डॉ ताहिर रज़ज़ाक़ी संभली अज़ीम शायर ,मुहक़्क़िक़,सहाफ़ी,नक़्क़ाद और उरूज़-ओ-बलाग़त के उस्ताद, की अदबी विरासत

 पैदाइश और इब्तेदाई पसमंज़र 

(12-02-1957) - (24-02-2014)

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी एक ऐसी अज़ीम शख़्सियत हैं कि जिनकी ज़िंदगी को अल्फ़ाज़ की क़ैद में लाना मेरे बस की बात हरगिज़ नहीं।

फिर भी, ये हक़ीर अपनी पूरी कोशिश कर रहा है कि मेरा क़लम अपना हक़ किसी हद तक अदा कर सके।

ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली की पैदाइश एक ऐसे शरीफ़ और इज़्ज़तदार ख़ानदान में हुई, जिसकी समाज में गहरी जड़ें और मुक़म्मल वक़ार था। आपके वालिद, जनाब हाजी अब्दुल रज़्ज़ाक़ साहब, अपने दौर में एक मोतबर और नेकनाम शख़्सियत के तौर पर पहचाने जाते थे। वहीं आपके दादा, हाजी बरकत उल्लाह साहब, उस ज़माने के चंद ख़ुशक़िस्मत लोगों में शामिल थे जिन्हें पानी के जहाज़ से हज की सआदत नसीब हुई—वो दौर जब हज का सफ़र चार महीनों पर मुश्तमिल हुआ करता था।


ऐसे पाकीज़ा, दीनी और इज़्ज़तदार माहौल में डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब ने आँख खोली। आप अपने वालिद के सबसे बड़े साहबज़ादे और दादा के सबसे बड़े पोते थे, लिहाज़ा आपकी परवरिश बड़े नाज़-ओ-नएमत और लाड़-प्यार के साए में हुई। इब्तिदाई तालीम के दौर में आप पर किसी क़िस्म की भारी ज़िम्मेदारियाँ नहीं डाली गईं, मगर कुदरत ने आपको ज़ेहन की तेज़ी, फ़िक्र की बुलंदी और तालीमी सलाहियत से नवाज़ा था।

पढ़ाई में आप न सिर्फ़ होशियार थे बल्कि ज़ेहनी तवाज़ुन और फ़हम-ओ-फ़िरासत में भी अपने हमअसरों से कहीं आगे नज़र आते थे। हाई स्कूल की तालीम के दौरान ही आपके अंदर शायरी का शौक़ परवान चढ़ने लगा। अपने क़रीब ही रहने वाले इब्तिदाई उस्ताद, जनाब वासिक संभली साहब की रहनुमाई और निगरानी में आपने नातिया कलाम कहना शुरू किया—और यहीं से आपके अदबी सफ़र की पहली रौशनी फूटी।

तालीमी सफर और शग़फ़ ए शायरी 

एक ज़माना था जब वालिदैन औलाद की शादियाँ बहुत कम उम्र में कर देना मुनासिब समझते थे। ऐसे ही रिवायती और सादा दौर में जनाब डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब की शादी सन् 1979 में महज़ बीस वर्ष की उम्र में तय हुई। यह रिश्ता एक मालदार और ज़मींदार ख़ानदान में, जनाब सूफ़ी इनायत हुसैन साहब की साहिबज़ादी, मोहतरमा बिल्कीस जहाँ साहिबा से मुक़र्रर पाया।

DR TAHIR RAZZAQUI AND WIFE BILQEES JAHAN

शादी के बाद ही डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब की आगे की तमाम तालीमी मंज़िलें तय होती चली गईं। हालाँकि राह आसान नहीं थी। शायरी का शौक़ उनके अहबाब को क़तई पसंद न था। वालिद, जनाब हाजी अब्दुल रज़्ज़ाक़ साहब की तमन्ना थी कि सबसे बड़े बेटे होने के नाते ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब कारोबार में उनका हाथ बँटाएँ और ख़ानदानी ज़िम्मेदारियों को आगे बढ़ाएँ।

मगर जनाब ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब तालीम और फ़न-ए-शायरी के शग़फ़ में ऐसे जुनून के साथ डूबे कि फिर पीछे मुड़कर देखने का सवाल ही पैदा न हुआ। इल्म और अदब की यह आग उनके अंदर इस क़दर रौशन थी कि तमाम रुकावटें खुद-ब-खुद रास्ता छोड़ती चली गईं।

