पैदाइश, ख़ानदान
कैसर उल जाफ़री का जन्म 14 सितंबर 1928 को उत्तर प्रदेश के ज़िला इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) की तहसील चायल के मुक़द्दस और तहज़ीबी गाँव नज़रगंज में एक ऐसे मुहज़्ज़ब, इल्मी और शरीफ़ ख़ानदान में हुआ, जहाँ इल्म, अदब, अख़्लाक़ और दीनदाराना उसूल ज़िंदगी का लाज़िमी हिस्सा समझे जाते थे। उनके वालिद क़ाज़ी सैय्यद सग़ीर अहमद अपने इल्म, फ़हम-ओ-फ़िरासत और शरीअती मसाइल पर गहरी पकड़ की वजह से इज़्ज़त की निगाह से देखे जाते थे, जबकि उनकी वालिदा इशरत बेगम एक नेक-सीरत, ख़ुश-अख़्लाक़ और बेहतरीन तरबियत देने वाली ख़ातून थीं, जिनकी शफ़्क़त, ख़ुलूस और दुआओँ ने कैसर उल जाफ़री की शख़्सियत को इब्तिदा ही से नर्मी, संजीदगी और इंसानी हमदर्दी के जज़्बे से सरशार कर दिया।
जिस घरेलू फ़िज़ा में उनकी परवरिश हुई, वहाँ किताबों की महक, इल्मी गुफ़्तगू, तहज़ीब की नफ़ासत और अदबी ज़ौक़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थे। यही वजह थी कि बचपन से ही उनके ज़ेहन में ज़बान की लताफ़त, अल्फ़ाज़ की नफ़ासत और एहसास की गहराई ने जड़ें जमाना शुरू कर दीं। आगे चलकर यही माहौल उनकी फ़िक्र, तख़य्युल और शेअरी शख़्सियत की बुनियाद साबित हुआ, जिसने उन्हें उर्दू अदब की दुनिया में एक मुमताज़ और मोअतबर मुक़ाम अता किया।
इब्तिदाई ज़िंदगी और ख़ानदानी तरबियत
कैसर उल जाफ़री की ज़िंदगी का इब्तिदाई दौर जितना इल्म-ओ-अदब की रौशन फ़िज़ाओं से मुनव्वर था, उतना ही आज़माइशों और ग़मगीन लम्हों से भी आबाद रहा। अभी उनकी उम्र बहुत कम ही थी कि उनकी वालिदा इशरत बेगम का साया हमेशा के लिए उनके सर से उठ गया। माँ की जुदाई का यह सदमा किसी मासूम बच्चे के लिए एक ऐसा ज़ख़्म था, जिसकी टीस उम्र भर उनके दिल में महफ़ूज़ रही। यही वजह है कि उनकी शायरी में मोहब्बत की नर्मी, जुदाई का दर्द, तन्हाई की कसक और रिश्तों की नाज़ुक कैफ़ियत बार-बार अपने मुख़्तलिफ़ रंगों में जलवा-गर नज़र आती है। उनके अशआर में जो गहरी इंसानी हमदर्दी, रूहानी लताफ़त और जज़्बात की सच्चाई दिखाई देती है, उसकी जड़ें इसी इब्तिदाई दौर की तल्ख़ हक़ीक़तों में तलाश की जा सकती हैं।
वालिदा के इंतिक़ाल के बाद उनकी परवरिश की अहम ज़िम्मेदारी उनके चाचा मौलाना अख़्तर साहब ने अपने सर ली। मौलाना अख़्तर साहब ख़ुद इल्म-दोस्त, दीनी शऊर रखने वाले और अरबी-फ़ारसी के अच्छे आलिम थे। उन्होंने कैसर साहब की तरबियत केवल एक सरपरस्त की हैसियत से नहीं की, बल्कि एक ऐसे मुर्ब्बी की तरह की, जिसने उनके ज़ेहन और शख़्सियत की तामीर में बुनियादी किरदार अदा किया। उनकी निगरानी में कैसर उल जाफ़री ने अरबी, फ़ारसी और उर्दू की बाक़ायदा तालीम हासिल की। इन ज़बानों की फ़साहत, लताफ़त और अदबी रवायतों ने उनके ज़ौक़-ए-मुतालआ को वुसअत बख़्शी और बहुत कम उम्र में ही उनके अंदर इल्म, ज़बान और फ़िक्र के प्रति एक गहरी दिलचस्पी पैदा कर दी।
