ख़ानदान और इब्तिदाई पस-मंज़र
जावेद अख़्तर साहब की पैदाइश सन 1945 में ग्वालियर में एक ऐसे इल्मी, अदबी और तहज़ीबी ख़ानदान में हुई, जिसकी जड़ें उर्दू अदब, शायरी और फ़िक्र-ओ-दानिश की रौशन रवायतों से गहराई से वाबस्ता रही हैं। उन्हें विरसे में जो अदबी सरमाया हासिल हुआ, वह बर्रे-सग़ीर की तवारीख़ में अपनी मिसाल आप है।
उनके वालिद, मशहूर उर्दू शायर और फ़िल्मी गीतकार जान निसार अख़्तर थे, जिन्होंने अपनी नफ़ीस शायरी, बुलंद ख़याली और ख़ूबसूरत तख़्लीक़ी एहसास के ज़रिये उर्दू अदब और हिन्दी फ़िल्मी दुनिया में एक मुनफ़रिद मुक़ाम हासिल किया। जावेद अख़्तर साहब ने अपने वालिद की अदबी विरासत से फ़ैज़ पाकर इल्म, शऊर और तख़्लीक़ी सलाहियतों की वह दौलत पाई, जिसने आगे चलकर उन्हें अपने अहद की सबसे नुमायाँ शख़्सियतों में शामिल कर दिया।
उनके दादा मुज़्तर ख़ैराबादी उर्दू के एक मुअतबर और उस्ताद शायर थे, जिनकी शायरी अपने दौर में ख़ूब मक़बूल हुई। फ़साहत, बलाग़त और ज़बान की नफ़ासत उनके कलाम की ख़ास पहचान थी। इसी अदबी सिलसिले में उनके दादा के बड़े भाई बिस्मिल ख़ैराबादी भी उर्दू शायरी के अहम् नामों में शुमार किए जाते हैं, जिनकी तख़्लीक़ात ने उर्दू अदब को नई जहतें अता कीं।
जावेद अख़्तर साहब का नसबी रिश्ता केवल शायरी और अदब तक महदूद नहीं था, बल्कि उनके परदादा फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी बर्रे-सग़ीर के अज़ीम इस्लामी आलिम, फ़लसफ़ी और दानीशवर थे। उन्होंने सन 1857 की जंग-ए-आज़ादी में अंग्रेज़ी इस्तिमार के ख़िलाफ़ अहम किरदार अदा किया। फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध जिहाद का फ़तवा जारी करके मुल्क की आज़ादी की तहरीक को मज़हबी और फ़िक्री ताइद फ़राहम की तथा ग़ुलामी के ख़िलाफ़ अवाम को आवाज़-ए-एहतिजाज बुलंद करने का हौसला बख़्शा।
यूं जावेद अख़्तर साहब एक ऐसे ख़ानदान के फ़र्द हैं, जिसकी तारीख़ अदब, इल्म, शायरी, फ़िक्र और हुब्ब-ए-वतन की दरख़्शाँ रवायतों से मुनव्वर है। यही वजह है कि उनकी शख़्सियत और फ़न में इल्मी गहराई, अदबी वुसअत और समाजी शऊर की झलक साफ़ तौर पर महसूस की जा सकती है।
शख़्सियत, नामकरण और इब्तिदाई तालीम
जावेद अख़्तर साहब महज़ एक कामयाब गीतकार और मक़बूल शायर ही नहीं, बल्कि एक बाशऊर समाजी कारकुन और इंसानी क़द्रों के हामी भी हैं। उन्होंने अपनी फ़िक्र-अंगेज़ तहरीरों, असरदार गीतों और बेबाक ख़यालात के ज़रिये अदब, फ़िल्म और समाज—तीनों मैदानों में गहरा असर छोड़ा है।
दिलचस्प बात यह है कि उनका अस्ल नाम "जादू" था। यह नाम उनके वालिद, मशहूर शायर जान निसार अख़्तर की एक नज़्म के मिसरे "लम्हा-लम्हा किसी जादू का फ़साना होगा" से माख़ूज़ था। इस शे'री तअल्लुक़ और अदबी लुत्फ़ की बिना पर उन्हें बचपन में "जादू" पुकारा जाता था। बाद में जब रस्मी नाम रखने का वक़्त आया तो "जावेद" नाम का इंतिख़ाब किया गया, क्योंकि यह लफ़्ज़ "जादू" की लफ़्ज़ियाती और सव्ती क़ुर्बत रखता था। आगे चलकर यही नाम हिन्दुस्तानी अदब और सिनेमा की दुनिया में एक मुकम्मल पहचान बन गया।
