Tribute: उर्दू शायरी का सदा-बहार चेहरा ताहिर फ़राज़ हमेशा के लिए ख़ामोश

 कुछ आवाज़ें सिर्फ़ कानों तक नहीं आतीं, वे सीधे दिल पर दस्तक देती हैं।

कुछ शायर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, वे इंसान की रूह में उतर कर उसकी तन्हाइयों के हमसफ़र बन जाते हैं।
और कुछ शख़्सियतें ऐसी होती हैं, जो महज़ अपने दौर की नुमाइंदगी नहीं करतीं, बल्कि पूरी एक तहज़ीब का चेहरा बन जाती हैं।

ताहिर फ़राज़ उन्हीं चंद नामों में से एक थे
और अब वही नाम उर्दू शायरी की तारीख़ में एक ऐसी ख़ामोशी बन गया है, जो बहुत देर तक महसूस की जाती रहेगी।

“काश ऐसा कोई मंज़र होता, मेरे कांधे पे तेरा सर होता…”

इन अमर अशआर को अपने मख़मली, तरन्नुम से सजाया और असरदार आवाज़ में ज़िंदगी अता करने वाले ताहिर फ़राज़ 72 बरस की उम्र में मुंबई के एक अस्पताल में इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए।

 उनके इंतिक़ाल की ख़बर ने, न सिर्फ़ रामपुर और बदायूं की गलियों को उदास कर दिया, बल्कि लखनऊ, दिल्ली, हैदराबाद से लेकर लंदन, दुबई और शिकागो तक फैले उर्दू अदब के चाहने वालों को भी गहरे रंज-ओ-ग़म में डुबो दिया।

एक शायर नहीं—चलती-फिरती तहज़ीब

ताहिर फ़राज़ को महज़ “मशहूर शायर” कहना उनके क़द और क़ीमत दोनों के साथ नाइंसाफ़ी होगी। वे उर्दू तहज़ीब की एक मुकम्मल तस्वीर थे
उनकी बातचीत में नज़ाकत थी,
उनके लहजे में ठहराव था,
और उनकी शायरी में वह सोज़ और सच्चाई थी, जो सीधे दिल को छू लेती है।

वे उस नस्ल के शायर थे, जिनके लिए शायरी शोहरत का ज़रिया नहीं, बल्कि इबादत का दर्जा रखती थी। मंच उनके लिए नमाइश नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी था—और हर शेर उस ज़िम्मेदारी का एहसास कराता था।

मुंबई का सफ़र और क़िस्मत की आख़िरी लकीर

ताहिर फ़राज़ मुंबई अपनी साहिबज़ादी के इलाज़ और एक ख़ानदानी शादी में शिरकत के लिए गए हुए थे। वहीं अचानक सीने में शदीद तकलीफ़ महसूस हुई। फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया, मगर तमाम तिब्बी कोशिशें बेबस साबित हुईं।
24 जनवरी 2026 हफ़्ते की सुबह उर्दू शायरी का वह चराग़ बुझ गया, जिसने दशकों तक मुशायरों की महफ़िलों को अपनी रौशनी से ज़ीनत बख़्शी थी।

बदायूं से रामपुर तक—एक रूहानी और अदबी सफ़र

29 जून 1953 को बदायूं की सरज़मीं पर जन्म लेने वाले शायर ताहिर फ़राज़ की परवरिश में ही अदब शामिल था। महज़ आठ बरस की उम्र में वे अपने वालिद के साथ अदबी नशिस्तों में बैठने लगे थे।
चौदह साल की उम्र में कही गई उनकी पहली मुकम्मल ग़ज़ल ने यह साफ़ कर दिया था कि यह आवाज़ मामूली नहीं—

“थे जो अपने हुए वो पराए,
रंग क़िस्मत ने ऐसे दिखाए,
हम जो मोती किसी हार के थे,
ऐसे बिखरे कि फिर जुड़ न पाए।”

तालीम के लिए वे रामपुर आए और फिर रामपुर ही उनकी पहचान बन गया। यहीं उन्हें डॉ. शौक़ असरी रामपुरी और दिवाकर राही जैसे उस्तादों की सोहबत और रहनुमाई नसीब हुई, जिन्होंने उनके फ़न को सलीक़ा, संजीदगी और तहज़ीब की ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

रूहानियत और अस्रियत का नायाब संगम

ताहिर फ़राज़ की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसका संतुलन था।
न उसमें बनावटी सूफ़ियाना रंग था,
न खोखली आधुनिकता की नुमाइश।

ख़ानक़ाह नियाज़िया, बरेली से उनकी गहरी वाबस्तगी ने उनके कलाम को रूहानी गहराई अता की, जबकि बशीर बद्र जैसे जदीद शायरों के असर ने उसे आज के इंसान की धड़कनों से जोड़ दिया।
ग़ज़ल, नात, भजन, सलाम या मनक़बत—हर फन में उनकी आवाज़ वही असर रखती थी, जो सुनने वाले को ख़ामोशी से सुनने पर मजबूर कर देती थी।

