GULZAR DEHLIVI POET : आनंद मोहन जुत्शी उर्दू अदब का वह रौशन सितारा जिसने साइंस को भी उर्दू की ज़बान दी

ज़िंदगी और कारनामे

आनंद मोहन जुत्शी उर्फ़ गुलज़ार देहलवी (7 जुलाई 1926 – 12 जून 2020) उर्दू अदब की उन नूरानी और दरख़्शाँ शख़्सियतों में शुमार किए जाते हैं जिन्होंने अपनी दिलनशीं शायरी, बा-वक़ार सहाफ़त और उर्दू ज़बान से बेपनाह मुहब्बत के ज़रिये हिन्दुस्तानी अदबी मंज़रनामे में एक नुमायाँ और पायेदार मुक़ाम हासिल किया। उनके नाम के साथ जुड़ा हुआ "देहलवी" महज़ एक निस्बती लफ़्ज़ नहीं, बल्कि शहर-ए-दिल्ली से उनकी गहरी रूहानी और तहज़ीबी वाबस्तगी का पता देता है, जहाँ उनकी फ़िक्र और तख़्लीक़ का सफ़र परवान चढ़ा।

पुरानी दिल्ली की इल्मी और तहज़ीबी फ़िज़ाओं में वाक़े कश्मीरी गली में पैदा होने वाले गुलज़ार देहलवी ने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान, उसकी तरक़्क़ी, फ़रोग़ और अदबी ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी। उनकी शख़्सियत इल्म, अदब, तहज़ीब और क़ौमी यकजहती की उन रौशन क़द्रों की अमीन थी, जिन्होंने न सिर्फ़ अपने अहद को मुतास्सिर किया बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी एक रोशन मिसाल क़ायम की। उनकी ज़िंदगी उर्दू अदब और सहाफ़त के साथ बेलौस मुहब्बत, ख़ुलूस-ए-अमल और ग़ैर-मुतज़लज़िल वाबस्तगी की एक ऐसी दरख़्शाँ दास्तान है, जो हमेशा याद रखी जाएगी।


गुलज़ार देहलवी महज़ उर्दू के एक मुमताज़ और यकता शायर ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने उर्दू अदब को जदीद साइंस, तहरीकी फ़िक्र और असरी तक़ाज़ों से हम-आहंग करके उसे नई जहतों से आश्ना किया। उनकी शख़्सियत उन चुनिंदा अहल-ए-क़लम में शुमार होती है जिन्होंने अपनी शायरी के ज़रिये न सिर्फ़ समाजी शऊर, तहज़ीबी अक़दार और इंसानी रवायात को फ़रोग़ दिया, बल्कि इल्म-ओ-दानिश, साइंसी फ़िक्र और जदीद मआरिफ़ की तर्वीज़ में भी अहम किरदार अदा किया।

उनका कलाम फ़िक्र-ओ-फ़न की ऐसी दिलआवेज़ तर्जुमानी करता है जिसमें अदब की लताफ़त, तहज़ीब की नफ़ासत और इल्म की रौशनी यकजा होकर नज़र आती है। यही वजह है कि गुलज़ार देहलवी का नाम उन दूरअंदेश शायरों में इज़्ज़त और एहतराम के साथ लिया जाता है जिन्होंने उर्दू शायरी को महज़ जज़्बात के इज़हार तक महदूद नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाजी बेदारी, फ़िक्र की बालीदगी और इल्मी आगाही का वसीला बनाया।

तालीम व इब्तिदाई ज़िंदगी

गुलज़ार देहलवी का जन्म 7 जुलाई 1926 को एक मुअज़्ज़ज़ और इल्मी-ओ-अदबी रिवायतों के अमीन कश्मीरी पंडित ख़ानदान में हुआ। उनके वालिद, पंडित त्रिभुवन नाथ "ज़ार" देहलवी, उर्दू और फ़ारसी ज़बान के नामवर आलिम, साहिबे-फ़ज़्ल अदबी शख़्सियत और दानिशवर उस्ताद थे। उन्होंने तक़रीबन चार दशकों तक दिल्ली यूनिवर्सिटी में तदरीसी ख़िदमात अंजाम देकर इल्म-ओ-अदब की शम्अ रौशन रखी और बेशुमार तलबा की ज़ेहनी व फ़िक्री तरबियत की।

