इब्तिदाई ज़िंदगी और पस-मंज़र
उर्दू अदब की फ़ज़ाओं को अपनी फ़िक्र की ख़ुश्बू से महकाने वाले मशहूर शाइर, अफ़साना-निगार और अदबी शख़्सियत अहमद नदीम क़ासमी का अस्ल नाम अहमद शाह अवान था। आपकी पैदाइश 20 नवम्बर 1916 को दौर-ए-ब्रिटानिया के ज़िला ख़ुशाब के पुरफ़ज़ा और तहज़ीबी रिवायतों से मालामाल गाँव अंगाह में हुई। आप एक मुअज़्ज़ज़ और इल्म-दोस्त अवान ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे, जिसकी सामाजिक और तहज़ीबी रिवायतों ने आपकी शख़्सियत की तश्कील में अहम किरदार अदा किया।
अहमद नदीम क़ासमी ने अपनी इब्तिदाई तालीम कैंपबेलपुर (मौजूदा अटक) में हासिल की, जहाँ बचपन ही से मुतालआ, तफ़क्कुर और अदब से उनकी दिलचस्पी के आसार नुमायाँ होने लगे थे। इल्म की तिश्नगी ने उन्हें आगे बढ़ाया और वह सादिक एगर्टन कॉलेज, बहावलपुर तक जा पहुँचे, जहाँ उनकी ज़ेहनी और फ़िक्री सलाहियतों को और ज़्यादा निखार मिला। तालीमी सफ़र की यह मंज़िलें सिर्फ़ दरसी किताबों तक महदूद न थीं, बल्कि इन्हीं अय्याम में उनके ज़ेहन में अदब, इंसान-दोस्ती और तख़्लीकी शऊर के वे बीज रोपे गए जो आगे चलकर एक विशाल अदबी दरख़्त की सूरत इख़्तियार करने वाले थे।
सन 1935 में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर से डिग्री हासिल की। यह दौर उनकी ज़िंदगी का वह अहम मोड़ साबित हुआ जब उन्होंने बाक़ायदा अदब की दुनिया में अपने क़दम जमाने शुरू किए। तालीम के मराहिल तय करते हुए उनका ज़ेहन सिर्फ़ इल्मी उफ़ुक़ तक महदूद न रहा, बल्कि इंसानी जज़्बात, समाजी मसाइल और ज़िंदगी की रंगा-रंग हक़ीक़तों की तरफ़ भी मुतवज्जेह हुआ। यही वजह है कि बाद के बरसों में उनकी शाइरी, अफ़सानों और मज़ामीन में ज़िंदगी की गहराइयाँ, इंसानी दर्द और समाजी शऊर पूरी आब-ओ-ताब के साथ झलकता है।
इन्हीं इब्तिदाई तजुर्बात, तालीमी मराहिल और मुताला ए वुसअत ने अहमद नदीम क़ासमी को उस राह पर गामज़न किया जहाँ उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अदब, फ़न और इंसानी क़द्रों की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी। आगे चलकर वह उर्दू अदब के उन चंद बुलंद-पाया अदीबों में शुमार किए गए जिनकी तख़्लीक़ात ने न सिर्फ़ अपने अहद को मुतास्सिर किया बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी फ़िक्र-ओ-फ़न का एक रौशन मीनार बन गईं।
अदबी ख़िदमात और नुमायाँ कारनामे
अहमद नदीम क़ासमी की अदबी ज़िंदगी कई दशकों पर मुहीत एक शानदार और फलदायक सफ़र रही, जिसमें उन्होंने उर्दू अदब को ऐसी बेशक़ीमती तख़्लीक़ात अता कीं जो आज भी अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों को मुंतशिर करती हैं। उन्होंने अपनी तवील अदबी ज़िंदगी में पचास से ज़्यादा किताबें तस्नीफ़ कीं, जिनमें शाइरी, अफ़साना-निगारी, तन्क़ीद, सहाफ़त और फ़नून-ए-लतीफ़ा से मुतअल्लिक़ रचनाएँ शामिल हैं। उनकी तख़्लीक़ात महज़ अल्फ़ाज़ का जमावड़ा नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात, समाजी शऊर और ज़िंदगी की तल्ख़-ओ-शीरीं हक़ीक़तों का एक जीता-जागता आईना हैं।
