जीवन-परिचय
इब्न-ए-इंशा उर्दू अदब की उन नायाब शख़्सियात में शुमार होते हैं जिनके फ़न की कोई एक ताबीर काफ़ी नहीं। वह शायर भी थे, मिज़ाह-निगार भी, सफ़रनामा-निगार भी, कालम-निगार भी और एक ऐसे साहिब-ए-नज़र मुतरजिम भी, जिनकी तहरीर में ज़िंदगी की तल्ख़ी, इंसानी बेचारगी, मुसाफ़िर की तन्हाई, आशिक़ की बेकरारी और ज़माने पर मुस्कुराने की सलाहियत एक साथ दिखाई देती है। उनकी शायरी में सादगी है मगर यह सादगी सतही नहीं; उसके पीछे गहरी उदासी, फ़िक्र, तजुर्बा और इंसानी मन की पेचीदगियों का एक पूरा जहान आबाद है। सरकारी ज़राए भी उनकी शायरी को सादा मगर गहरी और उनके मिज़ाहिया कलाम व कालम को उनकी मक़बूलियत का अहम सबब क़रार देते हैं।
इब्न-ए-इंशा का अस्ल नाम शेर मुहम्मद ख़ान था। उनकी पैदाइश 15 जून 1927 को फ़िल्लौर तहसील, ज़िला जालंधर, पंजाब में हुई। उनके वालिद का ताल्लुक़ राजस्थान से बताया जाता है। वह उस दौर में पैदा हुए जब बर्रे-सग़ीर हिंद की सियासी, समाजी और तहज़ीबी फ़ज़ा तेज़ी से बदल रही थी। बाद में 1947 की तक़सीम के बाद उन्होंने पाकिस्तान को अपना वतन बनाया और कराची में अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा गुज़ारा।
तालीम और अदबी परवरिश
इब्न-ए-इंशा की अदबी तर्बियत सिर्फ़ किताबों तक महदूद नहीं थी। उन्होंने मुख़्तलिफ़ अहल-ए-इल्म से इस्तिफ़ादा किया और उनकी फ़िक्र को कई उस्तादों की सोहबत से जिलौ मिला। उनके उस्तादों और रहनुमाओं में हबीबुल्लाह ग़ज़नफ़र अमरोहवी, डॉ. ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान और डॉ. अब्दुल क़य्यूम के नाम मिलते हैं।
उन्होंने 1946 में पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया और बाद में 1953 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कराची से एम.ए. की डिग्री हासिल की। यह तालीमी सफ़र उस अदबी शख़्सियत की बुनियाद बना जिसने आगे चलकर नस्र और नज़्म, मिज़ाह और संजीदगी, सफ़र और तख़य्युल—हर मैदान में अपनी अलग पहचान क़ायम की।
लाहौर की अदबी फ़ज़ा और साहिर से राब्ता
इब्न-ए-इंशा की जवानी उस लाहौर में परवान चढ़ी जो उस ज़माने में बर्रे-सग़ीर की सबसे अहम अदबी और तहज़ीबी बस्तियों में से एक था। यही वह फ़ज़ा थी जिसमें शायर, अफ़साना-निगार, सहाफ़ी और फ़नकार एक-दूसरे के क़रीब आते थे और अदब सिर्फ़ किताबों का मौज़ू नहीं बल्कि ज़िंदा सामाजिक तजुर्बा था।
इसी दौर में इब्न-ए-इंशा का ताल्लुक़ मशहूर शायर साहिर लुधियानवी से भी रहा। तहक़ीक़ी रिवायतों के मुताबिक़ साहिर के लाहौर के शुरुआती दिनों में इब्न-ए-इंशा, ए. हमीद और फ़िक्र तौंसवी जैसे अहबाब उनके क़रीबी हल्क़े में शामिल थे। इस अदबी माहौल ने इब्न-ए-इंशा की नस्री और शायरी दुनिया को भी गहरा असर दिया।
इब्न-ए-इंशा तहरीक-ए-अदब-ए-तरक़्क़ी-पसंद से भी वाबस्ता रहे। इस तहरीक के दौर में अदब को इंसानी ज़िंदगी, समाज, ग़रीबी, नाइंसाफ़ी, आज़ादी और तब्दीली के सवालों से जोड़कर देखने का रुझान मज़बूत हुआ। इब्न-ए-इंशा का फ़न हालांकि किसी एक नज़रिये में क़ैद नहीं होता, लेकिन उनकी तहरीर में आम इंसान के दुख-दर्द और समाजी ज़िंदगी पर उनकी गहरी नज़र साफ़ दिखाई देती है।
