Pandit Daya Shankar Naseem Poet: उर्दू मस्नवी का जादूगर और लखनऊ की नवाबी तहज़ीब का शायर

कश्मीरी पंडित से उर्दू अदब के शाहकार तक: नसीम का सफ़र  (1811–1845)

तआरुफ़ और अदबी अहमियत

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपनी कम-उम्री के बावजूद हमेशा के लिए अमर हो गए। पंडित दया शंकर ‘नसीम’ उन्हीं फ़नकारों में से एक हैं, जिनकी तख़्लीक़ी सलाहीयत, लफ़्ज़ों पर ग़ैर-मामूली दस्तरस और तसव्वुर की बुलंदी ने उन्हें उर्दू मस्नवी की दुनिया का एक बेमिसाल सितारा बना दिया। लखनऊ की नवाबी तहज़ीब, उसकी नफ़ासत, उसकी रंगीनी, उसकी अदबी रवायतें और उसकी ज़बानी शीरीनी जिस ख़ूबसूरती के साथ "गुलज़ार-ए-नसीम" में समाई हुई है, वैसी मिसाल उर्दू अदब में बहुत कम देखने को मिलती है।

सन् 1811 में अदब-दोस्त और इल्मी माहौल रखने वाले एक प्रतिष्ठित पंडित ख़ानदान में पैदा होने वाले नसीम ने बचपन ही से इल्म-ओ-अदब की फ़िज़ाओं में परवरिश पाई। यही वजह थी कि उनकी तबीयत में ज़बान की लताफ़त, ख़याल की बुलंदी और शे'री ज़ौक़ फ़ितरतन मौजूद था। उन्होंने अपनी तालीम मुकम्मल करने के बाद अवध की शाही फ़ौज के मालिया महकमे से वाबस्ता होकर मुलाज़मत इख़्तियार की, मगर उनका अस्ल मयदान दफ़्तर नहीं, बल्कि अदब की वह दुनिया थी जहाँ अल्फ़ाज़ को ज़िंदगी बख़्शी जाती है।

नसीम की अदबी ज़िंदगी का सबसे अहम मोड़ उस वक़्त आया जब उन्हें उर्दू के अज़ीम उस्ताद ख़्वाजा हैदर अली ‘आतिश’ की शागिर्दी नसीब हुई। आतिश सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू ज़बान के इस्लाह, तज़कीया और तरक़्क़ी के ऐसे रहनुमा थे जिन्होंने अपने शागिर्दों की पूरी एक ऐसी नस्ल तैयार की जिसने उर्दू अदब को नई बुलंदियाँ अता कीं। नसीम ने भी इब्तिदा में ग़ज़ल कही, मगर उनकी तख़्लीक़ी क़ुव्वत और वसीअ तसव्वुर ग़ज़ल की मुक़य्यद फ़ज़ा में पूरी तरह समा न सके। आख़िरकार उन्होंने मस्नवी को अपना अस्ल फ़न बनाया और वहीं उनकी अज़मत का सूरज पूरी आब-ओ-ताब के साथ तूलूअ हुआ।

उनकी शाहकार मस्नवी "गुलज़ार-ए-नसीम" सिर्फ़ एक इश्क़िया दास्तान नहीं, बल्कि लखनऊ स्कूल की नफ़ासत, फ़साहत, बलाग़त, बयान की रंगीनी और तख़य्युल की बुलंदी का ऐसा अदबी शाहकार है जिसने उर्दू मस्नवी को एक नई शान अता की। फ़ारसी दास्तान से माख़ूज़ इस अफ़साने को नसीम ने जिस फ़नकाराना अंदाज़, दिलकश तर्ज़-ए-बयान, लतीफ़ इस्तिआरों, दिलनशीं तश्बीहात और जादुई मंज़रनिगारी के साथ पेश किया, उसने इसे उर्दू अदब की सबसे मक़बूल और मुअतबर मस्नवियों में शामिल कर दिया। उस्ताद आतिश की इस्लाह के बाद नसीम ने इस मस्नवी को इस क़दर मुकम्मल और मुनज़्ज़म बनाया कि आज भी उसका कोई मिसरा या लफ़्ज़ ज़ाइद महसूस नहीं होता।

"गुलज़ार-ए-नसीम" में ताजुल-मुलूक और गुलबकावली की तिलिस्मी मुहब्बत, परिस्तान की हैरतअंगेज़ दुनिया, जादुई जंगल, परीज़ाद किरदार, इश्क़, जुदाई, सब्र, वफ़ा और फ़त्ह की दास्तान एक ऐसे फ़सीह और शीरीं अंदाज़ में बयान हुई है कि क़ारी ख़ुद को उस तिलिस्मी आलम का हिस्सा महसूस करने लगता है। साथ ही यह मस्नवी नवाबी लखनऊ की तहज़ीब, उसकी ऐशपरस्ती, उसकी नज़ाकत, उसकी ज़बान और उसके समाजी उसूलों का भी ज़िंदा दस्तावेज़ बन जाती है।