क़ासमी की शाइरी में इंसान-दोस्ती, मोहब्बत, अम्न, हमदर्दी और इंसानी अज़मत का गहरा एहसास पूरी शिद्दत के साथ झलकता है। उन्होंने अपने कलाम के ज़रिए इंसानियत के दर्द, समाजी नाइंसाफ़ियों और आम आदमी के जज़्बात को ऐसी पुरअसर आवाज़ बख़्शी कि उनका शे'री सरमाया हर तबक़े के क़ारी से सीधा रिश्ता क़ायम करने में कामयाब रहा। उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में फ़िक्र की गहराई और एहसास की गर्मी एक साथ दिखाई देती है, जो उन्हें अपने अहद के मुमताज़ शाइरों की सफ़ में ला खड़ा करती है।
अफ़साना-निगारी के मैदान में भी अहमद नदीम क़ासमी ने बेमिसाल कामयाबी हासिल की। उनके अफ़सानों में देहाती ज़िंदगी, गाँवों की सादा-लौह तहज़ीब, इंसानी रिश्तों की नज़ाकत और समाजी तब्दीलियों का ऐसा हक़ीक़ी और जाँदार तसव्वुर मिलता है कि उन्हें अक्सर मुंशी प्रेमचंद की रिवायत का अहम वारिस क़रार दिया जाता है। उन्होंने गाँव के गुमनाम किरदारों, मेहनतकश तबक़ों और आम इंसान की कशमकश को जिस फ़नकाराना अंदाज़ में बयान किया, वह उर्दू अफ़साने की तारीख़ में एक नुमायाँ मुक़ाम रखता है।
ग़ज़ल से लेकर जदीद नज़्म तक, क़ासमी ने शाइरी की तक़रीबन हर सिन्फ़ में अपनी फ़िक्र और फ़न का ऐसा रंग बिखेरा जिसने रिवायती और जदीद दोनों अदबी रवायतों को एक ख़ूबसूरत हम-आहंगी अता की। उनकी शाइरी में जहाँ क्लासिकी लुत्फ़ महसूस होता है, वहीं अस्र-ए-हाज़िर के मसाइल और जदीद एहसासात भी पूरी वाज़ेहियत के साथ नज़र आते हैं। यही वजह है कि उनका कलाम हर दौर में ताज़गी और मआनवी वुसअत का एहसास दिलाता है।
अहमद नदीम क़ासमी सिर्फ़ एक बुलंद-पाया शाइर और अफ़साना-निगार ही नहीं थे, बल्कि नई नस्ल के अदब-नवाज़ों और शाइरों के लिए एक मुश्फ़िक़ उस्ताद की हैसियत भी रखते थे। उन्होंने अनेक नौजवान तख़्लीक़कारों की रहनुमाई की, जिनमें मशहूर शाइरा परवीन शाकिर और बर्रे-सग़ीर के नामवर शाइर व फ़िल्मी गीतकार Gulzar भी शामिल हैं। गुलज़ार ने कई मौक़ों पर अहमद नदीम क़ासमी को अपना उस्ताद, रहनुमा और इल्हाम का अहम सरचश्मा क़रार दिया, जो उनकी अदबी अज़मत का एक रौशन सुबूत है।
तरक़्क़ी-पसंद अदबी तहरीक से उनकी वाबस्तगी भी उनकी फ़िक्री शख़्सियत का अहम पहलू थी। वह प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट से गहरा ताल्लुक रखते थे और सन 1948 में पंजाब शाख़ के महासचिव मुंतख़ब किए गए। उनकी तंजीमी सलाहियतों, फ़िक्री वुसअत और अदबी ख़िदमात के एतराफ़ में अगले ही बरस, यानी 1949 में उन्हें पाकिस्तान स्तर पर भी महासचिव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। इस तरह उन्होंने न सिर्फ़ अपनी तख़्लीक़ात के ज़रिए बल्कि अदबी तहरीकों और तंजीमी सरगर्मियों के माध्यम से भी उर्दू अदब की तामीर-ओ-तरक़्क़ी में फ़रामोश न किए जा सकने वाले नक़्श छोड़े।
सहाफ़ती और इदारती ख़िदमात