आपने अपनी हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की तालीम हिन्द इंटर कॉलेज, संभल से मुकम्मल की। इसके बाद आपने आगरा यूनिवर्सिटी से बी.ए. की डिग्री फ़र्स्ट डिवीजन के साथ हासिल की। फिर रोहिलखण्ड यूनिवर्सिटी, बरेली से एम.ए. की तालीम भी फ़र्स्ट डिवीजन में मुकम्मल की।
इल्म की प्यास यहीं थमी नहीं—आख़िरकार आपने गुरु नानक यूनिवर्सिटी, अमृतसर से ( PhD ) की डिग्री हासिल कर के अपने तालीमी सफ़र को बुलंदी तक पहुँचा दिया।

ज़रिया-ए-मआश और पेशेवर ज़िंदगी

डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब अंदर से निहायत ही खुद्दार, स्वाभिमानी और बुलंद किरदार इंसान थे। उनकी ज़िंदगी का हर पहलू मेहनत, इस्तिक़लाल और ख़ुद-एतमादी की रौशन मिसाल है। वह अक्सर तज़्किरा किया करते थे कि हाई स्कूल की तालीम के दौर ही में उन्होंने ट्यूशन पढ़ाने से लेकर हैंडीक्राफ़्ट्स के कारख़ानों में काम करके न सिर्फ़ अपनी पढ़ाई जारी रखी, बल्कि अपने इख़राजात भी ख़ुद उठाए। यह वही दौर था जब ज़िंदगी ने उन्हें मशक्क़त का सलीक़ा सिखाया और आत्मसम्मान की लकीर उनके किरदार पर और गहरी होती चली गई।

Dr.Tahir Razzaqi School Time Photograph

1979 में शादी के बाद उन्होंने मुसलसल हैंडीक्राफ़्ट्स के कारोबार की जद्दोजहद जारी रखी और तमाम नशेब-ओ-फ़राज़ के बावजूद अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के साथ-साथ तालीम और शग़फ़-ए-शायरी को भी ज़िंदा रखा। हालात चाहे जैसे भी रहे हों, इल्म और अदब से उनका रिश्ता कभी कमज़ोर नहीं पड़ा।

एम.ए. उर्दू मुकम्मिल करने के बाद, अपने इब्तिदाई उस्ताद मौलवी तनवीर साहब के ख़ुलूस-भरे मशविरे पर उन्होंने सरकारी मुलाज़िमत के लिए कोशिशें शुरू कीं। अल्लाह तआला की रहमत और अहबाब की दुआओं के सदक़े उन्हें ज़िआउल उलूम अरबिक कॉलेज, सराय तरीन में सरकारी नौकरी नसीब हुई, जहाँ उन्हें अपने उस्ताद-ए-मोहतरम के शाना-ब-शाना ख़िदमत अंजाम देने का शरफ़ हासिल हुआ।

मुलाज़िमत के दौरान उन्होंने कई दर्जों से गुज़रते हुए दरजात-ए-फ़ौक़ानिया तक का सफ़र तय किया। उनकी ज़ेहनी सलाहियत, फ़न-ए-उरूज़ और बलाग़त पर ऐसी गिरफ़्त थी कि दूर-दराज़ से लोग अपनी तख़्लीक़ात इस्लाह के लिए उनके पास लेकर आते। हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि बेरूनी ममालिक से भी डाक के ज़रिये किताबें, तख़्लीक़ात और मज़ामीन इस्लाह के लिए भेजे जाते थे। फ़हीम बिस्मिल शाहजहांपुरी, नदीम अख़्तर नदीम मुज़फ़्फ़रनगरी और सऊदी अरब से डॉ हनीफ़ शाह ख़ान साहब अक्सर अपनी तख़्लीक़ात उन्हें रवाना किया करते थे।

डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली के मुक़ामी शागिर्दों की फ़ेहरिस्त भी कम वसीअ नहीं—जनाब तौफ़ीक़ आज़ाद साहब, मुनव्वर ताबिश, शफ़ीक़ बरकाती, नूर आलम नूर, अनज़ार-उल-हक़ (हक़ संभली), सय्यद क़ायम संभली (हयात नगरी), मुज़म्मिल ख़ां मुज़म्मिल संभली, कौसर संभली, मुज़म्मिल दानिश संभली—जैसे न जाने कितने नाम हैं जिन्हें यहाँ दर्ज किया जा सकता है। यह फ़ेहरिस्त इतनी तवील है कि हर नाम अपने आप में एक रौशन तहरीर की तरह चमकता नज़र आता है।

ताहिर रज़ज़ाक़ि संभली साहब शख़्सियत और फन 

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली उर्दू अदब की उस रौशन रवायत का नाम हैं, जिसमें शख़्सियत की शराफ़त और फ़न की बुलंदी एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल जाती है कि पहचान मुश्किल नहीं, बल्कि रौशनतर हो जाती है। वह महज़ एक शायर नहीं, बल्कि अज़ीम नातगो, मुहक़्क़िक़, सहाफ़ी, नक्क़ाद और फ़न-ए-उरूज़-ओ-बलाग़त के मुकम्मल उस्ताद थे—ऐसे साहिब-ए-दीवान जिनकी ज़िंदगी इल्म, इश्क़ और अदब की खिदमत से तामीर हुई।

Mr. Dr. Tahir Razzaqi Sambhali was honored with the ceremonial draping of a shawl (Chadar Poshī) at a mushaira.

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी की अदबी ज़िंदगी का आग़ाज़ नातिया कलाम के पहले मजमूए “चराग़-ए-बता” से हुआ। इसके बाद उस्ताद-ए-मोहतरम जनाब मौजिज़ संभली की सरपरस्ती में दूसरा नातिया मजमूआ “हिलाल-ए-बता” मंजर-ए-आम पर आया। इश्क़-ए-रसूल ﷺ और इश्क़-ए-इलाही का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; तीसरा नातिया मजमूआ “कारवाँ-ए-तैबा” शाया हुआ, जिसने उन्हें ज़मीन-ए-संभल ही नहीं, बल्कि दूर-दराज़ तक मक़बूलियत अता की। संभल की सरज़मीन पर जब भी मीलाद की महफ़िल सजी, डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी का कलाम यक़ीनन गूँजता हुआ सुनाई देता था।
“बज़्म-ए-कौनेन पहले सजाई गई,
फिर तशरीफ़ आपकी दुनिया लाई गई”

यह शेर उस दौर की हर मीलाद की ज़ीनत बना रहता था।

वक़्त के साथ उनकी शायरी ने जमालियात की जानिब रुख़ किया और उन्होंने ग़ज़ल के मैदान में क़दम रखते हुए दीवान “बहारों के चराग़” तख़्लीक़ किया। यह दीवान अदबी हल्क़ों में इस क़दर सराहा गया कि बड़े-बड़े अदीबों और शोअरा ने इस पर तहक़ीक़ी और तन्क़ीदी मज़ामीन क़लमबंद किए।

Dr. Tahir Razzaqui Sambhali participated in a mushaira on Doordarshan TV channel, alongside all the leading and eminent poets of India.

उनकी एक और अहम तख़्लीक़ “औराक़-ए-जमाल” है—क़रीब ढाई सौ सफ़्हात पर मुश्तमिल दीवान, जिसका कुछ हिस्सा बदक़िस्मती से एक शागिर्द की बे-तरतीबी और अमानत में ख़यानत की वजह से नाक़िस सूरत में शाया हो गया। इंशा अल्लाह, यह मुकम्मल दीवान जल्द ही सही तरतीब के साथ मंज़र-ए-आम पर आएगा।

A photograph of Dr. Tahir Razzaqi Sambhali reciting poetry at a mushaira.

