Saleem Kausar
اصل نام: محمد سلیم
तआरुफ़
उर्दू ग़ज़ल की नर्म, दर्दमंद और असरदार आवाज़ सलीम कौसर उन शायरों में शुमार होते हैं जिनकी शायरी सीधे दिल से निकलकर दिल तक पहुँचती है। उनके अशआर में इश्क़ की सादगी, जुदाई की कसक, और ज़िंदगी की तहज़ीबी उदासी एक साथ बोलती है। ख़ासतौर पर ग़ज़ल “मैं ख़याल हूँ किसी और का” ने उन्हें ऐसी शोहरत बख़्शी कि उनका नाम उर्दू अदब के मुसल्लम हस्ताक्षरों में शामिल हो गया।
वलादत और शुरुआती ज़िंदगी
सलीम कौसर का जन्म 24 अक्टूबर 1947 को पानीपत (पूर्वी पंजाब, भारत) में हुआ। तक़सीम-ए-हिंद के बाद उनका ख़ानदान पाकिस्तान हिजरत कर गया और पंजाब के ख़ानवेल में आबाद हुआ। यहीं उनकी इब्तिदाई और सानवी तालीम मुकम्मल हुई। बाद के बरसों में वे अपने घरवालों के साथ कबीरवाला चले आए, जहाँ उनकी अदबी सरगर्मियाँ और ज़्यादा संगठित शक्ल इख़्तियार करने लगीं।
कराची की तरफ़ रुख़
सन 1972 में सलीम कौसर कराची मुंतक़िल हुए। यह शहर उनके लिए सिर्फ़ रोज़गार का ज़रिया नहीं, बल्कि अदबी तशख़ीस का अहम मरकज़ साबित हुआ। यहाँ उन्होंने मुख़्तलिफ़ उर्दू अख़बारात में काम किया और बाद में पाकिस्तान टेलीविज़न (PTV) से वाबस्ता हो गए। मीडिया से उनका यह रिश्ता उनकी शायरी की पहुँच को आम लोगों तक ले गया। कई बरसों की ख़िदमत के बाद वे रिटायर हो चुके हैं।
अदबी सफ़र
सलीम कौसर ने अपने अदबी करियर की शुरुआत कबीरवाला से की, जहाँ उन्हें मशहूर और क़ौमी सतह के शायरों की सोहबत नसीब हुई। मुशायरों में शिरकत और मुसलसल मश्क़ ने उनकी ग़ज़ल को पुख़्तगी बख़्शी। कराची आने के बाद उन्होंने अख़बारात में रोज़ाना क़तआत लिखीं—जो उर्दू शायरी की एक नफ़ीस और मुश्किल फ़न है।
उनकी ग़ज़ल “मैं ख़याल हूँ किसी और का” जब 1980 के आसपास मशहूर गायकों की आवाज़ में सामने आई, तो यह उनकी शायरी का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस ग़ज़ल ने उन्हें अवाम और ख़ास—दोनों के दिलों में मक़बूल बना दिया।
आलमी मुशायरे और शुहरत
सलीम कौसर ने दुनिया के कई मुल्कों—क़तर (दोहा), अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, डेनमार्क, मिडिल ईस्ट और हिंदुस्तान—में मुशायरों में शिरकत की। उनकी शायरी की क़ुबूलियत सरहदों से परे है, क्योंकि उनके अल्फ़ाज़ इंसानी जज़्बात की साझा ज़बान बोलते हैं।
शायरी की रूह
सलीम कौसर की शायरी का असल हुस्न उसकी सादगी में छुपा है। वे बड़े दावों या पेचीदा इस्तिलाहात के बजाय सीधे, सच्चे और असरदार अल्फ़ाज़ चुनते हैं। एक अदीब के बक़ौल, वे दौलत में नहीं, मगर दिल की सख़ावत में बेशुमार हैं—
“प्यार करने के लिए, गीत सुनाने के लिए
इक ख़ज़ाना है मेरे पास लुटाने के लिए।”
यह शेर उनकी फ़ितरत और फ़न—दोनों की मुकम्मल तर्जुमानी करता है।
इनआम और एज़ाज़
उर्दू अदब के लिए उनकी ख़िदमात के एतिराफ़ में 2015 में उन्हें हुकूमत-ए-पाकिस्तान की जानिब से प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस अवॉर्ड से नवाज़ा गया। यह एज़ाज़ उनकी तख़्लीक़ी ज़िंदगी का अहम मील-पत्थर है।
तस्नीफ़ात (किताबें)
सलीम कौसर की शायरी कई संग्रहों में महफ़ूज़ है, जिनमें ख़ास तौर पर ये किताबें क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं—
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मुहब्बत इक शजर है (1994)