अहमद नदीम क़ासमी की शख़्सियत का एक बेहद दरख़्शाँ और क़ाबिल-ए-फ़ख़्र पहलू उनकी सहाफ़ती और इदारती ख़िदमात हैं। अगरचे उन्हें बुनियादी तौर पर एक अज़ीम शाइर, अफ़साना-निगार और अदीब की हैसियत से जाना जाता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उर्दू सहाफ़त और अदबी रसाइल की दुनिया में भी उनका किरदार इंतिहाई अहम, असरअंदाज़ और तारीख़-साज़ रहा। उन्होंने अपनी बसीरत, ज़ेहनी पुख़्तगी और अदबी फ़रासत के ज़रिए न सिर्फ़ ख़ुद तख़्लीक़ की बुलंदियों को छुआ, बल्कि अनगिनत नए क़लमकारों और शुअरा के लिए भी कामयाबी के दरवाज़े खोले।
अदबी सहाफ़त के मैदान में अहमद नदीम क़ासमी ने कई मुअतबर और मक़बूल रसाइल की इदारत की ज़िम्मेदारियाँ निभाईं। इन रसाइल में ‘फूल’, ‘तहज़ीब-ए-निस्वाँ’, ‘अदब-ए-लतीफ़’, ‘सवेरा’ और ‘नक़ूश’ जैसे नाम शामिल हैं, जो अपने-अपने दौर में उर्दू अदब की तशकील और फ़रोग़ में अहम किरदार अदा करते रहे। क़ासमी की इदारत ने इन अदबी मंचों को सिर्फ़ एक रसाले की हैसियत तक महदूद नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें फ़िक्र, तहक़ीक़, तख़्लीक़ और मुक़ालमे के ऐसे मराकिज़ में तब्दील कर दिया जहाँ नए और पुराने अदबी रुझान एक-दूसरे से हम-कलाम होते थे।
ताहम, उनकी इदारती ज़िंदगी का सबसे रौशन और यादगार बाब उनकी मशहूर अदबी पत्रिका ‘फ़ुनून’ से वाबस्ता है। यह महज़ एक रसाला नहीं था, बल्कि उर्दू अदब की एक मुकम्मल तहरीक, एक फ़िक्री इदारा और एक तख़्लीकी मरकज़ की हैसियत रखता था। अहमद नदीम क़ासमी ने तक़रीबन पाँच दशकों तक इस रसाले को बड़ी मुहब्बत, लगन और इस्तिक़लाल के साथ जारी रखा। ‘फ़ुनून’ के सफ़्हात पर उर्दू अदब की कई अहम आवाज़ें पहली बार सुनाई दीं और असंख्य नौजवान क़लमकारों को अपनी सलाहियतों के इज़हार का मौक़ा हासिल हुआ। क़ासमी की दूरअंदेश निगाह नई प्रतिभाओं को पहचानने की ग़ैर-मामूली सलाहियत रखती थी, और यही वजह है कि ‘फ़ुनून’ ने उर्दू अदब को अनेक नामवर शाइर, अफ़साना-निगार और नक़्क़ाद अता किए।
अहमद नदीम क़ासमी का सहाफ़ती सफ़र अदबी रसाइल तक महदूद नहीं रहा, बल्कि उन्होंने रोज़नामा सहाफ़त में भी अपनी फ़िक्र और क़लम का जादू बिखेरा। उन्होंने उर्दू के मशहूर अख़बार ‘इमरोज़’ की इदारती ज़िम्मेदारियाँ सँभालीं और उसे फ़िक्र-ओ-नज़र की एक नई जिहत अता की। उनकी इदारत में अख़बार सिर्फ़ ख़बरों का मजमूआ नहीं रहा, बल्कि समाजी, सियासी और तहज़ीबी बहसों का एक मुअतबर मंच बन गया, जहाँ संजीदा फ़िक्र और रचनात्मक तजज़िये को अहमियत हासिल थी।
इसके इलावा, उन्होंने ‘रवाँ दवाँ’ और ‘डेली जंग’ जैसे क़ौमी अख़बारात में कई दशकों तक मुसलसल हफ़्तावार कॉलम तहरीर किए। उनके ये कॉलम अपने इल्मी वक़ार, फ़िक्री गहराई और अदबी लुत्फ़ की वजह से बेहद मक़बूल रहे। वह अपने क़लम के ज़रिए समाजी मसाइल, इंसानी रवैयों, अदबी रुझानों और वक़्ती हालात पर ऐसी बसीरत-अफ़रोज़ गुफ़्तगू करते थे जो क़ारी को सोचने पर मजबूर कर देती थी। उनकी तहरीरों में न सिर्फ़ एक अदीब की नज़ाकत मौजूद होती थी, बल्कि एक ज़िम्मेदार मुफक्किर की दूररस निगाह भी झलकती थी।
