15 मई 2026 की पुरसुकून और यादगार शाम, शब्बीर पैलेस अदब की रौशनी से जगमगा उठी, जब मशहूर-ओ-मारूफ़ उस्ताद शायर मरहूम डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी की याद में एक अज़ीमुश्शान मुशायरे का शानदार इनक़ाद किया गया। “कुछ रुतें डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम” के उनवान से मुनअक़िद इस अदबी महफ़िल में शहर संभल समेत मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से नामवर और मक़बूल शायरों ने शिरकत कर अपने दिलनशीं अशआर से समाअ बाँध दिया। रात के दस बजे जब महफ़िल-ए-सुख़न सजी, तो फिर सुबह की दस्तक तक अशआर, ग़ज़लों और नज़्मों की ख़ुशबू फ़िज़ाओं में बिखरती रही।
सराय तरीन की अदब-नवाज़ और ज़ौक़-ए-सुख़न रखने वाली समाईन ने भी पूरे शौक़, मोहब्बत और गर्मजोशी के साथ शोरा का इस्तक़बाल किया। दाद-ओ-तहसीन की गूंज से महफ़िल बार-बार जीवंत होती रही और समाईन आख़िरी लम्हों तक पूरे इनहिमाक और दिलचस्पी के साथ शोरा-ए-किराम का कलाम सुनते रहे। हर शेर पर उठती वाह-वाह और हर ग़ज़ल पर बरसती दाद ने इस महफ़िल को यादगार बना दिया।
यह शानदार मुशायरा क़लमकार फ़ाउंडेशन के ज़ेरे-एहतिमाम मुनअक़िद किया गया, जबकि इस अदबी आयोजन को स्पॉन्सर करने का फ़ख़्र www.Anthought.com को हासिल हुआ। साथ ही सामाजिक संस्था एहसास फ़ाउंडेशन ने भी अपने हिमायत से इस ख़ूबसूरत अदबी महफ़िल को कामयाबी की बुलंदियों तक पहुँचाने में अहम किरदार अदा किया।
मोहक़्क़िक़, नक़्क़ाद, सहाफ़ी, फ़न-ए-उरूज़-ओ-बलाग़त के उस्ताद शायर डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी को पेश किया गया पुरख़ुलूस ख़िराज-ए-अक़ीदत
मरहूम डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी को इस पुरअसर महफ़िल में बेहद जज़्बाती और पुरख़ुलूस अंदाज़ में ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया गया। यह मुकम्मल आयोजन उनकी याद-ए-रफ़्ता से मंसूब था, जिन्हें उर्दू अदब, समाजी फ़िक्र और इंसानी अख़लाक़ियात का सच्चा तरजुमान तसव्वुर किया जाता है। महफ़िल के दौरान मुख़्तलिफ़ वक्ताओं, अदीबों और शोअरा ने उनके इल्मी व अदबी कारनामों, बुलंद शख़्सियत और समाज के लिए अंजाम दी गई ख़िदमात को बड़े दर्दमंद और असरअंगेज़ लहजे में याद किया।
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| नाज़िम ए मुशायरा मीर शाह हुसैन "आरिफ" साहब अपना क़लाम पेश करते हुए |
मशहूर शायर और वरिष्ठ पत्रकार मीर शाह हुसैन "आरिफ" साहब ने यूँ कहा
इल्म-ओ-इरफ़ान का मीनार थे ताहिर साहिब
ज़िंदा दिल साहिब-ए-अफ़कार थे ताहिर साहिब
उनके अशआर में था इश्क़-ए- मोहम्मद का सुरूर
मदहा खाने शाहे अबरार थे ताहिर साहिब
बात जो सच्ची हे वो केहनी पड़ेगी आरिफ
चंद अपनों से ही बेज़ार थे ताहिर साहिब
था वो साहिब -ओ- फेहम -ओ-इज्राक
महफिलें उसके दम से थीं रंगीन
जश्न-ए-ताहिर हे अब जिया के घर
पेशवाई को हे सराय तरीन
डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी की शायरी और तहरीरों में इंसानी रिश्तों की हरारत, समाजी एहसासात की नर्मी और फ़िक्र-ओ-फ़न की गहरी रवायतें साफ़ झलकती थीं। उनकी तख़्लीक़ात महज़ अल्फ़ाज़ का मजमूआ नहीं, बल्कि एहसास, इल्म और तहज़ीब की रौशन मिसाल थीं। यही वजह रही कि महफ़िल में शरीक कई नामवर शोअरा ने अपने अशआर और ख़िराजिया कलाम के ज़रिये उन्हें याद करते हुए कहा कि डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी सिर्फ़ एक शायर या अदीब नहीं थे, बल्कि एक मुकम्मल तहज़ीब, इल्मी शऊर और इंसानी मोहब्बत की ज़िंदा अलामत थे।
संभल की अदबी पहचान को मिली नई मजबूती
संभल और सराय तरीन की सरज़मीं अरसे से उर्दू अदब, शायरी और तहज़ीबी रवायतों की ज़िंदा पहचान रही है। यहां की फ़िज़ाओं में आज भी इल्म-ओ-अदब की वही ख़ुशबू महसूस होती है जिसने इस शहर को अहल-ए-ज़ौक़ और अहल-ए-क़लम का मरकज़ बनाया। “कुछ रुतें डॉक्टर ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम” के उन्वान से सजी इस शानदार महफ़िल-ए-मुशायरा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह धरती आज भी अदब-नवाज़ दिलों, शेर-ओ-सुख़न के कद्रदानों और तहज़ीबी शऊर रखने वाले लोगों से रौशन है।