गुलज़ार देहलवी ने अपने वालिद की सरपरस्ती, इल्मी निगहबानी और अदबी फ़िज़ा में परवरिश पाई। यही वजह थी कि बचपन ही से उनके ज़ेहन में शायरी, अदब और ज़बान की लताफ़तों के बीज पड़ गए थे। उनकी इब्तिदाई तालीम रामजस स्कूल और बी.वी.जे. संस्कृत स्कूल में हुई, जहाँ उन्होंने इल्म की बुनियादी मंज़िलें तय कीं। इसके बाद उन्होंने हिन्दू कॉलेज से मास्टर्स डिग्री हासिल की और अपने इल्मी सफ़र को नई वुसअतें बख़्शीं।

उनके घर का माहौल इल्म, अदब, तहज़ीब और फ़िक्र की रौशन रवायतों से मामूर था। यही अदबी और फ़िक्री फ़िज़ा आगे चलकर उनके शायिराना मिज़ाज, ज़ौक़-ए-अदब और उर्दू ज़बान से गहरी वाबस्तगी का सबब बनी। यूँ कहा जा सकता है कि गुलज़ार देहलवी की शख़्सियत की तामीर में उनके ख़ानदानी माहौल और वालिद की इल्मी विरासत ने बुनियादी किरदार अदा किया।

अदबी सफ़र और ख़िदमात

गुलज़ार देहलवी का अदबी सफ़र उर्दू शायरी की उस रौशन रवायत का हिस्सा है, जिसने फ़िक्र, एहसास और समाजी शऊर को नई बुलंदियाँ अता कीं। उन्होंने अपने कलाम के ज़रिये उर्दू अदब को महज़ जज़्बात और तख़य्युलात की दुनिया तक महदूद नहीं रहने दिया, बल्कि उसे असरी मसाइल, समाजी तग़य्युरात, तहज़ीबी अक़दार और क़ौमी हमआहंगी के मौज़ूआत से भी वाबस्ता किया। उनकी शायरी में दौर-ए-हाज़िर के समाजी, सियासी और सक़ाफ़ती हालात की अक्कासी बड़ी ख़ूबसूरती और फ़िक्री गहराई के साथ नज़र आती है।

गुलज़ार देहलवी की ख़िदमात का दायरा सिर्फ़ शायरी तक महदूद नहीं था। उन्होंने इल्म-ओ-दानिश, तालीम, सहाफ़त और साइंसी शऊर के फ़रोग़ में भी ग़ैर-मामूली किरदार अदा किया। उनकी दूरअंदेशी और इल्मी बसीरत का सबसे नुमायाँ शाहकार "साइंस की दुनिया" के नाम से उर्दू ज़बान की पहली साइंसी रसाले की इदारेत थी। सन 1975 में जारी होने वाला यह रसाला अपने नौइयत का एक बेमिसाल और तारीख़ी क़दम था, जिसने उर्दू ज़बान को जदीद साइंस और असरी मआरिफ़ से जोड़ने में अहम किरदार अदा किया।

इस रसाले के ज़रिये गुलज़ार देहलवी ने साइंसी मालूमात और जदीद तहक़ीक़ात को उर्दू ज़बान में आम क़ारी तक पहुँचाने की भरपूर कोशिश की, ताकि उर्दू ज़बान से वाबस्ता तबक़ा भी इल्म-ओ-फ़न की नई दुनिया से हमआहंग हो सके। यह पहल दरअसल उर्दू ज़बान को जदीद दौर के इल्मी तक़ाज़ों से जोड़ने और उसे एक ज़िंदा, मुतहर्रिक और कारआमद ज़बान के तौर पर मुस्तहकम करने की जद्दोजहद थी।

उर्दू अदब, क़ौमी यकजहती और इल्मी बेदारी के फ़रोग़ में उनकी ग़ैर-मामूली ख़िदमात के एतिराफ़ में उन्हें मुल्क के मुख़्तलिफ़ अदबी और क़ौमी इदारों की जानिब से कई अहम इज़ाज़ात और एहतिरामात से नवाज़ा गया। उनकी इक्यानवेंवीं सालगिरह के मौक़े पर मुल्क के नायब सदर की जानिब से ख़ुसूसी इकराम भी इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी था।

