भारत की उर्दू अकादमियाँ सवालों के घेरे में: अदबी ख़िदमत या फंड की बंदरबाँट?

 

भारत की उर्दू अकादमियों का क़याम जिन बुलंद मक़ासिद के तहत हुआ था, उनका बुनियादी मक्सद उर्दू ज़बान, अदब, तहज़ीब और फिक्र की हिफ़ाज़त, तरक़्क़ी और नई नस्ल तक सही रूह के साथ इस्तक़लाल था। ये इदारे उर्दू के अदीबों, शायरों, तन्क़ीद-निगारों और तख़्लीक़कारों के लिए एक मज़बूत सहारा और तहज़ीबी मर्कज़ होने चाहिए थे। मगर आज अगर ईमानदारी से जायज़ा लिया जाए, तो तस्वीर बेहद मायूस-कुन और सोचने पर मजबूर करने वाली नज़र आती है।

आज हालात ये हैं कि ज़्यादातर सरकारी उर्दू अकादमियाँ अदबी ख़िदमत के बजाय रस्मी मशग़लों, नुमाइशी मुशायरों और फंड की बंदरबाँट तक महदूद होकर रह गई हैं। मुशायरों का वो तहज़ीबी वक़ार, जिसमें शेर सुनना एक फ़िक्र-अंगेज़ अमल हुआ करता था, अब अक्सर क़हक़हों, सतही तालियों और मुशायरा-कर्मी अंदाज़ की भेंट चढ़ चुका है।

मुशायरों का गिरता हुआ मयार

मुशायरा उर्दू अदब की जान रहा है, मगर आज बहुत से सरकारी मुशायरे चुने हुए चहेते नामों तक सिमट गए हैं। वही शायर, वही निज़ामत, वही घिसे-पिटे कलाम और वही ताली बजाने का तयशुदा नाटक। निज़ामत से लेकर शायरों की तर्तीब तक, हर मरहला पहले से तय होता है। जो शायर या अदीब इस दायरे से बाहर है, चाहे उसके कलाम में कितनी ही गहराई और सच्चाई क्यों न हो, वह सिर्फ़ तमाशाई बनकर रह जाता है।

दलाली निज़ाम और फंड की बंदरबाँट

सबसे संगीन सवाल सरकारी फंड का है। उर्दू अकादमियों को जो रक़म उर्दू की तरक़्क़ी के लिए मिलती है, उसका बड़ा हिस्सा अदबी प्रोजेक्ट्स, रिसर्च, किताबों की इशाअत, नई नस्ल की तरबियत पर ख़र्च होने के बजाय, दलाल तबक़े की नज़र हो जाता है। ये वही लोग हैं जो हर दौर में “ख़िदमत-ए-उर्दू” का नारा लगाते हैं, मगर असल में उर्दू को अपनी रोज़ी का ज़रिया बनाए हुए हैं।

फंड अलॉटमेंट के बाद कार्यक्रम सिर्फ़ इसीलिए आयोजित किए जाते हैं कि काग़ज़ी कार्रवाई पूरी हो जाए। नतीजा ये कि मुशायरे और सेमिनार एक औपचारिक रस्म बनकर रह जाते हैं, जिनमें न फ़िक्र की ताज़गी होती है, न तहक़ीक़ की गहराई, और न ही उर्दू के मुस्तक़बिल की कोई साफ़ तस्वीर।

अदीब और फ़नकार हाशिए पर

इस निज़ाम का सबसे बड़ा नुक़सान वो सच्चे अदीब, फ़नकार और शायर उठा रहे हैं, जो शोहरत या सिफ़ारिश के सहारे नहीं, बल्कि अपने कलाम और फ़िक्र के बल पर आगे आना चाहते हैं। ये लोग सालों मेहनत करते हैं, मगर अकादमियों के दरवाज़े उनके लिए अक्सर बंद ही रहते हैं। न उन्हें मंच मिलता है, न उनकी किताबों को सरपरस्ती, और न ही उनकी आवाज़ को अहमियत।

अदबी ख़िदमत या सिर्फ़ दिखावा?

ये सवाल अब टालना मुश्किल हो गया है कि क्या सरकारी उर्दू अकादमियाँ वाक़ई अदबी ख़िदमत अंजाम दे रही हैं या सिर्फ़ अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए कार्यक्रमों की गिनती बढ़ा रही हैं? अगर यही रवैया रहा, तो उर्दू अदब का नुकसान सिर्फ़ आज तक महदूद नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली नस्लें भी इससे महरूम रह जाएँगी।

आगे का रास्ता

ज़रूरत इस बात की है कि उर्दू अकादमियों में शफ़्फ़ाफ़ निज़ाम, जवाबदेही, और फ़िक्र-ओ-फ़न की असली क़द्र को फिर से ज़िंदा किया जाए। मुशायरों का मयार ऊँचा हो, फंड सही लोगों और सही कामों तक पहुँचे, और सिफ़ारिश व दलाली के बजाय क़ाबिलियत को मयार बनाया जाए। वरना ख़तरा ये है कि उर्दू अदब सिर्फ़ सरकारी फ़ाइलों और रस्मी मुशायरों तक सिमट कर रह जाएगा।

यह तहरीर किसी एक इदारे या शख़्स के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उस पूरे निज़ाम के ख़िलाफ़ एक संजीदा सवाल है, जिसने उर्दू की रूह को नुक़सान पहुँचाया है। अगर अब भी आत्म-मंथन न किया गया, तो आने वाला वक़्त उर्दू अकादमियों से नहीं, उर्दू अदब से भी सख़्त सवाल करेगा।ये भी पढ़ें 

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