जावेद अख़्तर साहब की परवरिश एक इल्मी और अदबी माहौल में हुई। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा लखनऊ की तहज़ीबी फ़िज़ाओं में गुज़ारा, जहाँ की गंगा-जमुनी रवायत, ज़बान की नफ़ासत और अदबी रौनक ने उनकी शख़्सियत की तश्कील में अहम किरदार अदा किया। लखनऊ की यही तहज़ीबी विरासत उनके लहजे, फ़िक्र और तख़्लीक़ी शऊर में बाद के दिनों तक झलकती रही।
उनकी इब्तिदाई तालीम भी लखनऊ में ही मुकम्मल हुई। बचपन से ही उन्हें किताबों, शायरी और इल्मी बहसों से ख़ास दिलचस्पी थी। घर के अदबी माहौल और तालीमी सरगर्मियों ने उनके ज़ेहन को वुसअत बख़्शी और उनमें मुताला, तख़य्युल और इज़हार की सलाहियतों को परवान चढ़ाया। यही वह बुनियाद थी, जिस पर आगे चलकर जावेद अख़्तर साहब ने शायरी, गीत-निगारी और फ़िक्र-ओ-फ़न की एक शानदार इमारत तामीर की।
ज़िंदगी का तआरुफ़
पूरा नाम : जावेद अख़्तर
बचपन का नाम : जादू
वालिद का नाम : जान निसार अख़्तर
तारीख़-ए-पैदाइश : 17 जनवरी 1945
जाए-पैदाइश : ग्वालियर, मध्य प्रदेश, हिन्दुस्तान
उम्र : 76 बरस
आबाई वतन : ग्वालियर, मध्य प्रदेश
मौजूदा मुक़ाम : मुंबई, हिन्दुस्तान
क़ौमियत : हिन्दुस्तानी
पेशा : गीत-निगार, स्क्रीन राइटर, शायर और अदीब
अक़ीदा : लादीनियत (नास्तिक)
ज़ौजी हैसियत : शादीशुदा
दिलचस्पियाँ : क्रिकेट के मुक़ाबले देखना और अदबी मुताला
क़द : तक़रीबन 5 फ़ीट 5 इंच
बुर्ज : बुर्ज-ए-जद्दी (मकर राशि)
तालीम : फ़नून-ए-लतीफ़ा (Arts) में सनद-ए-फ़राग़त (स्नातक)
माली हैसियत : तक़रीबन 35 मिलियन अमरीकी डॉलर के असासाजात के मालिक
जावेद अख़्तर साहब का सफ़र-ए-ज़ीस्त
मशहूर शायर, गीत-निगार और फ़िक्र-ओ-फ़न की दुनिया के दरख़्शाँ सितारे जावेद अख़्तर साहब की पैदाइश 17 जनवरी 1945 को मध्य प्रदेश के तारीख़ी शहर ग्वालियर में हुई। उन्हें एक ऐसे ख़ानदान में आँख खोलने का शरफ़ हासिल हुआ, जिसकी पहचान इल्म, अदब, शायरी और तख़्लीक़ी रवायतों से रही है। गोया अदब और शायरी उनके लिए महज़ एक फ़न नहीं, बल्कि ख़ानदानी विरसा था, जो नस्ल-दर-नस्ल उन्हें मुन्तक़िल हुआ।
उनके वालिद जान निसार अख़्तर अपने दौर के मक़बूल उर्दू शायर और हिन्दी फ़िल्मी दुनिया के नामवर गीत-निगार थे। उनकी शायरी में जज़्बात की गहराई, फ़िक्र की बुलंदी और ज़बान की नफ़ासत का ऐसा इम्तिजाज मिलता है, जिसने उन्हें उर्दू अदब में एक मुमताज़ मुक़ाम अता किया। जावेद अख़्तर साहब के चचा असरार-उल-हक़ "मजाज़" भी उर्दू शायरी के आसमान पर चमकने वाले उन सितारों में से थे, जिनके कलाम ने नौजवान नस्लों को मुद्दतों तक मुतास्सिर किया।
उनकी वालिदा सफ़िया अख़्तर एक मुअतबर अदीबा, दानिशवर और तालीमयाफ़्ता ख़ातून थीं। इल्म-ओ-अदब से उनकी गहरी वाबस्तगी ने घर के माहौल को फ़िक्र और तख़्लीक़ का मरकज़ बना रखा था। इसी तरह उनके दादा मुज़्तर ख़ैराबादी भी अपने अहद के मक़बूल शायरों में शुमार होते थे, जिनकी शायरी ने उर्दू अदब के ख़ज़ाने में गिराँक़द्र इज़ाफ़ा किया।
