Ibn e Insha: तख़य्युल, मिज़ाह, सफ़र और उर्दू अदब का एक अनोखा बाब

 

जीवन-परिचय

नाम: शेर मुहम्मद ख़ान
तख़ल्लुस: इब्न-ए-इंशा
पैदाइश: 15 जून 1927
जन्म-स्थान: फ़िल्लौर, ज़िला जालंधर, पंजाब
वफ़ात: 11 जनवरी 1978
वफ़ात का मक़ाम: लंदन
दफ़्न: कराची
शोबा-ए-कार: शायर, मिज़ाह-निगार, सफ़रनामा-निगार, कालम-निगार और मुतरजिम
तहरीकी वाबस्तगी: तहरीक-ए-अदब-ए-तरक़्क़ी-पसंद
इज़्ज़ाज़: प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस, 1978

इब्न-ए-इंशा उर्दू अदब की उन नायाब शख़्सियात में शुमार होते हैं जिनके फ़न की कोई एक ताबीर काफ़ी नहीं। वह शायर भी थे, मिज़ाह-निगार भी, सफ़रनामा-निगार भी, कालम-निगार भी और एक ऐसे साहिब-ए-नज़र मुतरजिम भी, जिनकी तहरीर में ज़िंदगी की तल्ख़ी, इंसानी बेचारगी, मुसाफ़िर की तन्हाई, आशिक़ की बेकरारी और ज़माने पर मुस्कुराने की सलाहियत एक साथ दिखाई देती है। उनकी शायरी में सादगी है मगर यह सादगी सतही नहीं; उसके पीछे गहरी उदासी, फ़िक्र, तजुर्बा और इंसानी मन की पेचीदगियों का एक पूरा जहान आबाद है। सरकारी ज़राए भी उनकी शायरी को सादा मगर गहरी और उनके मिज़ाहिया कलाम व कालम को उनकी मक़बूलियत का अहम सबब क़रार देते हैं।

इब्न-ए-इंशा का अस्ल नाम शेर मुहम्मद ख़ान था। उनकी पैदाइश 15 जून 1927 को फ़िल्लौर तहसील, ज़िला जालंधर, पंजाब में हुई। उनके वालिद का ताल्लुक़ राजस्थान से बताया जाता है। वह उस दौर में पैदा हुए जब बर्रे-सग़ीर हिंद की सियासी, समाजी और तहज़ीबी फ़ज़ा तेज़ी से बदल रही थी। बाद में 1947 की तक़सीम के बाद उन्होंने पाकिस्तान को अपना वतन बनाया और कराची में अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा गुज़ारा।

तालीम और अदबी परवरिश

इब्न-ए-इंशा की अदबी तर्बियत सिर्फ़ किताबों तक महदूद नहीं थी। उन्होंने मुख़्तलिफ़ अहल-ए-इल्म से इस्तिफ़ादा किया और उनकी फ़िक्र को कई उस्तादों की सोहबत से जिलौ मिला। उनके उस्तादों और रहनुमाओं में हबीबुल्लाह ग़ज़नफ़र अमरोहवी, डॉ. ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ान और डॉ. अब्दुल क़य्यूम के नाम मिलते हैं।

उन्होंने 1946 में पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया और बाद में 1953 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कराची से एम.ए. की डिग्री हासिल की। यह तालीमी सफ़र उस अदबी शख़्सियत की बुनियाद बना जिसने आगे चलकर नस्र और नज़्म, मिज़ाह और संजीदगी, सफ़र और तख़य्युल—हर मैदान में अपनी अलग पहचान क़ायम की।

लाहौर की अदबी फ़ज़ा और साहिर से राब्ता

इब्न-ए-इंशा की जवानी उस लाहौर में परवान चढ़ी जो उस ज़माने में बर्रे-सग़ीर की सबसे अहम अदबी और तहज़ीबी बस्तियों में से एक था। यही वह फ़ज़ा थी जिसमें शायर, अफ़साना-निगार, सहाफ़ी और फ़नकार एक-दूसरे के क़रीब आते थे और अदब सिर्फ़ किताबों का मौज़ू नहीं बल्कि ज़िंदा सामाजिक तजुर्बा था।

इसी दौर में इब्न-ए-इंशा का ताल्लुक़ मशहूर शायर साहिर लुधियानवी से भी रहा। तहक़ीक़ी रिवायतों के मुताबिक़ साहिर के लाहौर के शुरुआती दिनों में इब्न-ए-इंशा, ए. हमीद और फ़िक्र तौंसवी जैसे अहबाब उनके क़रीबी हल्क़े में शामिल थे। इस अदबी माहौल ने इब्न-ए-इंशा की नस्री और शायरी दुनिया को भी गहरा असर दिया।

इब्न-ए-इंशा तहरीक-ए-अदब-ए-तरक़्क़ी-पसंद से भी वाबस्ता रहे। इस तहरीक के दौर में अदब को इंसानी ज़िंदगी, समाज, ग़रीबी, नाइंसाफ़ी, आज़ादी और तब्दीली के सवालों से जोड़कर देखने का रुझान मज़बूत हुआ। इब्न-ए-इंशा का फ़न हालांकि किसी एक नज़रिये में क़ैद नहीं होता, लेकिन उनकी तहरीर में आम इंसान के दुख-दर्द और समाजी ज़िंदगी पर उनकी गहरी नज़र साफ़ दिखाई देती है।

सरकारी ख़िदमात और अदबी ज़िंदगी

इब्न-ए-इंशा ने सिर्फ़ अदबी दुनिया में ही अपनी ज़िंदगी नहीं गुज़ारी बल्कि मुख़्तलिफ़ सरकारी इदारों से भी वाबस्ता रहे। उन्होंने रेडियो पाकिस्तान, वज़ारत-ए-सक़ाफ़त और नेशनल बुक सेंटर ऑफ़ पाकिस्तान से मुतअल्लिक़ ज़िम्मेदारियाँ अंजाम दीं। कुछ अरसे तक उन्होंने अक़वाम-ए-मुत्तहिदा से भी वाबस्तगी रखी।

