उर्दू शायरी की चार बड़ी सनअतें: ग़ज़ल, रुबाई, मसनवी और क़सीदा का मुकम्मल तहक़ीक़ी मुताला
ग़ज़ल: जज़्बात का मुकम्मल आईना
ग़ज़ल उर्दू शायरी की सबसे ज़िंदा, मुतहर्रिक (गतिशील) और दायमी (स्थायी) सनअत है, जो फ़र्द के बातिनी जज़्बात, इश्क़, हिज्र, वस्ल, ग़म-ए-दौराँ और फ़लसफ़ियाना सोच को मुख़्तसर मगर पुर-असर अंदाज़ में बयान करती है। ग़ज़ल की बुनियादी ख़ुसूसियत उसका शेरी निज़ाम है, जहाँ हर शेर अपनी जगह मुकम्मल होता है, लेकिन मजमूई तौर पर एक गहरी जज़्बाती कड़ी भी क़ायम रहती है। क़ाफ़िया, रदीफ़ और बहर ग़ज़ल को सिर्फ़ एक फ़न नहीं, बल्कि एक सख़्त अदबी डिसिप्लिन बना देते हैं, जहाँ हर लफ़्ज़ अपनी ज़िम्मेदारी के साथ इस्तेमाल होता है।
मीर तक़ी मीर ग़ज़ल के पहले अज़ीम सुतून तस्लीम किए जाते हैं, जिनके यहाँ दर्द और सादगी अपनी इंतिहा को पहुँची नज़र आती है। मीर के अशआर में जो शाईस्तगी, तन्हाई और वुजूद़ी कसक मिलती है, वह ग़ज़ल को सिर्फ़ इश्क़ की ज़बान नहीं रहने देती, बल्कि इंसानी तजुर्बे का क़िस्सा बना देती है। उनके बाद मिर्ज़ा ग़ालिब ने ग़ज़ल को फ़िक्री और फ़लसफ़ियाना वुसअत (विस्तार) दी, जहाँ सवाल, तशकीक और ज़हानत मरकज़ बन गए। ग़ालिब के यहाँ ग़ज़ल एक ज़ेहनी मुक़ाबला है—ख़ुदा, काइनात और इंसान के दरमियान।
बीसवीं सदी में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और नासिर काज़मी जैसे शुअरा ने ग़ज़ल को समाजी और सियासी शऊर से जोड़कर उसकी नई ताबीर पेश की। फ़ैज़ के यहाँ ग़ज़ल इंक़िलाबी उम्मीद और इंसानी वफ़ादारी का बयान बन जाती है, जबकि नासिर काज़मी ने उसी ग़ज़ल में तन्हाई, हिजरत और शहरी वीरानी का नर्म मगर पुर-असर नक़्श खींचा। इस तरह ग़ज़ल हर दौर में अपनी शक्ल बदलकर ज़िंदा रहती है, जो इस बात की दलील है कि ग़ज़ल उर्दू शायरी की सबसे मुस्तहकम (मज़बूत, स्थिर, अटल) और क़ाबिल-ए-तवज्जो सनअत है।
रुबाई: फ़लसफ़ा और लम्हा-ए-फ़िक्र
रुबाई अपनी ज़ाहिरी छोटी शक्ल के बावजूद उर्दू और फ़ारसी शायरी की बेहद गहरी और संगीन सनअत है, जहाँ सिर्फ़ चार मिसरों में ज़िंदगी, मौत, वक़्त और हक़ीक़त जैसे अज़ीम (महान) सवाल समेट दिए जाते हैं। रुबाई का असर उस वक़्त बरक़रार होता है, जब शायर आख़िरी मिसरे में अचानक फ़िक्री झटका देता है, जो क़ारी को सोचने पर मजबूर कर देता है। यह सनअत ज़्यादातर फ़िक्र और हिकमत की हामिल होती है, इसलिए इसमें जज़्बाती रवानी से ज़्यादा ज़ेहनी तवाज़ुन दरकार होता है।
उमर ख़य्याम रुबाई के सबसे बड़े नाम हैं, जिनकी रुबाइयात ने मशरिक़ी फ़लसफ़े (बहुदेववादी दर्शन) को शायरी की ज़बान अता की। ख़य्याम के यहाँ ज़िंदगी की नापायेदारी (माप), वक़्त की बेरहमी और मज़हबी तसल्लुत पर नर्म मगर गहरी तन्क़ीद मिलती है। उनकी रुबाइयात सिर्फ़ शायरी नहीं, बल्कि एक ज़ेहनी रवायत बन गई, जिसने बाद के उर्दू शुअरा को भी मुतअस्सिर (प्रभावित) किया। उर्दू में जोश मलीहाबादी और फ़िराक़ गोरखपुरी ने रुबाई को नया लहजा और नया जज़्बाती तनाज़ुर अता किया।
रुबाई की अहमियत इस लिए भी बरक़रार है कि यह शायर की ज़ेहनी बुलंदी का इम्तिहान होती है। यहाँ ज़्यादा अल्फ़ाज़ की गुंजाइश नहीं होती, इसलिए हर लफ़्ज़ अपने वज़न और मआनी के साथ आता है। रुबाई असल में शायरी का मुहासिबा है—जहाँ शायर अपनी फ़िक्र, अपने यक़ीन और अपनी शक को सिर्फ़ चार मिसरों में क़ैद करता है। इसी वजह से रुबाई कम लिखी गई, मगर जब भी लिखी गई, उसने अदबी दुनिया में गहरा निशान छोड़ा।
मसनवी: दास्तान और सोच का सफ़र