जावेद अख़्तर साहब के ख़ानदान में अदबी और क़ौमी ख़िदमात की रवायत भी बराबर मौजूद रही। उनके चचा अंसार हरवानी हिन्दुस्तान की जंग-ए-आज़ादी के सरगर्म रुक्न रहे और बाद में अवामी नुमाइंदे की हैसियत से संसद तक पहुँचे। इसी तरह उनकी फूफी हमीदा सलीम एक मशहूर मुसन्निफ़ा, माहिर-ए-मआशियात और मुहक़्क़िका थीं, जिनकी इल्मी और अदबी ख़िदमात को बड़े एहतराम की निगाह से देखा जाता है।
यही वजह थी कि जावेद अख़्तर साहब का तअल्लुक़ शेर-ओ-शायरी, गीत, मौसीक़ी और उर्दू अदब से महज़ इत्तिफ़ाक़ी नहीं था, बल्कि यह रिश्ता सदियों पुरानी अदबी रवायतों की तौसीअ था। बचपन ही से उनका ज़ेहन किताबों, अशआर, नग़्मों और तख़्लीक़ी सरगर्मियों की तरफ़ माइल रहा। घर के इल्मी माहौल ने उनके अंदर मुताला, तख़य्युल और इज़हार की सलाहियतों को परवान चढ़ाया।
मगर उनकी ज़िंदगी का आग़ाज़ कुछ तल्ख़ तजरबात से भी हुआ। कमसिनी ही में उनके सर से वालिदा की शफ़क़त का साया उठ गया, जिसने उनकी ज़ात पर गहरा असर छोड़ा। वालिदा के इंतिक़ाल के बाद उन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा अपने नाना-नानी के घर लखनऊ में गुज़ारा। लखनऊ की तहज़ीबी रवायतों, अदबी फ़िज़ा और ज़बान की लताफ़त ने उनकी शख़्सियत की तामीर में अहम किरदार अदा किया।
बाद-अज़ां उन्हें अपनी मौसी के पास अलीगढ़ भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने अपनी इब्तिदाई तालीम हासिल की। अलीगढ़ के इल्मी माहौल और तालीमी रवायतों ने उनके ज़ेहन को और वुसअत बख़्शी। इसी दौरान उनकी शख़्सियत में मुताला-पसंदी, फ़िक्र की गहराई और अदबी शऊर की बुनियाद मज़बूत होती चली गई।
वालिदा के इंतिक़ाल के कुछ अरसे बाद उनके वालिद जान निसार अख़्तर ने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद जावेद अख़्तर साहब भोपाल में अपने वालिद और सौतेली वालिदा के साथ रहने लगे। भोपाल उस दौर में भी इल्म, अदब और सक़ाफ़त का एक अहम मरकज़ माना जाता था। यहाँ की अदबी महफ़िलों और तहज़ीबी सरगर्मियों ने भी उनके ज़ौक़-ए-अदब को नई जहतें अता कीं।
उन्होंने अपनी आला तालीम भोपाल के मशहूर सोफ़िया कॉलेज से मुकम्मल की और स्नातक की सनद हासिल की। तालीम के इस दौर में उनका मुताला और अदबी दिलचस्पियाँ बराबर फ़रोग़ पाती रहीं। यही वह ज़माना था जब उनके अंदर का शायर, कहानी-गो और तख़्लीक़कार धीरे-धीरे अपनी पहचान बना रहा था। आगे चलकर यही नौजवान हिन्दुस्तानी सिनेमा, उर्दू शायरी और अदबी दुनिया की एक ऐसी बुलंद आवाज़ बना, जिसका असर आज भी लाखों दिलों और ज़ेहनों पर क़ायम है।
जावेद अख़्तर साहब की ज़िंदगी का बाब-ए-इज़्दिवाज
जावेद अख़्तर साहब की ज़िंदगी का इज़्दिवाजी सफ़र भी उनकी फ़र्दी और अदबी ज़िंदगी की तरह दिलचस्प वाक़िआत और अहम मोड़ों से भरपूर रहा है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में दो निकाह किए, जिनका तअल्लुक़ हिन्दुस्तानी फ़िल्म और अदबी दुनिया की नामवर शख़्सियात से रहा।