उनकी शायरी में वतन-दोस्ती, इंसानी हमदर्दी, समाजी ज़िम्मेदारी और क़ौमी वफ़ादारी के जज़्बात पूरी आब-ओ-ताब के साथ झलकते हैं। उनकी मशहूर नज़्म "ज़रूरत है उन नौजवानों की" को आज़ादी-ए-हिन्द के तारीख़ी लम्हों में विशेष अहमियत हासिल हुई, जब उसे लाल क़िले से पढ़ा गया और यों उनका पैग़ाम मुल्क भर में गूँज उठा। इस वाक़िए ने उन्हें एक क़ौमी शायर के तौर पर भी पहचान बख़्शी।

उनकी अहम तस्नीफ़ "कुल्लियात-ए-गुलज़ार" उनके तवील अदबी सफ़र, फ़िक्री विरसे और शायिराना कमालात का निचोड़ मानी जाती है। इस गिराँक़द्र मजमूए में उनकी चुनिंदा नज़्में, अशआर और अदबी तख़्लीक़ात शामिल हैं, जो उनके फ़न, फ़िक्र और शख़्सियत का मुकम्मल तआरुफ़ पेश करती हैं। यह किताब उर्दू अदब में उनके मुक़ाम और उनकी तख़्लीकी अजमत की एक ज़िंदा दस्तावेज़ की हैसियत रखती है।

ज़ाती ज़िंदगी

गुलज़ार देहलवी का ताल्लुक़ एक ऐसे मुअज़्ज़ज़, इल्मी और अदबी ख़ानदान से था जिसकी रवायतें इल्म, तहज़ीब और ज़बान-ओ-अदब की ख़िदमत से रौशन थीं। उनके वालिद, पंडित त्रिभुवन नाथ "ज़ार" देहलवी, उर्दू और फ़ारसी के नामवर आलिम, मुअतबर उस्ताद और साहिबे-इल्म शख़्सियत थे, जिन्होंने अपनी तदरीसी और अदबी ख़िदमात के ज़रिये बेशुमार अफ़राद की फ़िक्री और इल्मी रहनुमाई की। उनकी वालिदा, श्रीमती बृज रानी जुत्शी, भी इल्म-दोस्त, बाशऊर और तहज़ीबयाफ़्ता ख़ातून थीं। उन्होंने अपने फ़र्ज़ंद की ज़ेहनी परवरिश, अदबी रुजहान और तख़्लीक़ी सलाहियतों की परवान चढ़ाने में निहायत अहम किरदार अदा किया और हर मरहले पर उनकी हौसलाअफ़ज़ाई करती रहीं।

गुलज़ार देहलवी की घरेलू ज़िंदगी भी मोहब्बत, हमआहंगी और ख़ानदानी अक़दार की एक ख़ूबसूरत मिसाल थी। उन्होंने कविता जुत्शी से रिश्ता-ए-इज़्दिवाज में मुनसलिक होकर अपनी ज़िंदगी का नया बाब शुरू किया। इस ख़ुशगवार रफ़ाक़त से उन्हें दो औलादें नसीब हुईं—फ़र्ज़ंद अनूप और दुख़्तर मीना—जिन्होंने उनके ख़ानदानी हल्क़े को मुकम्मल किया।

उनके घराने में इल्म-ओ-अदब, तहज़ीब और फ़िक्री रवायतों का गहरा असर पाया जाता था। यही अदबी और सक़ाफ़ती माहौल उनकी शख़्सियत का अहम हिस्सा बन गया, जिसने उनकी ज़ाती ज़िंदगी और पेशेवर मसारिफ़ के दरमियान एक दिलकश तवाज़ुन क़ायम रखने में अहम किरदार अदा किया। यूँ कहा जा सकता है कि गुलज़ार देहलवी की ज़िंदगी में ख़ानदानी उसूल, इल्मी विरसा और अदबी फ़िज़ा ने उनकी शख़्सियत को वुसअत, गहराई और इस्तेहकाम अता किया।