यूं कहा जा सकता है कि अहमद नदीम क़ासमी ने सहाफ़त और इदारत को महज़ पेशेवर ज़िम्मेदारी नहीं समझा, बल्कि उसे इल्म, अदब और समाज की ख़िदमत का एक वसीला बनाया। उनकी इदारती दूरअंदेशी, सहाफ़ती दीयानतदारी और तख़्लीकी रहनुमाई ने उर्दू अदब और सहाफ़त दोनों को ऐसे नक़्श-ए-क़दम अता किए जो आज भी नई नस्लों के लिए मशअल-ए-राह की हैसियत रखते हैं।
ज़ाती ज़िंदगी और विसाल
अहमद नदीम क़ासमी की ज़िंदगी जितनी रौशन उनकी अदबी कामयाबियों और तख़्लीकी फ़तहयाबियों से नज़र आती है, उतनी ही वह इंसानी जज़्बात, फ़िक्री पेचीदगियों और अदबी हल्क़ों की नाज़ुक रवायतों से भी आबस्ता रही। शोहरत, मक़बूलियत और अदबी इर्तिक़ा के इस तवील सफ़र में उन्हें बेपनाह तहरीस-ओ-तहसीन हासिल हुई, मगर दूसरी तरफ़ उनकी शख़्सियत और समकालीन अहल-ए-क़लम से उनके ताल्लुक़ात पर मुख़्तलिफ़ बहसें और तजज़िये भी सामने आते रहे। यह वही अम्र है जो अक्सर बड़ी अदबी शख़्सियतों के साथ जुड़ जाता है, क्योंकि असाधारण फ़िक्र और बुलंद-पाया सलाहियतें अकसर मुख़्तलिफ़ ताबीरों और नुक्ता-ए-नज़र को जन्म देती हैं।
मशहूर अदबी मुहक़्क़िक़ और नक़्क़ाद Fateh Muhammad Malik ने अपनी किताब Nadeem Shanasi में अहमद नदीम क़ासमी की शख़्सियत के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर तफ़्सील से रौशनी डाली है। इस किताब में उनकी फ़िक्री गहराइयों, मिज़ाजी नज़ाकतों और उनके अदबी हम-असरों के साथ रिश्तों का तजज़िया पेश किया गया है। ख़ुसूसन मशहूर इंक़िलाबी शाइर Faiz Ahmed Faiz के साथ उनके ताल्लुक़ात को भी अदबी तारीख़ के एक दिलचस्प बाब की हैसियत से देखा जाता है। कुछ हल्क़ों की राय थी कि क़ासमी अपनी अदबी सलाहियतों और मक़ाम के बारे में बेहद पुर-एतिमाद थे, जिसके सबब कभी-कभी अदबी बिरादरी में इख़्तिलाफ़-ए-राय और फ़िक्री दूरी की कैफ़ियत पैदा हो जाती थी।
ताहम, इन तमाम बहसों और मुख़्तलिफ़ तास्सुरात के बावजूद, इस हक़ीक़त से इंकार मुम्किन नहीं कि अहमद नदीम क़ासमी की अदबी अज़मत और तख़्लीकी हैसियत मुसल्लमा रही है। उनकी शाइरी, अफ़साने, मज़ामीन और तन्क़ीदी तहरीरें आज भी उर्दू अदब के क़ीमती सरमाये में शुमार की जाती हैं। बर्रे-सग़ीर के अदबी इदारों, यूनिवर्सिटियों और तहक़ीक़ी मराकिज़ में उनकी तख़्लीक़ात पर मुसलसल मुतालआ और तहक़ीक़ का सिलसिला जारी है। उनका कलाम न सिर्फ़ अपने दौर की आवाज़ है, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी फ़िक्र, एहसास और इंसान-दोस्ती का एक पायेदार पैग़ाम रखता है।
ज़िंदगी के आख़िरी अय्याम में अहमद नदीम क़ासमी मुख़्तलिफ़ जिस्मानी आरिज़ों का सामना करते रहे। आख़िरकार 10 जुलाई 2006 को दमा (अस्थमा) से पैदा होने वाली पेचीदगियों के सबब उन्होंने लाहौर में आख़िरी साँस ली। उनका इंतिक़ाल उर्दू अदब के लिए एक ऐसा सदमा था जिसने अदबी दुनिया को गहरे रंज-ओ-मलाल में मुब्तला कर दिया। उनकी रुख़्सती के साथ उर्दू अदब का एक ऐसा दरख़्शाँ बाब इख़्तिताम-पज़ीर हुआ जिसने तक़रीबन पूरी एक सदी तक इल्म, फ़िक्र और तख़्लीक़ के चराग़ रौशन रखे थे।