उनका पहला निकाह मशहूर फ़िल्मी मुसन्निफ़ा और स्क्रीन राइटर हनी ईरानी से सन 1972 में हुआ। दोनों की मुलाक़ात फ़िल्म "सीता और गीता" के सेट पर हुई, जहाँ पेशावराना तअल्लुक़ धीरे-धीरे क़ुर्बत और मुहब्बत में तब्दील हो गया। यह रिश्ता अपने दौर में फ़िल्मी दुनिया की चर्चित जोड़ियों में शुमार किया जाता था। दिलचस्प अम्र यह है कि जावेद अख़्तर साहब और हनी ईरानी दोनों की तारीख़-ए-पैदाइश 17 जनवरी है, जिसकी वजह से उनका यौम-ए-पैदाइश भी एक ही दिन मनाया जाता रहा।
इस इज़्दिवाज से उन्हें दो औलादें नसीब हुईं। उनके फ़र्ज़न्द फ़रहान अख़्तर हिन्दुस्तानी सिनेमा के मक़बूल अदाकार, फ़िल्मसाज़, निर्देशक, गायक और मुसन्निफ़ के तौर पर अपनी जुदागाना पहचान रखते हैं, जबकि उनकी साहिबज़ादी ज़ोया अख़्तर मुल्क की कामयाब फ़िल्म निर्देशक, प्रोड्यूसर और स्क्रीन राइटर के तौर पर शोहरत हासिल कर चुकी हैं। दोनों फ़र्ज़न्दों ने अपने वालिद की तख़्लीक़ी विरासत को नए अंदाज़ में आगे बढ़ाया है।
अगरचे यह रिश्ता कई बरसों तक बरक़रार रहा, लेकिन वक्त के साथ दोनों के रास्ते जुदा हो गए और आख़िरकार सन 1985 में उनका इज़्दिवाजी तअल्लुक़ ख़त्म हो गया। इसके बावजूद दोनों ने अपनी औलाद की परवरिश और उनकी तरक़्क़ी में अहम किरदार अदा किया।
जावेद अख़्तर साहब की ज़िंदगी में एक नया मोड़ उस वक़्त आया जब उन्होंने अपने दौर की मशहूर अदाकारा, समाजी कारकुन और फ़नकारा शबाना आज़मी से निकाह किया। शबाना आज़मी हिन्दुस्तानी सिनेमा की उन चुनिंदा अदाकाराओं में शुमार होती हैं, जिन्होंने अपनी फ़नकारी, समाजी शऊर और बेमिसाल अदाकारी से एक मुमताज़ मुक़ाम हासिल किया।
शबाना आज़मी साहिबा का तअल्लुक़ भी एक अज़ीम अदबी ख़ानदान से है। वह मशहूर इंक़िलाबी शायर कैफ़ी आज़मी की साहिबज़ादी हैं, जिनका नाम उर्दू शायरी की तारीख़ में बड़े एहतराम से लिया जाता है। इस तरह जावेद अख़्तर साहब का रिश्ता एक बार फिर ऐसे घराने से जुड़ा, जिसकी बुनियाद इल्म, अदब, शायरी और तख़्लीक़ी शऊर पर क़ायम थी।
क़ाबिल-ए-ज़िक्र बात यह भी है कि अपने इब्तिदाई दौर में जावेद अख़्तर साहब को कैफ़ी आज़मी जैसे अज़ीम शायर की क़ुर्बत हासिल रही। उन्होंने कुछ अरसे तक कैफ़ी आज़मी साहब के सहायक के तौर पर भी काम किया, जिससे उन्हें अदबी फ़िक्र, शायरी और फ़िल्मी तहरीर के मैदान में बहुत कुछ सीखने का मौक़ा मिला। आगे चलकर यही रिश्ता एक मज़बूत ख़ानदानी और इज़्दिवाजी बंधन में तब्दील हो गया।
आज जावेद अख़्तर और शबाना आज़मी की जोड़ी हिन्दुस्तान की सबसे मुअतबर, बाशऊर और अदबी-ओ-सक़ाफ़ती जोड़ियों में शुमार की जाती है, जिनकी शख़्सियतें फ़न, फ़िक्र और समाजी आगाही की एक रौशन मिसाल मानी जाती हैं।
जावेद अख़्तर साहब का इब्तिदाई अदबी सफ़र और फ़िक्र की तश्कील
जावेद अख़्तर साहब की तख़्लीक़ी शख़्सियत की तामीर में बचपन के मुताले और अदबी दिलचस्पियों ने बुनियादी किरदार अदा किया। कमउम्री ही से उन्हें किताबों से गहरी उन्सियत थी और मुताला उनके पसंदीदा मशाग़िल में शुमार होता था। यही वजह थी कि उनकी ज़ेहनी परवरिश महज़ तालीमी किताबों तक महदूद न रही, बल्कि अदब, तसव्वुर और फ़िक्र की रंगारंग दुनिया ने भी उनके शऊर को वुसअत बख़्शी।
