तआरुफ़
अली सरदार जाफ़री उर्दू अदब की उस रौशन और पुरअज़्म परम्परा के अहम शायर, अदीब, नक़्क़ाद, नाटककार, तरजुमान और फ़िल्मी नग़्मानिगार थे, जिन्होंने शायरी को महज़ हुस्न-ओ-इश्क़ की तफ़रीह नहीं रहने दिया, बल्कि उसे इंसान की आज़ादी, सामाजिक इंसाफ़, अम्न, मुश्तरका तहज़ीब और मज़लूम इंसान की आवाज़ बना दिया। उनकी शायरी में इंक़िलाबी तेवर भी है, रोमानी कैफ़ियत भी; अवामी दर्द भी है, हिन्दुस्तानी तहज़ीब की रंगारंगी भी; और सबसे बढ़कर इंसान से मुहब्बत का वह जज़्बा है जो उनकी पूरी अदबी ज़िन्दगी को एक मुत्तहिद रूह प्रदान करता है।
भारतीय अदब की तारीख़ में उनका नाम तरक़्क़ीपसन्द तहरीक के सबसे नुमायाँ चेहरों में शुमार होता है। उन्होंने अपने दौर की सियासी और सामाजिक हलचलों को सिर्फ़ बाहर से नहीं देखा, बल्कि उन्हें अपनी शायरी, नस्र और अदबी सरगर्मियों का हिस्सा बनाया। उनकी तख़्लीक़ में ज़िन्दगी के तल्ख़ तजुर्बात, इंक़िलाबी ख़्वाब, इंसानी बराबरी की तमन्ना और हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब का गहरा एहसास एक साथ दिखाई देता है।
भारतीय ज्ञानपीठ के मुताबिक़ उनका लेखकीय सफ़र 1938 में कहानी-संग्रह ‘मंज़िल’ की इशाअत से शुरू हुआ और बाद में उनके अनेक काव्य-संग्रह, नाटक, कहानी, याददाश्त-रिपोर्ताज और निबन्ध-संग्रह सामने आए। उनकी कई रचनाओं का मुख़्तलिफ़ हिन्दुस्तानी और बैरूनी ज़बानों में तर्जुमा हुआ।
पैदाइश और इब्तिदाई ज़िन्दगी
अली सरदार जाफ़री की पैदाइश 29 नवम्बर 1913 को बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में हुई। उनका बचपन अवध की उस फ़ज़ा में गुज़रा जहाँ ज़बान, तहज़ीब, मज़हबी रिवायत, लोक-संस्कृति और शायरी एक-दूसरे से गहरे तौर पर वाबस्ता थे।
अवध की ज़मीन ने उनकी ज़ेहनी और जज़्बाती तर्बियत में अहम किरदार अदा किया। आगे चलकर यही इलाक़ा उनकी शायरी में महज़ एक भौगोलिक सरज़मीन नहीं रहा, बल्कि याद, तहज़ीब और मुहब्बत की एक ज़िन्दा अलामत बन गया।
उनकी शायरी में अवध की ख़ाक, लखनऊ की रवायत, हिन्दुस्तान की मुश्तरका तहज़ीब और आम इंसान की ज़िन्दगी जिस तरह एक-दूसरे में घुलती दिखाई देती है, वह उनकी शख़्सियत की इब्तिदाई तहज़ीबी परवरिश से बेगाना नहीं है।
तालीम और ज़ेहनी बेदारी
अली सरदार जाफ़री ने अपनी तालीम बलरामपुर, लखनऊ, अलीगढ़ और दिल्ली में हासिल की। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िल हुए और इसी दौर में उनकी ज़ेहनी दुनिया में नयी सियासी और समाजी बहसों ने दस्तक दी।
अलीगढ़ में उन्हें उस दौर की तरक़्क़ीपसन्द और कम्यूनिस्ट विचारधारा से वाक़िफ़ियत हासिल हुई। उनकी सियासी सरगर्मियों की वजह से 1936 में उन्हें अलीगढ़ से ख़ारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में अपनी तालीम जारी रखी और ज़ाकिर हुसैन कॉलेज से 1938 में तालीमी मरहला पूरा किया।
बाद में उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी में पोस्टग्रेजुएट तालीम शुरू की, लेकिन 1940–41 के दौरान जंग-विरोधी नज़्में लिखने और सियासी सरगर्मियों में हिस्सा लेने के सिलसिले में गिरफ़्तारी के कारण उनकी तालीम मुकम्मल न हो सकी।
यह दौर उनके लिए सिर्फ़ तालीम का दौर नहीं था; यही वह ज़माना था जब उनका ज़ेहन अदब, सियासत और समाज के आपसी रिश्ते को नये सिरे से समझ रहा था।
मीर अनीस और जोश से अदबी रिश्ता
अली सरदार जाफ़री की इब्तिदाई अदबी तर्बियत पर मीर अनीस और जोश मलीहाबादी के असर का ख़ास तौर पर ज़िक्र मिलता है।
मीर अनीस से उन्हें बयान की वुसअत, जज़्बाती गहराई और मंजरनिगारी की रवायत मिली, जबकि जोश की शायरी में मौजूद बुलन्द आहंगी, इंक़िलाबी तेवर और ख़िताबी शान ने उनके शायराना मिज़ाज को प्रभावित किया।