अक़वाम-ए-मुत्तहिदा से उनकी वाबस्तगी और मुख़्तलिफ़ मुल्कों के सफ़र ने उनके अदबी तजुर्बे को नई वुसअत दी। उन्होंने जापान, फ़िलीपीन, चीन, हांगकांग, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, हिंदुस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, फ़्रांस, ब्रिटेन और अमरीका समेत कई मुल्कों की सैर की। इन सफ़रों ने बाद में उनके सफ़रनामों को वह रंग दिया जिसमें महज़ मक़ामात का बयान नहीं बल्कि इंसान, तहज़ीब, समाज और मुसाफ़िर के अपने अंदर की दुनिया भी शामिल हो गई।

इब्न-ए-इंशा की शायरी : सादगी में गहराई

इब्न-ए-इंशा की शायरी का सबसे बड़ा इम्तियाज़ उनकी ज़बान है। उन्होंने उर्दू शायरी को ऐसे अल्फ़ाज़, तरकीबात और लहजे से मालामाल किया जो रोज़मर्रा की बोलियों और बर्रे-सग़ीर की अवामी ज़बान के क़रीब थे। उनकी शायरी में अमीर ख़ुसरो की याद दिलाने वाली ज़बानी रवानी और हिंदुस्तानी लहजे की मिठास का एहसास मिलता है। यही वजह है कि उनका कलाम एक तरफ़ क्लासिकी रिवायत से जुड़ता है और दूसरी तरफ़ आम इंसान की ज़बान से भी क़रीबी रिश्ता क़ायम रखता है।

उनके यहां मुहब्बत सिर्फ़ महबूब के हुस्न का बयान नहीं बल्कि हिज्र, तन्हाई, इंतज़ार, बेघरपन और ज़िंदगी की नापाएदारी का एहसास भी है। उनका शायर अक्सर दुनिया को देखता है, उससे मुतअस्सिर होता है, मगर उसी दुनिया से एक हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ सवाल भी करता है।

इब्न-ए-इंशा की शायरी की यह दोहरी कैफ़ियत—दिल की उदासी और ज़बान की शगुफ़्तगी—उन्हें अपने हम-अस्र शायरों से अलग करती है।

उनके अहम मजमूआ-ए-शायरी में “चाँद नगर”, “दिल-ए-वहशी” और “इस बस्ती के इक कूचे में” ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।

“इंशा जी उठो” : एक अमर ग़ज़ल

इब्न-ए-इंशा की शायरी में जिस ग़ज़ल ने उन्हें अवामी सतह पर सबसे ज़्यादा मक़बूलियत दी, वह है:

“इंशा जी उठो, अब कूच करो
इस शहर में जी का लगाना क्या”

यह ग़ज़ल सिर्फ़ एक रूमानी कैफ़ियत का बयान नहीं बल्कि कूच, बेदिली, बेकरारी और दुनिया से उचाट हो जाने की ऐसी कैफ़ियत पैदा करती है जो हर दौर के इंसान को अपने क़रीब महसूस होती है।

इस ग़ज़ल को उस्ताद अमानत अली ख़ान ने 1974 में अपनी आवाज़ दी और उसके बाद यह कलाम एक मक़बूल अदबी नग़्मे की हैसियत हासिल कर गया। रेडियो पाकिस्तान भी इसे इब्न-ए-इंशा की सबसे मशहूर ग़ज़लों में शुमार करता है और इसे आधुनिक दौर की क्लासिकी ग़ज़ल क़रार देता है।

उनका कलाम बाद में जगजीत सिंह, ग़ुलाम अली और दूसरे मशहूर फ़नकारों की आवाज़ में भी अवामी ज़ौक़ तक पहुँचा। “कल चौदहवीं की रात थी” जैसी ग़ज़ल ने इश्क़िया शायरी में चाँद और महबूब के पुराने इस्तिआरे को एक नई ताज़गी दी।

सफ़रनामा : दुनिया को देखने का इब्न-ए-इंशाई अंदाज़

अगर शायरी इब्न-ए-इंशा के दिल की आवाज़ थी तो सफ़रनामा उनकी आँख था।

उन्होंने दुनिया को सिर्फ़ एक मुसाफ़िर की तरह नहीं देखा बल्कि एक ऐसे शख़्स की निगाह से देखा जो रास्ते में मिलने वाले हर इंसान, हर शहर, हर तहज़ीब और हर अजीबो-ग़रीब वाक़िए में एक कहानी तलाश करता था।

उनके सफ़रनामों में “आवारा गर्द की डायरी”, “दुनिया गोल है”, “इब्न बतूता के तआक़ुब में”, “चलتے हो तो चीन को चलिए” और “नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर” ख़ास तौर पर मशहूर हैं।

इब्न-ए-इंशा का सफ़रनामा महज़ रास्तों, इमारतों और मंज़िलों का बयान नहीं। वह रास्ते में अपने ही समाज को भी देखते हैं और मुसाफ़िर की अपनी कमज़ोरियों को भी। उनके यहां मिज़ाह महज़ हँसाने का ज़रिया नहीं बल्कि देखने का एक अदबी ज़ाविया है।

वह ऐसी बात भी कह देते हैं जिसे कोई दूसरा शख़्स भारी-भरकम फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में बयान करता, मगर इब्न-ए-इंशा उसे मुस्कुराते हुए कहकर गुज़र जाते हैं।

यही उनकी नस्र की सबसे बड़ी ख़ूबी है।

“उर्दू की आख़िरी किताब” और मिज़ाह की नई रवायत

इब्न-ए-इंशा को उर्दू के बेहतरीन मिज़ाह-निगारों में शुमार किया जाता है। उनकी किताब “उर्दू की आख़िरी किताब” इस फ़न की एक अहम मिसाल है। सरकारी और अदबी ज़राए ने भी उनकी मिज़ाहिया तहरीरों को उनकी मक़बूलियत का बुनियादी हिस्सा बताया है।

इब्न-ए-इंशा का मिज़ाह सतही ठिठोली नहीं। वह तंज़, फ़लसफ़ा, तारीख़, समाज और इंसानी कमज़ोरियों को एक-दूसरे में इस तरह मिला देते हैं कि क़ारी पहले मुस्कुराता है और फिर अचानक उसे एहसास होता है कि जिस बात पर वह हँस रहा था, वह दरअसल उसके अपने समाज का आईना है।