अफ़सोस कि उर्दू अदब का यह अज़ीम फ़नकार महज़ बत्तीस (32) वर्ष की उम्र में 1843 में इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गया। मगर अपनी छोटी-सी ज़िंदगी में वह उर्दू अदब को ऐसा शाहकार अता कर गया जिसने उन्हें हमेशा के लिए "उर्दू मस्नवी का जादूगर" और "लखनऊ की नवाबी तहज़ीब का सबसे रौशन तर्जुमान" बना दिया। आज भी जब "गुलज़ार-ए-नसीम" का ज़िक्र होता है, तो उसके साथ पंडित दया शंकर नसीम का नाम उर्दू अदब के आसमान पर एक ऐसे आफ़ताब की तरह चमकता नज़र आता है जिसकी रौशनी सदियों तक बाक़ी रहेगी।

लखनऊ का अदबी माहौल और शुरुआती तालीम

लखनऊ उस दौर में नवाबी अवध का दिल था—नज़ाकत, नफ़ासत, शायस्तगी और अदबी रवायतों का मरकज़। नसीम ने इसी माहौल में आँख खोली, जहां उर्दू और फ़ारसी की मिठास, शायरी की नफ़ासत और तख़य्युल की बुलंदियाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थीं। उन्होंने बचपन ही से उर्दू और फ़ारसी ज़बानों पर उबूर हासिल किया और क़दीम उस्तादों की शायरी, ख़ास तौर पर मीर तक़ी मीर की सूफ़ियाना कैफ़ियत और दर्दमंदी से गहरी असरपज़ीरी हासिल की।

उस्तादी सोहबत और अदबी तरबियत

अदबी सफ़र में उनकी रहनुमाई लखनऊ के मशहूर शायर ख़्वाजा हैदर अली आतिश ने की। आतिश जैसे उस्ताद की सोहबत ने नसीम के ज़ौक़ को तरतीब, फ़िक्र को वुसअत और ज़बान को वह शान बख़्शी, जिसकी बदौलत वह बहुत कम अरसे में लखनऊ की अदबी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हो गए।

मआशी ज़िंदगी और शायरी से वाबस्तगी

मआशी ज़िंदगी में नसीम ने नवाबी दौर में शाही फ़ौज के मालियाती शोबे से वाबस्ता होकर एक मुंशी के तौर पर ख़िदमत अंजाम दी, मगर उनका असली जुनून क़लम और काग़ज़ था। सरकारी ज़िम्मेदारियों के बावजूद उनकी रूह शायरी में बसती थी और उनका ज़ेहन हमेशा तख़य्युल की नई-नई परवाज़ों में मसरूफ़ रहता था।

गुलज़ार-ए-नसीम: फ़न और तहज़ीब का शाहकार

नसीम की शख़्सियत और शोहरत की बुनियाद उनकी अज़ीम मस्नवी “गुलज़ार-ए-नसीम” है, जिसे “क़िस्सा गुल बकावली” के नाम से भी जाना जाता है। यह मस्नवी उर्दू अदब की उन शाहकार तख़्लीक़ात में से है, जिसमें दास्तानवी रंग, तिलिस्मी फ़ज़ा, नफ़ीस तश्बीहात, ख़याल-अफ़रोज़ इस्तिआरे और ज़बान की बेमिसाल चाशनी एक साथ जलवा-गर नज़र आती है। इस मस्नवी में नसीम ने न सिर्फ़ क़िस्सागोई की आला मिसाल क़ायम की, बल्कि लखनऊ की नवाबी तहज़ीब, रहन-सहन, महफ़िलों, अदब और समाजी रवैयों की ऐसी जाँदार तस्वीर पेश की कि पूरा दौर आँखों के सामने ज़िंदा हो उठता है।

मस्नवी की ख़ुसूसियत और अदबी मयार

“गुलज़ार-ए-नसीम” की ख़ास बात इसका पेचीदा मगर दिलकश क़िस्साई ढांचा, मंज़रकशी की नफ़ासत और लफ़्ज़ों की नक्क़ाशी है। नसीम ने इसमें उर्दू मस्नवी को ऐसी बुलंदी अता की कि बाद के शायरों के लिए यह तख़्लीक़ एक मीज़ान और मयार बन गई। यही वजह है कि इस एक तस्नीफ़ ने उन्हें उर्दू अदब में दाइमी ज़िंदगी अता कर दी।

