Anees Amrohvi Poet,Journalist: अमरोहा से आलम-ए-अदब तक: एक रूहानी तख़्लीक़कार की दास्तान

अनीस अमरोहवी उर्दू अदब की उस ख़ामोश रिवायत के अमीन हैं, जहाँ फ़न की बुलंदी का शोर नहीं, बल्कि उसके असर की गूंज दिलों में देर तक महसूस होती रहती है। उनकी ज़िंदगी एक ऐसे तख़्लीक़ी मुसाफ़िर की दास्तान है, जिसने शोहरत के बाज़ार से दूर रहकर अपनी रूहानी और तख़य्युली दुनिया को ख़ामोशी की रौशन गलियों में पनपने दिया। 5 दिसम्बर 1954 को जन्मे अनीस साहब ने तालीम M.Com. तक हासिल की, मगर उनका असल सफ़र उस जहान से जुड़ा जहाँ अल्फ़ाज़ महज़ इबारत नहीं रहते, बल्कि एहसास की ज़िंदा तर्जुमानी बन जाते हैं।

दिल्ली के लक्ष्मी नगर में उनका अदबी आशियाना बरसों से इल्म, फ़िक्र और तख़्लीक़ का एक पुरसुकून मरकज़ बना हुआ है। उनकी शख़्सियत में उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी—तीनों ज़बानों की रवानी इस ख़ूबसूरती से घुली हुई है कि उनकी तहरीरों में हर ज़बान का लुत्फ़ और हर तहज़ीब की गरमी महसूस होती है। वह उन फ़नकारों में से हैं जिनके यहाँ ज़बान महज़ ज़रिया नहीं, बल्कि तहज़ीब और तजुर्बे की अमानत बन जाती है।

अनीस अमरोहवी का अदबी सफ़र बहुआयामी है—वह सिर्फ़ एक मुसन्निफ़ नहीं, बल्कि एक मुकम्मल अदबी शख़्सियत हैं, जिनकी क़लम ने समाज, सहाफ़त और मीडिया—तीनों को एक साथ रोशन किया। Writer, Editor, Publisher, Producer और Director के तौर पर उन्होंने जिस पुख़्तगी और संजीदगी का मुज़ाहिरा किया, वह उन्हें अपने दौर के मुमताज़ फ़नकारों में शामिल करता है।

उनकी तहरीरों में बीते हुए लम्हों की महक, इंसानी रिश्तों की नर्मी और समाजी एहसास की गहराई एक साथ महसूस होती है। वह यादों को महज़ बयान नहीं करते, बल्कि उन्हें इस तरह जीते हैं कि क़ारी भी उन लम्हों का हिस्सा बन जाता है। उनकी अदबी खिदमत सिर्फ़ तख़्लीक़ तक महदूद नहीं रही, बल्कि उन्होंने पब्लिशिंग और एडिटोरियल ज़िम्मेदारियों के ज़रिये भी उर्दू अदब को नई ज़िंदगी बख़्शी।


अदबी सफ़र — जहां तख़लीक़ियत भी और तअल्लुक़ भी

अनीस अमरोहवी सिर्फ़ लेखक नहीं—बल्कि एक ऐसे फ़नकार हैं जिनकी क़लम और जिनकी सोच ने समाज, अदब और स्क्रीन—तीनों को रोशन किया।
Writer, Editor, Publisher, Producer, Director—हर फ़न में माहिर, हर हुनर में पुख़्ता।

उनकी लिखी किताबें Pas-e-Parda,Woh Bhi Ek Zamana Tha और Wo Jin Ki Yaad Aati Hai—बीते हुए दौर की महक और उन शख़्सियतों की धड़कन हैं जिनकी याद आज भी अदब में जिंदा है।

उनके लिखे हुए कई अफ़साने, दर्जनों आलेख और मोहब्बत से बुने सांस्कृतिक-फ़लसफ़ाना essays भारत के नामचीन अख़बारों और जर्नल्स में छपे।
वे लंबे अरसे तक कई अख़बारों में कॉलमिस्ट रहे और कई टेलीविज़न कार्यक्रमों में Artist व Compere के रूप में भी नज़र आए।

अहम किताबें (तस्नीफ़ात)

उनकी तख़्लीक़ात में कुछ किताबें ख़ास तौर पर उनकी फ़िक्र और फ़न की पहचान बनकर उभरती हैं—