उनकी मिज़ाहिया तहरीर में एक ख़ास तरह की मासूम शरारत है। वह किसी मुश्किल बात को भी ऐसे अंदाज़ में पेश करते हैं जैसे कोई बच्चा दुनिया के बड़े-बड़े दावेदारों से भोलेपन में सवाल कर रहा हो।

इसी वजह से “उर्दू की आख़िरी किताब” सिर्फ़ मिज़ाह की किताब नहीं बल्कि तंज़ और सामाजिक शऊर की एक अदबी दस्तावेज़ भी बन जाती है। इसकी पहली इशाअत जुलाई 1971 में हुई और बाद के वर्षों में इसके कई इदादे शाया हुए।

नस्र में इब्न-ए-इंशा का फ़न

इब्न-ए-इंशा की नस्र की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि उसमें तकल्लुफ़ कम और इंसानी राब्ता ज़्यादा है।

वह मुश्किल बात को मुश्किल अल्फ़ाज़ में कहने के बजाय आसान ज़बान में ऐसी कैफ़ियत पैदा करते हैं कि क़ारी को महसूस होता है जैसे मुसन्निफ़ उसके सामने बैठा हुआ उससे गुफ़्तगू कर रहा हो।

उनकी तहरीर में:

  • शगुफ़्तगी है,

  • तंज़ है,

  • उदासी है,

  • बे-साख़्तगी है,

  • फ़लसफ़ियाना गहराई है,

  • और सबसे बढ़कर इंसान को समझने की कोशिश है।

यही वजह है कि इब्न-ए-इंशा की नस्र पढ़ते हुए हँसी और उदासी अक्सर एक ही जगह खड़ी दिखाई देती हैं।

ख़त-निगारी और तर्जुमा

इब्न-ए-इंशा ने ख़त-निगारी में भी अपनी ख़ास पहचान क़ायम की। “ख़त इंशा जी के” उनकी ख़तों का मशहूर मजमूआ है।

इसके अलावा उन्होंने मुख़्तलिफ़ ज़बानों के अदबी सरमाए को उर्दू क़ारी तक पहुँचाने के लिए तर्जुमे भी किए। उन्होंने चीनी नज़्मों का मजमूआ उर्दू में मुन्तक़िल किया, जो 1960 में “चीनी नज़्में” के नाम से शाया हुआ। रेख़्ता के अदबी अभिलेख में इसकी इशाअत का साल 1960 और लाहौर अकादमी, लाहौर को नाशिर के तौर पर दर्ज किया गया है।

उनके तर्जुमों में चेख़व, ओ. हेनरी, एडगर एलन पो और जर्मन अदब से मुतअल्लिक़ काम भी शामिल हैं। इस पहलू से इब्न-ए-इंशा की शख़्सियत महज़ शायर या मिज़ाह-निगार की नहीं बल्कि एक वसीअ मुताला रखने वाले अदबी मुतरजिम की भी थी।

इब्न-ए-इंशा की ज़बान : अवामी लहजे की शायरी

इब्न-ए-इंशा के अदबी कमाल को समझने के लिए उनकी ज़बान को समझना ज़रूरी है।

उन्होंने उर्दू की उस रवायत को आगे बढ़ाया जिसमें फ़ारसी और अरबी के साथ हिंदुस्तानी अवामी बोलियों की मिठास भी शामिल रही है। उनके यहां ऐसे अल्फ़ाज़ और तरकीबात मिलती हैं जो शहरी अदबी ज़बान से निकलकर सीधे अवामी मुहावरे से जुड़ती हैं।

इसी वजह से उनकी शायरी में एक तरफ़ क्लासिकी रवानी है और दूसरी तरफ़ गली-कूचों की ज़बान की ख़ुशबू।

यह अंदाज़ उन्हें अमीर ख़ुसरो की उस ज़बानी रवायत के क़रीब ले जाता है जिसमें अदब और अवाम के बीच फ़ासला कम हो जाता है। आलोचनात्मक और अदबी ज़राए भी इब्न-ए-इंशा की ज़बान को हिंदुस्तानी बोलियों से क़रीबी और अमीर ख़ुसरो की याद दिलाने वाली रवानी से जोड़ते हैं।

फ़िक्र और मिज़ाह का अनोखा इम्तिज़ाज

इब्न-ए-इंशा की सबसे बड़ी फ़नकारी शायद यह है कि वह गंभीर बात को भी मिज़ाह के पर्दे में कह सकते थे

उनके यहां हँसी कभी सिर्फ़ हँसी नहीं होती।

उसके पीछे कोई सवाल होता है।

कभी समाज पर सवाल, कभी सियासत पर, कभी इंसानी फ़ितरत पर, कभी अपनी ही ज़ात पर।

और यही ख़ूबी उनके मिज़ाह को महज़ मनोरंजन से उठाकर अदबी फ़न बना देती है।

उनकी तहरीर पढ़ने वाला क़ारी पहले लुत्फ़ हासिल करता है, फिर मुस्कुराता है और आख़िर में ठहरकर सोचने पर मजबूर हो जाता है।

आख़िरी अय्याम और वफ़ात

इब्न-ए-इंशा ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा कराची में गुज़ारा। 11 जनवरी 1978 को लंदन में उनका इंतिक़ाल हुआ। उनकी वफ़ात का सबब हॉजकिन लिम्फ़ोमा, यानी एक किस्म का ख़ून का सरतान, बताया जाता है। बाद में उन्हें कराची में दफ़्न किया गया।

उनकी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 50 बरस थी। यह छोटी-सी उम्र मगर असाधारण अदबी पैदावार उनके फ़न की वुसअत का अंदाज़ा देती है।

इब्न-ए-इंशा को उनकी अदबी ख़िदमात के एतिराफ़ में 1978 में प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस से नवाज़ा गया।

अदबी विरासत

इब्न-ए-इंशा की विरासत किसी एक किताब, किसी एक ग़ज़ल या किसी एक फ़न तक महदूद नहीं।

वह उन अदबी शख़्सियात में हैं जिन्होंने यह साबित किया कि शायरी में सादगी भी गहराई पैदा कर सकती है, मिज़ाह में फ़िक्र भी हो सकती है और सफ़रनामा महज़ दुनिया देखने का बयान नहीं बल्कि इंसान को समझने का ज़रिया भी बन सकता है।