दीवान-ए-नसीम और ग़ज़लियात

इसके अलावा नसीम का “दीवान-ए-नसीम” भी मिलता है, जिसमें उनकी ग़ज़लों का मजमूआ शामिल है। इन ग़ज़लों में इश्क़ की नज़ाकत, एहसास की लतीफ़ी और ज़बान की शगुफ़्तगी साफ़ झलकती है, मगर हक़ीक़त यह है कि उनकी शोहरत और अदबी अज़मत की बुनियाद “गुलज़ार-ए-नसीम” ही बनी।

कम-उम्री में इंतिक़ाल और अदबी नुक़सान

अफ़सोस कि यह अदबी सितारा बहुत जल्द ग़ुरूब हो गया। सिर्फ़ चौंतीस बरस की उम्र में, 1845 में नसीम का इंतिक़ाल हो गया, मगर उनकी कम-उम्री उनकी अज़मत की राह में हाइल न बन सकी। उन्होंने अपनी मुख़्तसर ज़िंदगी में जो कुछ लिखा, वह उर्दू अदब के लिए ऐसा सरमाया साबित हुआ जो सदियों तक पढ़ा और सराहा जाता रहेगा।

अदबी मक़ाम और दाइमी विरासत

पंडित दयाशंकर नसीम उर्दू शायरी की तारीख़ में उस पुल की हैसियत रखते हैं, जहां क़दीम दास्तानी रवायत और लखनऊ की नवाबी तहज़ीब एक-दूसरे से मिलती हैं। उनकी शायरी आज भी उर्दू ज़बान की शीरिनी, तख़य्युल की रानाई और अदबी शान की ज़िंदा मिसाल है, और “गुलज़ार-एनसीम” उर्दू मस्नवी की दुनिया में हमेशा एक बेमिसाल शाहकार की तरह जगमगाता रहेगा।

पंडित दया शंकर नसीम की शायरी, ग़ज़लें नज़्मे 

ग़ज़ल -1

इश्क़ में दिल बन के दीवाना चला

आश्ना से हो के बेगाना चला


क़ुलक़ुल-ए-मीना से आती है सदा

भर चुका जिस वक़्त पैमाना चला


बे-ज़बानों को भी आई है ज़बाँ

बेड़ी ग़ुल करती है दीवाना चला


इश्क़-बाज़ी बाज़ी-ए-शतरंज है

चाल नादाँ रह गया दाना चला


शब जो आया बज़्म में वो शोला-रू

शम्अ गुल करने को परवाना चला


बू-ए-गुल ग़ुंचा से कहती है 'नसीम'

बात निकली मुँह से अफ़्साना चला

ग़ज़ल -2

हम तुम हैं जो एक फिर जुदाई कैसी

दिल ही न मिला तो आश्नाई कैसी


काफ़िर न घमंड रख ख़ुद-आराई का

सब कुछ हों जो बुत तो फिर ख़ुदाई कैसी


निय्यत में तो है कि पाऊँ सहबा-ए-तहूर

ऐ शैख़ ये तेरी पारसाई कैसी


कहता था वो बद-ज़बान है मत छेड़ 'नसीम'

चपती तो न होगी क्यों सुनाई कैसी

ग़ज़ल -3


जब न जीते-जी मिरे काम आएगी

क्या ये दुनिया आक़िबत बख़्शाएगी


जब मिले दो दिल मुख़िल फिर कौन है

बैठ जाओ ख़ुद हया उठ जाएगी


गर यही है इस गुलिस्ताँ की हवा

शाख़-ए-गुल इक रोज़ झोंका खाएगी


दाग़-ए-सौदा एक दिन देगा बहार

फ़स्ल इस गुल की शगूफ़ा लाएगी


कुछ तो होगा हिज्र में अंजाम-ए-कार

बे-क़रारी कुछ न कुछ ठहराएगी


संदली रंगों से माना दिल मिला

दर्द सर की किस के माथे जाएगी


ख़ाकसारों से जो रक्खेगा ग़ुबार

ओ फ़लक बदली तिरी हो जाएगी


जब करेगा गर्मियाँ वो शोला-रू

शम-ए-महफ़िल देख कर जल जाएगी


जाँ निकल जाएगी तन से ऐ 'नसीम'