बाद के दौर में जाफ़री ने इन असरात को अपनी अलग आवाज़ में ढाल दिया। उन्होंने न तो अतीत की महज़ तक़लीद की और न ही इंक़िलाब को सिर्फ़ नारे में तब्दील किया। उनके यहाँ शायरी एक ऐसे एहसास की शक्ल अख़्तियार करती है जिसमें इंसान, समाज और तारीख़ एक-दूसरे से गुफ़्तगू करते हैं।
तरक़्क़ीपसन्द तहरीक और अली सरदार जाफ़री
1930 और 1940 की दहाइयों में हिन्दुस्तानी अदब एक गहरी तब्दीली से गुज़र रहा था। अदब के एक बड़े हिस्से में यह एहसास मज़बूत हो रहा था कि शायर और अदीब को अपने दौर की सामाजिक हक़ीक़तों से बेनियाज़ नहीं रहना चाहिए।
तरक़्क़ीपसन्द मुसन्निफ़ीन की तहरीक इसी ज़ेहनी फ़ज़ा की अहम तहरीक थी और अली सरदार जाफ़री उसके नुमायाँ रहनुमाओं में शामिल हुए।
1936 में लखनऊ में तरक़्क़ीपसन्द मुसन्निफ़ीन की पहली अहम कॉन्फ़्रेंस से उनका रिश्ता कायम हुआ और बाद की अदबी सरगर्मियों में भी वह इस तहरीक से वाबस्ता रहे। 1939 में वह ‘नया अदब’ के सह-मुदीर बने, जो तरक़्क़ीपसन्द अदबी तहरीक से वाबस्ता एक अहम रिसाला था और 1949 तक जारी रहा।
उनके लिए तरक़्क़ीपसन्द अदब का मतलब सिर्फ़ सियासी नज़रिया नहीं था। वह अदब को इंसानी ज़िन्दगी की बेहतरी, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़, मेहनतकश तबक़े की मुश्किलात और एक बेहतर मुस्तक़बिल की तलाश का ज़रिया समझते थे।
अदबी सफ़र का आग़ाज़
अली सरदार जाफ़री का बाक़ायदा अदबी सफ़र 1938 में कहानी-संग्रह ‘मंज़िल’ की इशाअत से शुरू हुआ। इसके बाद 1944 में उनका पहला काव्य-संग्रह ‘परवाज़’ सामने आया।
‘परवाज़’ का नाम ही उनके शायराना मिज़ाज की एक ख़ूबसूरत ताबीर है। उनकी शायरी लगातार एक ऐसी परवाज़ की तलाश करती रही जिसमें इंसान अपनी महदूदियों से निकलकर एक बेहतर और इंसाफ़पसन्द दुनिया की तरफ़ बढ़ सके।
1948 से 1978 के बीच उनके कई अहम काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। इनमें ‘नयी दुनिया को सलाम’, ‘ख़ून की लकीर’, ‘अमन का सितारा’, ‘एशिया जाग उठा’, ‘पत्थर की दीवार’, ‘एक ख़्वाब और’, ‘पैरहन-ए-शरर’ और ‘लहू पुकारता है’ जैसी किताबें ख़ास अहमियत रखती हैं।
बाद के दौर में ‘अवध की ख़ाक-ए-हसीं’, ‘सुबह-ए-फ़र्दा’, ‘मेरा सफ़र’ और ‘सरहद’ जैसी किताबों ने उनकी शायराना दुनिया को और वसीअ किया।
भारतीय ज्ञानपीठ के अनुसार उनके अदबी सरमाये में 11 काव्य-संग्रहों के अलावा नाटक, कहानी, याददाश्त-रिपोर्ताज और निबन्ध-संग्रह भी शामिल हैं।
जाफ़री की शायरी का फ़िक्री मिज़ाज
अली सरदार जाफ़री की शायरी को सिर्फ़ ‘इंक़िलाबी शायरी’ कह देना उनके फ़न की पूरी वुसअत को समेट देना होगा।
उनकी शायरी में कई सतहें एक साथ काम करती हैं।
एक तरफ़ ज़ुल्म और इस्तिबदाद के ख़िलाफ़ आवाज़ है, दूसरी तरफ़ मुहब्बत और हुस्न का एहसास; एक तरफ़ सियासी बेदारी है, दूसरी तरफ़ इंसानी रिश्तों की नर्मी; एक तरफ़ जंग के ख़िलाफ़ ऐलान है, दूसरी तरफ़ अम्न की आरज़ू; और एक तरफ़ हिन्दुस्तान की सरज़मीन है, तो दूसरी तरफ़ पूरी इंसानियत से वफ़ादारी।
यही वजह है कि उनका शायराना सरमाया किसी एक दौर की सियासी दस्तावेज़ी तहरीर बनकर नहीं रह गया।
उनके यहाँ इंसानियत सबसे बड़ी क़द्र है।
वह ग़रीब, मज़दूर, किसान, मज़लूम, औरत, बच्चे और आम इंसान को अपनी शायरी के मरकज़ में लाते हैं। उनकी शायरी में इंक़िलाब का ख़्वाब है, मगर वह ख़्वाब इंसान की आज़ादी और वक़ार से जुड़ा हुआ है।
‘अवध की ख़ाक-ए-हसीं’ और हिन्दुस्तानी तहज़ीब
अली सरदार जाफ़री की शायरी का एक ख़ास पहलू उनकी तहज़ीबी शऊर है।