आलमी मुशायरों का भरोसेमंद नाम

ताहिर फ़राज़ ने रामपुर को सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि आलमी अदबी नक़्शे पर भी एक नई पहचान अता की। अमरीका, ब्रिटेन, ख़लीजी ममालिक और पाकिस्तान तक उनके मुशायरे यादगार बने।
टी-सीरीज़ जैसी नामवर कंपनियों ने उनकी आवाज़ को रिकॉर्ड कर के आम लोगों तक पहुँचाया, जिससे उनकी शायरी किताबों की हदों से निकलकर दिलों की धड़कन बन गई।

रस्मुल-ख़त (ताज़ियत)

निहायत अफ़सोस और गहरे रंज-ओ-ग़म के साथ यह इत्तिला दी जाती है कि उर्दू अदब के नामवर शायर, खुश-आवाज़ फ़नकार और तहज़ीबी पहचान जनाब ताहिर फ़राज़ अब हमारे दरमियान मौजूद नहीं रहे।
उनका इंतिक़ाल महज़ एक फ़र्द की रुख़्सती नहीं, बल्कि उर्दू शायरी के एक रौशन, सजीव और मुकम्मल अहद का इख़्तिताम है।

मरहूम के पसमांदगान में अहलिया, तीन साहिबज़ादियां और एक साहिबज़ादा शामिल हैं। हम इस ग़म की घड़ी में अहल-ए-ख़ानदान से दिली ताज़ियत और हमदर्दी का इज़हार करते हैं और बारगाह-ए-इलाही में दुआगो हैं कि अल्लाह तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद करे और तमाम लवाहिक़ीन को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

एक ख़ला, जो कभी पूरा नहीं होगा

 ताहिर फ़राज़ का जाना उर्दू अदब के लिए ऐसा नुक़सान है जिसकी तलाफ़ी मुमकिन नहीं।
अल्फ़ाज़ तो मौजूद रहेंगे, मगर वह आवाज़, वह तरन्नुम और वह एहसास अब कभी लौट कर नहीं आएगा।

आज जब मुंबई की ख़ामोश फ़ज़ाओं में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किए जाने की तैयारियाँ चल रही हैं, तो दुनिया भर में फैले उनके चाहने वाले बस यही महसूस कर रहे हैं—

ग़ज़ल का वह कारीगर सो गया है…
और लफ़्ज़ यतीम (अनाथ) हो गए हैं।

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ایک آواز، جو اب خاموشی میں بدل گئی

کچھ آوازیں صرف کانوں تک نہیں آتیں، وہ سیدھے دل پر دستک دیتی ہیں۔
کچھ شاعر صرف پڑھے نہیں جاتے، وہ انسان کی روح میں اتر کر اس کی تنہائیوں کے ہم سفر بن جاتے ہیں۔
اور کچھ شخصیتیں ایسی ہوتی ہیں، جو محض اپنے دور کی نمائندگی نہیں کرتیں، بلکہ پوری ایک تہذیب کا چہرہ بن جاتی ہیں۔

طاہر فراز انہی چند ناموں میں سے ایک تھے—
اور اب وہی نام اردو شاعری کی تاریخ میں ایک ایسی خاموشی بن گیا ہے، جو بہت دیر تک محسوس کی جاتی رہے گی۔

“کاش ایسا کوئی منظر ہوتا، میرے کندھے پہ تیرا سر ہوتا…”

ان امر اشعار کو اپنی مخملی، ترنم سے بھری اور اثر دار آواز میں زندگی عطا کرنے والے طاہر فراز بہتر برس کی عمر میں ممبئی کے ایک اسپتال میں اس فانی دنیا سے رخصت ہو گئے۔ ان کے انتقال کی خبر نے نہ صرف رامپور اور بدایوں کی گلیوں کو اداس کر دیا، بلکہ لکھنؤ، دہلی، حیدرآباد سے لے کر لندن، دبئی اور شکاگو تک پھیلے اردو ادب کے چاہنے والوں کو بھی گہرے رنج و غم میں ڈبو دیا۔

ایک شاعر نہیں—چلتی پھرتی تہذیب

طاہر فراز کو محض “مشہور شاعر” کہنا ان کے قد اور قیمت دونوں کے ساتھ ناانصافی ہوگی۔ وہ اردو تہذیب کی ایک مکمل تصویر تھے—
ان کی گفتگو میں نزاکت تھی،
ان کے لہجے میں ٹھہراؤ تھا،
اور ان کی شاعری میں وہ سوز اور سچائی تھی، جو سیدھے دل کو چھو لیتی ہے۔

وہ اس نسل کے شاعر تھے، جن کے لیے شاعری شہرت کا ذریعہ نہیں، بلکہ عبادت کا درجہ رکھتی تھی۔ اسٹیج ان کے لیے نمائش نہیں، بلکہ ذمہ داری تھا—اور ہر شعر اس ذمہ داری کا احساس کراتا تھا۔