सरकारी ख़िदमात और अदबी ज़िंदगी
इब्न-ए-इंशा ने सिर्फ़ अदबी दुनिया में ही अपनी ज़िंदगी नहीं गुज़ारी बल्कि मुख़्तलिफ़ सरकारी इदारों से भी वाबस्ता रहे। उन्होंने रेडियो पाकिस्तान, वज़ारत-ए-सक़ाफ़त और नेशनल बुक सेंटर ऑफ़ पाकिस्तान से मुतअल्लिक़ ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दीं। कुछ अरसे तक उन्होंने अक़वाम-ए-मुत्तहिदा से भी वाबस्तगी रखी।
अक़वाम-ए-मुत्तहिदा से उनकी वाबस्तगी और मुख़्तलिफ़ मुल्कों के सफ़र ने उनके अदबी तजुर्बे को नई वुसअत दी। उन्होंने जापान, फ़िलीपीन, चीन, हांगकांग, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, हिंदुस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, फ़्रांस, ब्रिटेन और अमरीका समेत कई मुल्कों की सैर की। इन सफ़रों ने बाद में उनके सफ़रनामों को वह रंग दिया जिसमें महज़ मक़ामात का बयान नहीं बल्कि इंसान, तहज़ीब, समाज और मुसाफ़िर के अपने अंदर की दुनिया भी शामिल हो गई।
इब्न-ए-इंशा की शायरी : सादगी में गहराई
इब्न-ए-इंशा की शायरी का सबसे बड़ा इम्तियाज़ उनकी ज़बान है। उन्होंने उर्दू शायरी को ऐसे अल्फ़ाज़, तरकीबात और लहजे से मालामाल किया जो रोज़मर्रा की बोलियों और बर्रे-सग़ीर की अवामी ज़बान के क़रीब थे। उनकी शायरी में अमीर ख़ुसरो की याद दिलाने वाली ज़बानी रवानी और हिंदुस्तानी लहजे की मिठास का एहसास मिलता है। यही वजह है कि उनका कलाम एक तरफ़ क्लासिकी रिवायत से जुड़ता है और दूसरी तरफ़ आम इंसान की ज़बान से भी क़रीबी रिश्ता क़ायम रखता है।
उनके यहां मुहब्बत सिर्फ़ महबूब के हुस्न का बयान नहीं बल्कि हिज्र, तन्हाई, इंतज़ार, बेघरपन और ज़िंदगी की नापाएदारी का एहसास भी है। उनका शायर अक्सर दुनिया को देखता है, उससे मुतअस्सिर होता है, मगर उसी दुनिया से एक हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ सवाल भी करता है।
इब्न-ए-इंशा की शायरी की यह दोहरी कैफ़ियत—दिल की उदासी और ज़बान की शगुफ़्तगी—उन्हें अपने हम-अस्र शायरों से अलग करती है।
उनके अहम मजमूआ-ए-शायरी में “चाँद नगर”, “दिल-ए-वहशी” और “इस बस्ती के इक कूचे में” ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।
“इंशा जी उठो” : एक अमर ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा की शायरी में जिस ग़ज़ल ने उन्हें अवामी सतह पर सबसे ज़्यादा मक़बूलियत दी, वह है:
“इंशा जी उठो, अब कूच करो
इस शहर में जी का लगाना क्या”
यह ग़ज़ल सिर्फ़ एक रूमानी कैफ़ियत का बयान नहीं बल्कि कूच, बेदिली, बेकरारी और दुनिया से उचाट हो जाने की ऐसी कैफ़ियत पैदा करती है जो हर दौर के इंसान को अपने क़रीब महसूस होती है।
इस ग़ज़ल को उस्ताद अमानत अली ख़ान ने 1974 में अपनी आवाज़ दी और उसके बाद यह कलाम एक मक़बूल अदबी नग़्मे की हैसियत हासिल कर गया। रेडियो पाकिस्तान भी इसे इब्न-ए-इंशा की सबसे मशहूर ग़ज़लों में शुमार करता है और इसे आधुनिक दौर की क्लासिकी ग़ज़ल क़रार देता है।
