Hasrat Mohani Poet: फ़िक्र और फ़न का जदीद मुतालआ,उर्दू शायरी से संविधान सभा तक


मौलाना हसरत मोहानी की जीवनी

पूरा नाम: सैयद फ़ज़ल-उल-हसन
जन्म: 1 जनवरी 1875
निधन: 13 मई 1951
तख़ल्लुस (उपनाम): हसरत मोहानी
प्रसिद्धि: स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, उर्दू शायर

मौलाना हसरत मोहानी का असली नाम सैयद फ़ज़ल-उल-हसन था। हसरत मोहानी उनका तख़ल्लुस था, जो आगे चलकर उनकी पहचान और शोहरत का सबब बना। वह न सिर्फ़ उर्दू अदब के एक अज़ीम और बे-मिसाल शायर थे, बल्कि भारतीय जद्दोजहद-ए-आज़ादी के एक निडर, बेबाक और सरफ़रोश मुजाहिद भी थे।
सन 1921 में उन्हीं की ज़बान से निकला हुआ नारा “इंक़लाब ज़िंदाबाद” आज़ादी की तहरीक की रूह बन गया और देखते ही देखते पूरे मुल्क में बग़ावत और हौसले की आवाज़ बनकर गूंज उठा।
इसी साल अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में मौलाना हसरत मोहानी ने स्वामी कुमारानंद के साथ मिलकर भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का मुतालबा पेश किया, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की तारीख़ में एक अहम और फ़ैसला-कुन मील का पत्थर तस्लीम किया जाता है।

इब्तिदाई ज़िंदगी और तालीम

मौलाना हसरत मोहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के मोहन नामक क़स्बे में हुआ। उनका ख़ानदान असलन ईरान के निशापुर से ताल्लुक़ रखता था, जो वक़्त के साथ भारत आकर आबाद हुआ। इब्तिदाई तालीम उन्होंने कानपुर के वर्नाक्युलर मिडिल स्कूल, फतेहपुर हसवा से हासिल की, जहाँ बचपन ही से उनकी ज़ेहनी सलाहियत और ज़हानत के जौहर नुमाया होने लगे। आठवीं जमात में उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में अव्वल मुक़ाम हासिल किया और गणित में मैट्रिक का इम्तिहान आला तरीन दर्जे से पास किया। इसी क़ाबिलियत के सबब उन्हें दो वज़ीफ़े मिले—एक हुकूमत की जानिब से और दूसरा मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की तरफ़ से।

सन 1903 में हसरत मोहानी ने मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज से बी.ए. की तालीम मुकम्मल की, जो आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम से मशहूर हुआ। हालांकि अंग्रेज़ी हुकूमत पर बेबाक तनक़ीद की वजह से उन्हें तालीमी दौर में तीन मर्तबा कॉलेज से निकाला भी गया, मगर उनके हौसले और अज़्म में कोई कमी न आई। अलीगढ़ में उनके हम-अस्र और रफ़ीक़ों में मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली जैसे नामवर रहनुमा शामिल थे। शायरी में उनकी इस्लाह और रहनुमाई तस्लीम लखनवी और नसीम देहलवी जैसे बड़े उस्तादों से हुई। उनकी इल्मी और अदबी ख़िदमात के एतिराफ़ में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने एक हॉस्टल को उनके नाम से मंसूब कर रखा है, जो उनकी याद और मक़ाम का ज़िंदा निशान है।

सियासी ज़िंदगी और जद्दोजहद-ए-आज़ादी

मौलाना हसरत मोहानी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पूरी सरगर्मी, बेबाकी और इस्तिक़लाल के साथ हिस्सा लिया। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रुक्न रहे और सन 1919 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सदर भी मुन्तख़ब हुए। इसके बावजूद उन्होंने भारत के तक़सीम के ख़िलाफ़ हमेशा सख़्त और वाज़ेह मौक़िफ़ इख़्तियार किया।
3 जून 1947 को जब तक़सीम की योजना का एलान हुआ, तो मौलाना हसरत मोहानी ने अपने ज़मीर की आवाज़ पर लब्बैक कहते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की रुक्नियत से इस्तीफ़ा दे दिया और तक़सीम के बाद भी आज़ाद भारत में रहने का फ़ैसला किया। आगे चलकर वह भारतीय संविधान सभा के रुक्न बने, जिसने मुल्क के दस्तूर की तश्कील का तारीख़ी फ़र्ज़ अंजाम दिया।

