Professor Muzaffar Hanfi Poet: उर्दू शायरी, तन्क़ीद और तहक़ीक़ में आधी सदी का अदबी सफ़र

 प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी उर्दू अदब की उस रौशन और मुस्तहकम रिवायत का नाम हैं, जिसने आधी सदी से ज़्यादा अरसे तक अपनी फ़िक्र, तहक़ीक़, तख़्लीक़ और तालीमी ख़िदमात से उर्दू ज़बान को न सिर्फ़ ज़िंदा रखा बल्कि उसे जदीद अहद की ज़रूरतों से भी हम-आहंग किया। वह महज़ एक शायर या नक़्क़ाद नहीं, बल्कि उर्दू अदब का एक मुकम्मिल इदारा हैं — जिनकी शख़्सियत में शायरी की लताफ़त, तन्क़ीद की सख़्ती, तहक़ीक़ की गहराई और तालीम की रोशनी एक साथ जलती नज़र आती है।

पैदाइश और इब्तिदाई ज़िंदगी

प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी की पैदाइश 1 अप्रैल 1936 को खंडवा (मध्य प्रदेश) में हुई, जबकि उनका वतन-ए-असली हसवा, फ़तेहपुर (उत्तर प्रदेश) है। इल्म-दोस्त माहौल और अदबी ज़ौक़ ने उनके ज़ेहन को बचपन ही से मुतअस्सिर किया। यही वजह है कि बहुत कम उम्र में उन्होंने अल्फ़ाज़ की दुनिया से रिश्ता जोड़ लिया, जो आख़िरकार उर्दू अदब की एक अज़ीम विरासत में तब्दील हुआ।

तालीमी सफ़र

प्रोफ़ेसर हनफ़ी ने आला तालीमी इदारों से अपनी तालीम मुकम्मल की।
उन्होंने बी.ए., एम.ए., एल.एल.बी. और पीएच.डी. की डिग्रियाँ
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी, भोपाल से हासिल कीं। उनकी तालीम महज़ डिग्रियों तक महदूद नहीं रही, बल्कि उन्होंने इल्म को अमल, तख़्लीक़ और तन्क़ीद का ज़रिया बनाया।

शायरी की इब्तिदा और तख़्लीकी सफ़र

महज़ 14 साल की उम्र में प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी ने शायरी कहना शुरू कर दिया था। तब से लेकर आज तक उनका क़लम बिना किसी वक़्फ़े के चलता रहा।
पिछले पचास से ज़्यादा बरसों में उन्होंने 1700 से ज़्यादा ग़ज़लें कही हैं, जिनमें जदीद एहसास, असरी तजुर्बा और क्लासिकी रिवायत का बेहतरीन इम्तिज़ाज देखने को मिलता है।

उनकी शायरी दुनिया भर की नामवर उर्दू रसाइल में शाये होती रही है और आज भी अदबी हल्क़ों में पूरे एहतराम के साथ पढ़ी और सराही जाती है।

अदबी और तन्क़ीदी ख़िदमात

प्रोफ़ेसर हनफ़ी सिर्फ़ शायर ही नहीं, बल्कि एक बड़े नक़्क़ाद, मुहक़्क़िक़ और अफ़साना-निगार भी हैं।
उनकी तख़्लीक़ी वसीअत में शामिल हैं:

  • 80 से ज़्यादा किताबें

  • 200 से अधिक अफ़साने

  • 500 से ज़्यादा तन्क़ीदी और इल्मी मज़ामीन

उनकी तहरीरों में जदीद शायरी, तंज़-ओ-मिज़ाह, अदबी तन्क़ीद, तहक़ीक़, बच्चों का अदब और तराजिम (अनुवाद) ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।

‘नए चिराग़’ और जदीद उर्दू अदब

सन 1959 में प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी ने हिंदुस्तान का पहला जदीद उर्दू अदब पर आधारित मासिक रिसाला “नए चिराग़” जारी किया।
यह रिसाला अपने दौर में एक इनक़िलाबी क़दम साबित हुआ, जिसने कई जदीद शायरों और अदीबों को पहली बार पहचान दी।
ग़ौरतलब है कि मशहूर रिसाला “शबख़ून”, “नए चिराग़” के चार साल बाद शुरू हुआ।