उनका कलाम बाद में जगजीत सिंह, ग़ुलाम अली और दूसरे मशहूर फ़नकारों की आवाज़ में भी अवामी ज़ौक़ तक पहुँचा। “कल चौदहवीं की रात थी” जैसी ग़ज़ल ने इश्क़िया शायरी में चाँद और महबूब के पुराने इस्तिआरे को एक नई ताज़गी दी।
सफ़रनामा : दुनिया को देखने का इब्न-ए-इंशाई अंदाज़
अगर शायरी इब्न-ए-इंशा के दिल की आवाज़ थी तो सफ़रनामा उनकी आँख था।
उन्होंने दुनिया को सिर्फ़ एक मुसाफ़िर की तरह नहीं देखा बल्कि एक ऐसे शख़्स की निगाह से देखा जो रास्ते में मिलने वाले हर इंसान, हर शहर, हर तहज़ीब और हर अजीबो-ग़रीब वाक़िए में एक कहानी तलाश करता था।
उनके सफ़रनामों में “आवारा गर्द की डायरी”, “दुनिया गोल है”, “इब्न बतूता के तआक़ुब में”, “चलتے हो तो चीन को चलिए” और “नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर” ख़ास तौर पर मशहूर हैं।
इब्न-ए-इंशा का सफ़रनामा महज़ रास्तों, इमारतों और मंज़िलों का बयान नहीं। वह रास्ते में अपने ही समाज को भी देखते हैं और मुसाफ़िर की अपनी कमज़ोरियों को भी। उनके यहां मिज़ाह महज़ हँसाने का ज़रिया नहीं बल्कि देखने का एक अदबी ज़ाविया है।
वह ऐसी बात भी कह देते हैं जिसे कोई दूसरा शख़्स भारी-भरकम फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में बयान करता, मगर इब्न-ए-इंशा उसे मुस्कुराते हुए कहकर गुज़र जाते हैं।
यही उनकी नस्र की सबसे बड़ी ख़ूबी है।
“उर्दू की आख़िरी किताब” और मिज़ाह की नई रवायत
इब्न-ए-इंशा को उर्दू के बेहतरीन मिज़ाह-निगारों में शुमार किया जाता है। उनकी किताब “उर्दू की आख़िरी किताब” इस फ़न की एक अहम मिसाल है। सरकारी और अदबी ज़राए ने भी उनकी मिज़ाहिया तहरीरों को उनकी मक़बूलियत का बुनियादी हिस्सा बताया है।
इब्न-ए-इंशा का मिज़ाह सतही ठिठोली नहीं। वह तंज़, फ़लसफ़ा, तारीख़, समाज और इंसानी कमज़ोरियों को एक-दूसरे में इस तरह मिला देते हैं कि क़ारी पहले मुस्कुराता है और फिर अचानक उसे एहसास होता है कि जिस बात पर वह हँस रहा था, वह दरअसल उसके अपने समाज का आईना है।
उनकी मिज़ाहिया तहरीर में एक ख़ास तरह की मासूम शरारत है। वह किसी मुश्किल बात को भी ऐसे अंदाज़ में पेश करते हैं जैसे कोई बच्चा दुनिया के बड़े-बड़े दावेदारों से भोलेपन में सवाल कर रहा हो।
इसी वजह से “उर्दू की आख़िरी किताब” सिर्फ़ मिज़ाह की किताब नहीं बल्कि तंज़ और सामाजिक शऊर की एक अदबी दस्तावेज़ भी बन जाती है। इसकी पहली इशाअत जुलाई 1971 में हुई और बाद के वर्षों में इसके कई इदादे शाया हुए।
नस्र में इब्न-ए-इंशा का फ़न
इब्न-ए-इंशा की नस्र की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उसमें तकल्लुफ़ कम और इंसानी राब्ता ज़्यादा है।
वह मुश्किल बात को मुश्किल अल्फ़ाज़ में कहने के बजाय आसान ज़बान में ऐसी कैफ़ियत पैदा करते हैं कि क़ारी को महसूस होता है जैसे मुसन्निफ़ उसके सामने बैठा हुआ उससे गुफ़्तगू कर रहा हो।
उनकी तहरीर में:
शगुफ़्तगी है,
तंज़ है,
उदासी है,
बे-साख़्तगी है,
फ़लसफ़ियाना गहराई है,
और सबसे बढ़कर इंसान को समझने की कोशिश है।
यही वजह है कि इब्न-ए-इंशा की नस्र पढ़ते हुए हँसी और उदासी अक्सर एक ही जगह खड़ी दिखाई देती हैं।
ख़त-निगारी और तर्जुमा