‘अवध की ख़ाक-ए-हसीं’ में वह हिन्दुस्तानी तारीख़, पुराणिक किरदारों, सामाजिक नाइंसाफ़ी और अवध की तहज़ीबी यादों को एक ही शायराना फ़लक पर ले आते हैं।
सीता, द्रौपदी और शकुन्तला जैसे किरदार उनके यहाँ महज़ माज़ी की दास्तानों के किरदार नहीं रहते; वह उन्हें इंसानी बेबसी, ज़ुल्म और औरत की सामाजिक स्थिति की अलामतों में तब्दील कर देते हैं।
इसी तरह अवध उनके यहाँ सिर्फ़ एक जगह नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की मुश्तरका तहज़ीब का इस्तिआरा बन जाता है।
यह पहलू जाफ़री की शायरी को महज़ सियासी शायरी से अलग करके एक वसीअ तहज़ीबी शायरी में तब्दील करता है।
अम्न, इत्तिहाद और सरहद
उनकी ज़िन्दगी के आख़िरी दौर में ‘सरहद’ विशेष अहमियत रखती है।
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तल्ख़ी के बावजूद जाफ़री का शायराना ख़्वाब सरहदों से परे इंसानी रिश्तों की तलाश करता रहा। उनकी निगाह में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच सिर्फ़ सियासी फ़ासला नहीं था; दोनों मुल्कों के बीच एक मुश्तरका ज़बान, तहज़ीब, याद और तारीख़ भी मौजूद थी।
1999 में अटल बिहारी वाजपेयी अपने लाहौर सफ़र के दौरान जाफ़री की किताब ‘सरहद’ अपने साथ ले गये और लाहौर में इसे एक राष्ट्रीय तोहफ़े के तौर पर पेश किया गया। जाफ़री को इस सफ़र में साथ चलने की दावत भी दी गयी थी, लेकिन ख़राब सेहत के कारण वह सफ़र न कर सके।
यह वाक़िआ उनकी शायरी के उस पहलू की बेहद ख़ूबसूरत तस्दीक़ करता है जिसमें अदब सियासी सरहदों से ऊपर उठकर इंसानी राब्ते और अम्न का पैग़ाम बन जाता है।
फ़िल्मी दुनिया से रिश्ता
अली सरदार जाफ़री ने फ़िल्मी अदब में भी अपनी सलाहियतों का इस्तेमाल किया। ‘धरती के लाल’ (1946) और ‘परदेसी’ (1957) जैसी फ़िल्मों के सिलसिले में उनकी नग़्मानिगारी का ज़िक्र मिलता है।
उनकी फ़िल्मी दिलचस्पी महज़ रोज़गार या शोहरत का ज़रिया नहीं थी। वह अवामी ज़ेहन तक पहुँचने वाले हर माध्यम को अदब और सामाजिक शऊर की इशाअत का ज़रिया समझते थे।
उनकी यही वुसअत-ए-नज़र उन्हें महज़ किताबों के शायर के बजाय एक ऐसे अदबी फ़नकार में तब्दील करती है जो रेडियो, फ़िल्म, नाटक, रिसाला और टेलीविज़न—हर माध्यम से राब्ता कायम करने की सलाहियत रखता था।
नाटक, तहक़ीक़ और टेलीविज़न
अली सरदार जाफ़री ने नज़्म और ग़ज़ल के अलावा नाटक और नस्र में भी काम किया। उन्होंने इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के लिए नाटक लिखे और कबीर, इक़बाल तथा आज़ादी जैसे मौज़ूआत पर दस्तावेज़ी काम भी किया।
उनका सबसे यादगार टेलीविज़न प्रोजेक्ट ‘कहकशाँ’ था। यह 18 कड़ियों पर मुश्तमिल धारावाहिक बीसवीं सदी के उन उर्दू शायरों की ज़िन्दगी और फ़न से मुतअल्लिक़ था जिनसे जाफ़री ख़ुद वाक़िफ़ थे—फ़िराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, मजाज़, हसरत मोहानी, मख़दूम मोहिउद्दीन और जिगर मुरादाबादी।
‘कहकशाँ’ की अहमियत सिर्फ़ इतनी नहीं कि उसने बड़े शायरों को टेलीविज़न के ज़रिये घर-घर पहुँचाया; उसकी असल क़ीमत यह थी कि जाफ़री ने अपनी ज़ाती याददाश्त और अदबी राब्ते को अवामी तज़करे की शक्ल दे दी।
इसी तरह ‘महफ़िल-ए-याराँ’ में उन्होंने मुख़्तलिफ़ शोबों से ताल्लुक़ रखने वाली शख़्सियात से गुफ़्तगू की।
मीर, ग़ालिब, कबीर और मीरा की तरफ़ वापसी
अली सरदार जाफ़री की अदबी निगाह सिर्फ़ अपने हमअस्रों तक महदूद नहीं थी। उन्होंने कबीर, मीर, ग़ालिब और मीरा बाई जैसे बड़े नामों के अदबी सरमाये को भी नये पाठकों के सामने पेश करने का काम किया।
यहाँ उनके फ़न की एक और ख़ूबी सामने आती है—वह रवायत और जदीदियत के बीच कोई दुश्मनी नहीं देखते थे।