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी की ज़िंदगी की सबसे अहम और मयारी तख़्लीक़ रुबाइयात का दीवान “रुतें” साबित हुआ। इस दीवान ने आलमी सतह पर ज़बरदस्त क़बूलियत हासिल की और दुनिया भर के मुम्ताज़ शोअरा और अदीबों ने इस पर अपने मज़ामीन शाया किए। प्रोफ़ेसर सुहैल आगा (लाहौर यूनिवर्सिटी, पाकिस्तान) का तन्क़ीदी मज़मून इस किताब के बैक कवर की ज़ीनत बना—जो इसकी अदबी अहमियत का बेहतरीन सबूत है।

इल्म-ओ-तहक़ीक़ के मैदान में भी डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी ने मिसाली काम अंजाम दिया। उनकी Unpublished Ph.D. Thesis“मौजिज़ संभली : शख़्सियत और फ़न” — तक़रीबन 450 सफ़्हात पर मुश्तमिल एक अहम तहक़ीक़ी दस्तावेज़ है, जिसमें शहर संभल की मुकम्मल तारीख़, दादा उस्ताद मौजिज़ संभली की ज़िंदगी और उनकी फ़न्नी ख़ुसूसियात पर गहराई से रोशनी डाली गई है।

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी के दिल में असातिज़ा के लिए जो मुहब्बत और अक़ीदत थी, वह इस बात से वाज़ेह है कि उन्होंने अपने ही उस्ताद-ए-मोहतरम मौजिज़ संभली पर Ph.D. करने का अज़्म किया और उसे मुकम्मल करके सच्ची और हक़ीक़ी ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश की। वह कभी अपने उस्तादों को फ़रामोश करने वालों में से न थे। फ़न-ए-उरूज़-ओ-बलाग़त में उनके उस्ताद और Ph.D. Supervisor जनाब डॉ. ओम प्रकाश अग्रवाल ज़ारअललामी साहब रहे, जिनसे उन्होंने आख़िरी दम तक इल्मी रिश्ता क़ायम रखा और उनके लिए बराबर मज़ामीन लिखते रहे।

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब एक सरगर्म, जोशीले और बे-थक अदबी शख़्स थे। हरियाणा उर्दू अकादमी के रिसाले “जमुना तट” "तामीर ए हरयाणा" "अदबी दुनियां" "दुनिया ए अदब"   दिल्ली उर्दू के मैगज़ीन, और दीगर आलमी अख़बार-ओ-रसाइल में उनकी ग़ज़लियात, तन्क़ीदी और सहाफ़ती मज़ामीन बाक़ायदगी से शाया होते रहे। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी उनकी मौजूदगी रौशन रही—डी.डी. मेट्रो, दिल्ली दूरदर्शन, ज़ी सलाम, तमाम ऑल इंडिया मुशायरों, आकाशवाणी बरेली व लखनऊ, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मुख़्तलिफ़ अदबी मराक़िज़ में उन्होंने अपना कलाम पेश किया। इसके अलावा मुख़्तलिफ़ शहरों में उनके अदबी जश्न मनाए गए, जो उनकी मक़बूलियत और अदबी क़द्र का ज़िंदा सबूत हैं।

यक़ीनन, डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली उर्दू अदब के उस रौशन नाम का हिस्सा हैं, जिनकी तख़्लीक़ात वक़्त की गर्द से बे-नियाज़ होकर आने वाली नस्लों तक रोशनी पहुँचाती रहेंगी।

डॉ ताहिर रज़ज़ाक़ि साहब की तख़लीक़ात 

1-चराग़-ए-बतहा    (नातिया क़लाम )
2-हिलाल-ए-बतहा   (नातिया क़लाम )
3-कारवाँ-ए-तैबा  (नातिया क़लाम )
4-बहारों के चराग़ (ग़ज़लियात और क़तआत का दीवान)
5-औराक़-ए-जमाल (ग़ज़लियात और क़तआत का दीवान)
6-रुतें (रुबाई और और क़तआत का दीवान )
7-मौजिज संभली शख्सियत और फन (Ph.D. Thesis)

विसाल

डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली साहब को सन 2009 में ब्रेन ट्यूमर की तश्ख़ीस हुई। पंत हॉस्पिटल, दिल्ली में डॉ. अनीता जागिया की निगरानी में सुपर-स्पेशियलिटी के तहत उनका कामयाब ऑपरेशन हुआ। इस सफल जिर्राही(Surgical Operation ) के बाद चंद ही महीनों में आप पूरी तरह सेहतमंद नज़र आने लगे।

मगर अफ़सोस कि बाद के इलाज के सिलसिले में डॉक्टरों की हिदायतों पर पूरी तरह अमल न हो सका और एहतियात में कुछ लापरवाही बरती गई। इसके बावजूद एक ख़ूबसूरत पहलू यह रहा कि आपने ज़िंदगी के अहम और ज़रूरी कामों को सलीक़े से निबटाना शुरू कर दिया—मकान की तामीर से जुड़े अधूरे काम, कुछ अहम अदबी मशग़ले, और अपनी डायरी पर वसीयतनामा दर्ज करना। गोया आपको एहसास हो चुका था कि वक़्त की रेत तेज़ी से फिसल रही है।

