Josh Malihabadi Poet: शायर-ए-इंक़लाब,जोश मलीहाबादी की शायरी का फ़लसफ़ा और सामाजिक प्रभाव

जोश मलीहाबादी (जन्म: शब्बीर हसन ख़ान; 5 दिसम्बर 1898 – 22 फ़रवरी 1982) को अदब की दुनिया में "शायर-ए-इंक़लाब" के नाम से याद किया जाता है। वह एक नामवर पाकिस्तानी शायर थे, जिन्होंने अपनी आज़ाद ख़याली, बेबाक फ़िक्र, और जाबिर निज़ामात को ललकारने वाली शायरी के ज़रिए बेमिसाल शोहरत हासिल की। उनकी तहरीरों में बग़ावत की चमक भी है और रूहानी हरारत भी—जोश का कलाम हमेशा से हक़, हिम्मत और हुर्रियत की पुकार माना जाता रहा है।

जोश मलीहाबादी का जीवन-परिचय

जोश ने अपने तूलानी अदबी सफ़र में एक लाख से ज़्यादा अशआर और हज़ार से ज़्यादा रुबाइयाँ तख़लीक़ कीं—जो उनके फ़िक्र की बुलंदी और जज़्बात की शिद्दत का ज़inda सुबूत हैं। उनकी आत्मकथा "यादों की बारात" अपनी सच्ची, साफ़गोई से भरी और बिला झिझक बयान की गई रवानी के लिए आज भी एक लाजवाब दस्तावेज़ मानी जाती है।

भारत के पहले वज़ीरे-आज़म जवाहरलाल नेहरू जोश के कलाम के बेहद क़द्रदान थे और अक्सर लाला किशनलाल कालरा के यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस में होने वाली महफ़िलों व मुशायरों में उन्हें सुनने तशरीफ़ लाते थे।
जोश की कुछ रचनाओं का अंग्रेज़ी में भी तर्जुमा हुआ, जिनमें "The Unity of Mankind" काफ़ी मशहूर है, जिसे सैयद अकबर पाशा तिरमिज़ी ने निहायत ख़ूबसूरती से अनुवाद किया था।

इब्तेदाई ज़िंदगी (प्रारंभिक जीवन)

जोश मलीहाबादी का पैदाइशी ताल्लुक़ एक ख़ालिस उर्दू-गो मुस्लिम ख़ानदान से था, जिसका नस्ली रिश्ता अफ़रीदी पठानों से जा मिलता था। उनकी पैदाइश मलीहाबाद में हुई—जो लखनऊ से तक़रीबन 13 मील के फ़ासले पर, उस वक़्त के मुत्तहिदा सुबों (ब्रिटिश हिन्दुस्तान) में वाक़े था।
जोश ने इल्म की बुनियादी सीढ़ियाँ अपने घर ही में तय कीं, जहाँ उन्होंने अरबी, फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी की तालीम हासिल की। बाद-अज़ां, उन्होंने सेंट पीटर्स कॉलेज (आगरा) से सन 1914 में सीनियर कैम्ब्रिज का इम्तिहान कामयाबी से पास किया।

इसके बाद उन्होंने अरबी और फ़ारसी की आला तालीम की तरफ़ रुख़ किया और सन 1918 में शांतिनिकेतन में टैगोर के विश्वविद्यालय में तक़रीबन छह महीने बिताए। लेकिन 1916 में अपने वालिद बशीर अहमद ख़ान के इंतिक़ाल ने उनके तालीमी सफ़र को मुनक़ते कर दिया और वे कॉलेज की पढ़ाई मुकम्मल न कर सके।

जोश का ख़ानदान अदबी विरासत का गहवारा रहा है—एक ऐसी दराज़-नफ़्स सिलसिले की अमानत, जिसमें बड़े-बड़े फ़नकार पैदा हुए। उनके परदादा नवाब फ़क़ीर मुहम्मद ख़ान ‘गोया’, दादा नवाब मुहम्मद अहमद ख़ान, चाचा अमीर अहमद ख़ान, और वालिद बशीर अहमद ख़ान—सब के सब आला दर्जे के शायर थे। उनकी तसानीफ़ में शायरी के मजमुए, तर्जुमे और मुक़ालात बराबर पाये जाते हैं।
इसी ख़ानदानी सिलसिले में एक और रोशन नाम अब्दुर रज़्ज़ाक़ मलीहाबादी का भी है—जो एक मुमताज़ सहाफी, आलिम और अबुल कलाम आज़ाद के क़रीबी रफ़ीक़ के तौर पर जाने जाते हैं।