उनकी पहली किताब “पानी की ज़ुबान” को हिंदुस्तान में जदीद शायरी की बुनियादी किताबों में शुमार किया जाता है।

मुलाज़मत और तालीमी ख़िदमात

प्रोफ़ेसर हनफ़ी ने अपने करियर की शुरुआत मध्य प्रदेश फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट से की।
सन 1974 में वह दिल्ली आए और एन.सी.ई.आर.टी. में असिस्टेंट प्रोडक्शन ऑफ़िसर के तौर पर काम किया।

सन 1976 में उन्हें जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में लेक्चरर मुक़र्रर किया गया।

सन 1989 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी ने उन्हें बेहद मुअतबर ओहदा इक़बाल चेयर प्रोफ़ेसर पेश किया।
यह वही चेयर है, जिस पर इससे पहले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को दावत दी गई थी।
प्रोफ़ेसर हनफ़ी 2001 तक इस ओहदे पर फ़ाइज़ रहे और फिर रिटायर होकर दिल्ली आ गए, जहाँ उन्होंने पूरी तरह अदब के लिए ख़ुद को वक़्फ़ कर दिया।

अवॉर्ड्स और एज़ाज़ात

प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सतह पर सैकड़ों एज़ाज़ात से नवाज़ा गया।
उनका नाम दुनिया की कई मशहूर इंटरनेशनल बायोग्राफ़िकल डिक्शनरीज़ और रेफ़रेंस बुक्स में शामिल है।

दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, लंदन और कराची की उर्दू अकादमियों से उन्हें बार-बार अवॉर्ड्स मिले — जिनमें शायरी, तन्क़ीद, तहक़ीक़, बच्चों के अदब और तराजिम सभी शामिल हैं।

उनकी किताबों पर कई बार बेस्ट बुक ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड्स भी दिए गए।

तहक़ीक़ी काम और उन पर लिखा गया अदब

सन 1984 में डॉ. महबूब राही ने नागपुर यूनिवर्सिटी से
“प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी: ज़िंदगी और फ़न” पर पीएच.डी. मुकम्मल की।

सन 2001 में 550 से ज़्यादा सफ़्हात पर मुश्तमिल किताब
“मुज़फ़्फ़र हनफ़ी: एक मुताला” शाये हुई,
जिसे उनके फ़र्ज़ंद फ़िरोज़ मुज़फ़्फ़र ने मुरत्तब किया।

इसके अलावा, हिंदुस्तान और विदेश के कई नामवर रसाइल ने उनकी ज़िंदगी और फ़न पर ख़ुसूसी गोशे शाये किए।

अदबी मक़ाम और विरासत

प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी का नाम उर्दू अदब में उस शख़्सियत के तौर पर लिया जाता है, जिसने रिवायत और जिद्दत के दरमियान एक मज़बूत पुल क़ायम किया।
उनकी तख़्लीक़ात आने वाली नस्लों के लिए रहनुमा हैं और उर्दू ज़बान के अदबी सरमाये में एक अमानत की तरह शामिल हैं।

रब्ता पता

डी-40, बटला हाउस
जामिया नगर, नई दिल्ली – 110025 (भारत)