  • “Pas-e-Parda”
  • “Woh Bhi Ek Zamana Tha”
  • “Wo Jin Ki Yaad Aati Hai”

ये किताबें महज़ अफ़सानों या यादों का मजमूआ नहीं, बल्कि एक मुकम्मल तहज़ीबी दस्तावेज़ हैं, जिनमें गुज़रे हुए दौर की रूह, उसके एहसासात और उसकी इंसानी गर्माहट पूरी शिद्दत के साथ महफ़ूज़ है।

अनीस अमरोहवी की अदबी खिदमत का एक बहुत बड़ा पहलू उनकी पब्लिशिंग और सहाफ़ती ज़िम्मेदारियाँ हैं। उन्होंने STAR SAHITYA, MOVIE STAR, HINDI STAR, STAR COMICS, MENKA और SUSPENSE KAHANIYAN जैसे अहम रिसालों में एडिटोरियल ओहदों पर रहकर अपनी दूरअंदेशी और अदबी शऊर का सबूत दिया। TAKHLEEQKAR PUBLISHERS के तहत 350 से अधिक उर्दू किताबों की इशाअत उनके उस अज़्म और जुनून की मिसाल है, जो अदब की ख़िदमत को एक मिशन बना देता है।

कैमरे की दुनिया में भी उनकी तख़्लीक़ी रौशनी उतनी ही तेज़ है। “Apna Jahan”, “Miti Dhundh Jag Chanan Hoya” और “Raju Aur Uran Tashtari” जैसे प्रोजेक्ट्स उनके फ़न की वुसअत को बयान करते हैं, जबकि “Wapsi Sey Pehley”, “Ek Nai Subah” और “Urdu Theatre After Independence” जैसी डॉक्यूमेंट्रीज़ उनके समाजी शऊर और तहक़ीक़ी नज़र की गवाही देती हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी के साथ उनकी वाबस्तगी ने उन्हें एक ऐसे फ़नकार के तौर पर पेश किया, जो अदब को महज़ लिखता ही नहीं, बल्कि उसे ज़िंदगी के हर शोबे में महसूस भी कराता है।

एवार्ड्स और इज़ाज़ात

उनकी अदबी और सहाफ़ती खिदमत को कई अहम इज़ाज़ात से नवाज़ा गया, जो उनके फ़न की पुख़्तगी और उनकी फ़िक्र की अहमियत को रौशन करते हैं—

Delhi Urdu Academy Awards

  • 2015 – “Wo Jin Ki Yaad Aati Hai”
  • 2010 – “Pas-e-Parda”

Uttar Pradesh Urdu Academy Awards

  • “Pas-e-Parda”
  • “Woh Bhi Ek Zamana Tha”

International Recognition

  • Shah Lateef Award (Lahore, Pakistan) – Indo-Pak friendly journalism में अहम योगदान

Munshi Nawal Kishore Awards

  • 1993
  • 1998
  • 2003

ये तमाम एवार्ड्स उनकी शोहरत के नहीं, बल्कि उनकी बे-लौस अदबी खिदमत और उनकी गहरी इंसानी फ़िक्र के मोहरदार सबूत हैं।

Delhi Urdu Academy Award Receiving Mr.Anees Amrohvi  

आज “Qissey” जैसे मुअतबर उर्दू अदबी रिसाले के Chief Editor के तौर पर अनीस अमरोहवी नई नस्ल के लिए एक रहनुमा की हैसियत रखते हैं। वह सिर्फ़ लिखने का मौक़ा नहीं देते, बल्कि तख़्लीक़ का सलीक़ा और अदब का शऊर भी अता करते हैं।

Glimpses from the Successful Life of Anees Amrohvi

उनकी शख़्सियत दरअसल उन ख़ामोश रौशनियों की मिसाल है, जो बिना चकाचौंध के भी रास्ते रोशन करती हैं। उनकी तहरीरों में सन्नाटा भी है और सरगोशी भी, दर्द भी है और उम्मीद की एक महीन लौ भी। अनीस अमरोहवी एक ऐसे मुसाफ़िर हैं, जो जहाँ से गुज़रते हैं वहाँ अदब, तहज़ीब और फ़िक्र की ख़ुशबू छोड़ जाते हैं—और यही ख़ुशबू उन्हें उर्दू अदब में हमेशा ज़िंदा रखेगी।


एडिटोरियल, पब्लिशिंग और सहाफ़त (पत्रकारिता)

अनीस अमरोहवी ने अदब की दुनिया में मजबूत और स्थायी पहचान बनाने के लिए कई संस्थानों में अहम जिम्मेदारियाँ निभाईं—

  • Editor – Hindi Monthly STAR SAHITYA

  • Joint Editor – Urdu Monthly MOVIE STAR, Hindi HINDI STAR, और STAR COMICS – Star Publications Pvt. Ltd.