करियर

सन 1925 में जोश मलीहाबादी ने हैदराबाद की रियासत में वाक़े उस्मानिया यूनिवर्सिटी में तर्जुमे (अनुवाद) के काम की निगरानी शुरू की। लेकिन जल्द ही उनकी एक तेज़-तर्रार नज़्म, जो निज़ाम-ए-हैदराबाद पर सख़्त तनक़ीद करती थी, उनके लिए मुसीबत बनी और उन्हें यूनिवर्सिटी से बाहर कर दिया गया।
इस बेदख़ली के फ़ौरन बाद उन्होंने "कलीम" नाम से एक अदबी और तहरीरी रसाला जारी किया—जिसमें उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ और हिन्दुस्तान की आज़ादी के हक़ में बेबाक और जाँ-गुदाज़ मज़ामीन लिखे।

उनकी शहरा-आफ़्ता नज़्म "हुसैन और इंक़लाब" ने उन्हें शायर-ए-इंक़लाब का बुलंद-ओ -बाला ख़िताब दिलाया। इसके बाद जोश ने आज़ादी की जद्दोजहद में और भी गहरी शिरकत की और उस दौर के नामवर सियासी रहनुमाओं—ख़ास तौर पर जवाहरलाल नेहरू—के क़रीब आते चले गए।

1947 में ब्रिटिश राज के ख़ात्मे के बाद, जोश को "आज-कल" जैसे मो’तबर अदबी जरीदे का संपादक मुकर्रर किया गया, जहाँ उन्होंने अपने इंक़लाबी ज़हन और फ़िक्र को और भी निखारा।

जोश मलीहाबादी का हिजरत का फ़ैसला

सन 1956 में जोश मलीहाबादी ने पाकिस्तान हिजरत करने का अहम और नाज़ुक फ़ैसला किया—हालाँकि जवाहरलाल नेहरू ने उनसे इस क़दम से गुरेज़ करने की गुज़ारिश की थी। कहा जाता है कि यह फ़ैसला उन्होंने अपनी ज़ात और उर्दू ज़बान के मुस्तक़बिल से मुतअल्लिक गहरी बेचैनी के तहत किया; उन्हें ख़दशा था कि हिन्दुस्तान की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के दबाव में हिंदी को फ़रोग़ मिलेगा और उर्दू के दामन पर ख़तरा मंडराएगा।

पाकिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने कराची को अपना मिस्कन (ठिकाना) बनाया और वहाँ अंजुमन-ए-तरक़्क़ी-ए-उर्दू के लिए अपनी ख़िदमतें अर्पित कीं—जहाँ उन्होंने उर्दू के इशाअत, इर्तक़ा और तहफ़्फ़ुज़ के लिए बेहद सरगर्म और पुरअसर ढंग से काम किया।

जोश मलीहाबादी का इंतिक़ाल और उनकी अदबी विरासत

22 फ़रवरी 1982 को इस्लामाबाद में जोश मलीहाबादी इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए। लेकिन उनकी रवानगी के बाद भी उनके कलाम की गूँज, उनके अल्फ़ाज़ की हरारत और उनके फ़िक्र की चमक पहले की तरह ज़िंदा रही। उनके करीबी अहबाब और क़द्रदान—जैसे मुस्तफ़ा ज़ैदी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, और सैय्यद फ़ख़रुद्दीन बले—हमेशा जोश के फ़न और शख़्सियत के मुरीद रहे।