ज़िंदगी के मामलात में सादगी और इस्तिग़ना उनकी शख़्सियत का ख़ास जौहर थी। उन्होंने कभी हुकूमती वज़ीफ़ा या सरकारी भत्ता क़बूल नहीं किया और न ही सरकारी रिहाइश में रहना पसंद किया। वह हमेशा सादा और फ़क़ीराना ज़िंदगी बसर करते रहे—यहाँ तक कि पार्लियामेंट तक पहुँचने के लिए भी तांगे में सफ़र करना उनकी आदत थी।
वह कई मर्तबा हज की सआदत से भी मुस्तफ़ीद हुए और रेल के सफ़र में हमेशा तीसरे दर्जे को तरजीह दी। जब किसी ने उनसे पूछा कि आप तीसरे दर्जे में ही क्यों सफ़र करते हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए चुटकी ली—
“इसलिए कि चौथा दर्जा मौजूद ही नहीं।”
यह जुमला न सिर्फ़ उनकी सादगी का आइना है, बल्कि उनके फ़क़्र, हाज़िर-जवाबी और बुलंद किरदार की भी रौशन दलील है।

आज़ादी की तहरीक में ख़िदमात

मौलाना हसरत मोहानी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में निहायत अहम, जुरअतमंद और तारीख़-साज़ किरदार अदा किया। सन 1903 में उनकी इंक़लाबी सरगर्मियों और अंग्रेज़ हुकूमत पर बेबाक तनक़ीद के सबब उन्हें ब्रिटिश सरकार ने जेल में डाल दिया। उस दौर में सियासी क़ैदियों के साथ आम मुजरिमों जैसा सुलूक किया जाता था और उनसे सख़्त मशक़्क़त वाला मशक्क़त तलब काम लिया जाता था, मगर क़ैद-ओ-बंद की सख़्तियाँ भी उनके हौसले और अज़्म को कमज़ोर न कर सकीं।

सन 1904 में मौलाना हसरत मोहानी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को वाज़ेह और बेख़ौफ़ अंदाज़ में उठाया। यह उस वक़्त एक बेहद जुरअतमंद और दूर-अंदेश सियासी मौक़िफ़ था। आगे चलकर सन 1921 में, जब उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सालाना अधिवेशन की सदरात की, तो वहीं से भी उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के पूर्ण स्वतंत्रता का मुतालबा दोहराया।
इस तरह मौलाना हसरत मोहानी उन चंद रहनुमाओं में शुमार होते हैं, जिन्होंने बहुत पहले ही मुकम्मल आज़ादी को अपनी सियासत और जद्दोजहद का मरकज़ बना लिया था—और इसी वजह से उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की तारीख़ में हमेशा इज़्ज़त और एहतराम के साथ लिया जाता रहेगा।

कम्युनिस्ट तहरीक और अदबी ख़िदमात

मौलाना हसरत मोहानी न सिर्फ़ आज़ादी की जद्दोजहद के सरगर्म सिपाही थे, बल्कि वह हिंदुस्तान में कम्युनिस्ट तहरीक की बुनियाद रखने वालों में भी शुमार होते हैं। वह रूसी इंक़िलाब से गहराई से मुतास्सिर थे और इंसाफ़, मुसावात और मेहनतकश तबक़े के हुक़ूक़ की हिमायत को अपनी फ़िक्र का अहम हिस्सा बनाए रखते थे। सन 1925 में कानपुर में होने वाले कम्युनिस्ट सम्मेलन की तैयारियों का मरकज़ उनका अपना घर था, जहाँ इंक़िलाबी अफ़कार और तहरीकी मंसूबों ने शक्ल अख़्तियार की।
इसी तरह 1936 में लखनऊ में क़ायम होने वाले प्रगतिशील लेखक संघ के इब्तिदाई (स्थापना) सम्मेलन में भी उन्होंने सरगर्मी से शिरकत की और अदब को समाजी बदलाव का ज़रिया बनाने की पुरज़ोर हिमायत की।

अदबी मैदान में मौलाना हसरत मोहानी की ख़िदमात भी उतनी ही वसीअ और क़ाबिल-ए-एहतराम हैं। उनकी तसनीफ़ात में कुल्लियात-ए-हसरत मोहानी, शरह-ए-कलाम-ए-ग़ालिब, नुक़ात-ए-सुखन, मशाहिदात-ए-जिंदान और तज़किरा-तुल-शुआरा ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।
उनकी मशहूर ग़ज़ल चुपके चुपके रात दिन को ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ से अमर बना दिया। यह ग़ज़ल 1982 की मशहूर फ़िल्म निकाह में भी शामिल की गई, जिसने इसे हर दिल-अज़ीज़ बना दिया।
इस तरह मौलाना हसरत मोहानी की शख़्सियत सियासत, इंक़िलाब और अदब—तीनों का ऐसा संगम है, जो आज भी फ़िक्र और एहसास को रौशन करता है।