ممبئی کا سفر اور قسمت کی آخری لکیر

طاہر فراز ممبئی اپنی صاحب زادی کے علاج اور ایک خاندانی شادی میں شرکت کے لیے گئے ہوئے تھے۔ وہیں اچانک سینے میں شدید تکلیف محسوس ہوئی۔ فوراً اسپتال لے جایا گیا، مگر تمام طبی کوششیں بے بس ثابت ہوئیں۔
ہفتے کی صبح اردو شاعری کا وہ چراغ بجھ گیا، جس نے دہائیوں تک مشاعروں کی محفلوں کو اپنی روشنی سے زینت بخشی تھی۔

بدایوں سے رامپور تک—ایک روحانی اور ادبی سفر

29 جون 1953 کو بدایوں کی سرزمین پر جنم لینے والے طاہر فراز کی پرورش میں ہی ادب شامل تھا۔ محض آٹھ برس کی عمر میں وہ اپنے والد کے ساتھ ادبی نشستوں میں بیٹھنے لگے تھے۔
چودہ سال کی عمر میں کہی گئی ان کی پہلی مکمل غزل نے یہ صاف کر دیا تھا کہ یہ آواز معمولی نہیں—

“تھے جو اپنے ہوئے وہ پرائے،
رنگ قسمت نے ایسے دکھائے،
ہم جو موتی کسی ہار کے تھے،
ایسے بکھرے کہ پھر جُڑ نہ پائے۔”

تعلیم کے لیے وہ رامپور آئے اور پھر رامپور ہی ان کی شناخت بن گیا۔ یہیں انہیں ڈاکٹر شوق اسری رامپوری اور دیواکر راہی جیسے اساتذہ کی صحبت اور رہنمائی نصیب ہوئی، جنہوں نے ان کے فن کو سلیقہ، سنجیدگی اور تہذیب کی بلندیوں تک پہنچایا۔

روحانیت اور عصریت کا نایاب سنگم

طاہر فراز کی شاعری کی سب سے بڑی خصوصیت اس کا توازن تھا۔
ن اس میں بناوٹی صوفیانہ رنگ تھا،
ن کھوکھلی جدیدیت کی نمائش۔

خانقاہ نیازیہ، بریلی سے ان کی گہری وابستگی نے ان کے کلام کو روحانی گہرائی عطا کی، جبکہ بشیر بدر جیسے جدید شاعروں کے اثر نے اسے آج کے انسان کی دھڑکنوں سے جوڑ دیا۔
غزل، نعت، بھجن، سلام یا منقبت—ہر صنف میں ان کی آواز وہی اثر رکھتی تھی، جو سننے والے کو خاموشی سے سننے پر مجبور کر دیتی تھی۔

عالمی مشاعروں کا بھروسے مند نام

طاہر فراز نے رامپور کو صرف ہندوستان میں ہی نہیں، بلکہ عالمی ادبی نقشے پر بھی ایک نئی شناخت عطا کی۔ امریکہ، برطانیہ، خلیجی ممالک اور پاکستان تک ان کے مشاعرے یادگار بنے۔
ٹی سیریز جیسی نامور کمپنیوں نے ان کی آواز کو ریکارڈ کر کے عام لوگوں تک پہنچایا، جس سے ان کی شاعری کتابوں کی حدوں سے نکل کر دلوں کی دھڑکن بن گئی۔

رسم الخط (تعزیت)

نہایت افسوس اور گہرے رنج و غم کے ساتھ یہ اطلاع دی جاتی ہے کہ اردو ادب کے نامور شاعر، خوش آواز فنکار اور تہذیبی شناخت جناب طاہر فراز اب ہمارے درمیان موجود نہیں رہے۔
ان کا انتقال محض ایک فرد کی رخصتی نہیں، بلکہ اردو شاعری کے ایک روشن، زندہ اور مکمل عہد کا اختتام ہے۔

مرحوم کے پسماندگان میں اہلیہ، تین صاحب زادیاں اور ایک صاحب زادہ شامل ہیں۔ ہم اس غم کی گھڑی میں اہلِ خانہ سے دلی تعزیت اور ہمدردی کا اظہار کرتے ہیں اور بارگاہِ الٰہی میں دعا گو ہیں کہ اللہ تعالیٰ مرحوم کی مغفرت فرمائے، ان کے درجات بلند کرے اور تمام لواحقین کو صبرِ جمیل عطا فرمائے۔

ایک خلا، جو کبھی پورا نہیں ہوگا

 طاہر فراز کا جانا اردو ادب کے لیے ایسا نقصان ہے جس کی تلافی ممکن نہیں۔
الفاظ تو موجود رہیں گے، مگر وہ آواز، وہ ترنم اور وہ احساس اب کبھی لوٹ کر نہیں آئے گا۔

آج جب ممبئی کی خاموش فضاؤں میں انہیں سپردِ خاک کیے جانے کی تیاریاں چل رہی ہیں، تو دنیا بھر میں پھیلے ان کے چاہنے والے بس یہی محسوس کر رہے ہیں—

غزل کا وہ کاریگر سو گیا ہے…
اور لفظ یتیم ہو گئے ہیں۔

और नया पुराने