यह वही दौर था जब किताबें उनकी सबसे क़रीबी रफ़ीक़ बन गईं। क्लासिकी उर्दू अदब, फ़ारसी शायरी और अरबी अदब का मुतालआ उनके ज़ेहन को नई वुसअतें देता रहा। अल्फ़ाज़ की नफ़ासत, तश्बीहात की ख़ूबसूरती, इस्तिआरों की गहराई और बयान की शीरीनी ने उनके अंदर छिपे हुए शायर को धीरे-धीरे बेदार करना शुरू कर दिया। यही बुनियादी तालीम आगे चलकर उनकी शेअरी फ़िक्र की ऐसी मज़बूत बुनियाद साबित हुई, जिसने उन्हें उर्दू ग़ज़ल की दुनिया में एक मुनफ़रिद और मोअतबर आवाज़ के तौर पर पहचान दिलाई।
कैसर उल जाफ़री की अदबी ज़िंदगी का पहला रौशन बाब भी उनके बचपन ही से वाबस्ता है। गाँव नज़रगंज के एक पुराने तालाब के किनारे बैठकर उन्होंने अपने अज़ीज़ दोस्त आलम इलाहाबादी के साथ पहली बार शे'र कहने की कोशिश की। दो कमसिन दोस्तों के लिए यह महज़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं था, बल्कि एहसास को आवाज़ देने की पहली जुरअत थी। उन्हें शायद उस वक़्त यह एहसास भी न रहा होगा कि यही मासूम कोशिश आगे चलकर एक ऐसे शायर को जन्म देगी, जिसकी ग़ज़लें लाखों दिलों की धड़कन बन जाएँगी।
लेकिन तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर था। कुछ ही अरसे बाद वही तालाब, जो उनकी दोस्ती और शेअरी ख़्वाबों का गवाह बना था, एक दर्दनाक हादसे का मंज़र बन गया। उनके जिगरी दोस्त आलम इलाहाबादी उसी तालाब में डूबकर इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। यह सानिहा कैसर उल जाफ़री के लिए सिर्फ़ एक दोस्त की जुदाई नहीं था, बल्कि उनकी रूह पर हमेशा के लिए नक़्श हो जाने वाला एक गहरा ज़ख़्म था। इस हादसे ने उन्हें ज़िंदगी की नापायदारी, रिश्तों की नाज़ुकी और इंसानी जज़्बात की हक़ीक़त से बहुत कम उम्र में ही रू-ब-रू करा दिया।
यही वजह है कि उनकी शायरी में दर्द बनावटी नहीं, बल्कि जिया हुआ एहसास बनकर सामने आता है। उनकी ग़ज़लों में बिछड़ने की कसक, यादों की महक, वक़्त की बेवफ़ाई और इंसानी रिश्तों की नर्माहट जिस सच्चाई के साथ दिखाई देती है, वह दरअसल उनकी अपनी ज़िंदगी के इन्हीं तजुर्बात का अक्स है। बचपन की इन आज़माइशों ने उनके दिल को मज़बूत ज़रूर बनाया, लेकिन उसकी नर्मी कभी कम नहीं होने दी। यही नर्मी, यही एहसास और यही इंसानी दर्द आगे चलकर कैसर उल जाफ़री की शेअरी शख़्सियत की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
अदबी ख़िदमात और शेअरी उस्लूब