मुज़फ्फर हनफ़ी की शायरी ग़ज़लें नज़्में 

ग़ज़ल-1

यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ

आ जा मिरी रूठी हुई तन्हाई इधर आ


मुझ को भी ये लम्हों का सफ़र चाट रहा है

मिल बाँट के रो लें ऐ मिरे भाई इधर आ


ऐ सैल-ए-रवान-ए-अबदी ज़िंदगी नामी

मैं कौन सा पाबंद हूँ हरजाई इधर आ


इस निकहत-ओ-रानाई से खाए हैं कई ज़ख़्म

ऐ तू कि नहीं निकहत-ओ-रानाई इधर आ


आसाब खिंचे जाते हैं अब शाम ओ सहर में

होने ही को है मारका-आराई इधर आ


सुनता हूँ कि तुझ को भी ज़माने से गिला है

मुझ को भी ये दुनिया नहीं रास आई इधर आ


मैं राह-नुमाओं में नहीं मान मिरी बात

मैं भी हूँ इसी दश्त का सौदाई इधर आ

ग़ज़ल-2


लाइक़-ए-दीद वो नज़ारा था

लाख नेज़े थे सर हमारा था


एक आँधी सी क्यूँ बदन में है

उस ने शायद हमें पुकारा था


शुक्रिया रेशमी दिलासे का

तीर तो आप ने भी मारा था


बादबाँ से उलझ गया लंगर

और दो हाथ पर किनारा था


साहिबो बात दस्तरस की थी

एक जुगनू था इक सितारा था


आसमाँ बोझ ही कुछ ऐसा है

सर झुकाना किसे गवारा था


अब नमक तक नहीं है ज़ख़्मों पर

दोस्तों से बड़ा सहारा था

ग़ज़ल-3

कहीं तो पा-ए-सफ़र को राह-ए-हयात कम थी

क़दम बढ़ाया तो सैर को काएनात कम थी


सिवाए मेरे किसी को जलने का होश कब था

चराग़ की लौ बुलंद थी और रात कम थी


ख़याल सहरा-ए-ज़ात में उस मक़ाम पर था

जहाँ कि गुंजाइश-ए-फ़रार-ओ-नजात कम थी


वो फ़र्द-ए-बख़्शिश कि जिस की तकमील की है मैं ने

निगाह डाली तो इस में अपनी ही ज़ात कम थी


बहुत हँसे ख़ूब रोए जी खोल कर जिए हम

अगरचे मीआद-ए-हस्ती-ए-बे-सबात कम थी


तिरे करम से बड़ा था कुछ ए'तिक़ाद मेरा

इसी लिए मुझ को फ़िक्र-ए-सोम-ओ-सलात कम थी


बहाओ पानी की बूँद पर ख़ून का समुंदर

नहीं तो इक क़तरा-ए-लहू से फ़ुरात कम थी


ग़ज़ल 'मुज़फ़्फ़र' की ख़ूब थी इस में शक नहीं है

मगर तग़ज़्ज़ुल के नाम पर एक बात कम थी

ग़ज़ल-4

जो न महसूस किया हो उसे क्यूँकर कहते

वर्ना आसान था क़तरे को समुंदर कहते


खिल नहीं सकते कभी सीने में ज़ख़्मों के गुलाब

हम जो सूखे हुए काँटों को गुल-ए-तर कहते


ख़ाक हो कर भी चमकने से गुरेज़ाँ हैं हम

लोग ज़र्रों को सितारों के बराबर कहते


हम सुबुक-सर न हुए अपने लहू के हाथों

जाने क्या दिल में पलटते हुए ख़ंजर कहते


कोई रंजीदा नहीं अक्स गँवा कर अपना

आइना आइना ये राज़ भी पत्थर कहते

ग़ज़ल-5

क्या वस्ल की साअत को तरसने के लिए था

दिल शहर-ए-तमन्ना तिरे बसने के लिए था


सहरा में बगूलों की तरह नाच रहा हूँ

फ़ितरत से मैं बादल था बरसने के लिए था


रोती हुई एक भीड़ मिरे गिर्द खड़ी थी

शायद ये तमाशा मिरे हँसने के लिए था


कुछ रात का एहसाँ है न सूरज का करम है

ग़ुंचा तो बहर-हाल बिकसने के लिए था


इस राह से गुज़रा हूँ जहाँ साँस न दे साथ

हर नक़्श-ए-कफ़-ए-पा मिरे डसने के लिए था


हर क़तरा मिरी आँख से बहने को था बेताब

हर ज़र्रा मिरे पाँव झुलसने के लिए था

नज़्म -1 


चूहे की बारात 

मुर्ग़ी आई अण्डा ले कर

बंदर आया डंडा ले कर


आए तोते झंडा ले कर

गौरय्या सरकंडा ले कर


आई मैना साड़ी ले कर

बकरा आया दाढी ले कर


