इब्तिदाई ज़िंदगी
अब्बास क़मर का जन्म 1 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश के तारीख़ी और तहज़ीबी शहर जौनपुर में हुआ। जौनपुर अपनी इल्मी, अदबी और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, और यही फ़ज़ा अब्बास क़मर की शख़्सियत और फ़िक्र की तश्कील में अहम साबित हुई। एक सादा और शरीफ़ ख़ानदान में परवरिश पाने वाले अब्बास ने बचपन से ही छोटे शहर की सादगी, इंसानी रिश्तों की गर्माहट और ज़िंदगी के मामूली मगर गहरे एहसासों को क़रीब से महसूस किया। यही तजुर्बात बाद में उनकी शायरी का बुनियादी सरमाया बने।
बचपन में ख़ानदानी महफ़िलों, मुशायरों और अदबी बैठकों में सुनी गई उर्दू शायरी ने उनके दिल में अल्फ़ाज़ की दुनिया के लिए एक ख़ास कशिश पैदा कर दी। नौजवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही उन्होंने अपने जज़्बात को अशआर की शक्ल में ढालना शुरू कर दिया। यही शुरुआती दिलचस्पी आगे चलकर उन्हें उर्दू अदब की नई नस्ल के अहम शायरों में शामिल करने का सबब बनी।
तालीम और अदबी शऊर
अगरचे अब्बास क़मर की बाक़ायदा तालीम के बारे में ज़्यादा तफ़सीलात दस्तयाब नहीं हैं, लेकिन उनकी शायरी यह साबित करती है कि उन्हें उर्दू ज़बान और उसके अदबी मीरास से गहरा लगाव है। माना जाता है कि उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम जौनपुर के स्थानीय इदारों में हासिल की, जहाँ पढ़ाई के साथ-साथ उनका शौक़-ए-सुख़न भी परवान चढ़ता रहा।
उनकी अस्ल तालीम किताबों, मुतालए और उर्दू शायरी की क्लासिकी व जदीद रवायतों के गहरे अध्ययन से मुकम्मल हुई। उन्होंने एक तरफ़ मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे अज़ीम शायरों से फ़िक्र की बुलंदी और ज़बान की नफ़ासत सीखी, तो दूसरी तरफ़ जदीद दौर के मक़बूल शायरों, ख़ुसूसन अब्बास ताबिश, से एहसास की ताज़गी और बयान की सादगी का हुनर हासिल किया। यही वजह है कि उनकी शायरी में रवायत और जिद्दत का ख़ूबसूरत इम्तिजाज दिखाई देता है।
शायरी का सफ़र
अब्बास क़मर का अदबी सफ़र 2010 की दहाई में बाक़ायदा तौर पर शुरू हुआ, जब उन्होंने मुशायरों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर अपना कलाम पेश करना शुरू किया। अपनी कमउम्री के बावजूद उनकी शायरी में जज़्बात की गहराई, फ़िक्र की पुख़्तगी और लफ़्ज़ों की सादगी ने सुनने वालों को मुतास्सिर किया।
उनकी ग़ज़लों और अशआर में मोहब्बत, तन्हाई, इंसानी रिश्तों, ख़ामोश एहतिजाज और वक़्त के बदलते मिज़ाज की झलक मिलती है। वह अपने एहसासात को नर्म लेकिन असरदार अंदाज़ में बयान करते हैं, जिसकी वजह से उनकी शायरी ख़ास तौर पर नौजवान नस्ल में बेहद मक़बूल हुई है।
उन्होंने मुल्क के कई अहम मुशायरों में शिरकत की, जिनमें अंदाज़ ए बयान और जैसे इंटरनेशनल अदबी मंच भी शामिल हैं। उनकी तरन्नुम भरी पेशकश और दिल से निकले हुए अशआर सामईन के दिलों पर गहरा असर छोड़ते हैं।
डिजिटल दौर में मक़बूलियत
वर्तमान में नई दिल्ली में मुक़ीम अब्बास क़मर ने डिजिटल दुनिया में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई है। रेख़्ता, उर्दूपॉइंट और पोएटिस्टिक जैसे अहम अदबी प्लेटफ़ॉर्म्स पर उनका कलाम बड़ी तादाद में पढ़ा और साझा किया जाता है।
हालाँकि अब तक उनका कोई बाक़ायदा शायरी संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है, लेकिन उनके अशआर सोशल मीडिया और अदबी हल्क़ों में बराबर चर्चा का विषय बने रहते हैं। उनके कई शेर अपने जदीद एहसास और असरअंगेज़ अंदाज़ की वजह से ज़बान-ए-ख़ल्क़ बन चुके हैं।
शोहरत और अदबी पहचान
अब्बास क़मर बहुत कम अरसे में उर्दू शायरी के एक पुरउम्मीद और तवज्जोह हासिल करने वाले नाम के तौर पर उभरे हैं। रेख़्ता जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर अदबी मंच पर उनकी मौजूदगी उनकी बढ़ती हुई मक़बूलियत की गवाह है।