कैसर उल जाफ़री का शेअरी सफ़र महज़ अल्फ़ाज़ को क़ाफ़िया-रदीफ़ में पिरो देने का नाम नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात, समाजी शऊर, रूहानी एहसास और ज़िंदगी की गहरी हक़ीक़तों को फ़नकारी के साथ बयान करने की एक शानदार मिसाल है। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत की नज़ाकत, फ़िराक़ की कसक, ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ, समाजी नाइंसाफ़ियों का दर्द और इंसानियत की रौशन तालीमात एक साथ जलवा-गर दिखाई देती हैं। उन्होंने अपनी शायरी को महज़ जज़्बाती इज़हार तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे इंसानी फ़िक्र, तहज़ीबी शऊर और अख़्लाक़ी पैग़ाम का ज़रिया बनाया। यही वजह है कि उनका कलाम हर दौर के क़ारी को अपनी ज़िंदगी का अक्स महसूस कराता है।
कैसर उल जाफ़री की ग़ज़लों की सबसे बड़ी ख़ुसूसियत उनकी सादा लेकिन पुरअसर ज़बान, लतीफ़ तर्ज़-ए-बयाँ और जज़्बात की सच्चाई है। उन्होंने मुश्किल इस्तिलाहात या ग़ैर-मामूली लफ़्ज़ों के बजाय ऐसी शीरीं और रवाँ ज़बान इख़्तियार की, जो सीधे दिल तक पहुँचती है। उनके यहाँ लफ़्ज़ों की आराइश से ज़्यादा एहसास की सच्चाई को अहमियत हासिल है। यही वजह है कि उनका हर शे'र पढ़ने वाले के दिल में उतर जाता है और बरसों तक उसकी यादों का हिस्सा बना रहता है। उनकी ग़ज़लों में तख़य्युल की नफ़ासत, बयान की लताफ़त और जज़्बात की गर्माहट एक ऐसा हुस्न पैदा करती है, जो क़ारी को पहली ही गिरह में अपना गिरफ़्तार बना लेता है।
उनकी शायरी का दायरा महज़ इश्क़-ओ-मोहब्बत तक महदूद नहीं है। उन्होंने इंसानी रिश्तों की नाज़ुक कैफ़ियात, वक़्त की बेरहमी, तन्हाई की ख़ामोशी, उम्मीद की रौशनी, समाजी बेइंसाफ़ियों और इंसानी वक़ार जैसे अहम मौज़ूआत को भी अपने कलाम का हिस्सा बनाया। उनकी नज़र में शायरी का मक़सद महज़ दिल बहलाना नहीं, बल्कि इंसान को उसके अंदर छिपे एहसास, ज़मीर और इंसानियत से रू-ब-रू कराना था। यही फ़िक्र उनके अशआर को महज़ अदब नहीं, बल्कि ज़िंदगी का तजुर्बा बना देती है।
उनका एक मशहूर शे'र उनकी तख़्लीक़ी सलाहियत और एहसास की नफ़ासत का बेहतरीन नमूना है—
"ज़ेहन के सारे दरीचों पे जमी है पतझड़,
इक तेरा नाम महकता है गुलाबों की तरह।"
इस शे'र में तन्हाई, याद और मोहब्बत की जो कैफ़ियत निहाँ है, वह कैसर उल जाफ़री के शेअरी मिज़ाज की पूरी तर्जुमानी करती है। चंद अल्फ़ाज़ में गहरे जज़्बात समेट लेने का यह फ़न उन्हें अपने दौर के मुमताज़ ग़ज़लगो शायरों में शामिल करता है।
कैसर उल जाफ़री की फ़िक्र में एक गहरी फ़लसफ़ियाना रविश भी दिखाई देती है। ज़िंदगी, वक़्त, इंसान, मोहब्बत, जुदाई और तक़दीर जैसे मौज़ूआत पर उनकी निगाह सतही नहीं, बल्कि गहरे तफ़क्कुर से भरपूर है। उनके अशआर क़ारी को महज़ लुत्फ़ नहीं देते, बल्कि सोचने, महसूस करने और अपने अंदर झाँकने पर भी मजबूर करते हैं। यही फ़िक्र उनकी शायरी को हर दौर में ताज़गी और मआनवी गहराई अता करती है।