गुल को बू-ए-गुल हवा बतलाएगी

ग़ज़ल -4


दिल से हर-दम हमें आवाज़-ए-बुका आती है

बंद कानों को भी गिर्या की सदा आती है


दिल से है आँख तक आई असर-ए-गर्मी-ए-शौक़

अश्क हसरत से निगह आबला-पा आती है


गुल हुआ कोई चराग़-ए-सहरी ओ बुलबुल

हाथ मलती हुई पत्तों से सदा आती है


आईना साफ़ सिकंदर को दिखाया तू ने

ख़ूब ऐ ख़िज़्र तुझे राह बता आती है


छू लिया धोके से दामान-ए-सबा तू ने तो क्या

ग़ुंचा-ए-गुल कहीं मुट्ठी में हवा आती है


जिस क़दर वस्ल-ए-बुताँ का तुम्हें रहता है फ़िराक़

ऐ 'नसीम' उतनी कभी याद-ए-ख़ुदा आती है

तब्सरा

पंडित दया शंकर ‘नसीम’ का ज़िक्र उर्दू अदब में महज़ एक मस्नवी-निगार के तौर पर नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें उस दौर का ऐसा फ़नकार तस्लीम किया जाता है जिसने मस्नवी को महज़ दास्तानगोई की सनअत से निकालकर अदबी बुलंदी और फ़न्नी कमाल का दर्जा अता किया। अगर मीर ने उर्दू ग़ज़ल को दर्द की ज़बान दी, ग़ालिब ने उसे फ़िक्र की वुसअत बख़्शी और अनीस ने मर्सिये को अज़मत अता की, तो नसीम ने मस्नवी को अपने तसव्वुर, ज़बान की लताफ़त और बयान की रवानगी से एक नई शिनाख़्त दी।

"गुलज़ार-ए-नसीम" की सबसे बड़ी ख़ूबी इसकी कहानी नहीं, बल्कि उसका अंदाज़-ए-बयान है। अस्ल दास्तान फ़ारसी से माख़ूज़ होने के बावजूद नसीम ने उसे जिस फ़सीहत, बलाग़त, इस्तिआरों, तश्बीहात और लफ़्ज़ों की नफ़ासत से आरास्ता किया है, वह उसे एक मुकम्मल उर्दू शाहकार बना देता है। हर मंज़र ऐसा महसूस होता है मानो क़लम नहीं, बल्कि कोई मुसव्विर अपने रंगों से तिलिस्मी दुनिया की तस्वीर बना रहा हो।

नसीम की ज़बान में लखनऊ की तहज़ीब की मिठास, नवाबी दौर की नज़ाकत और उर्दू की शीरीनी एक साथ जलवा-गर नज़र आती है। उनके यहाँ अल्फ़ाज़ सिर्फ़ मानी अदा नहीं करते, बल्कि मंज़र पैदा करते हैं; तश्बीहें सिर्फ़ ख़ूबसूरती नहीं बढ़ातीं, बल्कि एहसास को ज़िंदा कर देती हैं। यही वजह है कि "गुलज़ार-ए-नसीम" पढ़ते हुए क़ारी सिर्फ़ कहानी नहीं पढ़ता, बल्कि एक मुकम्मल तिलिस्मी और तहज़ीबी दुनिया में दाख़िल हो जाता है।

यह भी नसीम की फ़न्नी बुलंदी का सबूत है कि उन्होंने एक बेहद पेचीदा और तिलिस्मी अफ़साने को ऐसी रवानी और तवाज़ुन के साथ बयान किया कि कहीं भी इबारत बोझिल या मुन्तशिर महसूस नहीं होती। उस्ताद आतिश की इस्लाह ने इस शाहकार को और भी तराश दिया, यहाँ तक कि इसकी हर सतर, हर मिसरा और हर लफ़्ज़ अपनी जगह पर ऐसा महसूस होता है जैसे सदियों से वहीं मौजूद हो।

अगर तनक़ीदी निगाह से देखा जाए तो नसीम की मस्नवी महज़ इश्क़ और तिलिस्म की दास्तान नहीं, बल्कि लखनऊ की नवाबी तहज़ीब, उसके ज़ौक़-ए-जमाल, उसके समाजी रवैयों और उसके अदबी मिज़ाज की एक ज़िंदा तारीखी सनद भी है। यही वजह है कि "गुलज़ार-ए-नसीम" का मुतालिआ सिर्फ़ अदबी लुत्फ़ नहीं देता, बल्कि उन्नीसवीं सदी के लखनऊ की सांस्कृतिक रूह से भी रूबरू कराता है।

अफ़सोस कि यह ग़ैर-मामूली फ़नकार सिर्फ़ बत्तीस बरस की उम्र में दुनिया से रुख़्सत हो गया। मगर अदब की तारीख़ गवाह है कि उम्र की तवीलियाँ नहीं, बल्कि तख़्लीक़ की अज़मत इंसान को बाक़ी रखती है। पंडित दया शंकर नसीम ने अपनी एक ही शाहकार मस्नवी के ज़रिये वह मक़ाम हासिल कर लिया, जहाँ पहुँचना कई फ़नकारों के लिए उम्र भर की कोशिशों के बावजूद मुमकिन नहीं हो पाता।

नसीम का नाम आज भी उर्दू मस्नवी की तारीख़ में एक ऐसे आफ़ताब की मानिंद रौशन है, जिसकी ज़िया न सिर्फ़ लखनऊ स्कूल की पहचान है, बल्कि उर्दू अदब की सदाबहार विरासत का भी एक नायाब और लाज़वाल हिस्सा है।ये भी पढ़ें 





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