इब्न-ए-इंशा ने ख़त-निगारी में भी अपनी ख़ास पहचान क़ायम की। “ख़त इंशा जी के” उनकी ख़तों का मशहूर मजमूआ है।
इसके अलावा उन्होंने मुख़्तलिफ़ ज़बानों के अदबी सरमाए को उर्दू क़ारी तक पहुँचाने के लिए तर्जुमे भी किए। उन्होंने चीनी नज़्मों का मजमूआ उर्दू में मुन्तक़िल किया, जो 1960 में “चीनी नज़्में” के नाम से शाया हुआ। रेख़्ता के अदबी अभिलेख में इसकी इशाअत का साल 1960 और लाहौर अकादमी, लाहौर को नाशिर के तौर पर दर्ज किया गया है।
उनके तर्जुमों में चेख़व, ओ. हेनरी, एडगर एलन पो और जर्मन अदब से मुतअल्लिक़ काम भी शामिल हैं। इस पहलू से इब्न-ए-इंशा की शख़्सियत महज़ शायर या मिज़ाह-निगार की नहीं बल्कि एक वसीअ मुताला रखने वाले अदबी मुतरजिम की भी थी।
इब्न-ए-इंशा की ज़बान : अवामी लहजे की शायरी
इब्न-ए-इंशा के अदबी कमाल को समझने के लिए उनकी ज़बान को समझना ज़रूरी है।
उन्होंने उर्दू की उस रवायत को आगे बढ़ाया जिसमें फ़ारसी और अरबी के साथ हिंदुस्तानी अवामी बोलियों की मिठास भी शामिल रही है। उनके यहां ऐसे अल्फ़ाज़ और तरकीबात मिलती हैं जो शहरी अदबी ज़बान से निकलकर सीधे अवामी मुहावरे से जुड़ती हैं।
इसी वजह से उनकी शायरी में एक तरफ़ क्लासिकी रवानी है और दूसरी तरफ़ गली-कूचों की ज़बान की ख़ुशबू।
यह अंदाज़ उन्हें अमीर ख़ुसरो की उस ज़बानी रवायत के क़रीब ले जाता है जिसमें अदब और अवाम के बीच फ़ासला कम हो जाता है। आलोचनात्मक और अदबी ज़राए भी इब्न-ए-इंशा की ज़बान को हिंदुस्तानी बोलियों से क़रीबी और अमीर ख़ुसरो की याद दिलाने वाली रवानी से जोड़ते हैं।
फ़िक्र और मिज़ाह का अनोखा इम्तिज़ाज
इब्न-ए-इंशा की सबसे बड़ी फ़नकारी शायद यह है कि वह गंभीर बात को भी मिज़ाह के पर्दे में कह सकते थे।
उनके यहां हँसी कभी सिर्फ़ हँसी नहीं होती।
उसके पीछे कोई सवाल होता है।
कभी समाज पर सवाल, कभी सियासत पर, कभी इंसानी फ़ितरत पर, कभी अपनी ही ज़ात पर।
और यही ख़ूबी उनके मिज़ाह को महज़ मनोरंजन से उठाकर अदबी फ़न बना देती है।
उनकी तहरीर पढ़ने वाला क़ारी पहले लुत्फ़ हासिल करता है, फिर मुस्कुराता है और आख़िर में ठहरकर सोचने पर मजबूर हो जाता है।
आख़िरी अय्याम और वफ़ात
इब्न-ए-इंशा ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा कराची में गुज़ारा। 11 जनवरी 1978 को लंदन में उनका इंतिक़ाल हुआ। उनकी वफ़ात का सबब हॉजकिन लिम्फ़ोमा, यानी एक किस्म का ख़ून का सरतान, बताया जाता है। बाद में उन्हें कराची में दफ़्न किया गया।
उनकी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 50 बरस थी। यह छोटी-सी उम्र मगर असाधारण अदबी पैदावार उनके फ़न की वुसअत का अंदाज़ा देती है।
इब्न-ए-इंशा को उनकी अदबी ख़िदमात के एतिराफ़ में 1978 में प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस से नवाज़ा गया।
अदबी विरासत
इब्न-ए-इंशा की विरासत किसी एक किताब, किसी एक ग़ज़ल या किसी एक फ़न तक महदूद नहीं।
वह उन अदबी शख़्सियात में हैं जिन्होंने यह साबित किया कि शायरी में सादगी भी गहराई पैदा कर सकती है, मिज़ाह में फ़िक्र भी हो सकती है और सफ़रनामा महज़ दुनिया देखने का बयान नहीं बल्कि इंसान को समझने का ज़रिया भी बन सकता है।