इसी ऑपरेटेड ट्यूमर के आगे इलाज में कोताही की वजह से सन 2014 में आपको ब्लड कैंसर ( Blood Cancer ) की तश्ख़ीस हुई। डॉक्टर्स ने साफ़ कह दिया कि अब वक़्त बहुत कम है और आपको घर ले जाना बेहतर होगा। फिर भी अल्लाह तआला ने अपनी रहमत से साढ़े चार महीने का ऐसा मोहलत-ए-ज़िंदगी अता फ़रमाया, जिसमें आप लोगों से मिले, बातें कीं, पूरे होश-ओ-हवास में अपने ज़रूरी कामों को मुकम्मल किया।

आख़िरकार 24-02-2014 की सुबह तक़रीबन छह बजे, आप अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी से जा मिले।
अल्लाह आपकी मग़फ़िरत फ़रमाए और आपको जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे। आमीन।


डॉ ताहिर रज़ज़ाक़ी साहब की शायरी, ग़ज़लें,क़तआत,रुबाई माहिये 


ग़ज़ल -1

तसनीफ़ - बहारों के चराग़ 

रोज़ रह रह के ये कहते हैं, मज़ारों के चराग़ 

बुझते देखे हैं बहुत,इश्क़ के मारों के चराग़ 


एक अपना ही दिया जल न सका हम से कभी 

यूँ तो रोशन किये दुनिया में हज़ारों के चराग़ 


सो गए खुद ही बुझा कर जो चराग़ ए हस्ती 

क्या करेंगे उन्हें बेदार मज़ारों के चराग़ 


अपनी आँखों में लिए बैठे हैं हम शोले ग़म के 

आके देखे तो कोई दर्द के मारों के चराग़ 


हाय वह आलम ए हसरत का अजब सा आलिम 

डूबने वालों ने जब देखे कनारो के चराग़ 


अब न भटकेगा कभी इश्क़ की राहों में कोई 

बन गए नक़्श ए क़दम राहगुज़ारों के चराग़ 


हम क़फ़स वालो की तक़दीर में लिखे हैं कहाँ 

देखने वालों ने देखे हैं बहारों के चराग़ 


कारवां शौक़ का मंज़िल पे लुटा हे ताहिर 

दे रहे हैं ये पता डूबते तारों के चराग़ 


ग़ज़ल -2

तसनीफ़ - बहारों के चराग़ 


जब हुस्न ए पुर बहार पे रानाइयाँ चलीं 

तोबा को तोड़ ताड़ के रानाइयाँ चलीं 


किस एहतमाम से चला हे करवाने शौक़ 

ज़ेहनो में गूंजती हुयी शहनाईयां चलीं 


हर ज़ख़्म खिंदा लब हुआ तज़्मइने दर्द को 

कुछ इस अदा से अबके ये पुरवाइयाँ चलीं 


वो नाज़िशे बहार जो गुलशन में आगया 

फूलों में खूब मोअर के अराइयां चलीं 


एक जुम्बिश ए निगाह ने दीवाना करदिया 

ताहिर न उसके सामने दानाईयाँ चलीं 



डॉ मो.ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब की  कुछ माहिये  


फनकार हुँ , शायर हुँ
इतना तारुफ़ हे 
संभल का हुँ, ताहिर हुँ


क्या रोग लगा बैठे 
तुमसे से मोहब्बत में 
हम ख़ुद को भुला बैठे
  

लगता हे की साजिश हे 
मुझपे अचानक क्यों 
उसकी नवाज़िश हे 



डॉ ताहिर  रज़्ज़ाक़ी साहब के कुछ कतआत 

कहकशां तेरी,आसमा तेरा 

सब मकाँ तेरे,लामकाँ तेरा 

मुझमे जो बोलता हे,वो भी तू 

ये जबीं तेरी,आस्ताँ तेरा 



मरमरीं जिस्म पर सियाह गेसू 

इन हवाओं से यूँ बिखरते हैं 

जिस तरह बर्फपोश वादी  में 

रात के साये रक्स करते हैं 



हिजरतें   वक्त   का  तकाज़ा थीं 

याद आयीं रिफ़ाक़ते क्या  क्या

तुम से बिछड़े तो क्या बताये हम 

हमपे गुज़रीं क्यामतें  क्या क्या