उनके लिए मीर अतीत का महज़ शायर नहीं, ग़ालिब महज़ एक क्लासिकी उस्ताद नहीं और कबीर महज़ मज़हबी रवायत का नाम नहीं थे; वह सब इंसानी फ़िक्र और हिन्दुस्तानी तहज़ीब के ज़िन्दा सरमाये थे।
शायर के तौर पर उनका अस्ल मक़ाम
भारतीय ज्ञानपीठ ने उनकी शायरी की एक ख़ास ख़ूबी के तौर पर उनके अल्फ़ाज़ की वाज़ेहियत, ताक़त, रवानी और ऊँची लय को रेखांकित किया है। उनकी शायरी में अवामी ख़िताब की क़ुव्वत है और उनके बड़े नज़्मिया कैनवस में मंजरनिगारी का असर दिखाई देता है।
यही वजह है कि जाफ़री की नज़्म जब पढ़ी जाती है तो वह सिर्फ़ ज़ेहन तक नहीं पहुँचती; उसकी आवाज़ कानों में भी गूँजती है।
उनका शायराना लहजा ख़िताबी है, लेकिन ख़िताब के बावजूद उसमें फ़न की लय मौजूद है। वह मुश्किल फ़लसफ़ियाना इस्तिलाहात के बजाय ऐसे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल करते हैं जो अवाम तक सीधे पहुँच सकें।
यह उनकी सबसे बड़ी फ़नकाराना कामयाबियों में से एक है।
‘मेरा सफ़र’ और जाफ़री का शायराना विरसा
‘मेरा सफ़र’ उनके शायराना सफ़र का एक अहम मजमूआ है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित इसके तआरुफ़ में उनकी शायरी की सादगी, रवानी, सच्चाई और अवामी असर को ख़ास तौर पर रेखांकित किया गया है।
जाफ़री का ‘सफ़र’ सिर्फ़ उनकी ज़ाती ज़िन्दगी का सफ़र नहीं था।
यह उस हिन्दुस्तान का भी सफ़र था जो ग़ुलामी से आज़ादी तक पहुँचा; उस समाज का सफ़र था जो जदीद सियासी और समाजी तसव्वुरात से रूबरू हुआ; और उस उर्दू अदब का सफ़र था जो रवायती हुस्न से निकलकर नये इंसानी मसाइल की तरफ़ बढ़ा।
अलीगढ़ से डिग्री तक वापसी
अली सरदार जाफ़री की ज़िन्दगी का एक बेहद दिलचस्प और जज़्बाती पहलू अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उनका रिश्ता है।
जिस इदारे ने 1936 में उनकी सियासी सरगर्मियों के कारण उन्हें ख़ारिज किया था, उसी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने 1986 में उन्हें डी.लिट. की मानद डिग्री से नवाज़ा।
यह महज़ एक अदबी एज़ाज़ नहीं था; इसे जाफ़री की ज़िन्दगी के एक लम्बे सफ़र की तकमील के तौर पर भी देखा जा सकता है।
जिस नौजवान को कभी सियासी सरगर्मी के कारण इदारे से बाहर जाना पड़ा था, वही शख़्स दशकों बाद उसी इदारे की तरफ़ से इल्मी और अदबी एज़ाज़ हासिल कर रहा था।
यह वाक़िआ उनके अदबी क़द और वक़्त के साथ उनकी शख़्सियत की बढ़ती क़द्रदानी की ख़ूबसूरत मिसाल है।
एज़ाज़ और इनामात
अली सरदार जाफ़री को उनकी अदबी ख़िदमात के एतराफ़ में कई अहम एज़ाज़ात मिले।
उन्हें 1967 में पद्मश्री से नवाज़ा गया। उन्हें जवाहरलाल नेहरू फ़ेलोशिप भी हासिल हुई और इक़बाल-शिनासी के सिलसिले में पाकिस्तान सरकार की तरफ़ से गोल्ड मेडल समेत कई अदबी एज़ाज़ात से नवाज़ा गया।
लेकिन उनकी अदबी ज़िन्दगी का सबसे बुलन्द मरहला ज्ञानपीठ पुरस्कार था।
भारतीय ज्ञानपीठ की आधिकारिक सूची के मुताबिक़ अली सरदार जाफ़री को 1997 के लिए उर्दू अदब में बेमिसाल ख़िदमात के एतराफ़ में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। वह उर्दू के उन शुरुआती शायरों में शामिल हुए जिन्हें इस राष्ट्रीय सतह के अदबी एज़ाज़ से नवाज़ा गया।
भारतीय ज्ञानपीठ के अपने तआरुफ़ में भी उनके नाम के साथ 1997 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दर्ज है और उनकी ज़बान उर्दू बतायी गयी है।
उनके दूसरे एज़ाज़ात में उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, मख़दूम पुरस्कार, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पुरस्कार, इक़बाल सम्मान और महाराष्ट्र सरकार का संत ज्ञानेश्वर पुरस्कार भी शामिल रहे।