उनकी ग़ज़लें आज भी गाई जाती हैं। उनके सफ़रनामे आज भी पढ़े जाते हैं। उनकी मिज़ाहिया तहरीरें आज भी मुस्कुराने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करती हैं।

उनकी शायरी की मक़बूलियत का एक बड़ा सबब यह भी है कि वह किसी पेचीदा अदबी प्रदर्शन के बजाय सीधे दिल से बात करती है। इसी लिए उनकी तहरीर में गुज़रे हुए दौर की महक होने के बावजूद उसका असर नई नस्लों तक पहुँचता रहा है। रेडियो पाकिस्तान और दूसरे अदबी ज़राए उन्हें अपनी नस्ल के नुमायाँ शायर, मिज़ाह-निगार और सफ़रनामा-निगारों में शुमार करते हैं।

इब्न-ए-इंशा : एक अदबी तजज़िया

अगर इब्न-ए-इंशा को सिर्फ़ शायर कहा जाए तो उनकी नस्र छूट जाती है।

अगर उन्हें सिर्फ़ मिज़ाह-निगार कहा जाए तो उनकी शायरी की उदासी और गहराई ओझल हो जाती है।

अगर उन्हें सिर्फ़ सफ़रनामा-निगार कहा जाए तो उनकी ज़बान और फ़िक्र की दुनिया अधूरी रह जाती है।

और अगर उन्हें सिर्फ़ कालम-निगार कहा जाए तो उनके फ़न का सबसे नर्म और ख़ूबसूरत हिस्सा नज़र से ओझल हो जाता है।

दरअसल इब्न-ए-इंशा एक ऐसी मुजस्सिम अदबी आवाज़ थे जिसमें शायर का दिल, मुसाफ़िर की आँख, मिज़ाह-निगार की मुस्कुराहट और फ़लसफ़ी की बेचैनी एक साथ मौजूद थी।

उनके यहां चाँद भी है और कूचा भी; सफ़र भी है और तन्हाई भी; हँसी भी है और आँसू भी; मुहब्बत भी है और कूच का एहसास भी।

यही इब्न-ए-इंशा का अस्ल फ़न है।

उन्होंने उर्दू अदब को सिर्फ़ नई ग़ज़लें और सफ़रनामे नहीं दिए, बल्कि देखने का एक नया अंदाज़ दिया—ऐसा अंदाज़ जिसमें दुनिया की तमाम संजीदगियों के बीच मुस्कुराने की गुंजाइश बाक़ी रहती है।

और शायद यही वजह है कि इब्न-ए-इंशा की आवाज़ उनके इंतिक़ाल के दशकों बाद भी ख़ामोश नहीं हुई।

वह आज भी अपनी ग़ज़लों, सफ़रनामों और मिज़ाहिया तहरीरों के ज़रिए क़ारी से मुख़ातिब हैं—और हर बार ऐसा महसूस होता है जैसे कोई पुराना मुसाफ़िर अभी-अभी किसी दूर शहर से लौटकर आया हो और अपने साथ दुनिया की कुछ उदास, कुछ दिलकश और कुछ बेहद मज़ाहिया कहानियाँ ले आया हो।

इब्न-ए-इंशा की अहम तसानीफ़

मजमूआ-ए-शायरी:

  • चाँद नगर

  • दिल-ए-वहशी

  • इस बस्ती के इक कूचे में

  • बिल्लो का बस्ता

सफ़रनामे:

  • आवारा गर्द की डायरी

  • दुनिया गोल है

  • इब्न बतूता के तआक़ुब में

  • चलते हो तो चीन को चलिए

  • नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर

मिज़ाहिया अदब:

  • उर्दू की आख़िरी किताब

  • ख़ुमार-ए-गंदुम

  • आप से क्या पर्दा

  • बातें इंशा जी की

  • दख़्ल दर मअक़ूलात

ख़तों का मजमूआ:

  • ख़त इंशा जी के

तर्जुमे:

  • चीनी नज़्में

  • सहर होने तक

  • कारनामे नवाब तीस मार ख़ाँ के

  • लाखों का शहर

  • अंधा कुआँ

इन तसानीफ़ का मजमूई मुताला यह साफ़ करता है कि इब्न-ए-इंशा की अदबी शख़्सियत किसी एक ख़ाने में रखी ही नहीं जा सकती। वह उर्दू अदब के शायर भी हैं, मुसाफ़िर भी, मिज़ाह-निगार भी और ज़िंदगी के बारीक नुक्तों को पहचानने वाले एक गहरे फ़नकार भी।

इब्न-ए-इंशा का सबसे बड़ा कमाल शायद यही है कि उन्होंने ज़िंदगी की उदासी को भी मुस्कुराकर बयान किया—और मुस्कुराहट के पीछे छुपी उदासी को भी क़ारी तक पहुँचा दिया।

इब्न ए इंशा की शायरी ,ग़ज़लें ,नज़्मे Iconic Poetry 


ग़ज़ल -1 

शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती
या हमीं को ख़बर नहीं होती

हम ने सब दुख जहाँ के देखे हैं
बेकली इस क़दर नहीं होती

नाला यूँ ना-रसा नहीं रहता
आह यूँ बे-असर नहीं होती

चाँद है कहकशाँ है तारे हैं
कोई शय नामा-बर नहीं होती

एक जाँ-सोज़ ओ ना-मुराद ख़लिश
इस तरफ़ है उधर नहीं होती

दोस्तो इश्क़ है ख़ता लेकिन
क्या ख़ता दरगुज़र नहीं होती

रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती

बे-क़रारी सही नहीं जाती
ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती

एक दिन देखने को आ जाते
ये हवस उम्र भर नहीं होती

हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता
हर किसी की नज़र नहीं होती

दिल पियाला नहीं गदाई का
आशिक़ी दर-ब-दर नहीं होती

ग़ज़ल -2

राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा
जी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा

शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी से
वीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा

हाँ यही शख़्स गुदाज़ और नाज़ुक होंटों पर मुस्कान लिए
ऐ दिल अपने हाथ लगाते पत्थर का बन जाएगा

दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की
वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा

तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमाम
चाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा

ग़ज़ल -3

जल्वा-नुमाई बे-परवाई हाँ यही रीत जहाँ की है
कब कोई लड़की मन का दरीचा खोल के बाहर झाँकी है

आज मगर इक नार को देखा जाने ये नार कहाँ की है
मिस्र की मूरत चीन की गुड़िया देवी हिन्दोस्ताँ की है

मुख पर रूप से धूप का आलम बाल अँधेरी शब की मिसाल
आँख नशीली बात रसीली चाल बला की बाँकी है

'इंशा'-जी उसे रोक के पूछें तुम को तो मुफ़्त मिला है हुस्न
किस लिए फिर बाज़ार-ए-वफ़ा में तुम ने ये जिंस गिराँ की है

एक ज़रा सा गोशा दे दो अपने पास जहाँ से दूर
इस बस्ती में हम लोगों को हाजत एक मकाँ की है

अहल-ए-ख़िरद तादीब की ख़ातिर पाथर ले ले आ पहुँचे
जब कभी हम ने शहर-ए-ग़ज़ल में दिल की बात बयाँ की है

ग़ज़ल -4

देख हमारी दीद के कारन कैसा क़ाबिल-ए-दीद हुआ
एक सितारा बैठे बैठे ताबिश में ख़ुर्शीद हुआ

आज तो जानी रस्ता तकते शाम का चाँद पदीद हुआ
तू ने तो इंकार किया था दिल कब ना-उम्मीद हुआ

आन के इस बीमार को देखे तुझ को भी तौफ़ीक़ हुई
लब पर उस के नाम था तेरा जब भी दर्द शदीद हुआ

हाँ उस ने झलकी दिखलाई एक ही पल को दरीचे में
जानो इक बिजली लहराई आलम एक शहीद हुआ

तू ने हम से कलाम भी छोड़ा अर्ज़-ए-वफ़ा के सुनते ही
पहले कौन क़रीब था हम से अब तो और बईद हुआ

दुनिया के सब कारज छोड़े नाम पे तेरे 'इंशा' ने
और उसे क्या थोड़े ग़म थे तेरा इश्क़ मज़ीद हुआ

नज़्म -1 

ये कौन आया

इंशा जी ये कौन आया किस देस का बासी है
होंटों पे तबस्सुम है आँखों में उदासी है

ख़्वाबों के गुलिस्ताँ की ख़ुश-बू-ए-दिल-आरा है
या सुब्ह-ए-तमन्ना के माथे का सितारा है

तरसी हुई नज़रों को अब और न तरसा रे
ऐ हुस्न के सौदागर ऐ रूप के बंजारे

रमना दिल ए इंशा का अब तेरा ठिकाना हो
अब कोई भी सूरत हो अब कोई बहाना हो

ख़ाकिस्तर-ए-दिल को है फिर शोला ब जाँ होना
हैरत का जहाँ होना हसरत का निशाँ होना

ऐ शख़्स जो तू आकर यूँ दिल में समाया है
तू दर्द कि दरमाँ है तो धूप कि साया है?

नैनाँ तिरे जादू हैं गेसू तिरे ख़ुश्बू हैं
बातें किसी जंगल में भटका हुआ आहू हैं

मक़्सूद ए वफ़ा सुन ले क्या साफ़ है सादा है
जीने की तमन्ना है मरने का इरादा है

नज़्म -2

इक बार कहो तुम मेरी हो

हम घूम चुके बस्ती बन में
इक आस की फाँस लिए मन में

कोई साजन हो कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो

जब जीवन रात अँधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों

जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो

या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यूँ गोरी का दिल मैला है

हम कब तक पीत के धोके में
तुम कब तक दूर झरोके में

कब दीद से दिल को सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का

सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए

तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

नज़्म -3

चाँद के तमन्नाई

शहर-ए-दिल की गलियों में
शाम से भटकते हैं

चाँद के तमन्नाई
बे-क़रार सौदाई

दिल-गुदाज़ तारीकी
जाँ-गुदाज़ तन्हाई

रूह-ओ-जाँ को डसती है
रूह-ओ-जाँ में बस्ती है

शहर-ए-दिल की गलियों में
ताक शब की बेलों पर

शबनमीं सरिश्कों की
बे-क़रार लोगों ने

बे-शुमार लोगों ने
यादगार छोड़ी है

इतनी बात थोड़ी है
सद-हज़ार बातें थीं

हीला-ए-शकेबाई
सूरतों की ज़ेबाई

कामतों की रा'नाई
उन सियाह रातों में

एक भी न याद आई
जा-ब-जा भटकते हैं

किस की राह तकते हैं
चाँद के तमन्नाई

ये नगर कभी पहले
इस क़दर न वीराँ था

कहने वाले कहते हैं
क़र्या-ए-निगाराँ था

ख़ैर अपने जीने का
ये भी एक सामाँ था

आज दिल में वीरानी
अब्र बन के घिर आई

आज दिल को क्या कहिए
बा-वफ़ा न हरजाई

फिर भी लोग दीवाने
आ गए हैं समझाने

अपनी वहशत-ए-दिल के
बुन लिए हैं अफ़्साने

ख़ुश-ख़याल दुनिया ने
गर्मियाँ तो जाती हैं

वो रुतें भी आती हैं
जब मलूल रातों में

दोस्तों की बातों में
जी न चैन पाएगा

और ऊब जाएगा
आहटों से गूँजेगी

शहर-ए-दिल की पिन्हाई
और चाँद-रातों में

चाँदनी के शैदाई
हर बहाने निकलेंगे

आरज़ू की गीराई
ढूँडने को रुस्वाई

सर्द सर्द रातों को
ज़र्द चाँद बख़्शेगा

बे-हिसाब तन्हाई
बे-हिजाब तन्हाई

शहर-ए-दिल की गलियों में

Iconic Poetry


वहशत-ए-दिल के ख़रीदार भी नापैद हुए
कौन अब इश्क़ के बाज़ार में खोलेगा दुकाँ


ऐ क़ैस-ए-जुनूँ-पेशा इंशा को कभी देखा
वहशी हो तो ऐसा हो रुस्वा हो तो ऐसा हो

 