उनकी शेअरी शख़्सियत पर साहिर लुधियानवी की समाजी बेदारी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इंसान-दोस्त फ़िक्र और तरक़्क़ी-पसंद रवायतों का असर ज़रूर दिखाई देता है, लेकिन उन्होंने कभी किसी की तर्ज़ की नक़्ल नहीं की। उन्होंने अपने एहसास, अपने तजुर्बात और अपनी फ़िक्र से एक ऐसा मुनफ़रिद अंदाज़-ए-बयाँ तख़्लीक़ किया, जो पूरी तरह उनकी अपनी पहचान बन गया। उनकी ग़ज़लों में न फ़ैज़ की गूंज सुनाई देती है, न साहिर की परछाईं; बल्कि हर शे'र में कैसर उल जाफ़री की अपनी आवाज़, अपना लहजा और अपनी रूह बोलती हुई महसूस होती है।
यही इन्फ़िरादियत, यही फ़िक्र की बुलंदी और यही जज़्बात की सच्चाई कैसर उल जाफ़री को उर्दू अदब के उन चुनिंदा शायरों की सफ़ में खड़ा करती है, जिनका कलाम महज़ अपने दौर तक महदूद नहीं रहता, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी रहनुमाई, एहसास और ख़ूबसूरती का सरमाया बन जाता है। उनकी शायरी आज भी उतनी ही ताज़ा, असरअंगेज़ और दिलनशीं महसूस होती है, जितनी अपने इब्तिदाई दौर में थी, और यही किसी भी अज़ीम शायर की सबसे बड़ी कामयाबी होती है।
इंसानियत, सादगी और ख़ुश-अख़्लाक़ी का आईना
कैसर उल जाफ़री जितने अज़ीम शायर थे, उतने ही आला अख़्लाक़, सादा-मिज़ाज और ख़ुलूस से भरपूर इंसान भी थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी शोहरत या नामवरी को अपनी शख़्सियत पर हावी नहीं होने दिया। सादगी, इन्किसारी और इंसानी हमदर्दी उनकी फ़ितरत का हिस्सा थीं। वह हर मिलने वाले से बेइंतिहा मुहब्बत, एहतराम और अपनाइयत के साथ पेश आते थे और ज़रूरतमंदों की मदद को अपना फ़र्ज़ समझते थे। उनके फ़र्ज़ंद इरफ़ान जाफ़री के मुताबिक़, लोग उन्हें जितना उनकी इल्मी वुसअत और दिलनशीं शायरी की वजह से याद करते हैं, उतना ही उनकी सादा ज़िंदगी, ख़ुश-अख़्लाक़ी और पुरख़ुलूस रवैये की वजह से भी मोहब्बत और एहतराम की निगाह से देखते हैं। यही ख़ूबसूरत औसाफ़ उनकी शख़्सियत को उनके कलाम की तरह हमेशा ज़िंदा रखते हैं
तस्नीफ़ात और शेअरी मजमूए
कैसर उल जाफ़री का अदबी सफ़र महज़ चंद किताबों की इशाअत का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसी रूहानी, फ़िक्री और तख़्लीक़ी दास्तान है, जिसने उर्दू शायरी के दामन में एहसास, फ़िक्र और इंसानियत के अनगिनत रंग समेट दिए। उनकी हर तस्नीफ़ उनके तख़य्युल की एक नई कैफ़ियत, उनके जज़्बात की एक नई तर्जुमानी और उनकी फ़िक्र की एक नई जहत की अक्सबंद नज़र आती है। उनके शेअरी मजमूओं में इश्क़ की लताफ़त, हिज्र की कसक, ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें, इंसानी रिश्तों की नज़ाकत और रूहानी एहसास की ऐसी दिलनशीं आमेज़िश मिलती है, जो क़ारी के दिल पर देर तक अपना असर क़ायम रखती है। यही वजह है कि उनकी तस्नीफ़ात उर्दू अदब के क़ीमती सरमाये में शुमार की जाती हैं और आज भी अदबी हल्क़ों में उसी एहतराम के साथ पढ़ी और सराही जाती हैं।
