सैयद मोहम्मद ज़ामिन अली नक़वी, जिनको अदबी दुनिया में सिर्फ़ “ज़ामिन” के नाम से जाना और पहचाना जाता है, 25 जून 1893 को मुस्तफ़ाबाद, रायबरेली (यूनाइटेड प्रॉविन्सेज़) के एक नामवर, इल्मी और अदबी ख़ानदान में पैदा हुए। आपका ख़ानदान शिया सय्यद ज़मींदार था, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ़ ज़मींदारी या जायदाद तक सीमित नहीं थी; बल्कि यह ख़ानदान इल्म, शायरी, अदब और तहरीक़ी ज़ेहनियत की रूह से भी सरशार था।
ज़ामिन अली की पूरी ज़िन्दगी उर्दू की ख़िदमत में गुज़री। उन्होंने उर्दू को एक ज़िन्दा, इल्मी, तहज़ीबी और अदबी ज़बान साबित किया। यही वजह है कि फ़िराक़ गोरखपुरी ने उन्हें “बाबा-ए-उर्दू” और “ख़िज़्र-ए-राह-ए-उर्दू” के खिताब से नवाज़ा।
बचपन और ख़ानदानी विरासत
ज़ामिन अली की परवरिश ऐसे घर में हुई जहाँ अदब और शायरी हवा में घुली हुई थी। आपके दादा सैयद नौरोज़ अली एक नामवर शायर थे। नाना उस्ताद मीर अली उबैद ‘नैसा’ उर्दू अदब की दुनिया का बड़ा नाम माने जाते थे। बड़े भाई सैयद हमीद अली भी उर्दू के अच्छे शायर थे।
इसी माहौल ने बचपन से ही ज़मीन अली के ज़ेहन को रौशन कर दिया। छोटी उम्र से ही उनके अंदर शायरी का ज़ौक़ और अदब का शौक़ गहरा होता चला गया। सिर्फ़ 13 साल की उम्र में उन्होंने पहली नज़्म और ग़ज़ल कही। उस्ताद “नैसा” की रहनुमाई ने उन्हें लखनऊ स्कूल ऑफ़ पोएट्री का नफ़ीस रंग-ओ-अंदाज़ सिखाया, जहाँ शोखी, नफ़ासत और तहज़ीब का बेहतरीन संगम मिलता था।
तालीमी सफर
ज़ामिन अली ने अपनी इब्तिदाई तालीम सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से शुरू की। 1910 में इंटरमीडिएट पास किया और फिर इविंग क्रिश्चियन कॉलेज, इलाहाबाद से बी.ए. किया। अदब और इल्म का जुनून उन्हें यहाँ तक ले आया कि उन्होंने 1922 में म्योर कॉलेज, इलाहाबाद से फ़ारसी में एम.ए. मुकम्मल किया।
यह वही वक़्त था जब उन्होंने तय कर लिया कि उनकी ज़िन्दगी का अस्ल मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ उर्दू की ख़िदमत होगा। 1922 में ही वह इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में फ़ारसी पढ़ाने लगे। लेकिन दो साल बाद, 1924 में जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उर्दू डिपार्टमेंट क़ायम हुआ, तो उसका पहला सरबराह उन्हें बनाया गया। यह वह तारीख़ थी जब पहली बार ब्रिटिश इंडिया की किसी यूनिवर्सिटी में उर्दू को अपनी पहचान और अकादमिक मक़ाम मिला।
उर्दू डिपार्टमेंट की बुनियाद
उस दौर में उर्दू को अक्सर फ़ारसी या ओरिएंटल स्टडीज़ का हिस्सा समझा जाता था। लेकिन ज़मीन अली का तसव्वुर साफ़ था – उर्दू अपनी पहचान, अपना डिपार्टमेंट और अपना अकादमिक ढाँचा डिज़र्व करती है।