शख़्सियत और घरेलू ज़िन्दगी
अली सरदार जाफ़री की शादी जनवरी 1948 में सुल्ताना से हुई। उनके दो बेटे थे।
लेकिन उनकी शख़्सियत को सिर्फ़ घरेलू या निजी दायरे में देखना उनकी ज़िन्दगी की बड़ी तस्वीर को छोटा कर देना होगा। उनका अस्ल तआरुफ़ उनकी अदबी और फ़िक्री ज़िन्दगी से बनता है—एक ऐसी ज़िन्दगी जिसमें शायरी, सियासत, समाज, इंसाफ़ और इंसानियत लगातार एक-दूसरे से जुड़ते रहे।
विसाल
1 अगस्त 2000 को अली सरदार जाफ़री का मुम्बई में इंतिक़ाल हुआ। उनकी उम्र 89 बरस थी।
उनके इंतिक़ाल के बाद भी उनका अदबी सफ़र रुका नहीं। उनकी शायरी, तहरीरें और अदबी सरगर्मियाँ लगातार पढ़ी जाती रहीं। उनके पहले यौम-ए-विसाल की याद में 2001 में ‘Ali Sardar Jafri: The Youthful Boatman of Joy’ नाम से एक किताब शाया हुई, जिसे स्क्वाड्रन लीडर अनिल सहगल ने मुरत्तब किया था।
उनका विसाल एक फ़र्द की ज़िन्दगी का इख़्तिताम था, लेकिन उनकी शायरी का सफ़र उसके बाद भी जारी रहा।
अदबी असर और विरसा
अली सरदार जाफ़री का सबसे बड़ा विरसा शायद उनका कोई एक मजमूआ या एक नज़्म नहीं, बल्कि अदब के बारे में उनका तसव्वुर है।
उन्होंने यह साबित किया कि शायर अपने दौर की सियासी और सामाजिक हक़ीक़तों से आँखें चुराए बग़ैर भी शायरी को फ़न की बुलन्द सतह पर रख सकता है।
उन्होंने यह भी दिखाया कि इंक़िलाबी शायरी सिर्फ़ नारों का नाम नहीं; उसमें ख़्वाब, हुस्न, तारीख़, तहज़ीब, मुहब्बत और इंसानियत की गहरी तहें मौजूद हो सकती हैं।
उनकी शायरी में अमन सिर्फ़ जंग की मुख़ालफ़त नहीं है; वह इंसान के लिए एक बेहतर दुनिया की आरज़ू है।
उनके यहाँ इंक़िलाब सिर्फ़ हुकूमत बदलने का नाम नहीं; वह ज़ेहन, समाज और इंसानी रिश्तों की तब्दीली का तसव्वुर है।
उनके यहाँ वतन महज़ सरज़मीन नहीं; वह लोगों की याद, उनकी मुहब्बत, उनकी तहज़ीब और उनके साझा दुख-सुख का नाम है।
और उर्दू उनके लिए सिर्फ़ एक ज़बान नहीं; वह हिन्दुस्तान की मुश्तरका तहज़ीबी याददाश्त का एक अहम हिस्सा है।
अली सरदार जाफ़री की अदबी अहमियत
अली सरदार जाफ़री को उर्दू शायरी की तारीख़ में उस पुल की तरह देखा जा सकता है जो क्लासिकी रवायत और जदीद फ़िक्री शऊर के बीच क़ायम हुआ।
उन्होंने मीर, ग़ालिब, कबीर और मीरा जैसी रवायतों से रिश्ता बनाए रखते हुए अपने दौर के सवालों को शायरी का मौज़ू बनाया। उन्होंने तरक़्क़ीपसन्द तहरीक के ज़रिये अदब को समाज से जोड़ा और अपनी शायरी के ज़रिये अवाम की आवाज़ बनने की कोशिश की।
उनकी ख़ासियत यह रही कि उनका शायराना लहजा पुरअज़्म होते हुए भी अवामी, इंक़िलाबी होते हुए भी इंसानी, और सियासी होते हुए भी तहज़ीबी रहा।
यही वह संगम है जिसने अली सरदार जाफ़री को बीसवीं सदी के उर्दू अदब में एक मुमताज़ और मुस्तक़िल मक़ाम अता किया।
इख़्तितामी कलाम
अली सरदार जाफ़री की पूरी ज़िन्दगी को अगर एक ही जुमले में समेटने की कोशिश की जाए तो कहा जा सकता है कि वह ऐसे शायर थे जिन्होंने शायरी को इंसान की तरफ़ मोड़ दिया।
उनके लिए क़लम महज़ जमालियाती लुत्फ़ का ज़रिया नहीं था; वह ज़मीर की आवाज़ था।
उन्होंने अपने दौर के ज़ुल्म को देखा, उसकी मुख़ालफ़त की, अम्न का ख़्वाब देखा, इंसानी बराबरी की हिमायत की और हिन्दुस्तान की मुश्तरका तहज़ीब को अपनी शायरी में ज़िन्दा रखा।
उनकी शायरी का सबसे क़ीमती पहलू यही है कि उसमें माज़ी की याद, हाल का दर्द और मुस्तक़बिल का ख़्वाब एक साथ साँस लेते हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ के मुताबिक़ उनकी तख़्लीक़ात आज भी मुख़्तलिफ़ हिन्दुस्तानी और बैरूनी ज़बानों में पढ़ी और तरजुमा की जाती हैं।