तब्सरा :-

इब्न-ए-इंशा उर्दू अदब की उन यगाना शख़्सियतों में से हैं जिनके यहाँ शायर, मज़ाहनिगार, सफ़रनामा-निगार, क़लमनवीस और मुतर्जिम अलग-अलग शख़्सियतों की सूरत में दिखाई नहीं देते, बल्कि एक ही हस्सास, ज़हीन और ज़ेरे-नज़र फ़नकार के मुख़्तलिफ़ पहलू बनकर सामने आते हैं। उनका अस्ल नाम शेर मुहम्मद ख़ाँ था और 15 जून 1927 को फ़िल्लौर, ज़िला जालंधर के एक ऐसे माहौल में पैदा हुए जहाँ पंजाब की लोक-रिवायत, देहाती ज़बान, हिंदुस्तानी तहज़ीबी रंग और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की सादगी उनके फ़ितरी ज़ेहन का हिस्सा बनी। आगे चलकर यही ज़मीनी तजरबा उनकी ज़बान की सबसे बड़ी क़ुव्वत बना। रेख़्ता के मुताबिक़ उनके उस्तादों में हबीबुल्लाह ग़ज़नफ़र अमरोहवी, डॉ. ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ और डॉ. अब्दुल क़य्यूम जैसे अहल-ए-इल्म शामिल थे और उनकी तालीमी ज़िंदगी पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.ए. और कराची यूनिवर्सिटी से एम.ए. तक पहुँची।

इब्न-ए-इंशा की अदबी अहमियत का पहला बुनियादी सबब उनकी ज़बान है। उन्होंने उर्दू को महज़ किताबों, दफ़्तरों और शाइराना इस्तिलाहात की ज़बान बनाकर नहीं रखा, बल्कि उसे गलियों, बाज़ारों, मुसाफ़िरों, आम आदमियों, बच्चों, दोस्तों और रोज़मर्रा की बातचीत की ज़बान से दोबारा जोड़ा। उनकी शायरी में अमीर ख़ुसरो की याद दिलाने वाली हिंदुस्तानी ज़बान की वह मिठास मिलती है जिसमें फ़ारसी-आरबी लफ़्ज़ों के साथ लोक-लहजे और ज़मीनी बोलचाल की रवानी भी शामिल है। यही वजह है कि उनकी शायरी में एक तरफ़ क्लासिकी ग़ज़ल की रवायत दिखाई देती है तो दूसरी तरफ़ ऐसी बे-तकल्लुफ़ ज़बान सुनाई देती है जो सीधे दिल और ज़ेहन से मुख़ातिब होती है। उनकी यही लिसानी रविश बाद की नस्लों के लिए असरअंगेज़ साबित हुई।

इब्न-ए-इंशा को सिर्फ़ एक दिलनशीन शायर कहना उनकी फ़नकारी को महदूद करना होगा। उनकी अस्ल ताक़त यह थी कि वह एक ही वक़्त में मुस्कुराने और उदास होने की कैफ़ियत पैदा कर सकते थे। उनकी शायरी में हँसी के पीछे छुपा हुआ दर्द, सफ़र के पीछे छुपी हुई तन्हाई, मुहब्बत के पीछे छुपी हुई ना-रसाई और रोज़मर्रा की मामूली बातों के पीछे छुपा हुआ इंसानी फ़लसफ़ा बार-बार उभरता है। यही वह नुक्ता है जहाँ इब्न-ए-इंशा का मज़ाह सिर्फ़ मज़ाह नहीं रहता और उनकी उदासी सिर्फ़ उदासी नहीं रहती; दोनों मिलकर एक ऐसी अदबी कैफ़ियत पैदा करते हैं जिसमें क़ारी मुस्कुराते हुए भी अपने अंदर की किसी ख़ला से रूबरू होता है।

उनकी मशहूर ग़ज़ल “कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तिरा / कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तिरा” उनकी शायराना फ़ितरत का ख़ूबसूरत नमूना है। इस शेर में मुहब्बत का बयान किसी पेचीदा इस्तिआरे या भारी-भरकम अल्फ़ाज़ के ज़रिये नहीं बल्कि एक ऐसी सादगी से होता है जिसमें पुरानी ग़ज़ल की रवायत भी है और इब्न-ए-इंशा की अपनी आवाज़ भी। इसी तरह “इंशा जी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या” में रुख़्सत, बेदिली, आवारगी और ज़िंदगी की ना-पाइदारी एक साथ समा जाती है। इस ग़ज़ल को अमानत अली ख़ाँ की आवाज़ ने 1974 में ऐसी मक़बूलियत दी कि इब्न-ए-इंशा की शायरी किताबों से निकलकर सामईन की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा बन गई।

लेकिन इब्न-ए-इंशा का सबसे बड़ा इम्तियाज़ शायद उनकी मज़ाहिया निस्र है। उर्दू मज़ाह की तारीख़ में उन्होंने जो आवाज़ पैदा की, वह न तो महज़ लतीफ़ागोई थी और न ही सिर्फ़ समाजी ख़ामियों पर फब्तियाँ कसने का हुनर। उनके यहाँ मज़ाह एक गहरी फ़िक्री रविश है। वह इंसान को उसके अपने तज़ाद, ख़ुदफ़रेबी, दिखावे, कमज़ोरियों और समाजी बे-हिसी के साथ देखते हैं और फिर उसे इतनी मासूमियत से बयान करते हैं कि तनक़ीद भी होती है और मुस्कुराहट भी पैदा होती है। फ़्लिंडर्स यूनिवर्सिटी में प्रकाशित एक अदबी मुताला भी उनकी ख़ास ख़ुसूसियत को इसी अम्र में देखता है कि वह संजीदा समाजी और सियासी मौज़ूआत को भी अपने ख़ास मज़ाहिया अंदाज़ में बरतने की सलाहियत रखते थे।