मसनवी उर्दू शायरी की वह वसीअ और क़दीम सनअत है, जो क़िस्सागोई, दास्तान, तसव्वुफ़ और समाजी रवायत को एक सिलसिला-वार शेरी निज़ाम में पेश करती है। मसनवी की बुनियाद मुसलसल क़ाफ़ियों पर होती है, जो शायर को यह इजाज़त देते हैं कि वह लंबी कहानी बिना रुकावट बयान कर सके। इस सनअत का असल हुस्न उसकी रवानी और तफ़सील में पोशीदा होता है, जहाँ क़ारी एक शेर से दूसरे शेर तक सफ़र करता हुआ एक मुकम्मल दुनिया में दाख़िल हो जाता है।
मौलाना जलालुद्दीन रूमी की “मसनवी-ए-मआनवी” इस सनअत की अज़ीम तरीन मिसाल है, जिसे सिर्फ़ अदबी नहीं बल्कि रूहानी और फ़लसफ़ियाना दस्तावेज़ का दर्जा हासिल है। रूमी के यहाँ मसनवी इश्क़-ए-हक़ीक़ी (आध्यात्मिक अनुभव,ईश्वर प्रेम) का सफ़र है, जहाँ कहानी, मिसाल और तमसील (उपमा और तुलना) के ज़रिए इंसान को उसकी असल पहचान तक पहुँचाया जाता है। उर्दू में मीर हसन की “सिहर-उल-बयान” और दया शंकर नसीम की “गुलज़ार-ए-नसीम” ने मसनवी को तहज़ीबी और रोमानी रंग दिया।
मसनवी की क़ुव्वत इस बात में है कि यह शायर को मुकम्मल बयान का मौक़ा देती है। यहाँ सिर्फ़ जज़्बा नहीं, बल्कि मुआशरा, रवायत और अख़लाक़ियात का जायज़ा लिया जाता है। इस सनअत ने उर्दू अदब को दास्तान की रवायत से जोड़ा और शायरी को सिर्फ़ जज़्बाती इज़हार तक महदूद नहीं रहने दिया। इसी लिए मसनवी को उर्दू शायरी की सबसे वसीअ और तवील फ़न्नी इमारत कहा जा सकता है।
क़सीदा: मदह, तारीख़ और अदबी शान
क़सीदा उर्दू और फ़ारसी शायरी की वह सनअत है, जो अपनी शान, जलालत और बलाग़त के लिए मशहूर रही है। इब्तिदा में क़सीदा ज़्यादातर बादशाहों, उमरा और बुज़ुर्ग शख़्सियतों की मदह के लिए लिखा जाता था, लेकिन वक़्त के साथ इसने तन्क़ीद (आलोचना) , हिकमत (बुद्धि) और तारीख़ी शऊर (ऐतिहासिक चेतना) को भी अपने दामन में समेट लिया। क़सीदा एक सख़्त फ़न्नी निज़ाम का मुतालबा (अर्थ) करता है, जहाँ ज़बान की क़ुव्वत (ताकत, दम) और तश्बीह-ओ-इस्तिआरा का हुस्न (प्रशंसा और रूपक की सुंदरता)अपनी बुलंदी पर होता है।
सौदा उर्दू क़सीदे के सबसे बड़े उस्ताद तस्लीम किए जाते हैं, जिनके क़सीदों में लफ़्ज़ी जलाल, फ़न्नी पुख़्तगी और समाजी तन्क़ीद एक साथ नज़र आती है। सौदा ने क़सीदे को सिर्फ़ तारीफ़ तक महदूद (सीमित ) नहीं रखा, बल्कि उसे अपने दौर के हालात पर तब्सिरा का ज़रिया बना दिया। उनके बाद मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़ ने क़सीदे में ज़बानी शोख़ी और फ़न्नी नज़ाकत पैदा की, जिससे यह सनअत दरबार से निकलकर अदबी ज़हानत का हिस्सा बन गई।
क़सीदे की अहमियत इस लिए भी क़ायम है कि यह शायर की ज़बान और इल्म दोनों का इम्तिहान होता है। यहाँ सिर्फ़ जज़्बा काफ़ी नहीं होता, बल्कि तारीख़, मज़हब, मुआशरा और फ़न्नी रवायत का गहरा इदराक ( समझ, बोध ) ज़रूरी होता है। आज अगरचे क़सीदा कम लिखा जाता है, मगर उसकी अदबी क़द्र और तारीख़ी अहमियत से इनकार मुमकिन नहीं। क़सीदा उर्दू शायरी की वह सनअत है, जो उसके शानदार माज़ी और इल्म-ओ-फ़न की बुलंदी की गवाह है।
नतीजा
ग़ज़ल जज़्बात की ज़बान है, रुबाई फ़िक्र का गहरायी, मसनवी दास्तान का सफ़र और क़सीदा अदबी शान का इज़हार। इन चारों सनअतों ने मिलकर उर्दू शायरी को वह वुसअत (विस्तार, चौड़ाई, गुंजाइश, सामर्थ्य) और गहराई अता की है, जो उसे दुनिया की बड़ी अदबी रवायतों में एक मुम्ताज़ मक़ाम देती है। ये सनअतें सिर्फ़ शेरी हैसियत नहीं रखतीं, बल्कि उर्दू तहज़ीब, सोच और तारीख़ का ज़िंदा दस्तावेज़ हैं।ये भी पढ़ें