अली सरदार जाफ़री का नाम इसलिए सिर्फ़ एक कामयाब शायर का नाम नहीं है। वह उस अदबी रवायत का नाम है जिसमें इंसाफ़ एक ख़्वाब नहीं बल्कि मक़सद, अमन एक नारा नहीं बल्कि ज़रूरत, और शायरी महज़ अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि ज़मीर की ज़िम्मेदारी बन जाती है।
इसीलिए उनका अदबी सफ़र ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं हुआ।
उनकी किताबें बाक़ी हैं, उनकी नज़्में बाक़ी हैं, उनका फ़िक्री सरमाया बाक़ी है—और सबसे बढ़कर वह इंसानी उम्मीद बाक़ी है जिसे उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी अपने क़लम से रोशन रखने की कोशिश की।
अली सरदार जाफ़री उर्दू अदब की उस रौशन कड़ी का नाम हैं जो माज़ी की रवायत को मुस्तक़बिल की उम्मीद से जोड़ती है।
अली सरदार जाफरी की शायरी,ग़ज़लें,नज़्में
1-ग़ज़ल
2-ग़ज़ल
3-ग़ज़ल
4-ग़ज़ल
5-नज़्म
तब्सरा:-
अली सरदार जाफ़री की शख़्सियत और फ़न
अली सरदार जाफ़री की शख़्सियत और फ़न का मुतालिआ किया जाए तो सबसे पहले यह एहसास सामने आता है कि वह महज़ एक शायर नहीं थे, बल्कि अपने अहद के ज़ेहनी, समाजी और तहज़ीबी शऊर के एक नुमायाँ तर्जुमान थे। उनकी शायरी में जिस तरह इंक़िलाबी फ़िक्र, इंसानी हमदर्दी, मुहब्बत, अम्न, आज़ादी और सामाजिक इंसाफ़ की आवाज़ एक-दूसरे में घुली हुई दिखाई देती है, वह उन्हें बीसवीं सदी के उर्दू अदब में एक मुमताज़ और मुतफ़र्रिद मक़ाम अता करती है। उनकी शख़्सियत में एक तरफ़ इंक़िलाबी सरगर्मी की गर्मी थी तो दूसरी तरफ़ अदब और तहज़ीब की वह नर्मी भी थी जो एक बड़े फ़नकार की पहचान होती है।
जाफ़री की असल क़ुव्वत यह थी कि उन्होंने अपने ज़माने को सिर्फ़ देखा नहीं, बल्कि उसे महसूस किया, समझा और अपनी तख़्लीक़ का हिस्सा बनाया। उनकी शायरी में ज़िन्दगी अपने तमाम रंगों और तल्ख़ियों के साथ दाख़िल होती है। ग़रीबी, नाइंसाफ़ी, जंग, इस्तिबदाद, मज़लूमियत और समाजी बेबसी उनके लिए महज़ सियासी मौज़ूआत नहीं थे; इन तमाम मसाइल के पीछे उन्हें एक ज़ख़्मी इंसान दिखाई देता था। यही वजह है कि उनकी इंक़िलाबी शायरी महज़ नारेबाज़ी नहीं बनती। उसके पीछे एक गहरी इंसान-दोस्ती और इंसानी वक़ार की तलाश मौजूद रहती है।
अली सरदार जाफ़री की शख़्सियत में एक ख़ास तरह की रूहानी बेचैनी थी। वह अपने दौर की नाइंसाफ़ियों को देखकर मुतमइन नहीं रह सकते थे। उनके यहाँ शायर का किरदार महज़ तमाशाई का नहीं बल्कि एक ऐसे ज़िम्मेदार शख़्स का है जो अपने समाज के दर्द में शरीक होता है। इस लिहाज़ से जाफ़री की शायरी को पढ़ना उनके दौर के ज़ेहनी और समाजी इतिहास को पढ़ने के बराबर है। मगर यहाँ यह बात भी अहम है कि उन्होंने अदब को सिर्फ़ सियासत का औज़ार नहीं बनाया; उन्होंने सियासत को भी इंसानी एहसास, तहज़ीब और नैतिक ज़िम्मेदारी के आईने में देखने की कोशिश की।
उनकी शायरी का सबसे बड़ा फ़न अवामी राब्ता है। वह उन शायरों में से हैं जिन्होंने मुश्किल फ़लसफ़ियाना बातों को भी ऐसी ज़बान में कहने की कोशिश की जो आम आदमी के दिल तक पहुँच सके। उनके अल्फ़ाज़ में ख़िताबी क़ुव्वत है, लेकिन वह महज़ तक़रीर नहीं बनते; उनमें शायराना रवानी और लय मौजूद रहती है। उनकी नज़्में अक्सर एक ऐसे मुसलसल बहाव के साथ आगे बढ़ती हैं जिसमें ख़याल, जज़्बा और तसव्वुर एक-दूसरे को ताक़त देते हैं। यही वजह है कि जाफ़री की शायरी को सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, उसे सुना और महसूस भी किया जा सकता है।