शायर और सहाफ़ी के तौर पर शनाख़्त

गुलज़ार देहलवी उन नादिर और बहुजिहत शख़्सियतों में शुमार किए जाते हैं जिन्होंने शायरी और सहाफ़त, दोनों मैदानों में अपनी अलग और मुस्तहकम पहचान क़ायम की। वे महज़ एक ख़ुशफ़िक्र और साहिबे-फ़न शायर ही नहीं थे, बल्कि एक दूरअंदेश सहाफ़ी, बालीदा-फ़िक्र दानिशवर और असरी तक़ाज़ों से पूरी तरह वाक़िफ़ अहल-ए-क़लम भी थे। उन्होंने अपनी तख़्लीक़ात के ज़रिये रवायत की नफ़ासत और जिद्दत की ताज़गी को इस ख़ूबसूरती से यकजा किया कि उनका कलाम उर्दू अदब में एक मुन्फ़रिद पहचान का हामिल बन गया।

गुलज़ार देहलवी का यह पुख़्ता एतिक़ाद था कि अदब को महज़ माज़ी की यादगार समझकर उस तक महदूद कर देना उसके दायरा-ए-असर को मुख़्तसर कर देता है। उनके नज़दीक अस्ल अदब वही है जो अपने अहद की नब्ज़ पर हाथ रखे, हाल की ज़रूरतों को समझे और मुस्तक़बिल की राहों को भी मुनव्वर करे। इसी फ़िक्री रवैये के तहत उन्होंने उर्दू अदब और सहाफ़त को जदीद इल्म, साइंसी शऊर और असरी मआरिफ़ से हमआहंग करने की मुसलसल जद्दोजहद की।

उनकी शायरी महज़ अल्फ़ाज़ की आराइश नहीं, बल्कि जज़्बात, एहसासात और इंसानी क़द्रों की एक पुरअसर तर्जुमान थी। उनके कलाम में दर्द-ए-इंसानियत, मोहब्बत, हमदर्दी, अख़्लाक़ी ज़िम्मेदारी और समाजी शऊर की गहरी झलक दिखाई देती है। उन्होंने ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ रंगों, इंसानी तजरिबात और दौर-ए-हाज़िर के मसाइल को अपने अशआर और नज़्मों का मौज़ू बनाया, जिससे उनका कलाम हर तबक़े के क़ारी के दिल तक रसाई हासिल करता है।

चाहे इश्क़-ओ-मोहब्बत की नर्म लहरें हों, वतन-दोस्ती के पुरजोश जज़्बात हों, इंसानी भाईचारे का पैग़ाम हो या समाज के प्रति फ़र्ज़-शनासी का एहसास—गुलज़ार देहलवी ने हर मौज़ू को अपनी फ़िक्री गहराई और फ़न्नी महारत के साथ पेश किया। उनकी तख़्लीक़ात में उर्दू ज़बान की लताफ़त, बयान की शगुफ़्तगी और अदबी बुलंदी इस अंदाज़ से जलवागर होती है कि क़ारी बेक़रार हुए बग़ैर नहीं रह सकता।

यही वजह है कि गुलज़ार देहलवी का नाम उर्दू अदब और सहाफ़त की तारीख़ में एक ऐसी मुअतबर और मुनव्वर शख़्सियत के तौर पर दर्ज है, जिसने अपने फ़न, फ़िक्र और इल्मी बसीरत से न सिर्फ़ उर्दू ज़बान को नई वुसअतें अता कीं, बल्कि उसे जदीद दौर के इल्मी और फ़िक्री तक़ाज़ों से भी हमकिनार किया।

विसाल और अदबी विरसा

12 जून 2020 को गुलज़ार देहलवी इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहकर अपने ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी से जा मिले। कोविड-19 के बाद पैदा होने वाली पेचीदगियों के सबब उनका विसाल उर्दू अदब, सहाफ़त और इल्मी हल्क़ों के लिए एक गहरा सदमा साबित हुआ। उनके इंतिक़ाल से उर्दू दुनिया एक ऐसी रौशन फ़िक्र, दूरअंदेश और बहुजिहत शख़्सियत से महरूम हो गई, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी ज़बान-ओ-अदब, इल्म-ओ-दानिश और क़ौमी यकजहती के फ़रोग़ के लिए वक़्फ़ कर दी थी।