ख़ुसूसन मशहूर उर्दू मुसन्निफ़ इब्ने सफ़ी की तहरीरों ने उनके ज़ेहन पर गहरा असर मुरत्तब किया। इब्ने सफ़ी के दिलचस्प, पुर-असरार और तजस्सुस से भरपूर नॉवेलात जावेद अख़्तर साहब के पसंदीदा मुताले में शामिल थे। उनके किरदारों की नफ़्सियाती पेचीदगियाँ, वाक़िआत की गिरहकुशाई और बयान की दिलकश रवानी ने नौजवान जावेद के तख़य्युल को नई परवाज़ अता की।
इसी तरह वह "जासूसी दुनिया", "द हाउस ऑफ़ फ़ियर" और दूसरी कई तजस्सुसी व साहसिक किताबों का भी शौक़ से मुताला किया करते थे। इन तहरीरों ने उनके अंदर कहानी-साज़ी, किरदार निगारी और वाक़िआत को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने की सलाहियत को बेदार किया। यही वह दौर था जब उनके ज़ेहन में अल्फ़ाज़ की क़ुव्वत, बयान की कशिश और तख़्लीक़ की अहमियत रासिख़ होती चली गई।
लगातार मुताले और अदबी माहौल की बदौलत उनका रुझान धीरे-धीरे शेर-ओ-शायरी, ग़ज़लगोई, गीत-निगारी और मौसीक़ी की जानिब बढ़ने लगा। उर्दू अदब की शीरीं रवायतें, शायरों का कलाम और नग़्मों की दिलनवाज़ दुनिया उन्हें अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करती रही। किताबों से हासिल होने वाला इल्मी व अदबी सरमाया उनके तख़य्युल को नई जहतें देता गया और उनके अंदर मौजूद फ़नकार को परवान चढ़ाता रहा।
यूं कहा जा सकता है कि जावेद अख़्तर साहब की तख़्लीक़ी ज़िंदगी की बुनियाद बचपन के उसी वसीअ मुताले, अदबी ज़ौक़ और इल्म-दोस्त माहौल पर क़ायम हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें हिन्दुस्तानी सिनेमा, उर्दू शायरी और गीत-निगारी की दुनिया का एक मुमताज़ और हरदिलअज़ीज़ नाम बना दिया। उनकी फ़िक्र की गहराई, अल्फ़ाज़ पर दस्तरस और तख़्लीक़ी वुसअत के पीछे यही इब्तिदाई अदबी सरमाया कारफ़रमा नज़र आता है।
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| Jawed Akhtar and His Wife Shabana Azmi |
जावेद अख़्तर साहब के एज़ाज़ात, इकरामात और अवार्ड्स
जावेद अख़्तर साहब का नाम उन चुनिंदा अदबी और फ़िल्मी शख़्सियात में शुमार किया जाता है, जिन्हें अपने फ़न, इल्मी बसीरत और तख़्लीक़ी ख़िदमात के सिलसिले में मुल्की और बैनुल-अक़्वामी सतह पर ग़ैरमामूली पज़ीराई हासिल हुई। उनकी शायरी, गीत-निगारी, पटकथा-निगारी और समाजी शऊर ने उन्हें न सिर्फ़ अवाम के दिलों में मुक़ाम अता किया, बल्कि मुल्क के आला तरीन एज़ाज़ात से भी नवाज़ा गया।
सन 1999 में हुकूमत-ए-हिन्द की जानिब से उन्हें "पद्म श्री" से सरफ़राज़ किया गया। यह मुल्क का एक अहम सिविलियन एज़ाज़ है, जो फ़न, अदब और समाजी ख़िदमात के मैदान में ग़ैरमामूली कारनामों पर अता किया जाता है। यह इकराम उनकी बढ़ती हुई अदबी और फ़िल्मी हैसियत का खुला एतराफ़ था।
इसके बाद सन 2007 में उन्हें हिन्दुस्तान के बुलंद-पाया सिविलियन एज़ाज़ "पद्म भूषण" से नवाज़ा गया। यह एज़ाज़ उनकी तवील अदबी, सक़ाफ़ती और फ़िल्मी ख़िदमात का इज़हार-ए-तहसीन था, जिसने उनके मुक़ाम को और ज़्यादा मुस्तहकम कर दिया।