वफ़ात और विरासत

मौलाना हसरत मोहानी का विसाल 13 मई 1951 को लखनऊ में हुआ। उनके इंतिक़ाल के साथ एक दौर ने पर्दा तो किया, मगर उनकी फ़िक्र, शायरी और इंक़िलाबी रूह आज भी ज़िंदा है। उनकी याद को बाक़ी और रौशन रखने के लिए मौलाना नुसरत मोहानी ने 1951 ही में हसरत मोहानी मेमोरियल सोसाइटी की बुनियाद रखी, जो उनके अफ़कार और अदबी विरसे की निगहबानी का फ़र्ज़ अंजाम देती है। इसी सिलसिले की एक कड़ी के तौर पर कराची (सिंध, पाकिस्तान) में हसरत मोहानी मेमोरियल लाइब्रेरी एंड हॉल क़ायम किया गया, जहाँ इल्म, अदब और तहरीक की रवायत सांस लेती है। भारत और पाकिस्तान—दोनों मुल्कों में हर साल उनके यौम-ए-विसाल पर मुख़्तलिफ़ इदारों की जानिब से ताज़ीमी जलसे और इज़हारे-अक़ीदत की महफ़िलें मुनअक़िद की जाती हैं।

उनकी ख़िदमात के एतिराफ़ में भारत और पाकिस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों और इदारों को उनके नाम से मंसूब किया गया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हसरत मोहानी हॉस्टल, कराची में हसरत मोहानी रोड और कानपुर में मौलाना हसरत मोहानी अस्पताल उनके नाम की वह रौशन निशानियाँ हैं, जो इस बात की गवाही देती हैं कि मौलाना हसरत मोहानी सिर्फ़ अपने अहद के नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी एक ज़िंदा विरासत हैं।

इशाअत और अदबी कारनामे

मौलाना हसरत मोहानी की अदबी ज़िंदगी इल्म, फ़िक्र और इंक़िलाब का हुस्न-ए-इज्तिमाअ है। उन्होंने सिर्फ़ शायरी ही नहीं कही, बल्कि उर्दू अदब को फ़िक्र-ओ-नज़र की नई सम्तें भी अता कीं। सन 1903 में उन्होंने अदबी रिसाला उर्दू-ए-मोअल्ला जारी किया, जो बहुत जल्द उर्दू दुनिया में फ़िक्र-ओ-तहज़ीब की एक मुअतबर आवाज़ बन गया। यह रिसाला उस दौर में अदब और सियासत—दोनों के लिए रहनुमा साबित हुआ।

उनकी अहम तसनीफ़ात में कुल्लियात-ए-हसरत मोहानी शामिल है, जिसमें उनकी ग़ज़लों और अशआर का जामेअ और नुमाइंदा मजमूआ मौजूद है। शरह-ए-कलाम-ए-ग़ालिब के ज़रिये उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी की बारीकियों और मआनी पर इल्मी रौशनी डाली। नुक़ात-ए-सुखन में शायरी के फ़न्नी और फ़िक्री पहलुओं पर गहरी बहस मिलती है, जबकि तज़किरा-तुल-शुआरा में शायरों की ज़िंदगी और फ़न का तहक़ीक़ी जायज़ा पेश किया गया है। क़ैद-ओ-बंद के तल्ख़ तजुर्बात पर मुश्तमिल मशाहिदात-ए-जिंदान उनकी सब्र, इस्तिक़लाल और हक़-गोई की ज़िंदा दस्तावेज़ है।

मौलाना हसरत मोहानी ऐसे मुजाहिद-ए-आज़ादी थे, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के हर पहलू को जद्दोजहद, सच्चाई और वतन-परस्ती से जोड़ दिया। सादगी, दीयानत और बेबाकी उनकी शख़्सियत का ख़ास पहचान-नामा थी। उनकी शायरी आज भी दिलों में हरारत पैदा करती है, ज़ेहनों को झिंझोड़ती है और इंसान को हक़ और इंसाफ़ के रास्ते पर चलने की दावत देती है। यक़ीनन, उनकी याद और उनके कारनामे हमेशा इज़्ज़त, एहतराम और अक़ीदत के साथ याद किए जाते रहेंगे।