अगरचे उन्हें अभी तक कोई बड़ा सरकारी या अदबी एवार्ड हासिल नहीं हुआ, लेकिन मुशायरों में मिलने वाली भरपूर दाद, सोशल मीडिया पर उनके कलाम की गूँज और शायरी के चाहने वालों की दिली मोहब्बत किसी भी इज़्ज़त-ओ-एहतिराम से कम नहीं। उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि वह आम जज़्बात को ख़ास लफ़्ज़ों में ढालकर सीधे दिल तक पहुँचाने की सलाहियत रखते हैं।
ज़ाती ज़िंदगी और मिज़ाज
अब्बास क़मर अपनी ज़ाती ज़िंदगी को मीडिया की चकाचौंध से दूर रखना पसंद करते हैं। वह कम बोलते हैं और अपने कलाम को ही अपनी पहचान बनने देते हैं। उनकी शायरी से एक मुतफ़क्किर, हस्सास और गहरे तजुर्बात रखने वाली शख़्सियत का तसव्वुर उभरता है, जो ख़ामोशी में मानी तलाश करती है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हुस्न देखना जानती है।
शायरी के अलावा उन्हें मौसीक़ी से भी गहरा लगाव है और दिल्ली की अदबी महफ़िलों में उनकी सक्रिय मौजूदगी उन्हें लगातार नए तजुर्बात और फ़िक्र से जोड़ती रहती है।
आज अब्बास क़मर जदीद उर्दू शायरी की उस नई आवाज़ का नाम हैं, जो रवायत की ज़मीन पर खड़े होकर अस्र-ए-हाज़िर के एहसासात को पूरी सच्चाई और ख़ूबसूरती के साथ बयान कर रही है। उनकी शायरी आने वाले वर्षों में उर्दू अदब की दुनिया में और भी अहम मुक़ाम हासिल करेगी, ऐसी उम्मीद की जाती है।
अब्बास क़मर की शायरी,ग़ज़लें,नज़्में
ग़ज़ल-1
सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप
आप का मयार देखा कितने मयारी हैं आप
सारे दरिया सब समुंदर मुंतज़िर हैं आप के
जाइए बहिए मिरी आँखों से क्यों जारी हैं आप
उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ल-ए-इलाही के ख़िलाफ़
आप को दरबार की आदत है दरबारी हैं आप
आप की आज़ादियाँ हैं आप ही के हाथ में
जिस पे क़ुदरत भी है नाज़ाँ वो गिरफ़्तारी हैं आप
जिस्म के पिंजरे में ले कर घूमिए नन्ही सी जान
चंद साँसों की मिरे प्यारे अदाकारी हैं आप
ग़ज़ल-2
ग़ज़ल-3
ग़ज़ल-4
ग़ज़ल-5
तब्सरा
अब्बास क़मर उन नौजवान शायरों में शुमार किए जाते हैं जिन्होंने उर्दू शायरी को महज़ लफ़्ज़ों की आराइश नहीं रहने दिया, बल्कि उसे अपने दौर की धड़कनों, बेचैनियों और ख़्वाबों की ज़ुबान बना दिया है। उनकी शायरी में न तो बनावटी फ़लसफ़ा है और न ही मुश्किलपसंद अल्फ़ाज़ का बोझ; बल्कि एक ऐसी सादगी है जो सीधे दिल में उतर जाती है और देर तक अपनी गूँज छोड़ती रहती है।
जदीद उर्दू शायरी के मंजरनामे में अब्बास क़मर की आवाज़ एक ताज़ा हवा के झोंके की मानिंद महसूस होती है। वह उन शायरों में से हैं जो दर्द को शोर नहीं बनाते, बल्कि ख़ामोशी की तहों में रखकर पेश करते हैं। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत है, मगर रिवायती आशिक़ी नहीं; तन्हाई है, मगर शिकवा नहीं; एहतिजाज है, मगर नाराबाज़ी नहीं। यही एहतियात और तहज़ीब उनके कलाम को एक अलग पहचान अता करती है।
अब्बास क़मर का सबसे बड़ा कमाल यह है कि वह मामूली से एहसास को भी ऐसा शेरी पैरहन पहनाते हैं कि वह सामईन और क़ारी दोनों की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है। उनके अशआर पढ़ते हुए महसूस होता है कि जैसे कोई शख़्स हमारे अपने दिल की बात हमसे ज़्यादा ख़ूबसूरती से बयान कर रहा हो।
डिजिटल दौर में जहाँ शायरी अक्सर चंद लम्हों की तवज्जोह की मोहताज होकर रह जाती है, वहीं अब्बास क़मर का कलाम अपनी मआनवी गहराई और जज़्बाती सच्चाई की वजह से याद रह जाता है। वह नई नस्ल और क्लासिकी रवायत के दरमियान एक ख़ूबसूरत पुल की हैसियत रखते हैं। उनकी शायरी यह साबित करती है कि अच्छे शे'र का रिश्ता किसी ज़माने से नहीं, बल्कि इंसान के एहसास से होता है।
अगर उर्दू शायरी की नई नस्ल के चंद सबसे उम्मीदअफ़ज़ा नामों की फ़ेहरिस्त तैयार की जाए तो अब्बास क़मर यक़ीनन उसमें एक नुमायाँ मुक़ाम के हक़दार नज़र आते हैं। उनकी फ़िक्र की ताज़गी, जज़्बात की सच्चाई और बयान की दिलनशीनी यह इशारा देती है कि आने वाले दिनों में उनका नाम उर्दू अदब के अफ़क़ पर और भी ज़्यादा रौशन होगा।ये भी पढ़ें
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