अगरचे उनका जिस्मानी सफ़र अपने इख़्तिताम को पहुँचा, लेकिन उनका फ़िक्री, अदबी और इल्मी विरसा आज भी पूरी आब-ओ-ताब के साथ ज़िंदा है। उनकी नज़्में, अशआर, तस्नीफ़ात और इल्मी कारनामे उनकी शख़्सियत की तरह आज भी अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों और ज़ेहनों को मुनव्वर कर रहे हैं। उन्होंने उर्दू अदब को महज़ तख़य्युल और जज़्बात की दुनिया तक महदूद नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जदीद साइंस, असरी शऊर और इल्मी अफ़कार से हमआहंग करके नई वुसअतें अता कीं। यही उनका वह कारनामा है जिसने उन्हें अपने अहद के मुमताज़ और मुन्फ़रिद अहल-ए-क़लम की सफ़ में ला खड़ा किया।

गुलज़ार देहलवी की तख़्लीक़ात आज भी अदब-दोस्त हल्क़ों में उसी दिलचस्पी, मोहब्बत और एहतिराम के साथ पढ़ी जाती हैं, जैसे उनके दौर-ए-हयात में पढ़ी जाती थीं। उनके कलाम में इंसान-दोस्ती, वतन-दोस्ती, समाजी बेदारी, अख़्लाक़ी क़द्रों और इंसानी जज़्बात की जो सच्ची अक्कासी मिलती है, वह हर दौर के क़ारी को अपनी जानिब मुतवज्जेह करती है।

उर्दू ज़बान के साथ उनकी वालिहाना वाबस्तगी, अदब की बेलौस ख़िदमत, इल्म के फ़रोग़ की मुसलसल जद्दोजहद और इंसानी क़द्रों के लिए उनकी फ़िक्र उन्हें हमेशा याद रखे जाने वाली शख़्सियतों में शामिल करती है। गुलज़ार देहलवी का नाम उर्दू अदब की तारीख़ में एक ऐसे रौशन सितारे की तरह दर्ज है जिसकी ताबानी आने वाली नस्लों की राहनुमाई करती रहेगी और जिसका फ़िक्री व अदबी विरसा सदियों तक अहल-ए-अदब के लिए सरमाया-ए-इफ़्तिख़ार बना रहेगा।

गुलज़ार देहलवी की शायरी, ग़ज़लें,नज़्मे 


1-ग़ज़ल 


एक काफ़िर अदा ने लूट लिया

उन की शर्म ओ हया ने लूट लिया


इक बुत ए बेवफ़ा ने लूट लिया

मुझ को तेरे ख़ुदा ने लूट लिया


आश्नाई बुतों से कर बैठे

आश्ना ए जफ़ा ने लूट लिया


हम ये समझे कि मरहम ए ग़म है

दर्द बन कर दवा ने लूट लिया


उन के मस्त ए ख़िराम ने मारा

उन की तर्ज़ ए अदा ने लूट लिया


हुस्न ए यकता की रहज़नी तौबा

इक फ़रेब ए नवा ने लूट लिया


होश ओ ईमान ओ-दीन क्या कहिए

शोख़ी ए नक़श ए पा ने लूट लिया


रहबरी थी कि रहज़नी तौबा

हम को फ़रमाँ रवा ने लूट लिया


एक शोला नज़र ने क़त्ल किया

एक रंगीं क़बा ने लूट लिया


हम को ये भी ख़बर नहीं 'गुलज़ार'