हसरत मोहनी की शायरी,ग़ज़लें,नज़्में 


1-ग़ज़ल 

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले पहल दिल का लगाना याद है

बार बार उठना उसी जानिब निगाह ए शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अतन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है

जान कर सोता तुझे वो क़स्द ए पा बोसी मिरा
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राह ए लिहाज़
हाल ए दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार ख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी छुपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र ए फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

आज तक नज़रों में है वो सोहबत ए राज़ ओ नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है

मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है

देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

शौक़ में मेहंदी के वो बे दस्त ओ पा होना तिरा
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है

बावजूद ए इद्दिया ए इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे
आज तक अहद ए हवस का वो फ़साना याद है

2-ग़ज़ल 


रौशन जमालए यार से है अंजुमन तमाम
दहका हुआ है आतिश ए गुल से चमन तमाम

हैरत ग़ुरूर ए हुस्न से शोख़ी से इज़्तिराब
दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम

अल्लाह री जिस्म ए यार की ख़ूबी कि ख़ुद ब ख़ुद
रंगीनियों में डूब गया पैरहन तमाम

दिल ख़ून हो चुका है जिगर हो चुका है ख़ाक
बाक़ी हूँ मैं मुझे भी कर ऐ तेग़ ज़न तमाम

देखो तो चश्म ए यार की जादू निगाहियाँ
बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम

है नाज़ ए हुस्न से जो फ़रोज़ाँ जबीन ए यार
लबरेज़ आब ए नूर है चाह ए ज़क़न तमाम

नश्व ओ नुमा ए सब्ज़ा ओ गुल से बहार में
शादाबियों ने घेर लिया है चमन तमाम

उस नाज़नीं ने जब से किया है वहाँ क़याम
गुलज़ार बन गई है ज़मीन ए दकन तमाम

अच्छा है अहलए जौर किए जाएँ सख़्तियाँ
फैलेगी यूँ ही शोरिश ए हुब्ब ए वतन तमाम

समझे हैं अहल ए शर्क़ को शायद क़रीब ए मर्ग
मग़रिब के यूँ हैं जम्अ' ये ज़ाग़ ओ ज़ग़न तमाम

शीरीनी ए नसीम है सोज़ ओ गदाज़ ए 'मीर'
'हसरत' तिरे सुख़न पे है लुत्फ़ ए सुख़न तमाम