जोश की शायरी से लोगों का जो मुहब्बत-आमेज़ रिश्ता था, वही उन्हें अमर बनाता रहा और हमेशा बनाए रखेगा। उनकी हमायती और मुस्तनिद तहरीरों को कई नामवर अदीबों और मुतफ़क्किरों ने क़लमबंद किया है। इनमें प्रोफ़ेसर एहतिशाम हुसैन, मुस्तफ़ा ज़ैदी, सेहबा लखनवी, अली सरदार और दीगर नाम शामिल हैं, जिन्होंने जोश के जीवन, फ़िक्र और अदबी कारनामों को बेपनाह इख़लास के साथ दर्ज किया।।ये भी पढ़ें 

जोश मलीहाबादी के एज़ाज़ात व अक़्दारे (सम्मान और पुरस्कार)

जोश मलीहाबादी को उनके फ़न, जुरअत-ए-अंदेश और बे-मिसाल अदबी ख़िदमात के एतिराफ़ में कई बुलंद ओ बाला एज़ाज़ात से नवाज़ा गया। इन एज़ाज़ात ने न सिर्फ़ उनकी शख़्सियत को रोशन किया, बल्कि उर्दू अदब की दुनिया में उनके मुक़ाम को और भी मुसब्बित (मज़बूत) कर दिया:

पद्म भूषण — हिन्दुस्तान का तीसरा सबसे बड़ा सिविलियन एवार्ड, जिससे उन्हें 1954 में सरफ़राज़ किया गया।

हिलाल-ए-इम्तियाज़ — पाकिस्तान का दूसरा आला तरीन सिविल एवार्ड, जो उन्हें 23 मार्च 2013 को अता किया गया; यह एज़ाज़ उनके फ़न की सरहदी पहचान और क़द्रदानी का सुबूत है।

जोश मलीहाबादी की प्रकाशित तसनीफ़ें

जोश मलीहाबादी की अदबी सफ़र की रोशनियां उनकी प्रकाशित तसनीफ़ों में जमी हुई हैं। इन किताबों और मज़ामीन ने न सिर्फ़ उनके फ़िक्र और शायरी की गहराई को बयाँ किया, बल्कि उर्दू अदब में उनकी अमिट छाप छोड़ी। प्रमुख प्रकाशित तसनीफ़ें इस प्रकार हैं:

  • आवाज़-ए-हक़ (1921)

  • शोला-ओ-शबनम

  • फ़िक्र-ओ-निशात (1937 और 1969)

  • आयत-ओ-नग़मात (1941)

  • अर्श-ओ-फ़र्श (1944 और 1973)

  • यादों की बारात (आत्मकथा)

जोश मलीहाबादी की प्रकाशित तसनीफ़ें

इन तसनीफ़ों में जोश का कलाम हर मोड़ पर बेबाक, जुरअत-ओ-फ़िक्र से भरा है, जो आज भी उर्दू पाठकों के दिलों में ज़िंदा और असरदार है। प्रकाशित पुस्तकें 

आवाज़-ए-हक़ (1921)

शोला-ओ-शबनम

फिक्र-ओ-निशात (1937 और 1969)

आयत-ओ-नग़मात (1941)

अर्श-ओ-फर्श (1944 और 1973)

यादों की बारात (आत्मकथा)



जोश मलीहाबादी की शायरी,ग़ज़लें ,नज़्मे,शेर 


1-ग़ज़ल 

जब से मरने की जी में ठानी है

किस क़दर हम को शादमानी है


शायरी क्यूँ न रास आए मुझे

ये मिरा फन ए ख़ानदानी है


क्यूँ लब इल्तिजा को दूँ जुम्बिश

तुम न मानोगे और न मानी है


आप हम को सिखाएँ रस्म ए वफ़ा

मेहरबानी है मेहरबानी है


दिल मिला है जिन्हें हमारा सा

तल्ख़ उन सब की ज़िंदगानी है


कोई सदमा ज़रूर पहुँचेगा

आज कुछ दिल को शादमानी है

2-ग़ज़ल 


सोज़ ए ग़म दे के मुझे उस ने ये इरशाद किया
जा तुझे कशमकश ए दहर से आज़ाद किया

वो करें भी तो किन अल्फ़ाज़ में तेरा शिकवा
जिन को तेरी निगह ए लुत्फ़ ने बर्बाद किया