कब बुत ए बेवफ़ा ने लूट लिया


हाए वो ज़ुल्फ़ ए मुश्क बू तौबा

हम को बाद ए सबा ने लूट लिया


उन को 'गुलज़ार' मैं ख़ुदा समझा

मुझ को मेरे ख़ुदा ने लूट लिया

2-ग़ज़ल 

न सही हम पे इनायत नहीं पैमानों की

खिड़कियाँ खुल गईं आँखों से तो मय ख़ानों की


आ नहीं सकता समझ में कभी फ़र्ज़ानों की

सुर्ख़ रू कैसे जबीनें हुईं दीवानों की


ज़ुल्फ़ बिखराए सर ए शाम परेशान हैं वो

क़िस्मतें औज पे हैं चाक गरेबानों की


दास्ताँ कोहकन ओ क़ैस की फ़र्सूदा हुई

सुर्ख़ियाँ हम ने बदल डाली हैं अफ़्सानों की


आँखें तो भीग चुकीं और न प्यार आ जाए

और रूदाद सुनें आप न दीवानों की


मय कदे आने से पहले का ज़माना तौबा

ख़ाक छानी है हरम और सनम ख़ानों की


ज़ख़्म ए दिल को कोई मरहम भी न रास आएगा

हर गुल ए ज़ख़्म में लज़्ज़त है नमक दानों की


जाने कब निकले मुरादों की दुल्हन की डोली

दिल में बारात है ठहरी हुई अरमानों की


ज़ख़्म पर हँसते हैं अश्कों को गुहर कहते हैं

अक़्ल मारी गई इस दौर में इंसानों की


कितने मोमिन नज़र आते हैं सनम-ख़ानों में

एक काफ़िर नहीं बस्ती में मुसलमानों की


जितनी तज़हीक तिरे शहर में अपनों की हुई

उतनी तौहीन न होगी कहीं बेगानों की


रात बढ़ बढ़ के जो शम' पे हुए थे सदक़े

सुब्ह तक ख़ाक न देखी गई परवानों की

3-ग़ज़ल 


हरम ओ दैर की बस्ती में है तमईज़ ओ नफ़ाक़

कोई तफ़रीक़ ए मिलल देखी न दीवानों की


लोग क्यूँ शहर ए ख़मोशाँ को खिंचे जाते हैं

जाने क्या जान है इस बस्ती में बे जानों की


रुख़ बदलते हैं दोराहे पे खड़े हैं सालार

सइ' ए नाकाम तो देखे कोई नादानों की


हाथा छाँटी है  अजब और अजब लूट खसूट

निय्यतें और हैं शायद कि निगहबानों की


पूछे 'गुलज़ार' से है वो ब-ज़बान ए सौसन

तुम कहाँ बज़्म में आए हो ज़बाँ-दानों की

4-ग़ज़ल 


उस सितमगर की मेहरबानी से

दिल उलझता है ज़िंदगानी से


ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं

धुल गए नक़्श कितने पानी से


हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है

इन हसीनों की मेहरबानी से


और भी क्या क़यामत आएगी

पूछना है तिरी जवानी से


दिल सुलगता है अश्क बहते हैं

आग बुझती नहीं है पानी से


हसरत ए उम्र ए जावेदाँ ले कर

जा रहे हैं सरा ए फ़ानी से


हाए क्या दौर ए ज़िंदगी गुज़रा

वाक़िए हो गए कहानी से


कितनी ख़ुश फ़हमियों के बुत तोड़े

तू ने गुलज़ार ख़ुश बयानी से

1-नज़्म 


दिल्ली 

दिल्ली कि इस जहाँ में अज़ीम ओ क़दीम है 

इल्म ओ फ़न ओ हुनर की सदा से नईम है 

अल्लाह इस की अज़्मत ए दीं का अलीम है 

तफ़्सीर ए दिल हदीस ए ख़ुदी का फ़हीम है 

गीता पुरान के भी फ़साने में ज़िक्र है 

तारीख़ से भी क़ब्ल ज़माने में ज़िक्र है 

दिल्ली का पांडओं के तराने में ज़िक्र है 

इंदर प्रस्थ तक के सजाने में ज़िक्र है 

दिल्ली सदा से मरकज़ ए बज़्म ए शहाँ रही 

सम्राट चक्रवर्ती ओ शाह ए जहाँ रही 

पीराना साल हो के भी हर दम जवाँ रही 

पच्चीस बार लुट के भी ये कहकशाँ रही 