उनकी अदबी, तहज़ीबी और क़ौमी ख़िदमात के एतराफ़ में पाकिस्तान की हुकूमत ने भी उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। इसी सिलसिले में इस्लामाबाद की मशहूर सातवीं एवेन्यू (7th Avenue) को उनके नाम से मंसूब किया गया, ताकि आने वाली नस्लें इस अज़ीम अदीब, शाइर और मुफक्किर की ख़िदमात को हमेशा याद रखें। यह एहतराम इस बात का वाज़ेह सुबूत है कि अहमद नदीम क़ासमी महज़ एक फ़र्द नहीं, बल्कि उर्दू अदब की तारीख़ का एक ऐसा रोशन इस्तिआरा थे जिसकी चमक मुद्दतों तक अहल-ए-अदब की राहों को मुनव्वर करती रहेगी।
अहमद नदीम क़ासमी की शायरी,ग़ज़लें
1-ग़ज़ल
2-ग़ज़ल
3-ग़ज़ल
4-ग़ज़ल
5-ग़ज़ल
अहमद नदीम क़ासमी : फ़िक्र-ओ-फ़न का एक रौशन बाब
— एक तन्क़ीदी तब्सिरा
अहमद नदीम क़ासमी का नाम उर्दू अदब की तारीख़ में महज़ एक शाइर, अफ़साना-निगार या सहाफ़ी की हैसियत से दर्ज नहीं, बल्कि एक ऐसे मुकम्मल अदबी इदारे के तौर पर महफ़ूज़ है जिसने तक़रीबन सात दशकों तक उर्दू ज़बान और उसकी तख़्लीकी रवायतों को नई ज़िंदगी अता की। उनकी शख़्सियत और फ़न का मुतालआ यह एहसास दिलाता है कि क़ासमी उन चंद अदीबों में से थे जिनकी तख़्लीक़ात में ज़मीन की महक, इंसानियत की गर्मी, फ़िक्र की गहराई और फ़न की नफ़ासत एक साथ जलवा-गर नज़र आती है।
अगर उनकी शाइरी का जायज़ा लिया जाए तो मालूम होता है कि क़ासमी ने तरक़्क़ी-पसंद तहरीक के अफ़कार को महज़ नारों और सियासी इज़हार तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उन्हें इंसानी जज़्बात और रूहानी एहसासात के साथ इस तरह हम-आहंग कर दिया कि उनका कलाम हर दौर और हर तबक़े के क़ारी के लिए कशिश रखता है। उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में इंसान-दोस्ती, अम्न, मोहब्बत, उम्मीद और इन्साफ़ की तलब बार-बार अपना जलवा दिखाती है। यही वजह है कि उनका शे'री लहजा न तो महज़ रुमानियत का असीर है और न ही ख़ालिस इंक़िलाबी नारों का; बल्कि उसमें ज़िंदगी की पूरी वुसअत और इंसानी तजुर्बे की गहराई समाई हुई है।
अफ़साना-निगारी के मैदान में क़ासमी का मुक़ाम और भी ज़्यादा नुमायाँ नज़र आता है। उन्होंने गाँव, देहात और मेहनतकश तबक़ों की ज़िंदगी को जिस सच्चाई, हमदर्दी और फ़नकाराना महारत के साथ बयान किया, वह उर्दू अफ़साने की तारीख़ में एक अहम मोड़ की हैसियत रखता है। उनके किरदार किताबी तसव्वुरात के पैदा किए हुए साये नहीं, बल्कि हमारे समाज के जीते-जागते अफ़राद हैं जिनकी ख़ुशियाँ, ग़म, महरूमियाँ और ख़्वाब क़ारी को अपने ही अहवाल महसूस होते हैं। यही फ़नकाराना सिद्क़ है जिसने उन्हें मुंशी प्रेमचंद की रवायत के सबसे अहम वारिसों में शामिल कर दिया।