उर्दू अदब में उनकी ख़िदमात को भी ख़ूब सराहा गया। उनकी मशहूर शायरी की किताब "लावा" पर उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया, जो हिन्दुस्तान के सबसे मुअतबर अदबी एज़ाज़ात में शुमार होता है। इस अवार्ड ने यह साबित कर दिया कि जावेद अख़्तर साहब महज़ फ़िल्मी गीतकार ही नहीं, बल्कि एक संजीदा और बुलंद-पाया शायर भी हैं।
सन 2013 में जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी ने उन्हें अपनी तरफ़ से मानद डॉक्टरेट (फ़ख़्री डिग्री) अता की। यह एज़ाज़ उनके इल्मी, अदबी और तख़्लीक़ी कारनामों के एतराफ़ में पेश किया गया, जो उनकी क़द्र-ओ-मंज़िलत का एक और रोशन सुबूत है।
इंसानी हुक़ूक़, अक़्ल-पसंदी, समाजी शऊर और इंसानी क़द्रों के फ़रोग़ में उनकी ख़िदमात को मद्देनज़र रखते हुए सन 2020 में उन्हें मुअतबर "रिचर्ड डॉकिन्स अवार्ड" से भी नवाज़ा गया। यह बैनुल-अक़्वामी एज़ाज़ उन शख़्सियात को दिया जाता है, जो तर्क़्क़ी-पसंद फ़िक्र, इंसानी हुक़ूक़ और अक़्ल-ओ-दलील की हिमायत में अहम किरदार अदा करती हैं।
फ़िल्मी दुनिया में भी जावेद अख़्तर साहब की कामयाबियों का दायरा बेहद वसीअ है। उन्हें पाँच बार राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (नेशनल फ़िल्म अवार्ड) से सरफ़राज़ किया जा चुका है। यह एज़ाज़ उन्हें मुख़्तलिफ़ फ़िल्मों के लिए बेहतरीन गीत-निगारी पर हासिल हुए, जिनमें:
- साज़ (1999)
- बॉर्डर (1997)
- गॉड मदर (1998)
- रिफ्यूजी (2000)
- लगान (2001)
जैसी यादगार फ़िल्में शामिल हैं। इन फ़िल्मों के गीतों ने न सिर्फ़ अवाम में मक़बूलियत हासिल की, बल्कि अदबी और फ़न्नी हल्क़ों में भी भरपूर पज़ीराई पाई।
अगर फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स की बात की जाए तो जावेद अख़्तर साहब का रिकॉर्ड बेहद शानदार है। उन्हें चौदह बार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से नवाज़ा जा चुका है। इनमें सात अवार्ड्स बेहतरीन गीत-निगारी (Best Lyrics) और सात अवार्ड्स बेहतरीन पटकथा-निगारी (Best Screenplay) के लिए हासिल हुए। यह कारनामा उनकी हमागीर तख़्लीक़ी सलाहियतों का वाज़ेह सुबूत है।
इनके अलावा भी उन्हें बेशुमार एज़ाज़ात, इकरामात और अवार्ड्स से नवाज़ा गया है, जिनमें बेस्ट लिरिसिस्ट ऑफ़ द ईयर, लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, अदबी इकरामात और मुख़्तलिफ़ क़ौमी व बैनुल-अक़्वामी सतह के सम्मानात शामिल हैं। यह तमाम एज़ाज़ात इस हक़ीक़त की गवाही देते हैं कि जावेद अख़्तर साहब अपने अहद के उन नादिर फ़नकारों में से हैं, जिनकी तख़्लीक़ी ख़िदमात ने अदब, सिनेमा और समाज—तीनों मैदानों को यकसाँ तौर पर मालामाल किया है।
जावेद अख्तर की शायरी
ग़ज़ल -1
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है
अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है
हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ
मगर सुना है अभी वो मकान बाक़ी है
हमारी उन से जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई
मगर सुकूत सा कुछ दरमियान बाक़ी है