मंगोल' शक कुषाण द्राविड़ कि हून हों 

वो आरिया अरब हों कि अहल ए फ़ुनून हूँ 

वैदिक हों बोध जैन कि अहल ए जुनून हूँ 

क़ौम ए अरब के हों कि मुसलमाँ के ख़ून हों 

दुनिया की कितनी नस्लों ने इस को सजाया है 

हर धर्म दीन ज़ात ने इस को बसाया है 

सारे जहाँ में इश्क़ का मरकज़ रही सदा 

सारे जहाँ में डंका इसी शहर का बजा 

बर्बादियों से आज बचाओ उसे रफ़ीक़ 

'गुलज़ार' ए हिन्द फिर से बनाओ इसे रफ़ीक़ 

तबसरा:-

गुलज़ार देहलवी का नाम उर्दू अदब की उन मुअतबर और नूरानी शख़्सियतों में शुमार होता है जिनकी हयात और ख़िदमात महज़ एक फ़र्द की कामयाबी की दास्तान नहीं, बल्कि एक मुकम्मल तहज़ीबी, इल्मी और अदबी अहद की तर्जुमानी करती हैं। उन्होंने जिस दौर में क़लम उठाया, वह दौर फ़िक्री, समाजी और तहज़ीबी तब्दीलियों का दौर था; मगर गुलज़ार देहलवी ने इन तमाम तग़य्युरात के दरमियान उर्दू ज़बान की शाइस्तगी, उसकी इल्मी वुसअत और उसकी तहज़ीबी शिनाख़्त को न सिर्फ़ महफ़ूज़ रखा, बल्कि उसे नई फ़िक्री जहतों से भी आश्ना किया।

उनकी शख़्सियत में एक तरफ़ रवायत की गहराई थी तो दूसरी जानिब जिद्दत की रौशनी। वह उन कमयाब अहल-ए-क़लम में से थे जिन्होंने माज़ी की गिराँक़द्र रवायतों को सीने से लगाए रखते हुए मुस्तक़बिल की दस्तकों को भी सुना और समझा। उनकी फ़िक्र में तहज़ीब की नफ़ासत, इल्म की रोशनी, इंसानियत की गर्माहट और वतन-दोस्ती की सच्ची रूह यकजा दिखाई देती है।

गुलज़ार देहलवी का सबसे बड़ा कमाल यह है कि उन्होंने उर्दू अदब को महज़ जज़्बाती इज़हार का ज़रिया नहीं समझा, बल्कि उसे इल्म, शऊर और समाजी बेदारी का वसीला बनाया। उन्होंने यह साबित किया कि उर्दू ज़बान सिर्फ़ ग़ज़ल, नज़्म और अदबी लताफ़त की अमीन नहीं, बल्कि जदीद साइंस, तहक़ीक़ और फ़िक्री मुबाहिस की भी पूरी सलाहियत रखती है। यही वजह है कि उनकी अदबी और इल्मी ख़िदमात को एक नए ज़ाविये से देखने की ज़रूरत है, क्योंकि उन्होंने उर्दू को महज़ एक ज़बान नहीं, बल्कि एक ज़िंदा और मुतहर्रिक तहज़ीबी क़ुव्वत के तौर पर पेश किया।

उनका कलाम पढ़ते हुए महसूस होता है कि शायर सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं लिख रहा, बल्कि अपने दौर की रूह, अपने समाज की धड़कन और अपने वतन की तामीरी ख़्वाहिशों को आवाज़ दे रहा है। उनके अशआर में जज़्बात की सच्चाई, ख़याल की बुलंदी और बयान की शाइस्तगी इस ख़ूबसूरती से घुल-मिल जाती है कि क़ारी देर तक उनके असर से बाहर नहीं निकल पाता।

बिला-शुब्हा, गुलज़ार देहलवी का अदबी विरसा उर्दू दुनिया का एक गिराँबहा सरमाया है। उनकी ज़िंदगी इस हक़ीक़त की ज़िंदा मिसाल है कि जब इल्म, अख़्लाक़, तहज़ीब और फ़न एक शख़्सियत में जमा हो जाएँ तो वह अपने दौर की सरहदों से निकल कर तारीख़ का हिस्सा बन जाती है। गुलज़ार देहलवी भी ऐसी ही एक रौशन, बाकमाल और बा-वक़ार शख़्सियत थे, जिनकी याद, जिनका फ़न और जिनकी फ़िक्र आने वाली नस्लों के लिए हमेशा मशअल-ए-राह बनी रहेगी।

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