  • Production Executive & In-charge – Urdu Department, Star Publication Pvt. Ltd.

  • Co-editor – Hindi Film Monthly MENKA और SUSPENSE KAHANIYAN

उनके कई short stories, essays और articles भारत के प्रतिष्ठित जर्नल्स और अख़बारों में छपे।


Producer / Director — कैमरे, कहानी और हकीकत की दुनिया

अनीस साहब की तख़लीक़ कैमरे की रोशनी में भी उतनी ही जगमगाती है जितनी किताबों के पन्नों पर।
उन्होंने कई serials, telefilms, documentaries और cultural कार्यक्रमों को लिखा, निर्देशित और प्रस्तुत किया।

फ़िल्में और Serial (पहले हिस्से से):

  • Apna Jahan – Art Fiction Serial (DD Bombay)

  • Miti Dhundh Jag Chanan Hoya – National Integration Telefilm

  • Raju Aur Uran Tashtari – बच्चों के लिए विज्ञान-फंतासी Serial

Documentary / Serial (पहले बताए गए):

  1. WAPSI SEY PEHLEY – कश्मीरी प्रवासियों पर आधारित 5-एपिसोड डॉक्यूमेंट्री

  2. EK NAI SUBAH – आतंकवाद-विरोधी गतिविधियों पर आधारित 60 मिनट की फ़िल्म

  3. URDU THEATRE AFTER INDEPENDENCE – आज़ादी के 50 वर्ष पर आधारित 4-एपिसोड सीरियल


मख़सूस  ( प्रमुख ) फ़िल्मी व टेलीविजन कार्य

  1. AUR GANGARAM SAMAJH GAYA
    – (Prod. Controller) दिल्ली दूरदर्शन के लिए परिवार कल्याण पर आधारित 30 मिनट की फ़िल्म।

  2. EK AKELA
    – (Asst. Director & Actor) NCERT के Teachers Education Training पर 20 मिनट की फ़िल्म, Producer/Director: Aakash Ahuja।

  3. GANGA JAMUNA
    – (Asst. Director & Actor) श्री एसिड्स एंड बायो-केमिकल्स, गजरौला (U.P.) के लिए 15 मिनट की कॉर्पोरेट फ़िल्म।

  4. BAZM
    – (Comparer & Participant) किताब और Jamhuriyat Mein Urdu Fankaron Ka Hissa जैसे कई प्रोग्राम, दिल्ली दूरदर्शन।

  5. KEHKASHAN
    – (Comparer) Several Urdu Programmes with Anwer Khan, Kafeel Aazar, Sagar Sarhadi, Izhar Asar, Moodood Siddiqui, Wali Mohd. Chaudhary, M.A. Zauqui, Masoom Moradabadi आदि।

  6. ALL INDIA RADIO
    – (Talker) उर्दू और साहित्यिक शख़्सियतों पर कई वार्ताएँ—Akashwani, Urdu Majlis और Urdu Service।

  7. Other Experience
  • Published about 350 Urdu literary books under TAKHLEEQKAR PUBLISHERS, New Delhi.

यह बिंदु सिर्फ़ अनुभव नहीं, बल्कि एक अदबी इमारत की नींव है—एक ऐसा सफ़र जिसमें उन्होंने 350 से अधिक उर्दू किताबों को दुनिया तक पहुँचाया।


Chief Editor – QISSEY (Urdu Literary Magazine)

आज वे उर्दू के प्रतिष्ठित अदबी रिसाले QISSEY के Chief Editor हैं—जहाँ नई पीढ़ी को तख़लीक़, सलीक़ा और अदबी शऊर दोनों मिलते हैं।


