Saqi Farooqi Poet: जदीद उर्दू शायरी का एक मुनफ़रिद और आलमी शायर

 

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ शायर ऐसे भी गुज़रे हैं जिनकी शख़्सियत और फ़िक्र ने शायरी को नई राहें दिखाईं। क़ाज़ी मुहम्मद शमशाद नबी फ़ारूक़ी, जो अदबी दुनिया में “साक़ी फ़ारूक़ी” के नाम से मशहूर हुए, उन्हीं अहम और नुमायाँ शायरों में शुमार किए जाते हैं। वह उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों ज़बानों में शायरी करने वाले एक क़ाबिल-ए-ज़िक्र ब्रिटिश-पाकिस्तानी शायर, नाक़िद और मज़मून निगार थे।


साक़ी फ़ारूक़ी का नाम जदीद उर्दू शायरी के उन प्रतिनिधि शायरों में लिया जाता है जिन्होंने क्लासिकी रवायत की जड़ों को बरक़रार रखते हुए अपने दौर के तजुर्बात, तन्हाई, हिजरत, इंसानी रिश्तों की पेचीदगियों और समाजी तजुर्बों को बड़ी गहराई से बयान किया। उनकी ग़ज़लों में जहाँ रिवायती लहजा मिलता है, वहीं उनकी नज़्मों में तजरीदी और फ़लसफ़ियाना रंग साफ़ नज़र आता है। ख़ुसूसन जानवरों की अलामतों—जैसे चूहा, साँप वग़ैरह—का इस्तिमाल उनकी शायरी का एक बेहद मुनफ़रिद और यादगार पहलू माना जाता है।


इब्तिदाई ज़िंदगी और तालीम

साक़ी फ़ारूक़ी का असल नाम क़ाज़ी मुहम्मद शमशाद नबी फ़ारूक़ी था। उनका जन्म 21 दिसम्बर 1936 को भारत के शहर गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। जब 1947 में बर्रे-सग़ीर की तक़सीम हुई, उस वक़्त उनकी उम्र महज़ ग्यारह बरस थी।

तक़सीम के बाद उनका ख़ानदान कुछ अरसे तक भारत में रहा, मगर 1948 में वह मशरिक़ी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) चला गया। वहाँ से 1952 में उनका परिवार कराची, पाकिस्तान आ बसा।

कराची में साक़ी फ़ारूक़ी ने उर्दू कॉलेज से साइंस में इंटरमीडिएट की तालीम हासिल की और बाद में कराची यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन मुकम्मल किया। अदबी शौक़ उन्हें बचपन से था। शुरू-शुरू में वह अफ़साना निगारी की तरफ़ माइल थे, मगर एक वाक़िया ऐसा पेश आया कि उनके लिखे हुए अफ़साने चोरी हो गए। इस हादसे ने उन्हें गहरी मायूसी में डाल दिया और उन्होंने अफ़साना छोड़कर शायरी को अपना असल ज़रिया-ए-इज़हार बना लिया।

कराची में ही उनकी अदबी तरबियत हुई और 1955 के बाद उनकी शायरी मुल्क के मशहूर रसाइल—आज, लैल-ओ-निहार, अदब-ए-लतीफ़, सवेरा और फुनून—में बाक़ायदगी से शाए होने लगी। उन्होंने रेडियो के लिए गीत, नग़मे और बच्चों की शायरी भी तख़्लीक़ की। एक मुद्दत तक वह माहनामा “नवाए कराची” के मुदीर (संपादक) भी रहे।


अदबी सफ़र और हिजरत का तजुर्बा

1960 की दहाई के आख़िर या 1970 के शुरू में साक़ी फ़ारूक़ी पाकिस्तान से लंदन मुंतक़िल हो गए और अपनी बाक़ी ज़िंदगी वहीं गुज़ारी। लंदन में क़याम ने उनकी शख़्सियत और शायरी दोनों को एक आलमी और कॉस्मोपॉलिटन रंग दिया।

उन्होंने उर्दू के साथ-साथ अंग्रेज़ी में भी शायरी की और अंग्रेज़ी अदबी हल्क़ों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उनकी शायरी में हिजरत का दर्द, तहज़ीबी टकराव, तन्हाई, इंसानी राब्तों की उलझनें और जदीद ज़िंदगी की कश्मकश बार-बार सामने आती है।