कैसर उल जाफ़री की अहम तस्नीफ़ात और शेअरी मजमूए निम्नलिखित हैं—
- हर्फ़-ए-तस्लीम (1955)
- रंग-ए-हिना (1964)
- संग-आशना (1977)
- दश्त-ए-बेतमन्ना (1988)
- पत्थर हवा में फेंके (1995)
- अगर दरिया मिला होता (ग़ैर-मुतबूआ मुसव्वदा)
इन तस्नीफ़ात के ज़रिये कैसर उल जाफ़री ने उर्दू अदब को ऐसा तख़्लीक़ी ख़ज़ाना अता किया, जिसकी रौनक़ वक़्त गुज़रने के साथ और भी निखरती चली गई। उनका कलाम किसी एक दौर, एक तबक़े या एक ज़ेहन तक महदूद नहीं रहा, बल्कि हर उस दिल तक पहुँचा जो अल्फ़ाज़ में एहसास, फ़िक्र में सच्चाई और शायरी में इंसानियत की तलाश करता है। यही वजह है कि उनकी ग़ज़लें और नज़्में आज भी उसी ताज़गी, उसी दिलकशी और उसी असरअंगेज़ी के साथ पढ़ी जाती हैं, जैसे अपने अहद-ए-इब्तिदा में पढ़ी जाती थीं। कैसर उल जाफ़री का अदबी विरसा उर्दू शायरी की उस रौशन रवायत का अहम हिस्सा है, जो आने वाली नस्लों को भी ज़ौक़-ए-अदब, फ़िक्र की बुलंदी और इंसानी क़द्रों की शिनाख़्त कराता रहेगा।
कैसर उल जाफ़री की शायरी,ग़ज़लें,नज़्मे
1-ग़ज़ल
सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा
सूरज उफ़ुक़ से झाँक रहा है नज़र उठा
इतनी बुरी नहीं है खंडर की ज़मीन भी
इस ढेर को समेट नए बाम-ओ-दर उठा
मुमकिन है कोई हाथ समुंदर लपेट दे
कश्ती में सौ शिगाफ़ हों लंगर मगर उठा
शाख़-ए-चमन में आग लगा कर गया था क्यूँ
अब ये अज़ाब-ए-दर-बदरी उम्र भर उठा
मंज़िल पे आ के देख रहा हूँ मैं आइना
कितना ग़ुबार था जो सर-ए-रहगुज़र उठा
सहरा में थोड़ी देर ठहरना ग़लत न था
ले गर्द-बाद बैठ गया अब तो सर उठा
दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी
दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा
'क़ैसर' मता-ए-दिल का ख़रीदार कौन है
बाज़ार उजड़ गया है दुकान-ए-हुनर उठा
2-ग़ज़ल
यूँ बैठ रहीं दिल में शोरीदा तमन्नाएँ
गोया किसी जंगल में पत्तों की उड़ानें थीं
यारब मिरे हाथों में तेशा भी दिया होता
हर मंज़िल-ए-हस्ती में जब इतनी चटानें थीं
वो लम्हा-ए-लर्ज़ां भी देखा है सर-ए-महफ़िल
इक शोले की मुट्ठी में परवानों की जानें थीं
हम मरहला-ए-ग़म में तन्हा थे कहाँ यारो
क़ातिल थे सलीबें थीं तेग़ें थी सिनानें थीं
इक हर्फ़-ए-मोहब्बत यूँ फैला कि गुनह ठहरा
अफ़्साने हमारे थे दुनिया की ज़बानें थीं
3-ग़ज़ल
तिरी बेवफ़ाई के बाद भी मिरे दिल का प्यार नहीं गया
शब-ए-इंतिज़ार गुज़र गई ग़म-ए-इंतिज़ार नहीं गया
मैं समुंदरों का नसीब था मिरा डूबना भी अजीब था
मिरे दिल ने मुझ से बहुत कहा मैं उतर के पार नहीं गया