रक़्स करने लगे हैं सन्नाटे 

शाम आयी उदासियाँ लेकर 

तोड़ दो ये तिलिस्म तीराह शबी 

अभी जाओ तज्जलियाँ लेकर 


तस्कीन ए दिलो जाँ हे रुबाई कहना 

जज़्बों का चराग़ाँ हे रुबाई कहना 

औज़ान न जाने तो हे कहना मुश्किल 

वाक़िफ़ हे तो आसान हे रुबाई कहना 


में तेरा गुनहगार हूँ मेरे आक़ा 

हर रुख से ख़ताकार हूँ मेरे आक़ा 

कुछ भी तो नहीं पास असासे बख़्शिश 

रेहमत का तलबगार हूँ मेरे आक़ा 


हम क़लन्दर मिज़ाज हैं हमसे 

जिस क़द्र चाहे तू ख़ुशी लेले 

तेरे हिस्से में  जितने आंसू हैं 

उनके बदले मे तू हंसी लेले 

Topics (Coming Soon)

This biography is continuously being expanded with authentic research, rare documents, interviews, and verified literary sources. The following sections will be added and updated in the coming days:

  • Biography
  • Early Life & Family Background
  • Education
  • Literary Journey
  • Poetry Career
  • Shayari
  • Ghazals
  • Nazms
  • Hamd, Naat & Manqabat
  • Rubaiyat & Qataat Mahiye
  • Books & Publications
  • Complete Kulliyat
  • Unpublished Works
  • Literary Style & Thought
  • Journalism Career
  • Literary Contributions
  • Awards & Honours
  • Famous Quotes
  • Selected Poetry
  • Interviews
  • Rare Photographs
  • Audio & Video Archive
  • Timeline of Life & Career
  • Critical Reviews
  • Research Papers & Articles
  • Contemporary Opinions
  • FAQs
  • References & Sources
  • Photo Gallery
  • Legacy & Influence
  • Latest Updates 


तक़मील का सफ़र जारी है...


(डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली की सवानेह के लिए)

मेरे वालिद-ए-मोहतरम जनाब डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली की अदबी, इल्मी, तन्क़ीदी और सहाफ़ती ज़िंदगी के बहुत से गोशे ऐसे हैं जिन पर अभी तफ़्सील के साथ काम किया जाना बाक़ी है। हक़ीक़त यही है कि यह सवानेह-ए-हयात अभी अपनी इब्तिदाई मंज़िल में है। अब तक जो कुछ यहाँ तहरीर किया गया है, वह उनकी हमागीर शख़्सियत, अदबी ख़िदमात और फ़िक्री विरासत का शायद दो फ़ीसद भी नहीं। इसे सिर्फ़ एक इब्तिदा समझा जाए; अस्ल सफ़र अभी बाक़ी है और इंशा अल्लाह यह सिलसिला मुसलसल जारी रहेगा।

अपनी रोज़मर्रा की मसरूफ़ियात के दरमियान मुझे जितना भी वक़्त नसीब होता है, उसे मैं अपनी वेबसाइट, उर्दू-हिन्दी अदब की ख़िदमत और ख़ुसूसन शोरा व उदबा की मुस्तनद सवानेह को तरतीब देने में सरफ़ करता हूँ। यह महज़ मेरा ज़ाती शौक़ नहीं, बल्कि एक ऐसी अदबी अमानत है जिसकी जड़ें हमारे ख़ानदानी मिज़ाज और तहज़ीबी विरासत में पैवस्त हैं। अदब की ख़िदमत का जज़्बा हमारे ख़ून में शामिल है, और इंशा अल्लाह जब तक कलम में तवानाई बाक़ी है, यह ख़िदमत पूरे ख़ुलूस और दयानतदारी के साथ जारी रहेगी।