उनकी ग़ज़लें आज भी गाई जाती हैं। उनके सफ़रनामे आज भी पढ़े जाते हैं। उनकी मिज़ाहिया तहरीरें आज भी मुस्कुराने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करती हैं।
उनकी शायरी की मक़बूलियत का एक बड़ा सबब यह भी है कि वह किसी पेचीदा अदबी प्रदर्शन के बजाय सीधे दिल से बात करती है। इसी लिए उनकी तहरीर में गुज़रे हुए दौर की महक होने के बावजूद उसका असर नई नस्लों तक पहुँचता रहा है। रेडियो पाकिस्तान और दूसरे अदबी ज़राए उन्हें अपनी नस्ल के नुमायाँ शायर, मिज़ाह-निगार और सफ़रनामा-निगारों में शुमार करते हैं।
इब्न-ए-इंशा : एक अदबी तजज़िया
अगर इब्न-ए-इंशा को सिर्फ़ शायर कहा जाए तो उनकी नस्र छूट जाती है।
अगर उन्हें सिर्फ़ मिज़ाह-निगार कहा जाए तो उनकी शायरी की उदासी और गहराई ओझल हो जाती है।
अगर उन्हें सिर्फ़ सफ़रनामा-निगार कहा जाए तो उनकी ज़बान और फ़िक्र की दुनिया अधूरी रह जाती है।
और अगर उन्हें सिर्फ़ कालम-निगार कहा जाए तो उनके फ़न का सबसे नर्म और ख़ूबसूरत हिस्सा नज़र से ओझल हो जाता है।
दरअसल इब्न-ए-इंशा एक ऐसी मुजस्सिम अदबी आवाज़ थे जिसमें शायर का दिल, मुसाफ़िर की आँख, मिज़ाह-निगार की मुस्कुराहट और फ़लसफ़ी की बेचैनी एक साथ मौजूद थी।
उनके यहां चाँद भी है और कूचा भी; सफ़र भी है और तन्हाई भी; हँसी भी है और आँसू भी; मुहब्बत भी है और कूच का एहसास भी।
यही इब्न-ए-इंशा का अस्ल फ़न है।
उन्होंने उर्दू अदब को सिर्फ़ नई ग़ज़लें और सफ़रनामे नहीं दिए, बल्कि देखने का एक नया अंदाज़ दिया—ऐसा अंदाज़ जिसमें दुनिया की तमाम संजीदगियों के बीच मुस्कुराने की गुंजाइश बाक़ी रहती है।
और शायद यही वजह है कि इब्न-ए-इंशा की आवाज़ उनके इंतिक़ाल के दशकों बाद भी ख़ामोश नहीं हुई।
वह आज भी अपनी ग़ज़लों, सफ़रनामों और मिज़ाहिया तहरीरों के ज़रिए क़ारी से मुख़ातिब हैं—और हर बार ऐसा महसूस होता है जैसे कोई पुराना मुसाफ़िर अभी-अभी किसी दूर शहर से लौटकर आया हो और अपने साथ दुनिया की कुछ उदास, कुछ दिलकश और कुछ बेहद मज़ाहिया कहानियाँ ले आया हो।
इब्न-ए-इंशा की अहम तसानीफ़
मजमूआ-ए-शायरी:
चाँद नगर
दिल-ए-वहशी
इस बस्ती के इक कूचे में
बिल्लो का बस्ता
सफ़रनामे:
आवारा गर्द की डायरी
दुनिया गोल है
इब्न बतूता के तआक़ुब में
चलते हो तो चीन को चलिए
नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर
मिज़ाहिया अदब:
उर्दू की आख़िरी किताब
ख़ुमार-ए-गंदुम
आप से क्या पर्दा
बातें इंशा जी की
दख़्ल दर मअक़ूलात
ख़तों का मजमूआ:
ख़त इंशा जी के
तर्जुमे:
चीनी नज़्में
सहर होने तक
कारनामे नवाब तीस मार ख़ाँ के
लाखों का शहर
अंधा कुआँ
इन तसानीफ़ का मजमूई मुताला यह साफ़ करता है कि इब्न-ए-इंशा की अदबी शख़्सियत किसी एक ख़ाने में रखी ही नहीं जा सकती। वह उर्दू अदब के शायर भी हैं, मुसाफ़िर भी, मिज़ाह-निगार भी और ज़िंदगी के बारीक नुक्तों को पहचानने वाले एक गहरे फ़नकार भी।
इब्न-ए-इंशा का सबसे बड़ा कमाल शायद यही है कि उन्होंने ज़िंदगी की उदासी को भी मुस्कुराकर बयान किया—और मुस्कुराहट के पीछे छुपी उदासी को भी क़ारी तक पहुँचा दिया।