1924 में उनकी कोशिशों से उर्दू डिपार्टमेंट क़ायम हुआ। उन्होंने बी.ए., एम.ए. और पीएचडी तक का मुकम्मल सिलेबस तैयार किया। दरजनों टेक्स्टबुक्स खुद लिखीं, और उर्दू को अकादमिक ज़बान का मुक़ाम दिया। उनके शागिर्दों में सैयद वक़ार अज़ीम, सैयद एजाज़ हुसैन, फ़ातिमा अख़्तर, ज्ञानचंद जैन जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने आगे चलकर उर्दू अदब में रोशन नाम छोड़ा।
यही नहीं, उन्होंने उर्दू डिपार्टमेंट की फ्लैगशिप ऐनुअल मैगज़ीन “नैसा” शुरू की, जिसने अदब के शोले हर तरफ़ फैला दिए।
हिन्दुस्तानी अकैडमी और गांधी का ख़्वाब
1927 में ज़ामिन अली हिन्दुस्तानी अकैडमी के फ़ाउंडिंग मेम्बर और वाइस प्रेसीडेंट बने। उस दौर में महात्मा गांधी का ख़्वाब था कि हिन्दुस्तानी एक ऐसी क़ौमी ज़बान बने जो उर्दू और देवनागरी दोनों लिपियों में इस्तेमाल हो।
ज़मीन अली ने उर्दू सर्वे कमेटी की सदारत की और किताब “उर्दू ज़बान-ओ-अदब” लिखी, जो आज भी एक भाषाई शाहकार मानी जाती है। 1928 में जब गांधी जी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आए तो उन्होंने ज़मीन अली के काम की खुले आम तारीफ़ की।
हालाँकि तक़सीम-ए-हिन्द के बाद यह ख़्वाब अधूरा रह गया, मगर ज़मीन अली का नाम हमेशा इस तहरीक के साथ याद किया जाएगा।
उर्दू तालीम में किरदार
ज़ामिन अली ने उर्दू तालीम का नक्शा बदल दिया। उन्होंने नर्सरी से लेकर पीएचडी तक उर्दू को सिलेबस का हिस्सा बनाया। दर्जनों टेक्स्टबुक्स उन्होंने और उनके शागिर्दों ने लिखीं। उनमें से कुछ अहम हैं:
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उर्दू शायरी (चार जुलूस)
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गौहर-ए-सीलोन (प्राइमरी स्टूडेंट्स के लिए रैपिड रीडर)
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ख़त-ए-शिकस्त
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इंतिख़ाब-ए-मैराज
उन्होंने मर्सिया और क़सीदा को सिर्फ़ मज़हबी दायरे से निकाल कर एक अदबी आर्ट फ़ॉर्म की हैसियत दी। उनकी किताब वाक़यात-ए-कर्बला आम अफ़राद तक कर्बला के वाक़ियात और उनसे मुतअल्लिक़ शख़्सियतें पहुँचाने का ज़रिया बनी।
शायरी का अस्लूब
“ज़मीन” उनका तख़ल्लुस था। वह लखनऊ स्कूल की रवायत के बेहतरीन नुमाइंदा माने जाते हैं। उनकी शायरी में नफ़ासत, शोखी, तहज़ीब और गहराई का संगम मिलता है।
उनकी शायरी के मजमुए ये हैं:
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ग़ज़लियात-ए-ज़मीन
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कलाम-ए-ज़मीन
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मजमुआ-ए-क़साएद-ओ-सलाम
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कुल्लियात-ए-ज़मीन
2024 में जश्न-ए-रेख़्ता के दौरान जावेद अख़्तर ने उनकी “ग़ज़लियात-ए-ज़मीन” का नया एडिशन लॉन्च किया और कहा:
“ज़ामिन अली की शायरी अपने दौर की बेहतरीन मिसाल है – नफ़ीस अल्फ़ाज़, फ़ारसी रंग और रोज़मर्रा ज़िन्दगी के जज़्बात का बेहतरीन संगम।”