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया

ऐ मैं सौ जान से इस तर्ज़ ए तकल्लुम के निसार
फिर तो फ़रमाइए क्या आप ने इरशाद किया

इस का रोना नहीं क्यूँ तुम ने किया दिल बर्बाद
इस का ग़म है कि बहुत देर में बर्बाद किया

इतना मानूस हूँ फ़ितरत से कली जब चटकी
झुक के मैं ने ये कहा मुझ से कुछ इरशाद किया

मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैं ने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया

मुझ को तो होश नहीं तुम को ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुम ने मुझे बर्बाद किया

कुछ नहीं इस के सिवा 'जोश' हरीफ़ों का कलाम
वस्ल ने शाद किया हिज्र ने नाशाद किया

3-ग़ज़ल 


बेहोशियों ने और ख़बरदार कर दिया
सोई जो अक़्ल रूह ने बेदार कर दिया

अल्लाह रे हुस्न ए दोस्त की आईना दारियाँ
अहल ए नज़र को नक़्श ब दीवार कर दिया

या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने
इंसाँ को और ग़म में गिरफ़्तार कर दिया

दिल कुछ पनप चला था तग़ाफ़ुल की रस्म से
फिर तेरे इल्तिफ़ात ने बीमार कर दिया

कल उन के आगे शरह ए तमन्ना की आरज़ू
इतनी बढ़ी कि नुत्क़ को बेकार कर दिया

मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें
मेरे ग़ुरूर ए इश्क़ ने इंकार कर दिया

ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़
आँखों को हम ने दीदा ए ख़ूँ बार कर दिया

4-ग़ज़ल 


ये बात ये तबस्सुम ये नाज़ ये निगाहें
आख़िर तुम्हीं बताओ क्यूँकर न तुम को चाहें

अब सर उठा के मैं ने शिकवों से हात उठाया
मर जाऊँगा सितमगर नीची न कर निगाहें

कुछ गुल ही से नहीं है रूह ए नुमू को रग़बत
गर्दन में ख़ार की भी डाले हुए है बाँहें

अल्लाह री दिल फ़रेबी जल्वों के बाँकपन की
महफ़िल में वो जो आए कज हो गईं कुलाहें

ये बज़्म 'जोश' किस के जल्वों की रहगुज़र है
हर ज़र्रे में हैं ग़लताँ उठती हुई निगाहें

