अली अकबर नातिक़ समकालीन उर्दू और पंजाबी अदब का वह चमकता हुआ नाम हैं, जिनकी शख़्सियत सिर्फ़ एक शायर, अफ़सानानिगार या नावेल निगार तक महदूद नहीं, बल्कि एक ऐसे फ़नकार की है जो अपने दौर की समाजी, तहज़ीबी और इंसानी सच्चाइयों को पूरी दीयानत के साथ क़लमबंद करता है। उनकी तख़लीक़ात में मिट्टी की महक, मेहनतकश तबक़े का दर्द, हिजरत की टीस और इंसानी वजूद की गहरी समझ साफ़ महसूस की जाती है। अली अकबर नातिक़ का अदब बनावटी लफ़्ज़ों से नहीं, बल्कि ज़िंदगी की सख़्त हक़ीक़तों से तामीर हुआ है।
जन्म, ख़ानदानी पस-ए-मंजर और तहज़ीबी जड़ें
अली अकबर नातिक़ 22 दिसंबर 1974 को पाकिस्तान के सूबा-ए-पंजाब के ज़िला ओकाड़ा के गाँव 32/2L में पैदा हुए। उनका ख़ानदानी पस-ए-मंजर हिजरत और जुदाई की लंबी तारीख़ से जुड़ा हुआ है। उनके असलाफ़ बीसवीं सदी के आग़ाज़ में फ़ैज़ाबाद (लखनऊ के क़रीब) से पंजाब के ज़िला फ़िरोज़पुर की तरफ़ मुंतक़िल हुए और फिर 1947 की तक़सीम के बाद सुलेमानकी हेडवर्क्स के रास्ते पाकिस्तान आकर ओकाड़ा में आबाद हुए। यह सिलसिला-ए-हिजरत उनकी ज़िंदगी ही नहीं, बल्कि उनकी अदबी फ़िक्र का भी बुनियादी हिस्सा बन गया, जो बाद में उनके अफ़सानों और नावेलों में गहरे तौर पर नुमायाँ हुआ।
इब्तिदाई ज़िंदगी और तालीमी जद्दोजहद
अली अकबर नातिक़ की इब्तिदाई ज़िंदगी सादा, मगर मशक्क़त से भरी हुई रही। उन्होंने अपने गाँव के हाई स्कूल से मैट्रिक किया और गवर्नमेंट कॉलेज ओकाड़ा से एफ.ए. का इम्तिहान पास किया। मआशी तंगी ने उन्हें नियमित तालीम जारी रखने से रोक दिया, मगर इल्म से उनकी मोहब्बत कभी कमज़ोर नहीं पड़ी। हालात से लड़ते हुए उन्होंने बहाउद्दीन ज़करिया यूनिवर्सिटी, मुल्तान से बी.ए. और एम.ए. की डिग्रियाँ प्राइवेट तौर पर हासिल कीं। यह दौर उनकी ज़िंदगी का सबसे सख़्त, मगर सबसे तामीरी दौर साबित हुआ।
मेहनत-मज़दूरी, ज़िंदगी का क़रीबी तजुर्बा और इल्मी तश्नगी
अली अकबर नातिक़ ने अपनी ज़िंदगी के अहम साल राजमिस्त्री के तौर पर गुज़ारे। वह गुम्बद, मीनारें और मस्जिदें बनाने में माहिर थे। ईंट, सीमेंट और पत्थर के बीच काम करते हुए उन्होंने इंसानी ज़िंदगी की बारीकियों को बहुत क़रीब से देखा। इसी दौरान उर्दू अदब, तारीख़ और अरबी किताबों का मुतालआ भी जारी रहा। उनके वालिद अरब ममालिक — इराक़ और कुवैत — से जो किताबें लाए थे, उन्होंने उन्हें गहरी दिलचस्पी से पढ़ा। 1998 में सऊदी अरब और दीगर मिडिल ईस्टी ममालिक में मज़दूर के तौर पर क़ियाम ने उनकी सोच को और वसीअ कर दिया।
अदबी सफ़र की इब्तिदा और शायरी की पहचान
अली अकबर नातिक़ का अदबी सफ़र बाक़ायदा तौर पर 2010 में उनके पहले शायरी मजमूए “बे-यक़ीन बस्तियों में” से शुरू हुआ। इस किताब ने यह साबित कर दिया कि नातिक़ की शायरी महज़ जज़्बाती बयान नहीं, बल्कि समाजी हक़ीक़तों का संजीदा और तहदार तजज़िया है। उनकी नज़्मों में उजड़ी बस्तियाँ, टूटे ख़्वाब और इंसानी उम्मीद की हल्की-सी रौशनी एक साथ नज़र आती है।