हमारे ज़ेहन की बस्ती में आग ऐसी लगी
कि जो था ख़ाक हुआ इक दुकान बाक़ी है
वो ज़ख़्म भर गया अर्सा हुआ मगर अब तक
ज़रा सा दर्द ज़रा सा निशान बाक़ी है
ज़रा सी बात जो फैली तो दास्तान बनी
वो बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है
अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया
हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है
ग़ज़ल -2
तुम को देखा तो ये ख़याल आया
ज़िंदगी धूप तुम घना साया
आज फिर दल ने इक तमन्ना की
आज फिर दिल को हम ने समझाया
तुम चले जाओगे तो सोचेंगे
हम ने क्या खोया हम ने क्या पाया
हम जिसे गुनगुना नहीं सकते
वक़्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया
ग़ज़ल -3
जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू
संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू
भिक्षु-दानी, प्यासा पानी, दरिया सागर, जल गागर
गुलशन ख़ुशबू, कोयल कूकू, मस्ती दारू, मैं और तू
ब़ाँबी नागिन, छाया आँगन, घुंघरू छन-छन, आशा मन
आँखें काजल, पर्बत बादल, वो ज़ुल्फ़ें और ये बाज़ू
रातें महकी, साँसें दहकी, नज़रें बहकी, रुत लहकी
सप्न सलोना, प्रेम खिलौना, फूल बिछौना, वो पहलू
तुम से दूरी, ये मजबूरी, ज़ख़्म-ए-कारी, बेदारी,
तन्हा रातें, सपने क़ातें, ख़ुद से बातें, मेरी ख़ू
नज़्म
किसी का हुक्म है सारी हवाएँ
हमेशा चलने से पहले बताएँ
कि उन की सम्त क्या है
किधर जा रही हैं
हवाओं को बताना ये भी होगा
चलेंगी अब तो क्या रफ़्तार होगी
हवाओं को ये इजाज़त नहीं है
कि आँधी की इजाज़त अब नहीं है
हमारी रेत की सब ये फ़सीलें
ये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैं
हिफ़ाज़त उन की करना है ज़रूरी
और आँधी है पुरानी इन की दुश्मन
ये सभी जनते हैं
किसी का हुक्म है दरिया की लहरें
ज़रा ये सर-कशी कम कर लें अपनी हद में ठहरें
उभरना फिर बिखरना और बिखर कर फिर उभरना
ग़लत है ये उन का हंगामा करना
ये सब है सिर्फ़ वहशत की अलामत
बग़ावत की अलामत
बग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगी
ये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगी
अगर लहरों को है दरिया में रहना
तो उन को होगा अब चुप-चाप बहना
किसी का हुक्म है
इस गुलिस्ताँ में बस इक रंग के ही फूल होंगे
कुछ अफ़सर होंगे जो ये तय करेंगे
गुलिस्ताँ किस तरह बनना है कल का
यक़ीनन फूल तो यक-रंगीं होंगे
मगर ये रंग होगा कितना गहरा कितना हल्का
ये अफ़सर तय करेंगे
किसी को ये कोई कैसे बताए
गुलिस्ताँ में कहीं भी फूल यक-रंगीं नहीं होते
कभी हो ही नहीं सकते
कि हर इक रंग में छुप कर बहुत से रंग रहते हैं
जिन्होंने बाग़-ए-यक-रंगीं बनाना चाहे थे
उन को ज़रा देखो
कि जब इक रंग में सौ रंग ज़ाहिर हो गए हैं तो
कितने परेशाँ हैं कितने तंग रहते हैं
किसी को ये कोई कैसे बताए
हवाएँ और लहरें कब किसी का हुक्म सुनती हैं
हवाएँ हाकिमों की मुट्ठियों में हथकड़ी में
क़ैद-ख़ानों में नहीं रुकतीं
ये लहरें रोकी जाती हैं
तो दरिया कितना भी हो पुर-सुकूँ बेताब होता है