5-नज़्म 

लोग हम से रोज़ कहते हैं ये आदत छोड़िए 

ये तिजारत है ख़िलाफ़-ए-आदमियत छोड़िए 

इस से बद-तर लत नहीं है कोई ये लत छोड़िए 

रोज़ अख़बारों में छपता है कि रिश्वत छोड़िए 

भूल कर भी जो कोई लेता है रिश्वत चोर है 

आज क़ौमी पागलों में रात दिन ये शोर है 

किस को समझाएँ उसे खोदें तो फिर पाएँगे क्या 

हम अगर रिश्वत नहीं लेंगे तो फिर खाएँगे क्या 

क़ैद भी कर दें तो हम को राह पर लाएँगे क्या 

ये जुनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छुट जाएँगे क्या 

मुल्क भर को क़ैद कर दे किस के बस की बात है 

ख़ैर से सब हैं कोई दो-चार दस की बात है 

ये हवस ये चोर बाज़ारी ये महँगाई ये भाव 

राई की क़ीमत हो जब पर्बत तो क्यूँ न आए ताव 

अपनी तनख़्वाहों के नाले में है पानी आध-पाव 

और लाखों टन की भारी अपने जीवन की है नाव 

जब तलक रिश्वत न लें हम दाल गल सकती नहीं 

नाव तनख़्वाहों के पानी में तो चल सकती नहीं 

रिश्वतों की ज़िंदगी है चोर-बाज़ारी के साथ 

चल रही है बे-ज़री अहकाम-ए-ज़रदारी के साथ 

फुर्तियाँ चूहों की हैं बिल्ली की तर्रारी के साथ 

आप रोकें ख़्वाह कितनी ही सितमगारी के साथ 

हम नहीं हिलने के सुन लीजे किसी भौंचाल से 

काम ये चलता रहेगा आप के इक़बाल से 

ये है मिल वाला वो बनिया है ये साहूकार है 

ये है दूकाँ-दार वो है वेद ये अत्तार है 

वो अगर ठग है तो ये डाकू है वो बट-मार है 

आज हर गर्दन में काली जीत का इक हार है 

हैफ़ मुल्क-ओ-क़ौम की ख़िदमत-गुज़ारी के लिए 

रह गए हैं इक हमीं ईमान-दारी के लिए 

भूक के क़ानून में ईमान-दारी जुर्म है 

और बे-ईमानियों पर शर्मसारी जुर्म है 

डाकुओं के दौर में परहेज़-गारी जुर्म है 

जब हुकूमत ख़ाम हो तो पुख़्ता-कारी जुर्म है 

लोग अटकाते हैं क्यूँ रोड़े हमारे काम में 

जिस को देखो ख़ैर से नंगा है वो हम्माम में 

तोंद वालों की तो हो आईना-दारी वाह वा 

और हम भूखों के सर पर चाँद-मारी वाह वा 

उन की ख़ातिर सुब्ह होते ही नहारी वाह वा 

और हम चाटा करें ईमान-दारी वाह वा 

सेठ जी तो ख़ूब मोटर में हवा खाते फिरें 

और हम सब जूतियाँ गलियों में चटख़ाते फिरें 

ख़ूब हक़ के आस्ताँ पर और झुके अपनी जबीं 

जाइए रहने भी दीजे नासेह-ए-गर्दूँ-नशीं 

तौबा तौबा हम भड़ी में आ के और देखें ज़मीं 

आँख के अंधे नहीं हैं गाँठ के पूरे नहीं 

हम फटक सकते नहीं परहेज़-गारी के क़रीब 

अक़्ल-मंद आते नहीं ईमान-दारी के क़रीब 

इस गिरानी में भला क्या ग़ुंचा-ए-ईमाँ खिले 

जौ के दाने सख़्त हैं ताँबे के सिक्के पिल-पिले 

जाएँ कपड़े के लिए तो दाम सुन कर दिल हिले 

जब गरेबाँ ता-ब-दामन आए तो कपड़ा मिले 

जान भी दे दे तो सस्ते दाम मिल सकता नहीं 

आदमियत का कफ़न है दोस्तों कपड़ा नहीं 

सिर्फ़ इक पतलून सिलवाना क़यामत हो गया 

वो सिलाई ली मियाँ दर्ज़ी ने नंगा कर दिया 

आप को मालूम भी है चल रही है क्या हवा 

सिर्फ़ इक टाई की क़ीमत घोंट देती है गला 

हल्की टोपी सर पे रखते हैं तो चकराता है सर 

और जूते की तरफ़ बढ़िए तो झुक जाता है सर 

थी बुज़ुर्गों की जो बनियाइन वो बनिया ले गया 

घर में जो गाढ़ी कमाई थी वो गाढ़ा ले गया 

जिस्म की एक एक बोटी गोश्त वाला ले गया 

तन में बाक़ी थी जो चर्बी घी का प्याला ले गया 

आई तब रिश्वत की चिड़िया पँख अपने खोल कर 

वर्ना मर जाते मियाँ कुत्ते की बोली बोल कर 

पत्थरों को तोड़ते हैं आदमी के उस्तुख़्वाँ 

संग-बारी हो तो बन जाती है हिम्मत साएबाँ 

पेट में लेती है लेकिन भूक जब अंगड़ाइयाँ 

और तो और अपने बच्चे को चबा जाती है माँ 

क्या बताएँ बाज़ियाँ हैं किस क़दर हारे हुए 

रिश्वतें फिर क्यूँ न लें हम भूक के मारे हुए 

आप हैं फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा-ए-पाक से कुर्सी-नशीं 