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ख़ाली हाथों में अर्ज़-ओ-समां (1980)
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ये चराग़ है तो जला रहे (1987)
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ज़रा मौसम बदलने दो (1991)
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दुनिया मेरी आरज़ू से कम है (2007)
इन तमाम किताबों में इश्क़, वक़्त, जुदाई और इंसानी एहसासात की नर्म आंच महसूस की जा सकती है।
सलीम कौसर की शायरी ,ग़ज़लें नज़्मे
ग़ज़ल -1
कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से
हम भरे शहर की ख़ल्वत में मिले हैं तुझ से
साए से साया गुज़रता हुआ महसूस हुआ
इक अजब ख़्वाब की हैरत में मिले हैं तुझ से
इतना शफ़्फ़ाफ़ नहीं है अभी अक्स-ए-दिल-ओ-जाँ
आईने गर्द-ए-मसाफ़त में मिले हैं तुझ से
इस क़दर तंग नहीं वुसअत-ए-सहरा-ए-जहाँ
हम तो इक और ही वहशत में मिले हैं तुझ से
जुज़ ग़म-ए-'इश्क़ कोई काम नहीं है सो ऐ हुस्न
जब मिले इक नई हालत में मिले हैं तुझ से
वक़्त का सैल-ए-रवाँ रोक ही लेंगे शायद
वो जो फिर मिलने की हसरत में मिले हैं तुझ से
इतना ख़ुश-फ़हम न हो अपनी पज़ीराई पर
हम किसी और मोहब्बत में मिले हैं तुझ से
याद का ज़ख़्म भी हम तुझ को नहीं दे सकते
देख किस आलम-ए-ग़ुर्बत में मिले हैं तुझ से
अब अगर लौट के आए तो ज़रा ठहरेंगे
हम मुसाफ़िर हैं सो उजलत में मिले हैं तुझ से
ग़ज़ल -2
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है
मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है
अजब ए'तिबार ओ बे-ए'तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है
मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है
तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ कोई और है
वही मुंसिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की इबारतें
मिरा जुर्म तो कोई और था प मिरी सज़ा कोई और है
कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है
जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को 'सलीम' सुब्ह न मिल सकी
तो फिर इस के मअ'नी तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है
ग़ज़ल -3
मिलना न मिलना एक बहाना है और बस
तुम सच हो बाक़ी जो है फ़साना है और बस
लोगों को रास्ते की ज़रूरत है और मुझे
इक संग-ए-रहगुज़र को हटाना है और बस
मसरूफ़ियत ज़ियादा नहीं है मिरी यहाँ
मिट्टी से इक चराग़ बनाना है और बस
सोए हुए तो जाग ही जाएँगे एक दिन
जो जागते हैं उन को जगाना है और बस
तुम वो नहीं हो जिन से वफ़ा की उमीद है
तुम से मिरी मुराद ज़माना है और बस
फूलों को ढूँडता हुआ फिरता हूँ बाग़ में
बाद-ए-सबा को काम दिलाना है और बस
आब ओ हवा तो यूँ भी मिरा मसअला नहीं
मुझ को तो इक दरख़्त लगाना है और बस
नींदों का रत-जगों से उलझना यूँही नहीं
इक ख़्वाब-ए-राएगाँ को बचाना है और बस
इक वा'दा जो किया ही नहीं है अभी 'सलीम'
मुझ को वही तो वा'दा निभाना है और बस
ग़ज़ल -4
अभी जो गर्दिश-ए-अय्याम से मिला हूँ मैं
समझ रही थी किसी काम से मिला हूँ मैं
शिकस्त-ए-शब तिरी तक़रीब से ज़रा पहले
दिए जलाती हुई शाम से मिला हूँ मैं
अजल से पहले भी मिलता रहा हूँ पर अब के
बड़े सुकूँ बड़े आराम से मिला हूँ मैं
तिरी क़बा की महक हर तरफ़ नुमायाँ थी
हवा-ए-वादी-ए-गुल-फ़ाम से मिला हूँ मैं