उनके फ़न का दूसरा अहम पहलू उनका तारीखी और तहज़ीबी शऊर है। जाफ़री अपने माज़ी से बेख़बर शायर नहीं थे। मीर, ग़ालिब, कबीर, मीरा और इक़बाल जैसी रवायतों से उनका रिश्ता महज़ इल्मी नहीं था; वह इस पूरी तहज़ीबी विरासत को अपने ज़माने के सवालों के साथ जोड़कर देखते थे। इसी वजह से उनकी शायरी में हिन्दुस्तान की मिट्टी, उसकी तहज़ीब, उसकी लोक-याददाश्त और उसकी मुश्तरका रिवायत बार-बार सामने आती है।
‘अवध की ख़ाक-ए-हसीं’ इसका एक शानदार उदाहरण है। यहाँ अवध सिर्फ़ एक इलाक़ा नहीं रहता, बल्कि हिन्दुस्तानी तहज़ीब की एक बड़ी अलामत बन जाता है। सीता, द्रौपदी और शकुन्तला जैसे किरदारों को वह अपने अहद के समाजी सवालों से जोड़ते हैं। यह उनके फ़न की वह सलाहियत है जिसमें माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल एक ही शायराना फ़लक पर आ जाते हैं। उनके लिए तारीख़ महज़ गुज़रे हुए वाक़िआत का सिलसिला नहीं बल्कि आज के इंसान को समझने का ज़रिया है।
जाफ़री की शायरी में मुहब्बत और इंक़िलाब एक-दूसरे के मुख़ालिफ़ नहीं बल्कि एक-दूसरे के तकमीलकुन दिखाई देते हैं। उनके यहाँ इश्क़ महज़ फ़र्द की ज़ाती कैफ़ियत नहीं है। वह मुहब्बत को इंसान से इंसान के रिश्ते, समाज से वफ़ादारी और दुनिया को बेहतर बनाने की तमन्ना से जोड़ देते हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी में रोमानी जज़्बा भी अपनी जगह रखता है और सामाजिक ज़िम्मेदारी भी।
एक नक़्क़ाद की नज़र से देखा जाए तो जाफ़री के फ़न की सबसे बड़ी ख़ूबी और उसकी सबसे बड़ी चुनौती दोनों एक ही जगह मौजूद हैं—उनकी शायरी का फ़िक्री इरादा बहुत वाज़ेह है। वह अपने मौक़िफ़ को छुपाते नहीं। वह साफ़-साफ़ इंसाफ़, आज़ादी, अम्न और सामाजिक बराबरी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। कभी-कभी यही वाज़ेह फ़िक्री तेवर उनकी शायरी को ख़िताबी और सीधे बयान की तरफ़ ले जाता है, जहाँ शायराना इशारे की जगह ऐलान की आवाज़ बुलन्द हो जाती है। लेकिन यही जाफ़री की फ़नकाराना पहचान भी है। उन्होंने जान-बूझकर ऐसी शायरी लिखी जिसे अवाम समझ सके और जिसके ज़रिये वह अपने अहद से सीधा संवाद कर सकें।
इसी बिंदु पर जाफ़री को सिर्फ़ तरक़्क़ीपसन्द शायर कह देना भी उनके फ़न को सीमित कर देता है। उनकी अदबी दुनिया में तरक़्क़ीपसन्द फ़िक्र एक बुनियादी ज़मीन ज़रूर है, मगर उसके ऊपर तहज़ीबी याद, रोमानी एहसास, तारीखी चेतना और इंसानी हमदर्दी की कई मंज़िलें क़ायम हैं। उनकी शायरी का फ़लक सियासी नारे से कहीं ज़्यादा वसीअ है।
उनकी शख़्सियत का एक और दिलचस्प पहलू मुबाहिसे और मुख़ालफ़त से न घबराने वाला मिज़ाज है। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में सियासी और अदबी दोनों तरह के इख़्तिलाफ़ात देखे। गिरफ़्तारी, तहरीक़ी सरगर्मियाँ और अदबी बहसें उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा रहीं। मगर उन्होंने अपने फ़िक्री मौक़िफ़ से आसानी से दस्तबरदार होना गवारा नहीं किया। यही बेबाकी उनके शायराना लहजे में भी दिखाई देती है।
जाफ़री की नक़्क़ादाना अहमियत को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वह सिर्फ़ शायर नहीं थे; उन्हें उर्दू की बड़ी अदबी रवायतों का गहरा शऊर था। मीर और ग़ालिब से लेकर कबीर और मीरा तक उनके अदबी सरोकार यह साबित करते हैं कि उनकी निगाह सिर्फ़ अपने दौर की तख़्लीक़ तक महदूद नहीं थी। वह अदब को एक मुसलसल रवायत की तरह देखते थे, जिसमें हर नया शायर अपने से पहले आने वाली आवाज़ों से गुफ़्तगू करता है।
उनका फ़न एक और मायने में अहम है कि उन्होंने अदब और अवाम के बीच फ़ासला कम किया। रिसाला, किताब, नाटक, फ़िल्म, टेलीविज़न और मुशायरे—उन्होंने मुख़्तलिफ़ ज़रियों को अपनाया। ‘कहकशाँ’ जैसे टेलीविज़न प्रोजेक्ट के ज़रिये उन्होंने बीसवीं सदी के बड़े उर्दू शायरों को नयी नस्ल के सामने पेश किया। यह काम महज़ प्रसारण नहीं था; यह अदबी याददाश्त की हिफ़ाज़त का एक अहम तरीक़ा था।