अफ़साना निगारी और आलमी पज़ीराई
2012 में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से शाए होने वाला उनका अफ़साना मजमूआ “क़ायम दीन” उर्दू अदब में एक अहम संग-ए-मील साबित हुआ। इस किताब को यू.बी.एल. और ऑक्सफ़ोर्ड अवार्ड्स से नवाज़ा गया। बाद में इसका अंग्रेज़ी तरजुमा “What Will You Give For This Beauty?” पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया से शाए हुआ, जिससे अली अकबर नातिक़ की पहचान बैनुल-अक़वामी सतह पर मज़बूत हुई। 2011 में उनका अफ़साना “मेसन’स हैंड” मशहूर आलमी रिसाले Granta के पाकिस्तान स्पेशल इश्यू में शामिल हुआ, जो उनकी अदबी क़ाबिलियत का बड़ा एतिराफ़ था।
शायरी का दूसरा दौर और तर्जुमों की दुनिया
2013 में उनका दूसरा शायरी मजमूआ “याक़ूत के वरक़” मंजर-ए-आम पर आया। इस किताब में ज़बान की शफ़्फ़ाफ़ी, तख़य्युल की गहराई और फ़िक्र की पुख़्तगी साफ़ नज़र आती है। इस मजमूए से मुन्तख़ब नज़्मों का जर्मन ज़बान में तरजुमा हुआ, जिसने नातिक़ की शायरी को यूरोप तक पहुँचाया।
नावेल निगारी और तारीख़ी चेतना
अली अकबर नातिक़ का पहला नावेल “नौलखी कोठी” 2015 में कराची लिटरेचर फ़ेस्टिवल में जारी हुआ। यह नावेल तक़सीम, सामंती निज़ाम और इंसानी रिश्तों की जटिलताओं का एक गहरा और दर्दनाक बयान है। बाद में 2020 में उनका दूसरा नावेल “कमारी वाला” शाए हुआ, जिसमें समाजी ज़ुल्म, मज़दूर की बेबसी और इंसानी वक़ार की जद्दोजहद को बड़े असरदार अंदाज़ में पेश किया गया। 2024 में उनका नावेल “कूफ़ा का मुसाफ़िर” उनकी फ़िक्र के नए अबआद को सामने लाता है।
तदरीसी ख़िदमात और अक़लामी शिनाख़्त
अदब के साथ-साथ अली अकबर नातिक़ ने तालीमी शोबे में भी अहम ख़िदमात अंजाम दीं। वह उसवा कॉलेज इस्लामाबाद में उर्दू के प्रोफ़ेसर और यूनिवर्सिटी ऑफ़ लाहौर में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। 16 जुलाई 2018 को The New York Times में पाकिस्तान में जम्हूरियत पर उनका मज़मून शाए हुआ, जो पहले उर्दू में लिखा गया था और बाद में अंग्रेज़ी में तरजुमा किया गया। यह उनकी फ़िक्र की आलमी अहमियत का वाज़ेह सबूत है।
अदबी मक़ाम और फ़िक्र की अहमियत
अली अकबर नातिक़ की तख़लीक़ात में गाँव, मेहनतकश इंसान, हाशिये पर खड़ा समाज और तहज़ीबी टूट-फूट बार-बार उभर कर सामने आती है। वह अपने दौर के ऐसे अदबी गवाह हैं जो सच को बिना सजावट के बयान करते हैं। उनकी ज़िंदगी और अदब इस हक़ीक़त की तस्दीक़ करते हैं कि सच्चा फ़न वही है जो ज़मीन से जुड़ा हो और इंसान के दर्द को आवाज़ दे।
अली अकबर नातिक़ की शायरी ग़ज़लें नज़्मे
ग़ज़ल-1
बाद-ए-सहरा को रह-ए-शहर पे डाला किस ने