मैं जानता हूँ मकीनों की ख़ामुशी का सबब
मकाँ से पहले दर-ओ-बाम से मिला हूँ मैं
'सलीम' नाम बताया था ग़ालिबन उस ने
कल एक शाएर-ए-गुम-नाम से मिला हूँ मैं
ग़ज़ल -5
अच्छा है इसी सूरत-ए-हालात में रहना
दिन शहर में और रात मज़ाफ़ात में रहना
हर रात सितारों को ज़मीं पर लिए फिरना
हर सुब्ह कहीं हम्द-ओ-मुनाजात में रहना
इस भीड़ में गर्द-ए-दर-ओ-दीवार है इतनी
मुमकिन ही नहीं हाथ किसी हात में रहना
उस शख़्स की चाहत भी अजब है कि हमेशा
ख़ातिर में न लाना तो मुदारात में रहना
ये शहर समुंदर के किनारे प है आबाद
इस शहर में रहना भी तो औक़ात में रहना
हम अहल-ए-तरीक़त की यही रस्म रही है
ज़िंदान में या हल्क़ा-ए-सादात में रहना
दिखना तो 'सलीम' अपने रवय्ये ही पे दिखना
ख़ुश रहना तो अपनी ही किसी बात में रहना
नज़्म -1
माँ
अज़ीम माँ
तू ने अपने बेटों को
बेवगी की सियाह चादर में रौशनी का सबक़ पढ़ाया
अज़ीम माँ
तू ने दुख उठाए कि तेरे बेटे जवान होंगे
तो उम्र भर की मसाफ़तों का ख़िराज लूँगी
तमाम हिस्से विरासतों के
तमाम लम्हे मोहब्बतों के
तमाम आँसू मसर्रतों के
जवान होंगे तो अपने बेटों में बाँट दूँगी
अज़ीम माँ तेरे सारे बेटे जवाँ हुए हैं
तो अब ये पलकों पे आंसुओं की सबील कैसी
उफ़ुक़ के उस पार ख़ाली आँखों के जाल फैलाए
अब तू किस शय की मुंतज़िर है
नज़्म -2
तुम्हें ख़बर है कहा था तुम ने
मैं लफ़्ज़ सोचूँ मैं लफ़्ज़ बोलूँ मैं लफ़्ज़ लिक्खूँ
मैं लफ़्ज़ लिखने पे ज़िंदगी के अज़ीज़ लम्हों को नज़्र कर दूँ
मैं लफ़्ज़ लिक्खूँ
और उन की आँखों में मुंजमिद रतजगों को अपने लहू की ताज़ा हरारतें दे के
जगमगा दूँ
तो मैं बड़ा हूँ
तुम्हें ख़बर है
मिरी रगों में बड़े क़बीले के शाहज़ादे का ख़ून ज़िंदा रवाँ-दवाँ है
जिसे मोहब्बत के दुश्मनों बे-ज़मीर लोगों ने
प्यार करने के जुर्म में क़त्ल कर दिया था
यही नहीं बल्कि ख़ुद को मुंसिफ़ बना लिया था
किसी ने भी ख़ूँ-बहा न माँगा
कि शहर-ए-मेहनत के सब बुज़ुर्गों ने दरगुज़र का सबक़ दिया था
मगर वो मैं था कि लफ़्ज़ लिक्खे
तुम्हें ख़बर है
कि मेरी बूढ़ी अज़ीम माँ ने जवान बेटों को हादसों के
सुपुर्द कर के दुआएँ माँगीं
ख़ुदा-ए-बर्तर मिरे लहू को अमर बना दे
दुआएँ माँगें तो उन के चेहरे पे गुज़रे मौसम के सारे दुख
सिलवटों की सूरत उभर गए हैं
मगर वो मफ़्लूज हो गई है
यक़ीन जानो कि मैं ने ऐसे अज़ाब लम्हों में लफ़्ज़ लिक्खे
तुम्हें ख़बर है
बड़ी हवेली के रहने वाले तमाम लोगों को छोड़ कर मैं ने लफ़्ज़ लिक्खे
तुम्हें ख़बर है
मैं लहलहाते हसीन खेतों को छोड़ शहर की बे-अमाँ
फ़सीलों में आगया हूँ
और अपने साए की खोज में हूँ
कहीं मिले तो मैं लफ़्ज़ लिक्खूँ
नहीं मिले तो मैं लफ़्ज़ लिक्खूँ
तुम्हें ख़बर है कहा था तुम ने
कि वक़्त मुंसिफ़ है
और वो फ़ैसला करेगा
नज़्म -3
वही कार-ए-दुनिया
वही कार-ए-दुनिया के अपने झमेले
वही दिल की हालत
वही ख़्वाहिशों आरज़ूओं के मेले
वही ज़िंदगी से भरी भीड़ में चलने वाले सभी लोग
अपनी जगह पर अकेले
कई गर्द-आलूद मंज़र निगाहों की दहलीज़ पर जम गए हैं
मुझे यूँ लगा जैसे चलते हुए वक़्त के क़ाफ़िले थम गए हैं
ज़रा सीढ़ियों से उधर मैं ने देखा
वही शहर है और वही शहर की बे-करामत फ़ज़ा है
वही ख़ल्क़ है और वही ख़ल्क़ के भूल जाने की अपनी अदा है
वही रास्ते हैं वही बे-सुहूलत सफ़र की सज़ा है
वही साँस लेने को जीने को बे-मेहर आब-ओ-हवा है