साक़ी फ़ारूक़ी का एक ख़ास अंदाज़ यह भी था कि वह जानवरों की अलामतों के ज़रिये इंसानी समाज और उसकी सियासत का इस्तिआरा पेश करते थे। इसी वजह से उनकी नज़्म “शाह दौला का चूहा” उर्दू अदब में एक बेहद मशहूर और अहम नज़्म मानी जाती है।


अहम तस्नीफ़ात

साक़ी फ़ारूक़ी की अदबी ख़िदमतें कई अहम किताबों की शक्ल में सामने आईं। उनके मशहूर शायरी मजमुए इस तरह हैं—

  • राज़ों से भरा बस्ता (1981)

  • राडार (1982)

  • बाज़गश्त-ओ-बाज़याफ़्त (1987)

  • ज़िंदा पानी सच्चा (1990)

  • हिदायतनामा-ए-शायर (1995)

  • ग़ज़ल है शर्त (2004)

  • सुर्ख़ गुलाब और बद्र-ए-मुनीर (2005)

  • शाह दौला का चूहा और दूसरी मुन्तख़िब नज़्में (2008)

अंग्रेज़ी ज़बान में उनका मशहूर मजमुआ “Nailing Dark Storm” है, जिसने उन्हें अंग्रेज़ी अदबी हल्क़ों में भी पहचान दिलाई।

Book “Nailing Dark Storm”

इसके अलावा उनकी दिलचस्प और मशहूर ख़ुदनविश्त “आप बीती पाप बीती” भी 2008 में शाए हुई, जिसमें उन्होंने अपनी ज़िंदगी के तजुर्बात को बेबाक और दिलचस्प अंदाज़ में बयान किया। यह किताब पहले मुक़ालमा और नया वर्क़ जैसे रसाइल में क़िस्तवार शाए होती रही।


फ़िक्र-ओ-फ़न की ख़ुसूसियत

साक़ी फ़ारूक़ी की शायरी में कई अहम विषय बार-बार सामने आते हैं—

  • हिजरत और बेघर होने का एहसास

  • तन्हाई और इंसानी वजूद की तलाश

  • इंसानी रिश्तों की पेचीदगियाँ

  • मौत और ज़िंदगी के फ़लसफ़ियाना सवाल

  • जानवरों की अलामती तश्बीहें

नाक़िदीन का कहना है कि उन्होंने क्लासिकी उर्दू शायरी की रवायत को जदीद एहसास और जदीद फ़िक्र के साथ इस तरह जोड़ा कि एक बिल्कुल नया और मुनफ़रिद शायरी मंजरनामा सामने आ गया।


वफ़ात और अदबी विरासत

साक़ी फ़ारूक़ी लंबी बीमारी के बाद 19 जनवरी 2018 को लंदन में 81 बरस की उम्र में इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। उनके इंतिक़ाल की ख़बर से उर्दू अदबी हल्क़ों में गहरा रंज-ओ-ग़म फैल गया।

उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिये न सिर्फ़ पाकिस्तान और ब्रिटेन बल्कि पूरी दुनिया के उर्दू दाँ क़ारईन के दिलों में अपनी जगह बनाई। उनकी ग़ज़लें और नज़्में आज भी अदबी महफ़िलों, मुशायरों और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स पर शौक़ से पढ़ी और सुनी जाती हैं।

साक़ी फ़ारूक़ी उन शायरों में से थे जिन्होंने हिजरत के दर्द, तन्हाई की कैफ़ियत और इंसानी ज़िंदगी के गहरे सवालों को इस अंदाज़ में बयान किया कि उनका कलाम आज भी ज़ेहन-ओ-दिल में गूंजता महसूस होता है। यही वजह है कि जदीद उर्दू शायरी की तारीख़ में उनका नाम हमेशा एहतिराम और अहमियत के साथ लिया जाएगा।