शख़्सियत—रूहानी सौंधापन और खामोश रौशनियाँ

अनीस अमरोहवी की शख़्सियत किसी तेज़ रोशनी की नहीं, बल्कि उन ख़ामोश रौशनियों की है जो धीरे-धीरे दुनिया को जगमगाती हैं।
उनकी तहरीरों में सन्नाटा भी है और सरगोशी भी, दर्द भी है और उम्मीद का दीया भी।
वो मुसाफ़िर हैं—मगर ऐसे मुसाफ़िर जो जहाँ से गुज़रते हैं, वहाँ फ़िक्र, तहज़ीब और अदब की खुशबू छोड़ जाते हैं।

अनीस अमरोहवी — वो फ़नकार,
जो बोलता कम है…
मगर जिसकी तहरीरें सदियों तक बोलती रहेंगी।


अनीस अमरोहवी की शायरी, ग़ज़लियात,नज़्में,क़तआत 

ग़ज़ल-1

इस लिए मुझ को बदगुमानी  थी

मेरे हिस्से में बे-मकानी थी


ज़िंदगी तब बड़ी सुहानी थी

अपने रिश्तों में जब रवानी थी


शोर था, ज़ोर था, रवानी थी

अपनी नदियों की यह निशानी थी


आज भी सच हुयी वही साबित

हालाँकि बात कुछ पुरानी थी


थी बहुत तेज़ जिस्म की खुशबू

और कुछ आँच भी सुहानी थी


था नया सब ही यादखाने  में

एक तस्वीर बस पुरानी थी


वाक़िआ जिस ने ज़िंदगी बदली

कैसे कह दूँ वो एक कहानी थी


ग़ज़ल-2 


हुस्न के माहताब लाख सही

इश्क़ के आफ़ताब कम होंगें


तेरे दीवाने इस ख़राबे में

हम से ख़ाना-ख़राब कम होंगें


दिन यह देखें गे क्या ख़बर थी हमें

उन के रहम ओ करम पे हम होंगें


हम ने सींचा था ख़ून से ग़ल्शन

क्या हमीं पर यहाँ सितम होंगें


जगमगाएँगे चाँद तारों से

ऐसे रोशन हमारे ग़म होंगें


आज कल काँच के मकानों में

संग होंगें तो कुछ सनम होंगें

क़तआत 

पहला कतआ 


देश के हुक्मरान हैं शातिर

रोज़ साज़िश नई रचाते हैं

दोष औरों के दोष पर रख कर

अपनी नाकामियाँ छुपाते हैं


○○


दूसरा क़तआ


ज़ब्त से काम ले दिल नादाँ

आज उन से न कर तू फ़रमाइश

होंगे मशरूफ़ जश्न में अपने

आज है उन का यौम-ए-पैदाइश


○○


तीसरा क़तआ


बनते-बनते मेरी आदत बन गये हो

ऐसा लगता है इबादत बन गये हो

चाह कर भी चाहे जाने की तमन्ना

तुम मुजस्सिम मेरी चाहत बन गये हो

नई उम्मीद (नज़्म)

अजब मखलूक है ये

न इंसान हैं, न ये हवां ही हैं

न जाने कौन से सियारे से उतरे हैं ये ज़ालिम

मोहब्बत से इन्हें है सख्त नफरत

अजी इंसानी लाशों का भी ये व्यापार करते हैं

कमीने पन के सारे गर

उन्हें अज़बर हैं कुछ ऐसे

गुनाहों को समझते हैं

ये एक कार-ए -ख़ैर हो जैसे 

सियासत इनकी नफरत पर है मबनी 

फिर इस पर ये ग़ज़ब

तफ़ाख़ुर  का भी है एहसास इनको

ये इंसानी सूरत के दरिन्दे

ये सारे ये सारे उम्मते इब्लीस हैं शायद!