अली सरदार जाफ़री की शख़्सियत में रहबरी और रिफ़ाक़त दोनों का रंग था। वह अपने हमअस्रों के सिर्फ़ नक़्क़ाद या शायर नहीं थे; उनसे राब्ता भी रखते थे और उनकी अदबी दुनिया को आने वाली नस्लों तक पहुँचाने की कोशिश भी करते थे। ‘कहकशाँ’ में फ़िराक़, जोश, मजाज़, हसरत मोहानी, मख़दूम और जिगर जैसे शायरों को पेश करना इस बात की मिसाल है कि वह अपने अहद के अदबी कारनामे को एक सामूहिक विरासत की तरह देखते थे।
उनकी शायरी का एक बड़ा कमाल यह भी है कि उसमें सरहदों के पार इंसानी रिश्ता बार-बार उभरता है। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की तल्ख़ी के दौर में भी वह दोनों तरफ़ की मुश्तरका ज़बान और तहज़ीब को याद करते रहे। ‘सरहद’ इसी फ़िक्र का शायराना इज़हार है। अटल बिहारी वाजपेयी का 1999 के लाहौर सफ़र में ‘सरहद’ को साथ ले जाना इस बात की ख़ूबसूरत मिसाल है कि कभी-कभी अदब वह काम कर देता है जो सियासत नहीं कर पाती—दो दिलों के बीच एक राब्ता क़ायम करना।
एक बड़े नक़्क़ाद की हैसियत से जाफ़री के फ़न पर बात करते हुए यह भी कहना ज़रूरी है कि उनकी शायरी का क़द उसकी फ़िक्री सच्चाई और इंसानी वफ़ादारी से बनता है। वह फ़न को ज़िन्दगी से काटकर नहीं देखते। उनके लिए ख़ूबसूरती का अस्ल मतलब भी ज़िन्दगी की बेहतरी से जुड़ा हुआ है। इसलिए उनकी शायरी में फूल और ख़ुशबू जितने अहम हैं, उतने ही भूख, ग़रीबी, जंग और ज़ुल्म भी अहम हैं।
उनका शायराना सफ़र दरअसल ख़्वाब और हक़ीक़त के बीच मुसलसल कशमकश का सफ़र है। वह हक़ीक़त की तल्ख़ियों से वाक़िफ़ हैं, मगर उससे मायूस नहीं होते। वह बार-बार एक नयी दुनिया का ख़्वाब देखते हैं। यही ख़्वाब उनकी शायरी को महज़ शिकायत की शायरी बनने से बचाता है।
अली सरदार जाफ़री की सबसे बड़ी फ़नकाराना कामयाबी शायद यह है कि उन्होंने उम्मीद को अदबी क़ीमत अता की। उनकी शायरी में अँधेरा है तो उसके साथ सुबह का तसव्वुर भी है; ज़ुल्म है तो उसके मुक़ाबले में इंसानी हिम्मत भी है; सरहद है तो उसके पार मुहब्बत भी है; और मौत है तो उसके सामने ज़िन्दगी की मुसलसल जद्दोजहद भी है।
इसीलिए अली सरदार जाफ़री को सिर्फ़ एक तरक़्क़ीपसन्द शायर, एक सियासी अदीब या एक इंक़िलाबी आवाज़ के तौर पर पढ़ना उनके फ़न के साथ नाइंसाफ़ी होगी। वह बीसवीं सदी के हिन्दुस्तानी उर्दू अदब की एक मुकम्मल तहज़ीबी शख़्सियत थे—ऐसे अदीब जिनके यहाँ शायरी, तारीख़, सियासत, इंसानियत और तहज़ीब एक-दूसरे से जुदा नहीं बल्कि एक ही रूह के मुख़्तलिफ़ इज़हार हैं।
उनकी शायरी की अस्ल ताक़त इस बात में है कि वह अपने अहद से गुफ़्तगू करते हुए भी अपने अहद में क़ैद नहीं हो जाती। उनके कई सियासी और समाजी मौज़ूआत अपने ज़माने से वाबस्ता थे, मगर इंसाफ़, अम्न, आज़ादी, इंसानी बराबरी और मुहब्बत जैसे उनके बुनियादी सरोकार आज भी उतने ही मौज़ूँ हैं।
अली सरदार जाफ़री का फ़न दरअसल इंसान के हक़ में लिखी गयी एक लम्बी, पुरअज़्म और रौशन तहरीर है। उन्होंने क़लम को हथियार बनाया तो उसमें नफ़रत नहीं, इंसाफ़ था; उन्होंने इंक़िलाब का ख़्वाब देखा तो उसमें सिर्फ़ निज़ाम की तब्दीली नहीं, इंसान की तक़दीर की तब्दीली थी; उन्होंने वतन से मुहब्बत की तो उसमें तंगनज़री नहीं, पूरी इंसानियत के लिए गुंजाइश थी।
और यही वह मक़ाम है जहाँ अली सरदार जाफ़री एक शायर से बढ़कर अपने अहद के ज़मीर के शायर बन जाते हैं।ये भी पढ़ें
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