साक़ी फ़ारूक़ी की शायरी ग़ज़लियात,नज़्में और अहम् तख़लीक़ात 


ग़ज़ल -1 

सोच में डूबा हुआ हूँ अक्स अपना देख कर

जी लरज़ उट्ठा तिरी आँखों में सहरा देख कर


प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर

भागती जाती हैं लहरें ये तमाशा देख कर


एक दिन आँखों में बढ़ जाएगी वीरानी बहुत

एक दिन रातें डराएँगी अकेला देख कर


एक दुनिया एक साए पर तरस खाती हुई

लौट कर आया हूँ मैं अपना तमाशा देख कर


उम्र भर काँटों में दामन कौन उलझाता फिरे

अपने वीराने में आ बैठा हूँ दुनिया देख कर

ग़ज़ल -2

मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला

साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला


मुझ में बसी हुई थी किसी और की महक

दिल बुझ गया कि रात वो बरहम नहीं मिला


बस अपने सामने ज़रा आँखें झुकी रहीं

वर्ना मिरी अना में कहीं ख़म नहीं मिला


उस से तरह तरह की शिकायत रही मगर

मेरी तरफ़ से रंज उसे कम नहीं मिला


एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए

ये क्या हुआ कि वक़्फ़ा-ए-मातम नहीं मिला

ग़ज़ल -3

मैं एक रात मोहब्बत के साएबान में था

मिरा तमाम बदन रूह की कमान में था


धनक जली थी फ़ज़ा ख़ून से मुनव्वर थी

मिरे मिज़ाज का इक रंग आसमान में था


जो सोचता हूँ उसे दिल में फूल खिलते हैं

वो ख़ुश-निगाह नहीं था तो कौन ध्यान में था


ये हादसा है कि दोनों ख़िज़ाँ-सरिश्त हुए

मगर बहार का इक अहद दरमियान में था


मुझे अज़ीज़ रही दुश्मनी की तल्ख़ी भी

इस एक ज़हर से क्या ज़ाइक़ा ज़बान में था

ग़ज़ल -4

ये कौन आया शबिस्ताँ के ख़्वाब पहने हुए

सितारे ओढ़े हुए माहताब पहने हुए


तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में

वो मेरी रूह में उतरा हिजाब पहने हुए


मुझे कहीं कोई चश्मा नज़र नहीं आया

हज़ार दश्त पड़े थे सराब पहने हुए


क़दम क़दम पे थकन साज़-बाज़ करती है

सिसक रहा हूँ सफ़र का अज़ाब पहने हुए


मगर सबात नहीं बे-सबील रस्तों में

कि पाँव सो गए 'साक़ी' रिकाब पहने हुए


नज़्म -1 

मस्ताना हीजड़ा 

मौला तिरी गली में
सर्दी बरस रही थी

शायद इसी सबब से
मस्ताना हीजड़ा भी

विस्की पहन के निकला
टेनिस के बाल

कसती अंगिया में
घुस-घुसा के

पिस्तान बन गए थे
शहवत के सुर्ख़ डोरे

सुर्मा लगाने वाली
आँखों में तन गए थे

इक दम से
चलते चलते

उस ने कमर के झटके से
राह चलने वाले

शोहदों, हराम-ख़ोरों
से इल्तिफ़ात माँगा

और दावत-ए-नज़र दी
उस के ज़ख़ीम

कूल्हों ने
आग और लज़्ज़त

ख़ाली दिलों में भर दी
उस ने हथेलियों के गद्दे

रगड़ रगड़ के
वो तालियाँ उड़ाईं

मेहंदी के रंग
तितली बन के हवा में

अपने पर तौलने लगे थे
फिर जान-दार होंटों

से पान-दार बोसे
छन छन छलक छलक के

हर मंचली नज़र में
रस घोलने लगे थे

वो आज लहर में था
मिस्सी की छब दिखा के

नथने फुला फुला के
उँगली नचा नचा के

उस ने मज़े में आ के
हँस कर कहा कि ''सालो''