3-ग़ज़ल 


आप ने क़द्र कुछ न की दिल की
उड़ गई मुफ़्त में हँसी दिल की

ख़ू है अज़-बस कि आशिक़ी दिल की
ग़म से वाबस्ता है ख़ुशी दिल की

याद हर हाल में रहे वो मुझे
अल ग़रज़ बात रह गई दिल की

मिल चुकी हम को उन से दाद ए वफ़ा
जो नहीं जानते लगी दिल की

चैन से महव ए ख़्वाब ए नाज़ में वो
बेकली हम ने देख ली दिल की

हमा तन सर्फ़ होश्यारी ए इश्क़
कुछ अजब शय है बे ख़ुदी दिल की

उन से कुछ तो मिला वो ग़म ही सही
आबरू कुछ तो रह गई दिल की

मर मिटे हम न हो सकी पूरी
आरज़ू तुम से एक भी दिल की

वो जो बिगड़े रक़ीब से 'हसरत'
और भी बात बन गई दिल की

4-ग़ज़ल 

रोग दिल को लगा गईं आँखें
इक तमाशा दिखा गईं आँखें

मिल के उन की निगाह ए जादू से
दिल को हैराँ बना गईं आँखें

मुझ को दिखला के राह ए कूचा ए यार
किस ग़ज़ब में फँसा गईं आँखें

उस ने देखा था किस नज़र से मुझे
दिल में गोया समा गईं आँखें

महफ़िल ए यार में ब ज़ौक़ ए निगाह
लुत्फ़ क्या क्या उठा गईं आँखें

हाल सुनते वो क्या मिरा 'हसरत'
वो तो कहिए सुना गईं आँखें

नज़्म 

मथुरा कि नगर है आशिक़ी का 

दम भरती है आरज़ू इसी का 

हर ज़र्रा ए सर ज़मीन ए गोकुल 

दारा है जमाल ए दिलबरी का 

बरसाना ओ नंद गाँव में भी 

देख आए हैं जल्वा हम किसी का 

पैग़ाम ए हयात ए जावेदाँ था 

हर नग़्मा ए कृष्ण बाँसुरी का 

वो नूर ए सियाह या कि हसरत 

सर चश्मा फ़रोग़ ए आगही का 

तब्सरा :-

मौलाना हसरत मोहानी की शख़्सियत और फ़न को अगर जदीद नज़रिये से देखा जाए, तो वह महज़ एक शायर, सियासतदान या आज़ादी के सिपाही भर नहीं नज़र आते, बल्कि वह फ़िक्र, जज़्बे और अमल का ऐसा मुकम्मल संगम हैं, जो आज के दौर में भी पूरी तरह मानीख़ेज़ और मौज़ूं है। उनकी ज़िंदगी बयान और अमल के दरमियान किसी फ़ासले को क़बूल नहीं करती। वह जो कहते थे, वही जीते थे—और जो जीते थे, वही उनकी शायरी और सियासत में झलकता है। आज जब ज़्यादातर आवाज़ें मौक़िफ़ से ज़्यादा मुनाफ़े की तलाश में दिखाई देती हैं, हसरत मोहानी एक ऐसे किरदार के तौर पर सामने आते हैं, जो किसी भी तरह के समझौते को अपनी फ़िक्र पर हावी नहीं होने देता।

उनकी सादगी, फ़क़्र और इस्तिग़ना किसी ज़ाती कमज़ोरी का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा सियासी और अख़लाक़ी मौक़िफ़ थी। सरकारी भत्तों से इंकार करना, आम सवारी में सफ़र करना और आम आदमी की तरह ज़िंदगी गुज़ारना—यह सब उनके लिए दिखावा नहीं, बल्कि उस निज़ाम के ख़िलाफ़ ख़ामोश मगर वाज़ेह एहतिजाज था, जो इंसान को ओहदों और सहूलियतों में तौलता है। इस मायने में वह आज की ज़बान में एक

anti-establishment conscience नज़र आते हैं।

फ़न के मैदान में हसरत मोहानी की सबसे बड़ी ख़ासियत उनकी वही दोहरी मगर हमआहंग फ़ितरत है, जिसमें इंक़िलाब और इश्क़ एक-दूसरे की नफ़ी नहीं करते, बल्कि एक-दूसरे को मुकम्मल करते हैं। एक ही शायर के यहाँ “इंक़लाब ज़िंदाबाद” जैसी बुलंद सियासी आवाज़ भी मिलती है और “चुपके चुपके रात दिन” जैसी नर्म, लतीफ़ और जज़्बाती ग़ज़ल भी। यह द्वैत नहीं, बल्कि इंसानी तजुर्बे की पूरी तस्वीर है—जहाँ बाहर ज़ुल्म से टकराव है और अंदर एहसास की नाज़ुकियत। आज का इंसान भी इसी कशमकश से गुज़र रहा है, और इसी लिए हसरत मोहानी की शायरी आज भी दिल और ज़ेहन दोनों से मुख़ातिब होती है।

जदीद तन्क़ीदी फ़्रेमवर्क में हसरत मोहानी को सिर्फ़ एक रोमांटिक इंक़िलाबी शायर कह देना नाकाफ़ी है। वह तबक़ाती शऊर रखते थे, मज़हबी पहचान के साथ समाजी इंसाफ़ की बात करते थे और क़ौमियत को अंधी वतन-परस्ती में तब्दील होने से बचाते थे। उनकी सोच में सवाल है, बेचैनी है और जवाब तलाश करने की जुरअत भी। यही वजह है कि वह आज के पोस्ट-कोलोनियल और प्रोग्रेसिव डिस्कोर्स में भी पूरे वज़न के साथ मौजूद दिखाई देते हैं।

आख़िरकार, मौलाना हसरत मोहानी की शख़्सियत और फ़न हमें यह एहसास दिलाते हैं कि शायरी महज़ ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदार मौक़िफ़ होती है, और सियासत सिर्फ़ तक़रीर या नारा नहीं, बल्कि एक अख़लाक़ी इम्तिहान होती है। इसी लिए हसरत मोहानी न तो सिर्फ़ तारीख़ का एक बाब हैं और न ही अदबी किताबों की ज़ीनत—वह आज भी उन ज़ेहनों के साथ चल रहे हैं जो सोचते हैं, उन दिलों में ज़िंदा हैं जो सवाल करते हैं, और उन रूहों के लिए मशाल हैं जो हर दौर में सच के साथ खड़े रहने का हौसला रखती हैं।ये भी पढ़ें 

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