तू मिरा शरीक-ए-सफ़र नहीं मिरे दिल से दूर मगर नहीं
तिरी मम्लिकत न रही मगर तिरा इख़्तियार नहीं गया
उसे इतना सोचा है रोज़ ओ शब कि सवाल-ए-दीद रहा न अब
वो गली भी ज़ेर-ए-तवाफ़ है जहाँ एक बार नहीं गया
कभी कोई वादा वफ़ा न कर यूँही रोज़ रोज़ बहाना कर
तू फ़रेब दे के चला गया तिरा ए'तिबार नहीं गया
मुझे उस के ज़र्फ़ की क्या ख़बर कहीं और जा के हँसे अगर
मिरे हाल-ए-दिल पे तो रोए बिन कोई ग़म-गुसार नहीं गया
उसे क्या ख़बर कि शिकस्तगी है जुनूँ की मंज़िल-ए-आगही
जो मता-ए-शीशा-ए-दिल लिए सर-ए-कू-ए-यार नहीं गया
मिरी ज़िंदगी मिरी शाइरी किसी ग़म की देन है 'जाफ़री'
दिल ओ जाँ का क़र्ज़ चुका दिया मैं गुनाहगार नहीं गया
4-ग़ज़ल
घर बसा कर भी मुसाफ़िर के मुसाफ़िर ठहरे
लोग दरवाज़ों से निकले कि मुहाजिर ठहरे
दिल के मदफ़न पे नहीं कोई भी रोने वाला
अपनी दरगाह के हम ख़ुद ही मुजाविर ठहरे
इस बयाबाँ की निगाहों में मुरव्वत न रही
कौन जाने कि कोई शर्त-ए-सफ़र फिर ठहरे
पत्तियाँ टूट के पत्थर की तरह लगती हैं
उन दरख़्तों के तले कौन मुसाफ़िर ठहरे
ख़ुश्क पत्ते की तरह जिस्म उड़ा जाता है
क्या पड़ी है जो ये आँधी मिरी ख़ातिर ठहरे
शाख़-ए-गुल छोड़ के दीवार पे आ बैठे हैं
वो परिंदे जो अँधेरों के मुसाफ़िर ठहरे
अपनी बर्बादी की तस्वीर उतारूँ कैसे
चंद लम्हों के लिए भी न मनाज़िर ठहरे
तिश्नगी कब के गुनाहों की सज़ा है 'क़ैसर'
वो कुआँ सूख गया जिस पे मुसाफ़िर ठहरे
5-ग़ज़ल
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ मुझे
तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे
जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे
वो फूल जो मिरे दामन से हो गए मंसूब
ख़ुदा करे उन्हें बाज़ार की हवा न लगे
न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाए तो बेवफ़ा न लगे
तू इस तरह से मिरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बा'द मुझे कोई बेवफ़ा न लगे
तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िंदगी 'क़ैसर'
कि एक घूँट में मुमकिन है बद-मज़ा न लगे
6-ग़ज़ल
दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है
कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो
शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है
आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन
आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है
इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा
जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है
दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं
शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है
किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है
शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है
1-नज़्म
ज़िंदगी तू मुझे किस मोड़ पे ले आई है
ख़्वाब खुलते थे जहाँ बर्फ़ वहाँ छाई है
सौ दरीचे हैं मगर शम्अ किसी पर भी नहीं
चाँद निकले मिरी रातों का मुक़द्दर भी नहीं
क्या करूँ क्या न करूँ हाथ में पत्थर भी नहीं
शीश-महलों को कोई ग़म भी नहीं डर भी नहीं
लोग गूँगे हैं बयाबाँ में अज़ाँ कैसे हो
लोग क़ातिल हैं इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ कैसे हो
लोग पत्थर हैं तो एहसास-ए-ज़ियाँ कैसे हो
किस को फ़ुर्सत है जो पूछे कि मियाँ कैसे हो
रात जब ख़त्म हुई थी तो सहर लगती थी
रौशनी राहगुज़र राहगुज़र लगती थी
ज़िंदगी कूचा-ए-जानाँ का सफ़र लगती थी
अपनी मंज़िल कहीं जन्नत के उधर लगती थी
कुछ भी आँखों में नहीं अश्क-ए-नदामत के सिवा
कुछ भी दामन में नहीं दाग़-ए-मलामत के सिवा
कुछ भी चेहरे पे नहीं गर्द-ए-मसाफ़त के सिवा
अपनी दूकान में सब कुछ है मोहब्बत के सिवा
2-नज़्म
नीली जिल्द की किताब
मेरे घर में झोंज बनाए गौरय्या का जोड़ा
चोंच में ले कर आए जाए भूसा थोड़ा थोड़ा
भूसे में कुछ तिनके भी हैं कुछ मटियाले पर
नीले पीले उजले मैले भूरे काले पर
बाग़ों बाग़ों हो कर आए अपना घर न भूले
पहले वो रस्सी पर बैठे पल भर झूला झूले
फिर अलमारी में उड़ कर जाए सीधे अपने कोने
ग़ालिब का दीवान चुना है रहने को इन दो ने
नीली नीली जिल्द पे जैसे फूल रखा हो कोई
या काग़ज़ को रात समझ कर चाँद उगा हो कोई
क़िस्मत वाले ठहरे उन के लाल गुलाबी पंजे
उर्दू का इक शायर आया उन के पाँव के नीचे
चाँदी जैसे तख़्त पे सो कर गुज़रीं रातें उन की
'ग़ालिब'-साहिब सुनते होंगे शायद बातें उन की
माज़ी की बुनियाद पे रक्खा है मुस्तक़बिल सब का
आने वाले दौर में लोगो अटका है दिल सब का
गौरय्या के इन ख़्वाबों को कैसे तोड़ा जाए
कोई नुस्ख़ा और मँगा लें इस को छोड़ा जाए
तब्सरा:-
कैसर उल जाफ़री उन शायरों में शुमार किए जाते हैं, जिन्होंने उर्दू शायरी को महज़ अल्फ़ाज़ की आराइश नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात की सच्ची तर्जुमानी का वसीला बनाया। उनका शेअरी सफ़र किसी अदबी रिवायत की तकरार नहीं, बल्कि एहसास, फ़िक्र और तहज़ीब के उस ख़ूबसूरत इत्तिहाद का नाम है, जिसमें मोहब्बत की नर्मी, इंसानियत की गरमी, समाजी शऊर की रोशनी और फ़लसफ़ियाना तफ़क्कुर की गहराई एक साथ दिखाई देती है। उन्होंने अपने अहद की ग़ज़ल को न तो मुश्किल इस्तिआरों का कै़दी बनाया और न ही लफ़्ज़ी सनअतों की नुमाइशगाह; बल्कि उसे इंसानी दिल की धड़कनों से हमआहंग कर दिया। यही वजह है कि उनका कलाम पढ़ते वक़्त ऐसा महसूस होता है, जैसे कोई दर्दमंद इंसान अपने दिल की बात पूरे ख़ुलूस के साथ बयान कर रहा हो।