मैं तो जनम जनम से
अपने ही आँसुओं में

डूबा हुआ पड़ा हूँ
शायद ज़मीर-ए-आलम के

तंग मक़बरे में
ज़िंदा गड़ा हुआ हूँ

नज़्म -2

डस्टबिन 

सुब्ह के जग-मग सूरज को
शाम के नारंजी बादल में

क्यूँ गहनाती हो
वो क्या अंदेशा है

जिस के बढ़ते क़दमों की धमक सुनी
और तुम ने अपने आँसू अपने अंदर गिरा लिए

अपनी रूह में नौहे जम्अ किए
और निस्याँ की डस्टबिन में फेंक दिए

वो कौन सा मुजरिम दर्द है
जिस को दिल के शब-ख़ानों में छुपाए

जिस के नादीदा शोलों से नज़र जलाए
बैठी हो

चोर ज़ेहन के
पिछले शेल्फ़ पे

तह करके मुझे मत रक्खो
मुझ से जान छुड़ानी हो तो

मुझे शुऊर के शीश-महल में ज़िंदा करे;
मुझे ज़िंदा करो

मिरे होने का इक़रार करो
मिरी ताक़त से इंकार करो

मुझे मारो

तब्सरा :-

उर्दू शायरी की जदीद रवायत में साक़ी फ़ारूक़ी का नाम एक ऐसे शायर के तौर पर लिया जाता है जिनकी आवाज़ में ज़माने की उदासी, हिजरत की टीस और वजूद की तल्ख़ सच्चाइयाँ घुली हुई महसूस होती हैं। उनकी शायरी में दर्द महज़ जज़्बाती रंग नहीं, बल्कि एक फ़लसफ़ियाना कैफ़ियत बनकर सामने आता है—ऐसी कैफ़ियत जो इंसान को अपने अंदर झाँकने पर मजबूर कर देती है। 

साक़ी फ़ारूक़ी की शख़्सियत में एक अजीब-सी तन्हाई और तजरीद का रंग था, जो उनके कलाम में भी पूरी शिद्दत के साथ झलकता है। उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में ज़िंदगी की रौशनियों से ज़्यादा उसके साए दिखाई देते हैं। यही वजह है कि उनका लहजा अक्सर संजीदा, ख़ामोश और गहरे तजुर्बे से मआमूर लगता है। उन्होंने इंसानी रिश्तों की उलझनों, समाजी बेगानगी और ज़माने की बेरुख़ी को जिस अदा से बयान किया, वह जदीद उर्दू शायरी की एक मुनफ़रिद पहचान बन गया। 

लेकिन इसी मुनफ़रिदियत के साथ एक तनक़ीदी सवाल भी उभरता है—क्या उनकी शायरी में मोहब्बत, इश्क़ और जमालियात की पारंपरिक रूह को कहीं नज़रअंदाज़ नहीं किया गया? उर्दू शायरी की सदियों पुरानी रवायत में इश्क़ महज़ एक जज़्बा नहीं, बल्कि तख़्लीक़ का बुनियादी ज़रिया रहा है। साक़ी फ़ारूक़ी के यहाँ यह जज़्बा अक्सर एक बौद्धिक या वजूदियाती बहस में तब्दील हो जाता है, जहाँ दिल की नरमी की जगह ज़ेहन की सख़्ती ज़्यादा महसूस होती है। 

उनकी अलामती शायरी—ख़ुसूसन जानवरों की तश्बीहों के ज़रिये—इंसानी समाज की सियासत और नैतिक ज़वाल को बेनक़ाब करती है, मगर इस अंदाज़ में कभी-कभी जज़्बाती लुत्फ़ की कमी भी महसूस होती है। यही वजह है कि कुछ नक़्क़ाद उन्हें एक ऐसे शायर के तौर पर देखते हैं जो ज़िंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को तो पूरी बेबाकी से बयान करता है, मगर मोहब्बत की नर्म और रोशन दुनिया से कुछ दूरी बनाए रखता है।ये भी पढ़ें 

इसके बावजूद, यह भी हक़ीक़त है कि साक़ी फ़ारूक़ी ने जदीद उर्दू शायरी को एक नई ज़बान, नया तख़य्युल और नया फ़िक्रिया उफ़क़ अता किया। उनकी शायरी दर्द की वह तहरीर है जो ख़ामोशी से पढ़ी जाती है, मगर दिल में देर तक गूँजती रहती है। यही गूँज उन्हें अपने दौर के अहम और नुमायाँ शायरों की सफ़ में खड़ा करती है।

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