क़ासमी की सबसे बड़ी ख़ूबियों में से एक यह थी कि उन्होंने अदब को महज़ तख़्लीक़ तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसकी तर्वीज़ और तरक़्क़ी को भी अपना फ़र्ज़ समझा। ‘फ़ुनून’ की इदारत इसका सबसे बड़ा सुबूत है। उर्दू अदब की तारीख़ में बहुत कम ऐसे लोग मिलते हैं जिन्होंने अपनी तख़्लीकी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ नई नस्ल के क़लमकारों की तर्बियत और रहनुमाई का फ़र्ज़ भी इतनी ख़ुलूस-मंदी से निभाया हो। ‘फ़ुनून’ दरअसल एक रसाला नहीं, बल्कि एक अदबी दर्सगाह थी, जहाँ से उर्दू अदब की अनेक ताबनाक आवाज़ें उभरकर सामने आईं। इस एतिबार से देखा जाए तो क़ासमी की इदारती ख़िदमात उनकी तख़्लीक़ी ख़िदमात से किसी तरह कम नहीं।
एक बड़े अदीब की तरह क़ासमी की शख़्सियत भी मुख़्तलिफ़ जहात की हामिल थी। उनके बारे में इख़्तिलाफ़ी राय रखने वाले लोग भी मौजूद रहे और कुछ अदबी हल्क़ों में उनके मिज़ाज तथा रवैयों पर बहसें भी होती रहीं। मगर तारीख़-ए-अदब का उसूल यह है कि किसी अदीब का अस्ल फ़ैसला उसकी ज़ाती पसंद-नापसंद या मुआसरात नहीं, बल्कि उसकी तख़्लीक़ात करती हैं। इस मेयार पर अहमद नदीम क़ासमी बिला-शुब्हा सरफ़राज़ नज़र आते हैं। उनके अदबी कारनामे उन तमाम बहसों से कहीं ज़्यादा वसीअ, गहरे और पायेदार साबित हुए हैं जो कभी उनके इर्द-गिर्द पैदा हुईं।
तन्क़ीदी नुक्ता-ए-नज़र से देखा जाए तो क़ासमी की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने रिवायत और जिद्दत के दरमियान एक मुतवाज़िन पुल क़ायम किया। वह न तो माज़ी से पूरी तरह कटे और न ही जदीदियत की अंधी पैरवी के क़ायल हुए। उन्होंने उर्दू अदब की क्लासिकी रवायतों को बरक़रार रखते हुए उन्हें अस्र-ए-हाज़िर के तजुर्बात और मसाइल से हम-आहंग किया। यही वजह है कि उनका कलाम अपने दौर की नुमाइंदगी करने के साथ-साथ आज भी ताज़गी और मआनवी असर रखता है।
हक़ीक़त यह है कि अहमद नदीम क़ासमी का ज़िक्र उर्दू अदब के उस सुनहरे सिलसिले का ज़िक्र है जिसमें फ़ैज़, फ़िराक़, जोश, मंटो, इस्मत चुग़ताई और इंतिज़ार हुसैन जैसी अज़ीम शख़्सियतें शामिल हैं। मगर क़ासमी की इम्तियाज़ी पहचान उनकी गहरी इंसान-दोस्ती, देहाती ज़िंदगी से वाबस्तगी और नई नस्लों की रहनुमाई का वह जज़्बा है जिसने उन्हें महज़ एक अदीब नहीं, बल्कि एक मुकम्मल अदबी तहरीक बना दिया।
यही वजह है कि आज, उनके इंतिक़ाल के दो दशक बाद भी, अहमद नदीम क़ासमी का नाम उर्दू अदब के आसमान पर एक ऐसे दरख़्शाँ सितारे की मानिंद चमक रहा है जिसकी रौशनी न सिर्फ़ अपने दौर को मुनव्वर करती है बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी फ़िक्र, फ़न, इंसानियत और अदबी वक़ार की राहें रौशन करती रहती है। उनकी तख़्लीक़ात इस बात का ज़िंदा सुबूत हैं कि अस्ल अदब वक़्त की गर्द में गुम नहीं होता, बल्कि हर नए दौर में नए मआनी और नई ज़िंदगी के साथ दोबारा जन्म लेता है। अहमद नदीम क़ासमी इसी अमर अदबी रवायत का एक बुलंद और नाक़ाबिल-ए-फ़रामोश नाम हैं।।ये भी पढ़ें
Read More Articles :-