इंतिज़ाम-ए-सल्तनत है आप के ज़ेर-ए-नगीं 

आसमाँ है आप का ख़ादिम तो लौंडी है ज़मीं 

आप ख़ुद रिश्वत के ज़िम्मेदार हैं फ़िदवी नहीं 

बख़्शते हैं आप दरिया कश्तियाँ खेते हैं हम 

आप देते हैं मवाक़े' रिश्वतें लेते हैं हम 

ठीक तो करते नहीं बुनियाद-ए-ना-हमवार को 

दे रहे हैं गालियाँ गिरती हुई दीवार को 

सच बताऊँ ज़ेब ये देता नहीं सरकार को 

पालिए बीमारियों को मारिए बीमार को 

इल्लत-ए-रिश्वत को इस दुनिया से रुख़्सत कीजिए 

वर्ना रिश्वत की धड़ल्ले से इजाज़त दीजिए 

बद बहुत बद-शक्ल हैं लेकिन बदी है नाज़नीं 

जड़ को बोसे दे रहे हैं पेड़ से चीं-बर-जबीं 

आप गो पानी उलचते हैं ब-तर्ज़-ए-दिल-नशीं 

नाव का सूराख़ लेकिन बंद फ़रमाते नहीं 

कोढ़ियों पर आस्तीं कब से चढ़ाए हैं हुज़ूर 

कोढ़ को लेकिन कलेजे से लगाए हैं हुज़ूर 

दस्त-कारी के उफ़ुक़ पर अब्र बन कर छाइए 

जहल के ठंडे लहू को इल्म से गर्माइए 

कार-ख़ाने कीजिए क़ाएम मशीनें लाइए 

उन ज़मीनों को जो महव-ए-ख़्वाब हैं चौंकाइए 

ख़्वाह कुछ भी हो मुंढे ये बैल चढ़ सकती नहीं 

मुल्क में जब तक कि पैदा-वार बढ़ सकती नहीं 

दिल में जितना आए लूटें क़ौम को शाह-ओ-वज़ीर 

खींच ले ख़ंजर कोई जोड़े कोई चिल्ले में तीर 

बे-धड़क पी कर ग़रीबों का लहू अकड़ें अमीर 

देवता बन कर रहें तो ये ग़ुलामान-ए-हक़ीर 

दोस्तों की गालियाँ हर आन सहने दीजिए 

ख़ाना-ज़ादों को यूँही शैतान रहने दीजिए 

दाम इक छोटे से कूज़े के हैं सौ जाम-ए-बिलूर 

मोल लेने जाएँ इक क़तरा तो दें नहर-ओ-क़ुसूर 

इक दिया जो बेचता है माँगता है शम-ए-तूर 

इक ज़रा से संग-रेज़े की है क़ीमत कोह-ए-नूर 

जब ये आलम है तो हम रिश्वत से क्या तौबा करें 

तौबा रिश्वत कैसी हम चंदा न लें तो क्या करें 

ज़ुल्फ़ उस को-ऑपरेटिव सिलसिले की है दराज़ 

छेड़ते हैं हम कभी तो वो कभी रिश्वत का साज़ 

गाह हम बनते हैं क़ुमरी गाह वो बनते हैं बाज़ 

आप को मालूम क्या आपस का ये राज़-ओ-नियाज़ 

नाव हम अपनी खिवाते भी हैं और खेते भी हैं 

रिश्वतों के लेने वाले रिश्वतें देते भी हैं 

बादशाही तख़्त पर है आज हर शय जल्वा-गर 

फिर रहे हैं ठोकरें खाते ज़र-ओ-ला'ल-ओ-गुहर 

ख़ास चीज़ें क़ीमतें उन की तो हैं अफ़्लाक पर 

आब-ख़ोरा मुँह फुलाता है अठन्नी देख कर 

चौदा आने सेर की आवाज़ सुन कर आज-कल 

लाल हो जाता है ग़ुस्से से टमाटर आज-कल 

नस्तरन में नाज़ बाक़ी है न गुल में रंग-ओ-बू 

अब तो है सेहन-ए-चमन में ख़ार-ओ-ख़स की आबरू 

ख़ुर्दनी चीज़ों के चेहरों से टपकता है लहू 

रूपये का रंग फ़क़ है अशरफ़ी है ज़र्द-रू 

हाल के सिक्के को माज़ी का जो सिक्का देख ले 

सौ रूपे के नोट के मुँह पर दो अन्नी थूक दे 

वक़्त से पहले ही आई है क़यामत देखिए 

मुँह को ढाँपे रो रही है आदमियत देखिए 

दूर जा कर किस लिए तस्वीर-ए-इबरत देखिए 

अपने क़िबला 'जोश' साहब ही की हालत देखिए 

इतनी गम्भीरी पे भी मर-मर के जीते हैं जनाब 

सौ जतन करते हैं तो इक घूँट पीते हैं जनाब 

चुनिंदा शेर 

मुझ को तो होश नहीं तुम को ख़बर हो शायद 

लोग कहते हैं कि तुम ने मुझे बर्बाद किया 
उस ने वादा किया है आने का 

रंग देखो ग़रीब ख़ाने का 
काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब 

