शायरी से सियासत तक: कुमार विश्वास की फ़िक्री तब्दीली का तन्क़ीदी मुतालआ

 उर्दू-हिंदी अदब की तारीख़ गवाह है कि शायर जब तक हुक्मरानों की आँखों में आँखें डालकर बात करता है, तब तक वह शायर रहता है; और जिस रोज़ वह सत्ता की ज़बान बोलने लगे, उसी रोज़ उसकी शायरी महज़ एक सियासी बयान बन कर रह जाती है। कुमार विश्वास की शख़्सियत और सफ़र को इसी पैमाने पर परखना आज निहायत ज़रूरी हो चला है।

एक वक़्त था जब कुमार विश्वास को मंचीय शायरी की उस नस्ल का हिस्सा समझा जाता था, जो राहत इंदौरी को अपना बड़ा भाई मानती थी—वही राहत, जिनकी शायरी नफ़रत की हर दीवार से टकराकर उसे चकनाचूर कर देती थी। राहत का फ़न सत्ता से सवाल करता था, मज़हब से नहीं; ज़ालिम से उलझता था, मज़लूम से नहीं।

 मगर अफ़सोस कि इसी रिश्ते का हवाला देने वाला शायर, वक़्त के साथ उसी रिवायत से मुनहरिफ़ होता चला गया।

ज़बान का सफ़र: गीत से ग़ज़ल और ग़ज़ल से एजेंडा

कुमार विश्वास ने हिंदी कविताओं और गीतों से अपनी पहचान बनाई। इसके बाद उर्दू ग़ज़ल की तरफ़ उनका रुझान एक मुबारक तब्दीली हो सकता था, क्योंकि उर्दू अपने अस्ल में मुहब्बत, तहज़ीब और इंसानियत की ज़बान है। लेकिन जब ग़ज़ल का इस्तेमाल इशारों, तानों और मज़हबी ध्रुवीकरण के लिए होने लगे, तो यह फ़न की नहीं, बल्कि नियत की तब्दीली कहलाती है।

उर्दू ग़ज़ल का मिज़ाज नफ़रत से कोसों दूर है, मगर यहां ग़ज़ल महज़ एक सियासी लिबास बनती दिखाई दी—जिसके भीतर मज़मून बदल चुका हे।

दुबई के मुशायरों की निज़ामत 

दुबई और खाड़ी मुल्कों के मुशायरों की निज़ामत किसी भी शायर के लिए इज़्ज़त की बात होती है। मगर सवाल यह है कि क्या ये मंच अदबी मुशावरत के लिए थे या सियासी मक़बूलियत के इज़ाफ़े के लिए? जब मुशायरे—जो तहज़ीबी हमआहंगी की अलामत रहे—सियासी बयानबाज़ी के अड्डे बन जाएँ, तो अदब की रूह ज़ख़्मी होती है।

तालियाँ जब फ़िक्र की गहराई पर नहीं, बल्कि नफ़रत के इशारों पर बजें, तो शायर नहीं, मुक़र्रिर पैदा होते हैं।

आम आदमी पार्टी से बेदख़ली: उसूल या हुक्मरानी की आरज़ू?

आम आदमी पार्टी से निकाला जाना सिर्फ़ एक तंज़ीमी फ़ैसला नहीं था, बल्कि यह उस सफ़र का मोड़ था जहाँ से उसूल पीछे और तमन्ना आगे नज़र आने लगी। सियासत में इख़्तिलाफ़ क़ुदरती है, मगर जब सियासत का मर्कज़ ओहदा, कुर्सी और रियासत बन जाए, तो शायर का किरदार महज़ एक सीढ़ी बन कर रह जाता है।

राज्यसभा की कुर्सी की हवस और ताक़तवर हुक्मरानों की क़ुर्बत ने उस आवाज़ को कमज़ोर किया, जो कभी अवाम की नुमाइंदगी का दावा करती थी।

नफ़रत का बाज़ार और बयानात की तिजारत

आज का दौर नफ़रत की सबसे मुनाफ़ा-बख़्श मंडी बन चुका है। अफ़सोसनाक हक़ीक़त यह है कि कुछ शायर और मुक़र्रिर इस मंडी में सबसे तेज़ सौदागर साबित हुए हैं। मुसलमानों पर तंज़, उनके अकीदों पर वार और तारीख़ी निशानियों की तौहीन—ये सब उसी तिजारत के सर्टिफ़िकेट हैं।

ताजमहल—जो दुनिया के सात अजूबों में शुमार, मुहब्बत और फ़न-ए-तामीर की बे-मिसाल अलामत है—उसे “कब्रिस्तान” कहकर तंज़ करना सिर्फ़ जहालत नहीं, बल्कि तारीख़, तहज़ीब और इंसानियत की तौहीन है। यह बयान न इल्मी है, न अदबी—बल्कि नफ़रत की राजनीति का सस्ता हथकंडा है।

चाटुकारिता बनाम अदबी गैरत

उर्दू अदब की रिवायत में शायर सत्ता का मीर-ए-मजलिस नहीं, बल्कि मीर-ए-ज़मीर होता है। वह दरबार की शोभा नहीं, बल्कि उसकी बेचैनी होता है। मगर यहां शायर का किरदार चाटुकार में तब्दील होता दिखाई देता है—जो हर उस बयान पर तालियाँ बजाता है, जिससे हुक्मरान खुश हों।

राहत इंदौरी की विरासत इससे बिल्कुल उलट थी। राहत ने कभी अपनी शायरी को सत्ता की नौकरानी नहीं बनने दिया।

नतीजा:-

 फ़न की शिकस्त या ज़मीर की?

कुमार विश्वास का सफ़र इस सवाल पर आकर ठहरता है कि क्या यह फ़न की हार है या ज़मीर की? शायर का सबसे बड़ा ओहदा उसकी सचाई होती है, न कि संसद की कुर्सी। जब शायरी नफ़रत बोने लगे और मज़हबों के बीच खाइयाँ खोदने लगे, तो वह शायरी नहीं रहती—वह महज़ सियासी प्रचार बन जाती है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि अदब को फिर से मुहब्बत, इंसाफ़ और इंसानी बराबरी की ज़बान बनाया जाए। शायर अगर इस रास्ते पर नहीं लौटता, तो तारीख़ उसे शायर नहीं, बल्कि एक कामयाब सौदागर के तौर पर याद रखेगी—और यह किसी भी अदीब के लिए सबसे बड़ी शिकस्त है।ये भी पढ़े 

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