तार-ए-वहशत को गरेबाँ से निकाला किस ने
मुख़्तसर बात थी, फैली क्यूँ सबा की मानिंद
दर्द-मंदों का फ़साना था, उछाला किस ने
बस्तियों वाले तो ख़ुद ओढ़ के पत्ते, सोए
दिल-ए-आवारा तुझे रात सँभाला किस ने
आग फूलों की तलब में थी, हवाओं पे रुकी
नज़्र-ए-जाँ किस की हुई, राह से टाला किस ने
काँच की राह पे इक रस्म-ए-सफ़र थी मुझ से
ब'अद मेरे बुना हर गाम पे जाला किस ने
ग़ज़ल-2
ग़ज़ल-3
ग़ज़ल-4
ग़ज़ल-5
नज़्म-1
बे यक़ीन बस्तियाँ
नज़्म-2
तब्सिरा (तनक़ीदी राय)
अली अकबर नातिक़ की यह जीवनी महज़ किसी शायर या अफ़सानानिगार का तआरुफ़ नहीं, बल्कि अपने दौर की समाजी और तहज़ीबी सच्चाइयों की एक मुकम्मल दस्तावेज़ है। इस मज़मून में नातिक़ की ज़िंदगी और उनके अदब को इस ख़ूबसूरती से आपस में पिरोया गया है कि क़ारी के सामने एक ऐसा फ़नकार उभरता है, जिसकी क़लम ज़िंदगी की सख़्त तपिश से गुज़र कर पुख़्ता हुई है।
इस तब्सिरे की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें अली अकबर नातिक़ के ख़ानदानी पस-ए-मंजर, हिजरत के तजुर्बे, मेहनत-मज़दूरी और इल्मी जद्दोजहद को महज़ वाक़िआत के तौर पर नहीं, बल्कि उनकी तख़लीक़ी फ़िक्र की बुनियाद के रूप में पेश किया गया है। गाँव की मिट्टी, मज़दूर की मशक्क़त, तामीरात की सख़्ती और किताबों से बे-पनाह मोहब्बत — ये तमाम अनासिर इस लेख को ज़िंदा और असरदार बनाते हैं।
नातिक़ के अदब पर की गई बहस ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-तवज्जोह है। उनकी शायरी, अफ़साना निगारी और नावेल निगारी को अलग-अलग ख़ानों में महदूद करने के बजाय, उन्हें एक ही समाजी और इंसानी फ़िक्र की मुख़्तलिफ़ सूरतें क़रार दिया गया है। “बे-यक़ीन बस्तियों में” से लेकर “नौलखी कोठी” और “कमारी वाला” तक, हर तख़लीक़ को समाजी नाइंसाफ़ी, मज़दूर के दर्द और तहज़ीबी टूट-फूट के संदर्भ में देखा गया है, जो इस मज़मून को इल्मी और तनक़ीदी वज़्न अता करता है।
बैनुल-अक़वामी सतह पर नातिक़ की पज़ीराई — ऑक्सफ़ोर्ड और पेंग्विन जैसे मुअतबर इदारों, Granta और The New York Times में मौजूदगी — इस बात का वाज़ेह सुबूत है कि उनकी फ़िक्र महज़ महल्लाती या इलाक़ाई नहीं, बल्कि आलमी अहमियत की हामिल है। यह पहलू इस तब्सिरे को प्रोफ़ेशनल और मुतवाज़िन बनाता है, जहाँ तारीफ़ के साथ-साथ फ़िक्र की गहराई भी नुमायाँ होती है।
मजमूई तौर पर यह तब्सिरा अली अकबर नातिक़ को समकालीन उर्दू अदब के उस सच्चे गवाह के रूप में पेश करता है, जो बनावटी लफ़्ज़ों के बजाय ज़िंदगी की खुरदरी हक़ीक़तों से अपना अदब तामीर करता है। यह लेख क़ारी को न सिर्फ़ नातिक़ के फ़न से रौशनास कराता है, बल्कि यह एहसास भी दिलाता है कि असली फ़न वही है, जो ज़मीन से जुड़ा हो और इंसानी दर्द को आवाज़ देता हो। ये भी पढ़े
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