वही ज़िंदगी है वही उस के चारों तरफ़ बे-तहफ़्फ़ुज़ रिदा है
वही सीढ़ियों से उधर राहदारी के बाएँ तरफ़ ख़ाली कमरा
तिरी गुफ़्तुगू से भरा ख़ाली कमरा
तिरे क़हक़हों के समुंदर में डूबा हुआ आंसुओं का जज़ीरा
जज़ीरे में उड़ता हुआ इक परिंदा
मुंडेरों दरीचों दरख़्तों की तन्हाइयों का मुदावा परिंदा
तिरी चाहतों और वफ़ा-दारियों के उफ़ुक़ पर सितारा-नुमा इक परिंदा
तिरे गीत गाता
तमन्नाओं की बारिशों में नहाता
किसी ताज़ा इम्कान को जगमगाता
कहीं दूर फैली हुई कहकशाओं में गुम हो गया है
ज़रा सीढ़ियों से उधर मैं ने देखा
कई लिखने वाले
ख़ुशामद का कासा लिए अपने ग़ीबत-कदे में खड़े हैं
सियासी वडेरे
मुसावात का नाम ले कर हमेशा ग़रीब आदमी की अना से लड़े हैं
कई अहल-ए-दानिश
जो मज़लूम की आह-ओ-ज़ारी पे दिखते थे
ज़ालिम के दर पर पड़े हैं
यहाँ कोई छोटा नहीं है
सब इक दूसरे से बड़े हैं
तिरी शाइरी का ख़मीर अपने जज़्बों की सच्चाइयों से उठा था
तू अपने उसूलों के आतिश-फ़िशाँ पर खड़ा
ज़िंदगी की रिया-कारियों से नबर्द-आज़मा था
तू अपने रवय्यों की सब हालतों में
मोहब्बत से लिक्खी हुई इक दुआ था
तू अहल-ए-वफ़ा का ज़मीर आश्ना था
अभी सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते मैं रुक सा गया हूँ
वहाँ कौन है
कौन है अब जो दस्तक की पहली किरन की हिकायत सुनेगा
नए रतजगों की मसाफ़त में उलझे हुए आने वाले दिनों की
रिवायत सुनेगा
चराग़ों की आवाज़ में
आइनों की तिलावत सुनेगा
मिरे शाइ'र-ए-ख़ुश-नवा
तू कि दुश्मन भी अच्छा था
और दोस्ती में भी तेरा यहाँ कोई सानी नहीं है
जिसे अहल-ए-दिल भूल जाएँगे
तू वो कहानी नहीं है
तब्सरा:-
सलीम कौसर की शायरी—चाहे वह ग़ज़ल हो या नज़्म—ज़िंदगी की गहरी परतों में उतरकर इंसानी एहसास को उसकी असल सूरत में पेश करती है। उनके यहाँ अल्फ़ाज़ का शोर नहीं, बल्कि ख़ामोशी की गूँज सुनाई देती है; ऐसी ख़ामोशी जो पढ़ने वाले के दिल में देर तक ठहरी रहती है। सलीम कौसर उस क़बीले के शायर हैं जो जज़्बात को नारे में नहीं, तजुर्बे में ढालते हैं।
उनकी ग़ज़लों में इश्क़ कोई रूमानी ख़्वाब नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी, एक इंतज़ार और कभी-कभी एक आज़माइश बनकर सामने आता है। जुदाई, फ़िराक़ और तन्हाई उनके यहाँ रोने-बिलखने की सूरत में नहीं, बल्कि ठहरे हुए दर्द की शक्ल में मौजूद रहती है। यही ठहराव उनकी शायरी को वक़ार अता करता है। सलीम कौसर की नज़्में भी इसी तहज़ीब के साथ आगे बढ़ती हैं—जहाँ ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें बिना शोर-शराबे के बयान हो जाती हैं।
उनकी फ़िक्र का दायरा बहुत वसीअ है। वह मोहब्बत से शुरू होकर समाज, वक़्त और इंसान की अंदरूनी टूट-फूट तक पहुँचते हैं। मगर कमाल यह है कि कहीं भी बयान बोझिल नहीं होता। सादा-सी लगने वाली पंक्तियाँ अपने भीतर गहरी मानीख़ेज़ी छुपाए होती हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी अवाम और ख़वास—दोनों को एक साथ मुतास्सिर करती है।
सलीम कौसर के यहाँ ज़िंदगी शिकायत नहीं बनती, बल्कि सवाल बनकर उभरती है—और यही सवाल पाठक को अपने आप से मुख़ातिब होने पर मजबूर कर देते हैं। उनकी शायरी दरअसल एहसास की वह तहज़ीब है, जहाँ दर्द भी अदब के साथ बात करता है और मोहब्बत भी संजीदगी के साथ मुस्कुराती है।
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