मेरा नारा इंक़िलाब ओ इंक़िलाब ओ इंक़िलाब 
वो करें भी तो किन अल्फ़ाज़ में तेरा शिकवा 

जिन को तेरी निगह ए लुत्फ़ ने बर्बाद किया 

निष्कर्ष

जोश मलीहाबादी की साहित्यिक यात्रा ने उर्दू साहित्य को एक नया आयाम दिया। उनके जीवन का मिशन उनके अपने शब्दों में सुमधुर और प्रेरणादायक था:

"काम है मेरा तग़य्युर, नाम है मेरा शबाब,

मेरा नारा: इंकलाब-ओ-इंकलाब-ओ-इंकलाब!"

जोश मलीहाबादी की ज़िंदगी दरअस्ल एक तेज़ आँधी की तरह थी—जिसमें अल्फ़ाज़ भी थे, बग़ावत भी थी और दिल की वह तड़प भी, जो हर क़लंदर शायर के सीने में धड़कती है। उनके यहाँ शायरी किसी महफ़िल का लुत्फ़ नहीं, बल्कि एक सदियों से चलती आ रही सच्चाई का इस्तिघासा थी। जोश ने अपने अल्फ़ाज़ से उस खामोशी को तोड़ा, जिसे बहुत से लोग रवायत का नाम देकर दबाना चाहते थे।

उनका फ़न किसी तराशे हुए नमूने की तरह नहीं, बल्कि एक जलते हुए शोलों की तरह था—बे-लगाम, बे-रोक और बे-तअल्लुक़ उस डर से जो इंकलाबी आवाज़ों को खामोश कर देता है। उन्होंने शायरी को महज़ एहसास का पर्दा नहीं बनाया, बल्कि उसे ज़मीर की आवाज़ और इंसानी इकरार की शक्ल दी। उनकी नज़्मों में जो तड़प है, वह सिर्फ़ जुबान का करिश्मा नहीं, बल्कि एक ऐसे दिल का दर्द है जो अपने वक़्त की नाइंसाफ़ियों से सुलग रहा था।

जोश की ज़िंदगी में तल्ख़ियाँ भी थीं और मोहब्बत भी, लेकिन उन्होंने दोनों को अपनी शायरी में इस क़दर घोल दिया कि उनके अशआर कभी तलवार बन गए, कभी मरहम। उनके यहाँ बयान की रवायतें टूटती भी हैं और सँवरती भी—लहजा कभी चाकू की धार जैसा तीखा, तो कभी बारिश की पहली गिरह जैसा नरम।

जोश मलीहाबादी उन लोगों में से थे जो ख़ुद भी जलते हैं और दूसरों को रौशनी भी देते हैं। उन्होंने उर्दू को सिर्फ़ जज़्बात की ज़ुबान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे बग़ावत का आईना बना दिया। उनकी शायरी में जो शोर है, वह महज़ हंगामा नहीं, बल्कि एक क़ौम की जागती हुई रूह का एहसास है।

आज भी उनकी आवाज़ में वही भभकता हुआ तेवर महसूस होता है—जैसे कोई शायर सदियों बाद भी कह रहा हो कि इंकलाब सिर्फ़ एक मुकाम नहीं, बल्कि अल्फ़ाज़ की वह सफ़रगाह है जहाँ इन्सानियत अपनी असल पहचान पाती है।

जोश को पढ़ना, दरअसल अपने वक़्त और ख़ुद अपनी रूह से एक दर्पण-संवाद जैसा है—जहाँ हर लफ्ज़ एक सवाल है और हर नज़्म एक जवाब।ये भी पढ़े 

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