और इस बेताबी का अगला क़दम सैलाब होता है
तब्सिरा:-
जावेद अख़्तर साहब की ज़िंदगी और फ़न पर मबनी यह तफ़्सीली मज़मून एक ऐसी शख़्सियत के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को सामने लाता है, जिसने उर्दू अदब, हिन्दुस्तानी सिनेमा और समाजी शऊर—तीनों मैदानों में अपनी अलग और मुस्तहकम पहचान क़ायम की। यह तहरीर महज़ वाक़िआत की तरतीब नहीं, बल्कि एक ऐसे तख़्लीक़कार के सफ़र की रूदाद है, जिसकी शख़्सियत कई तहज़ीबी, अदबी और फ़िक्री रवायतों का संगम नज़र आती है।
मज़मून की सबसे अहम ख़ूबी यह है कि इसमें जावेद अख़्तर साहब की शख़्सियत को केवल एक मक़बूल गीतकार या फ़िल्मी मुसन्निफ़ की हैसियत से नहीं देखा गया, बल्कि उन्हें उनके ख़ानदानी पस-मंज़र, अदबी विरसे, तालीमी तश्कील, ज़ाती जद्दोजहद और फ़िक्री इर्तिक़ा के तसव्वुर के साथ समझने की कोशिश की गई है। यही पहलू इस तहरीर को एक साधारण जीवनी से आगे बढ़ाकर एक अदबी मुताला बना देता है।
तन्क़ीदी एतिबार से देखा जाए तो जावेद अख़्तर साहब की ज़िंदगी इस हक़ीक़त की नुमाइंदगी करती है कि अज़ीम फ़नकार महज़ विरासत से पैदा नहीं होते, बल्कि अपने दौर के मसाइल, ज़ाती तजरबात और लगातार मुताले के ज़रिये अपनी फ़िक्री शख़्सियत तामीर करते हैं। वालिदा की जुदाई, बचपन की तन्हाइयाँ, मुख़्तलिफ़ शहरों की तहज़ीबी फ़िज़ाएँ और अदबी माहौल ने उनके अंदर एक ऐसा शऊर पैदा किया, जो बाद में उनकी शायरी, गीतों और ख़ुत्बों में साफ़ दिखाई देता है।
मज़मून यह भी वाज़ेह करता है कि जावेद अख़्तर साहब की कामयाबी का राज़ सिर्फ़ उनकी फ़न्नी सलाहियत नहीं, बल्कि उनकी ज़बान पर ग़ैरमामूली गिरफ़्त, वसीअ मुताला और बदलते हुए समाजी हक़ायक़ पर गहरी नज़र भी है। यही वजह है कि उनके गीत महज़ फ़िल्मी नग़्मे नहीं रहते, बल्कि कई बार अपने दौर की जज़्बाती और फ़िक्री तर्जुमानी बन जाते हैं।
जदीद नुक्ता-ए-नज़र से देखा जाए तो जावेद अख़्तर साहब उस नस्ल की नुमाइंदगी करते हैं जिसने रवायत और जिद्दत के दरमियान एक कामयाब पुल तामीर किया। एक तरफ़ उनके पीछे फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी, मुज़्तर ख़ैराबादी, जान निसार अख़्तर और कैफ़ी आज़मी जैसी अज़ीम अदबी रवायतें मौजूद हैं, तो दूसरी जानिब वह नए हिन्दुस्तान की फ़िल्मी, समाजी और फ़िक्री ज़रूरतों से भी पूरी तरह हम-आहंग नज़र आते हैं। यही इम्तिजाज उनकी शख़्सियत को अपने अस्र का एक अहम सांस्कृतिक दस्तावेज़ बना देता है।
मजमूई तौर पर यह मज़मून जावेद अख़्तर साहब की ज़िंदगी और फ़न का एक वसीअ, मुतवाज़िन और दिलचस्प जायज़ा पेश करता है। यह क़ारी को सिर्फ़ मालूमात फ़राहम नहीं करता, बल्कि उसे इस बात पर भी ग़ौर करने की दावत देता है कि एक फ़नकार किस तरह अपने ख़ानदानी विरसे, ज़ाती तजरबात और फ़िक्री जद्दोजहद को तख़्लीक़ में ढालकर अपने दौर की आवाज़ बन जाता है। यही वजह है कि जावेद अख़्तर साहब की शख़्सियत और उनका फ़न आज भी तवज्जोह, मुताले और तन्क़ीदी बहस का अहम मौज़ू बने हुए हैं।
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