“उर्दू की आख़िरी किताब” उनकी इसी फ़नकारी का एक नुमायाँ शाहकार है। यह किताब महज़ मज़ाहिया तहरीरों का मजमूआ नहीं बल्कि समाज, तालीम, तारीख़, सियासत और इंसानी रवैयों को उलटकर देखने की एक फ़िक्री कोशिश है। इब्न-ए-इंशा यहाँ पाठक को सिर्फ़ हँसाते नहीं; वह उसे यह एहसास भी दिलाते हैं कि जिन चीज़ों को हम मामूल समझकर क़बूल कर लेते हैं, उनमें कितनी अजीब और कभी-कभी ख़तरनाक ख़ुदफ़रेबियाँ छुपी हुई हैं। इसी वजह से उनका मज़ाह वक़्ती नहीं लगता। उसमें अपने दौर की तस्वीर भी है और इंसानी फ़ितरत की वह पहचान भी जो दौर बदलने के बावजूद पुरानी नहीं पड़ती।

उनकी सफ़रनामानिगारी उर्दू निस्र की तारीख़ में एक अलग मक़ाम रखती है। रऊफ़ पारिख़ के तनक़ीदी मुताले के मुताबिक़ इब्न-ए-इंशा ने उर्दू सफ़रनामे में मज़ाह को एक ख़ास और असरदार अंदाज़ में बरता और सफ़रनामे को महज़ तारीख़ी मालूमात या मक़ामात की रिपोर्ट बनने से निकालकर मुसाफ़िर की ज़ाती कैफ़ियत, मशाहिदे और ज़ेहनी प्रतिक्रिया से जोड़ा। यह उनकी बड़ी फ़नकारी थी कि वह किसी मुल्क को सिर्फ़ नक़्शे पर मौजूद एक जगह के तौर पर नहीं देखते थे; वह वहाँ के इंसान, बाज़ार, होटल, सड़क, भाषा, रस्म, खाना, रवैया और अपने साथ पेश आने वाले छोटे-छोटे वाक़ियात को अदबी तजरबे में तब्दील कर देते थे।

“चलते हो तो चीन को चलिए”, “दुनिया गोल है”, “इब्न-ए-बतूता के तआक़ुब में”, “आवारागर्द की डायरी” और “नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर” इसी फ़न के अलग-अलग नमूने हैं। रेख़्ता के रिकॉर्ड के मुताबिक़ “दुनिया गोल है” में फ़िलिपींस, इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया, बैंकॉक, हांगकांग, अफ़ग़ानिस्तान, तुर्की, जापान, कोरिया, पेरिस और अमेरिका के मुख़्तलिफ़ हिस्सों के सफ़र का बयान मिलता है। मगर इन सफ़रनामों की अहमियत सिर्फ़ इस बात में नहीं कि इब्न-ए-इंशा ने कितने मुल्क देखे; अस्ल अहमियत इस बात में है कि उन्होंने देखे हुए आलम को किस नज़र से देखा।

उनकी निगाह में सफ़र बाहरी दुनिया की सैर के साथ-साथ अंदरूनी दुनिया का भी सफ़र है। वह दूसरे मुल्कों को देखते हुए बार-बार अपने समाज, अपनी तहज़ीब और अपने मुल्क की तरफ़ पलटते हैं। इसी वजह से उनके सफ़रनामे में दूसरे समाज का बयान दरअसल अपने समाज का आईना भी बन जाता है। कभी वह किसी मामूली सहूलत को देखकर अपने यहाँ की महरूमी पर मुस्कुराते हैं, कभी किसी समाजी रवैये को देखकर अपने माहौल की ख़ामी महसूस करते हैं और कभी किसी अजनबी शहर में ऐसी चीज़ खोज लेते हैं जो अपने वतन की याद को और गहरा कर देती है। इस तरह उनका सफ़रनामा बाहरी भूगोल से ज़्यादा इंसानी ज़ेहन का भूगोल बन जाता है।

इब्न-ए-इंशा की फ़नकारी का एक और अहम पहलू उनका मुताला और तर्जुमा है। उन्होंने चीनी अशआर के मजमूए को उर्दू में मुन्तक़िल किया और चेख़व, ओ. हेनरी, एडगर एलन पो और जर्मन अदब से भी तर्जुमे किए। यह पहलू साबित करता है कि उनकी अदबी दुनिया सिर्फ़ उर्दू की रवायत तक महदूद नहीं थी। वह बाहरी दुनिया के अदब से वाक़िफ़ थे और उसे उर्दू क़ारी के लिए क़ाबिल-ए-फ़हम बनाना जानते थे। मगर तर्जुमा करते हुए भी उनकी अपनी ज़बान की शिनाख़्त बाक़ी रहती थी।

उनकी शख़्सियत में प्रगतिशील फ़िक्री रुझान भी अहम था। वह प्रगतिशील मुसन्निफ़ीन की तहरीक से वाबस्ता रहे और उनकी तहरीर में समाजी ना-बराबरी, इंसानी बे-चारगी, सियासी तज़ाद और सामूहिक ख़ुदफ़रेबी के ख़िलाफ़ एक बे-आवाज़ मगर गहरी तनक़ीद मिलती है। लेकिन उनकी ख़ासियत यह है कि उन्होंने नारे को अदब का मुतबादिल नहीं बनने दिया। वह फ़िक्र को फ़न के अंदर समोते हैं। उनकी तहरीर में अगर कोई समाजी या सियासी नुक्ता आता भी है तो वह अक्सर किसी वाक़िए, किसी मज़ाहिया कैफ़ियत या किसी मामूली इंसानी हरकत के रास्ते आता है। यही वजह है कि उनकी तहरीर में विचारधारा मौजूद होते हुए भी अदब पर हावी नहीं होती।

इब्न-ए-इंशा की शख़्सियत का सबसे दिलचस्प पहलू शायद यही तज़ाद है कि वह बाहर से बेहद बे-फ़िक्र, ख़ुश-मिज़ाज और शोख़ नज़र आते हैं लेकिन उनकी शायरी और निस्र के अंदर एक गहरी तन्हाई, बे-क़रारी और रुख़्सत का एहसास लगातार मौजूद रहता है। “इंशा जी उठो अब कूच करो” जैसी पुकार को सिर्फ़ एक मुसाफ़िर की रुख़्सती समझना उनकी शायरी की गहराई को कम करना होगा। इसमें शहर से बे-ताल्लुक़ी भी है, ज़िंदगी की ना-पाइदारी भी, मुहब्बत की शिकस्त भी और अपने ही वजूद से एक अजीब बे-नियाज़ी भी। इब्न-ए-इंशा के यहाँ “कूच” महज़ जगह बदलना नहीं; कई बार यह ज़िंदगी की उस मंज़िल की तरफ़ इशारा मालूम होता है जहाँ इंसान को आख़िरकार हर ठिकाने से रवाना होना है।