अगर उनकी अस्नाफ़-ए-सुख़न पर नज़र डाली जाए तो ग़ज़ल उनकी शेअरी शख़्सियत का सबसे रौशन पहलू है। ग़ज़ल के अलावा उन्होंने नज़्म, क़िता और मुख़्तलिफ़ अदबी तहरीरों के ज़रिये भी अपनी तख़्लीक़ी सलाहियत का सुबूत दिया, लेकिन जिस मुक़ाम और मक़बूलियत ने उन्हें उर्दू अदब में अमर किया, वह उनकी ग़ज़लगोई ही है। उनकी ग़ज़लों में रिवायती हुस्न भी है और जदीद एहसास की ताज़गी भी। वह क्लासिकी उर्दू ग़ज़ल की रवायत से वाबस्ता रहते हुए भी अपने दौर के इंसान की बेचैनी, तन्हाई, मोहब्बत, उम्मीद और समाजी हक़ीक़तों को ऐसी सादगी से बयान करते हैं कि उनका हर शे'र सीधे दिल में उतर जाता है।
फ़न्नी एतिबार से कैसर उल जाफ़री की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी सहल-ए-मुम्तना की कैफ़ियत है। उनके यहाँ अल्फ़ाज़ इंतिहाई सादा, रवाँ और रोज़मर्रा की ज़बान से क़रीब हैं, लेकिन उन्हीं सादा अल्फ़ाज़ में मआनी की ऐसी वुसअत और एहसास की ऐसी गहराई मौजूद है, जिसे पैदा करना हर शायर के बस की बात नहीं। उन्होंने तश्बीह, इस्तिआरा, अलामत और इमेजरी का इस्तेमाल भी बड़े एहतियात और फ़नकारी के साथ किया। यही वजह है कि उनका कलाम न तो बोझिल मालूम होता है और न ही सतही; बल्कि हर बार पढ़ने पर नए मआनी और नए एहसास से आश्ना कराता है। उनकी शायरी में लफ़्ज़ों की चमक से ज़्यादा जज़्बात की रौशनी दिखाई देती है, और यही किसी बड़े फ़नकार की अस्ल पहचान होती है।
कैसर उल जाफ़री की शख़्सियत भी उनके कलाम की तरह बेहद सादा, पुरख़ुलूस और वक़ार से मामूर थी। उन्होंने कभी शोहरत को अपनी तबीयत पर मुसल्लत नहीं होने दिया। इल्म, अख़्लाक़, इन्किसारी और इंसान-दोस्ती उनकी ज़िंदगी के बुनियादी उसूल रहे। यही वजह है कि जो लोग उनसे मिले, उन्होंने पहले एक नेक इंसान को देखा और उसके बाद एक अज़ीम शायर को पहचाना। उनकी गुफ़्तगू में तहज़ीब, उनके किरदार में ख़ुलूस और उनके मिज़ाज में ऐसी नर्मी थी, जिसने उन्हें अदबी हल्क़ों में बेइंतिहा एहतराम बख़्शा।
बिला-शुब्हा कैसर उल जाफ़री उन चंद शायरों में शामिल हैं, जिनका फ़न अपने दौर की सरहदों में महदूद नहीं रहता। उनका कलाम हर उस दिल की आवाज़ बन जाता है, जिसने मोहब्बत की लताफ़त, जुदाई की कसक, ज़िंदगी की तल्ख़ियों और इंसानियत की अहमियत को महसूस किया हो। यही उनकी शेअरी अज़मत है, यही उनका फ़न्नी कमाल और यही उनकी लाज़वाल अदबी विरासत। उर्दू अदब की तारीख़ में उनका नाम हमेशा एक ऐसे ख़ालिस ग़ज़लगो शायर के तौर पर याद रखा जाएगा, जिसने अपने लफ़्ज़ों से दिलों को रौशन किया, अपने फ़िक्र से ज़ेहनों को वुसअत बख़्शी और अपनी शख़्सियत से इंसानियत, सादगी और तहज़ीब की सबसे ख़ूबसूरत मिसाल क़ायम की।ये भी पढ़ें
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