इसी मक़सद के तहत डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली के तमाम मतबूआ मजमूए, उन पर लिखे गए मज़ामीन, तब्सिरे, तास्सुरात, इंटरव्यू, नायाब दस्तावेज़ात और मुकम्मल फ़ेहरिस्त-ए-कुतुब (बिब्लियोग्राफ़ी) मरहला-वार इसी वेबसाइट पर शाया किए जाते रहेंगे, ताकि मुहक़्क़िक़ीन, तलबा और अदब के संजीदा क़ारीन को एक मुकम्मल और मुस्तनद मरजअ हासिल हो सके।

मेरी दिली ख़्वाहिश है कि डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी संभली की मुकम्मल कुल्लियात और उनकी जामेअ सवानेह ऐसी सूरत में मुरत्तब हो जो सिर्फ़ मालूमात का मजमूआ न हो, बल्कि उनकी शख़्सियत, फ़िक्र, फ़न और अस्राती किरदार का सच्चा आईना साबित हो। इसी वजह से उनके शागिर्दों, रुफ़क़ा-ए-क़लम, असातिज़ा, अहबाब और जानशीनों से रू-ब-रू मुलाक़ातें भी इस तहरीरी सफ़र का लाज़िमी हिस्सा हैं। इनमें से कई अहबाब सात सौ किलोमीटर से भी ज़्यादा फ़ासले पर मुक़ीम हैं। अगरचे आज के दौर में ऑनलाइन राब्ते बहुत-सी आसानीयाँ फ़राहम करते हैं, लेकिन यादों की हरारत, लहजे की कैफ़ियत और वाक़ियात की अस्ल रूह सिर्फ़ आमने-सामने की मुलाक़ातों से ही महफ़ूज़ की जा सकती है। मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि यह अदबी सरमाया मुस्तनद हवालों और बराहे-रास्त References की बुनियाद पर मुरत्तब किया जाए।

यहाँ एक बात वाज़ेह तौर पर अर्ज़ करना भी ज़रूरी समझता हूँ कि इस सवानेह-ए-हयात का हर सफ़्हा मेरी अपनी तहक़ीक़, मुताला, मुशाहिदे और मेहनत का नतीजा है। जब मैंने इस तहरीरी सफ़र का आग़ाज़ किया था, उस वक़्त मुझे रवायती तौर पर किसी उस्ताद की शागिर्दी का शरफ़ हासिल न था, और अब भी मेरा इरादा यही है कि इस मुकम्मल कुल्लियाती मंसूबे को अपनी तहक़ीक़ और अपनी ज़िम्मेदारी के तहत ही मुकम्मल करूँ। यह किसी से बेनियाज़ी नहीं, बल्कि हालात की वह मजबूरी है जिसने मुझे शुरू से ही अपना रास्ता ख़ुद तलाश करना सिखाया।

आख़िर में एक तल्ख़ मगर सच्ची हक़ीक़त का ज़िक्र भी करना चाहता हूँ। मेरा शहर, जिससे मुझे बेपनाह मुहब्बत है, बदक़िस्मती से अपने उभरते हुए अहल-ए-क़लम की क़द्र-शनासी में हमेशा दरियादिली का मुज़ाहिरा नहीं कर सका। यह एहसास सिर्फ़ मेरी ज़ात तक महदूद नहीं, बल्कि मैंने महसूस किया है कि बहुत-से बा-कमाल नौजवान क़लमकार भी इसी Ignorance का शिकार रहे हैं। लेकिन मेरा यक़ीन है कि इख़्लास, दीयानत और इल्मी मेहनत से अंजाम दिया गया काम अपनी पहचान ख़ुद पैदा करता है। वक़्त गुज़र जाने के बाद शख़्सियतें नहीं, बल्कि उनके अफ़कार, उनकी तख़्लीक़ात और उनकी ख़िदमात ज़िंदा रहती हैं। इसी यक़ीन और इसी अज़्म के साथ मैं इस अदबी सफ़र को जारी रखे हुए हूँ, और दुआगो हूँ कि अल्लाह तआला इस मामूली कोशिश को शरफ़-ए-क़ुबूलियत अता फ़रमाए और इसे अहल-ए-इल्म व अदब के लिए नाफ़ेअ बनाए। आमीन।ये भी पढ़े 


अल्लाह हाफिज़

आपका अपना 

 हक़ीर ज़र्रा,

ضیا السحر رزّاقی

E-mail-zsrazzaqi@gmail.com

Phone-7011631225 (w)


और नया पुराने