मुशायरों की दुनिया और इंसानियत का रंग
इलाहाबाद में उनका घर काशान-ए-अदब उर्दू शायरी का मरकज़ बन गया था। हर महीने यहाँ बड़े पैमाने पर मुशायरे होते, जिनमें कैफ़ी आज़मी, फ़िराक़ गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, हफ़ीज़ जलंधरी जैसे शायर हिस्सा लेते।
उनका घर तालेब-ए-इल्म और अदबी शख़्सियतों के लिए हमेशा खुला रहता। ग़रीब तलबा और बीमार लोगों के इलाज व रहनुमाई का खर्च भी वह खुद उठाते। इंसानियत और ख़ुलूस का यह रंग उनके शख़्स को और भी अज़ीम बनाता है।
1937 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के गोल्डन जुबली मुशायरे की सदारत भी उन्होंने की, जिसमें पूरे हिन्दुस्तान के नामवर शायर शामिल हुए।
इज़्ज़त और एहतराम
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1946 में ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें M.B.E. Medal (Member of British Empire) दिया।
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1980 में भारत सरकार ने उनके नाम पर पोस्टल स्टाम्प जारी किया।
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उनकी कोशिशों से आज 55 यूनिवर्सिटीज़ में उर्दू डिपार्टमेंट्स मौजूद हैं और हज़ारों स्कूलों में उर्दू तालीम का हिस्सा है।
इंतिक़ाल और विरासत
25 अप्रैल 1955 को ज़मीन अली का इंतिक़ाल हुआ। उन्हें इलाहाबाद के शिया क़ब्रिस्तान में दफ़्न किया गया।
उनका छोड़ा हुआ विरसा सिर्फ़ किताबें और सिलेबस नहीं, बल्कि एक पूरी तहरीक है। उन्होंने उर्दू को उस मुक़ाम तक पहुँचाया जहाँ यह सिर्फ़ शायरी की ज़बान नहीं, बल्कि क़ौमी, तहज़ीबी और इल्मी ज़बान बन गई।
ज़ामिन अली की शायरी ,ग़ज़लें ,नज़्मे
पर्शियन ग़ज़ल
मुफ़्लिसानेम आमद: दर कू-ए-तू
शैउन लिल्लाह अज़ जमाल-ए-रू-ए-तू
काब:-ए-जाँ क़िब्ल:-ए-मन रू-ए-तू
सज्द:-गाह-ए-आ'शिक़ाँ अबरू-ए-तू
जन्नतुलमावास्त जानाँ कू-ए-तू
मज़हर-ए-नूर-ए-इलाही रू-ए-तू
मी-नुमायद मा’नी-ए-लौलाक रा
जल्व:-ए-हुस्न-ए-अज़ल हर सू-ए-तू
दस्त ब-कुशा जानिब-ए-ज़ंबील-ए-मा
आफ़रीँ बर दस्त-ओ-बर बाज़ू-ए-तू
हर चे आयद दर दिलम ग़ैर-ए-तू नीस्त
या तुई या बू-ए-तू या ख़ू-ए-तू
फ़िल-हक़ीक़त ‘ला’ बुदी ‘ज़ामिन अ’ली’
गुफ़्त ख़ुसरौ नुक्त:-ए दिल-जू-ए-तू
नतीजा
ज़ामिन अली की ज़िन्दगी इस बात का सबूत है कि ज़बान सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का मजमुआ नहीं, बल्कि एक क़ौम की रूह, तहज़ीब और तामीरी पहचान का आईना है। उन्होंने उर्दू को नयी पहचान दी, नये दरवाज़े खोले और एक ऐसा रास्ता बनाया जो हमेशा रोशन रहेगा।ये भी पढ़ें
Note:-जामिन अली की बायोग्राफी पर अभी काम जारी हे ,इनकी तख़लीक़ात हासिल नहीं हो पा रही हैं ,जैसे जैसे चीज़ें मोज़ूल होंगी इंशा अल्लाह हम इस पर काम करते जायेंगे, शुक्रिया