तब्सरा:-

अनीस अमरोहवी का ज़िक्र करते ही उर्दू अदब की वह ख़ामोश मगर असरदार रौशनी ज़ेहन में उभरती है, जो बिना शोर किए दिलों और फ़िक्रों को मुनव्वर करती रहती है। वह उन फ़नकारों में से हैं जिनकी पहचान उनकी आवाज़ की बुलंदी से नहीं, बल्कि उनके ख़याल की गहराई और उनके लफ़्ज़ों की सादगी से होती है। उनकी तहरीरों में एक अजीब-सी कशिश है—ऐसी कशिश जो क़ारी को अपनी गिरफ़्त में लेकर उसे ख़ामोशी से सोचने पर मजबूर कर देती है।

उनका फ़न किसी दिखावे या बनावट का मोहताज नहीं, बल्कि ज़िंदगी के सच्चे तजुर्बों और जज़्बात की सादी मगर पुरअसर तस्वीर है। वह पेचीदा बातों को भी इस तरह बयान करते हैं कि हर पढ़ने वाला उसे अपने दिल के क़रीब महसूस करता है। उनकी तख़लीक़ात में न सिर्फ़ एक दौर की झलक मिलती है, बल्कि इंसानी रिश्तों की नर्मी, तहज़ीब की खुशबू और वक्त की गर्द में छुपी हुई यादों की आहट भी साफ़ सुनाई देती है। ऐसा लगता है जैसे वह अल्फ़ाज़ नहीं लिखते, बल्कि एहसास को काग़ज़ पर उतार देते हैं।

अनीस अमरोहवी की अदबी खिदमत का दायरा बेहद वसीअ है। उन्होंने सिर्फ़ अफ़साने और मज़ामीन लिखकर ही अपना फ़र्ज़ अदा नहीं किया, बल्कि एडिटिंग, पब्लिशिंग और सहाफ़त के ज़रिये उर्दू अदब की एक मुकम्मल ख़िदमत अंजाम दी। सैकड़ों किताबों की इशाअत उनके उस जुनून का सबूत है, जो अदब को ज़िंदा रखने और नई नस्ल तक पहुँचाने के लिए उनके अंदर मौजूद है। यह काम महज़ एक पेशा नहीं, बल्कि एक मिशन की तरह उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है।

उनकी शख़्सियत में एक ख़ामोश वक़ार और एक सादा शाइस्तगी पाई जाती है, जो उनकी तहरीरों में भी साफ़ झलकती है। वह उन लोगों में से नहीं जो अपने काम का शोर मचाएँ, बल्कि उनका फ़न ख़ुद उनकी पहचान बन जाता है। मीडिया और टेलीविज़न के ज़रिये भी उन्होंने जिस तरह अदब और समाजी शऊर को आम किया, वह उनके फ़न की वुसअत और उनकी सोच की रौशनदिली का पता देता है। उनके प्रोजेक्ट्स में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक पैग़ाम, एक सोच और एक तहज़ीबी एहसास भी शामिल होता है।

उनकी फ़िक्र का मरकज़ हमेशा इंसान और उसकी ज़िंदगी रही है। वह मोहब्बत को भी लिखते हैं, मगर महज़ जज़्बाती अंदाज़ में नहीं, बल्कि एक गहरी इंसानी सच्चाई के तौर पर; वह दर्द को भी बयान करते हैं, मगर उसमें मायूसी के बजाय एक ऐसी उम्मीद छुपी होती है जो पढ़ने वाले को अंदर से मज़बूत बनाती है। उनकी तहरीरें यह एहसास दिलाती हैं कि अदब सिर्फ़ लफ़्ज़ों का खेल नहीं, बल्कि रूह की आवाज़ है।

एवार्ड्स और इज़ाज़ात बेशक उनकी अदबी क़ाबिलियत का एतराफ़ हैं, मगर उनकी असल कामयाबी यह है कि उन्होंने अपने क़ारी के दिल में एक मुकम्मल जगह बना ली है। उनकी लिखावट में जो सच्चाई, ख़ुलूस और तहज़ीबी शऊर है, वही उन्हें दूसरों से अलग करता है।

अनीस अमरोहवी दरअसल उन फ़नकारों में से हैं जो ख़ामोशी से अपना सफ़र तय करते हैं, मगर उनके नक़्श-ए-कदम देर तक नज़र आते रहते हैं। वह एक ऐसी रौशनी हैं जो तेज़ नहीं, मगर मुक़म्मल है; जो चकाचौंध नहीं करती, मगर रास्ता ज़रूर दिखाती है। उनकी तहरीरें आने वाले वक्त में भी इसी तरह दिलों को छूती रहेंगी, क्योंकि उनमें फ़न से ज़्यादा इंसानियत की गर्मी और एहसास की सच्चाई मौजूद है।ये भी पढ़ें 

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