उनकी शायरी की मक़बूलियत का एक सबब यह भी है कि उन्होंने जज़्बात को मुश्किल नहीं बनाया। वह मुहब्बत, जुदाई, इंतज़ार, तन्हाई और रुख़्सत जैसे पुराने मौज़ूआत को ऐसी ज़बान देते हैं जो नई भी लगती है और अपनी भी। “कल चौदहवीं की रात थी” जैसी ग़ज़ल का असर इसी सादगी में है। उसमें क्लासिकी ग़ज़ल का हुस्न है मगर बयान में वह बे-तकल्लुफ़ी है जो इब्न-ए-इंशा को उनके हम-अस्रों से अलग करती है। बाद में जगजीत सिंह और ग़ुलाम अली जैसे फ़नकारों की आवाज़ों से उनकी शायरी की मक़बूलियत ने सरहदों को भी पार किया।

उनकी निस्र के बारे में सबसे अहम बात यह है कि उसमें “आवाज़” मौजूद है। बहुत से मुसन्निफ़ अच्छे वाक़िए लिखते हैं, बहुत से मज़ाहनिगार अच्छे लतीफ़े बयान करते हैं और बहुत से सफ़रनामा-निगार अच्छे मंज़र खींचते हैं; मगर इब्न-ए-इंशा का इम्तियाज़ यह है कि उनकी तहरीर पढ़ते हुए क़ारी को एक ख़ास शख़्स बोलता हुआ महसूस होता है। यही किसी बड़े अदीब की निशानी है। उनका लहजा नक़्ल नहीं किया जा सकता। इसी नुक्ते की तरफ़ उर्दू मज़ाह पर लिखने वाली तनक़ीदी सामग्री भी इशारा करती है कि उनकी सादगी, शगुफ़्तगी और बे-साख़्तगी का अंदाज़ अपनी मिसाल आप था।

इब्न-ए-इंशा की फ़नकारी को अगर एक जुमले में समेटना हो तो कहा जा सकता है कि उन्होंने “मुस्कुराहट को फ़िक्र” और “उदासी को शायरी” बना दिया। उनकी हँसी में समाज की तनक़ीद है, उनकी आवारगी में तलाश है, उनके सफ़र में तन्हाई है, उनकी मुहब्बत में शिकस्त की हल्की-सी आँच है और उनकी ज़बान में हिंदुस्तानी तहज़ीब की वह साझी मिठास है जो उर्दू को सिर्फ़ एक रस्मी अदबी ज़बान नहीं रहने देती बल्कि उसे इंसानी तजरबे की ज़बान बना देती है।

इसीलिए इब्न-ए-इंशा को सिर्फ़ पाकिस्तान के एक मक़बूल शायर या मज़ाहनिगार के तौर पर याद करना उनके अदबी क़द के साथ नाइंसाफ़ी होगी। वह उर्दू अदब की उस रवायत के अहम वारिस हैं जिसमें अमीर ख़ुसरो की ज़मीनी ज़बान, ग़ज़ल की क्लासिकी रिवायत, प्रगतिशील फ़िक्र, पंजाब की लोक-रूह, मुसाफ़िर की बे-क़रारी और आधुनिक इंसान की तन्हाई एक दूसरे से हम-आहंग होती दिखाई देती है। उनकी किताबें यह साबित करती हैं कि बड़ा मज़ाह सतही नहीं होता, बड़ा सफ़रनामा महज़ जगहों का बयान नहीं होता और बड़ी शायरी महज़ अल्फ़ाज़ की सजावट नहीं होती—इन तीनों के पीछे एक ऐसी ज़िंदा निगाह ज़रूरी होती है जो दुनिया को दूसरों से कुछ अलग ढंग से देख सके।

इब्न-ए-इंशा के विसाल ने 11 जनवरी 1978 को महज़ पचास बरस की उम्र में एक ऐसी आवाज़ को ख़ामोश कर दिया जो अभी और बहुत कुछ कह सकती थी। लंदन में उनका इंतिक़ाल हुआ और उनकी तदफ़ीन कराची में हुई। उन्हें इसी साल प्रेसिडेंट ऑफ़ पाकिस्तान की तरफ़ से प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस से नवाज़ा गया। मगर किसी फ़नकार की अस्ल तक़दीर सरकारी ऐज़ाज़ नहीं बल्कि उसकी तहरीर की ज़िंदगी होती है। इस लिहाज़ से इब्न-ए-इंशा आज भी ज़िंदा हैं—किसी पुरानी किताब के सफ़हे पर नहीं, बल्कि उस हर क़ारी की मुस्कुराहट में जो उनकी निस्र पढ़ते हुए अचानक अपने समाज को पहचान लेता है, उस हर मुसाफ़िर की तन्हाई में जो उनके साथ किसी अनजान शहर की सड़क पर चल पड़ता है और उस हर दिल में जो “कल चौदहवीं की रात थी” पढ़कर यह तय नहीं कर पाता कि उसने चाँद देखा है या किसी चेहरे की याद।

यही इब्न-ए-इंशा का अस्ल अदबी कमाल है: उन्होंने उर्दू को सिर्फ़ लिखा नहीं, उसे जिया; उन्होंने मज़ाह को सिर्फ़ हँसाया नहीं, उसे सोचने का ज़रिया बनाया; उन्होंने सफ़र को सिर्फ़ तय नहीं किया, उसे निस्र में ढाला; और उन्होंने मुहब्बत को सिर्फ़ बयान नहीं किया, उसे ऐसी सादगी दी कि वह नस्ल-दर-नस्ल क़ारी के दिल में उतरती चली गई। उर्दू अदब की तारीख़ में उनका नाम इसी लिए एक ऐसे फ़नकार के तौर पर बाक़ी रहेगा जिसकी आवाज़ को पहचाना जा सकता है, जिसकी ज़बान की नक़्ल नहीं की जा सकती और जिसकी हँसी के पीछे छुपी उदासी को जितना पढ़ा जाए, उतनी ही नई परत खुलती चली जाती है।ये भी पढ़ें 

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