हाथी आए गाड़ी ले कर

भालू कच्ची ताड़ी ले कर


बुलबुल आई गजरा ले कर

कव्वा आया कजरा ले कर


घड़ियाल आए बजरा ले कर

कछवे-साहिब शजरा ले कर


मोरनी आई जल्वा ले कर

चेता आया बलवा ले कर


गाएँ आईं हल्वा ले कर

टिड्डी मन और सल्वा ले कर


हिरनी आई छलांगें ले कर

दुम्बा आया टांगें ले कर


सांभर आए जांघें ले कर

झींगुर रें-रें माँगें ले कर


कोयल आई कू-कू ले कर

नेवला आया झाड़ू ले कर


गिरगिट आए जादू ले कर

आई छछूंदर ख़ुश्बू ले कर


मकड़ी आई तमाशे ले कर

भैंसा आया ताशे ले कर


चीतल खेल तमाशे ले कर

च्यूँटी गुड़ दो-माशे ले कर


चील आई छन्ताई ले कर

लडडू उल्लू भाई ले कर


ख़रगोश आए दुलाई ले कर

और गधे शहनाई ले कर


जी हाँ इतने ठाट-बाट से

पानी पी कर घाट घाट से


चूहे की बारात चली

दिल्ली से मेवात चली

नज़्म -2 


मेरे हिन्दोस्तान


हरियाणा कश्मीर उड़ीसा महाराष्ट्र पंजाब

करें तुझे आदाब


कर्नाटक बंगाल आंधरा तमिल नाडू आसाम

करते हैं प्रणाम


तेरे दरवाज़े पर सर ख़म केरल राजस्थान

मेरे हिन्दोस्तान मेरे हिन्दोस्तान


ताज अजंता काशी साँची दिल्ली और चित्तौड़

कितनी लम्बी दौड़


चिश्ती नानक ख़ुसरव गाँधी अकबर और अशोक

सब हिंसा की रोक


तेरी बाँकी आन-बान है सब से ऊँची शान

मेरे हिन्दोस्तान मेरे हिन्दोस्तान


जैन पारसी सिख ईसाई हिन्दू मुस्लिम सारे

तेरे राज दुलारे


बंगाली पंजाबी उर्दू हिन्दी और मलयालम

एक गीत के सरगम


तेरी ज़ात अज़ीम है सब से तेरी बात महान

मेरे हिन्दोस्तान मेरे हिन्दोस्तान

मशहूर शेर 

हज़ारों मुश्किलें हैं दोस्तों से दूर रहने में

मगर इक फ़ाएदा है पीठ पर ख़ंजर नहीं लगता

फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से

वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से

फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से

वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से

वहाँ भी 'अक़्ल ही मसनद-नशीं मिली कि जहाँ

मता'-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र का कोई सवाल न था

तब्सरा:-


प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी को पढ़ना किसी तयशुदा नक़्शे पर चलना नहीं, बल्कि उर्दू अदब की एक ज़िंदा सरज़मीन पर क़दम रखना है। उनकी शख़्सियत में इल्म की संजीदगी है, मगर बयान में कहीं तक़रीर का बोझ नहीं। वह लिखते हैं तो महसूस होता है कि अल्फ़ाज़ उनसे पहले नहीं, उनके साथ सोचते हैं। यही वजह है कि उनका फ़न रिवायत का एहतराम करते हुए भी उसकी नक़्ल नहीं करता।

हनफ़ी साहब की ग़ज़ल हो या तन्क़ीद, हर जगह एक अंदरूनी तवाज़ुन नज़र आता है—न जज़्बात की अफ़रात, न अक़्ल की सख़्ती। उन्होंने अदब को किसी ऊँचे मिंबर से नहीं, बल्कि ज़िंदगी की सतह से देखा है। उनकी तहरीरें पढ़ने वाले को मुतास्सिर नहीं करतीं, बल्कि उसे बदलती हैं।

आज जब अदब अक्सर तजल्ली या तकरार का शिकार है, प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र हनफ़ी की मौजूदगी इस बात की दलील है कि ख़ामोशी एक मुकम्मल और बामानी बयान हो सकती है।ये भी पढ़ें 

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