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| संभल के उस्ताद शायर, सद्र ए महफ़िल ए मुशायरा जनाब मुनव्वर ताबिश संभाली साहब,अपना क़लाम पेश करते हुए |
डिजिटल दौर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में, जहां अदबी महफ़िलें और इल्मी नशिस्तें धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं, वहीं इस तरह की पुरवक़ार और बामक़सद महफ़िलें समाज को उसकी तहज़ीबी जड़ों, इल्मी विरासत और अदबी रवायतों से जोड़ने का अहम फ़र्ज़ अंजाम दे रही हैं। यह आयोजन सिर्फ़ एक यादगारी मुशायरा नहीं था, बल्कि नई नस्ल को उर्दू शायरी की लताफ़त, तहज़ीब की नफ़ासत और अदब की रूहानियत से आश्ना कराने की एक ख़ूबसूरत और कामयाब कोशिश भी साबित हुआ।
ख़ुत्बा इस्तक़बालिया ज़िआउस सहर रज़ज़ाक़ी ने पढ़ा
डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब के फ़र्ज़ंद ज़िआउस सहर रज़्ज़ाक़ी ने महफ़िल में बेहद दर्दमंद, असरअंगेज़ और जज़्बाती अंदाज़ में ख़ुत्बा-ए-इस्तक़बालिया पेश किया। अपने वालिद-ए-मोहतरम की यादों को ताज़ा करते हुए उनकी आवाज़ कई मौक़ों पर भर्रा गई। उन्होंने कहा कि एक वक़्त था जब डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब के शागिर्दों की फ़ेहरिस्त बेहद तवील हुआ करती थी। बड़े-बड़े शोअरा, जो आज उस्ताद का मुक़ाम रखते हैं, कभी उनके सामने अपने कलाम की इस्लाह के लिए बैठा करते थे।
उन्होंने कहा, “हमने अपनी आँखों से देखा है कि लोग पूरा-पूरा दिन हमारे वालिद के साथ हमारे घर में गुज़ार देते थे। दूर-दूर से लोग अपनी किताबें, अपने अशआर और अपने मसौदे लेकर आते थे ताकि डॉ साहब उनकी रहनुमाई फ़रमा सकें। उनके इल्म, फ़न और शफ़क़त से न जाने कितने लोग फ़ैज़याब हुए, मगर अफ़सोस कि वही लोग आज उन्हें इस तरह फ़रामोश कर चुके हैं जैसे उनका कोई रिश्ता ही न रहा हो।”
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| ख़ुत्बा इस्तक़बालिया पढ़ते हुए ज़िआउस सहर रज़ज़ाक़ी |
उन्होंने भारी दिल से कहा कि वालिद-ए-मोहतरम के इंतिक़ाल को तक़रीबन बारह साल गुज़रने को हैं, लेकिन इस दौरान मुश्किल से एक मुशायरा ऐसा हुआ जिसे जनाब फ़हीम बिस्मिल, जनाब शफ़ीक़-उर-रहमान शफ़ीक़, जनाब जावेद अख़्तर रज़्ज़ाक़ी और तौफ़ीक़ आज़ाद साहब ने मिलकर आयोजित किया। इसके अलावा न कोई ख़िराज-ए-अक़ीदत की महफ़िल सजाई गई, न कोई ताज़ियाती प्रोग्राम, न कोई अदबी नशिस्त।
ज़िआउस सहर रज़्ज़ाक़ी ने शहर की इस ख़ामोशी और बेएतिनाई पर हैरत जताते हुए कहा, “अगर किसी को औलाद से अदावत भी हो, तो हो सकती है, मगर जिन लोगों ने आपसे फ़न सीखा हो, जिनकी शायरी को आपने सँवारा हो, कम-अज़-कम किसी मुशायरे में अपने उस्ताद का नाम ही ले लेते। कहीं तो उस्ताद का हक़ अदा कर देते।”
उन्होंने इशारों-इशारों में यह भी कहा कि उनकी नज़र में ऐसे तीस-पैंतीस नाम मौजूद हैं जिनका ज़िक्र किया जा सकता है, मगर अदब और मुनासिबत का तक़ाज़ा उन्हें ख़ामोश रहने पर मजबूर करता है। उनके इन दर्द भरे अल्फ़ाज़ ने महफ़िल में मौजूद अहल-ए-अदब और सामेईन को गहरी सोच में डाल दिया और फ़िज़ा कुछ लम्हों के लिए बेहद जज़्बाती हो गई।
उन्होंने बेहद सलीक़े, वक़ार और यक़ीन से भरे लहजे में कहा कि उनके वालिद-ए-मोहतरम डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब का इल्मी और अदबी सरमाया इतना वसीअ, गहरा और असरअंगेज़ है कि उनके क़लम की गूंज सिर्फ़ हिंदुस्तान तक महदूद नहीं रही, बल्कि दुनिया भर के अहल-ए-अदब ने उनके फ़िक्र-ओ-फ़न को दिल से तस्लीम किया। उनकी तस्नीफ़ात, तहक़ीक़ी मज़ामीन और शायरी ने अदबी हल्क़ों में एक ऐसा मुक़ाम पैदा किया, जिसे आज भी एहतराम और अक़ीदत की निगाह से देखा जाता है।
उन्होंने कहा कि डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब की किताबों पर मुल्क के नामवर अदीबों, नक़्क़ादों, दानिशवरों और साहिबान-ए-क़लम ने अपने क़ीमती तास्सुरात दर्ज किए, जबकि बेरूनी ममालिक से भी इल्म-ओ-अदब से वाबस्ता शख़्सियात ने उनके फ़न, शख़्सियत और इल्मी ख़िदमात को पुरख़ुलूस ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया। यह उनके फ़िक्र की वही रौशनी थी जिसने सरहदों और ज़बानों की क़ैद से ऊपर उठकर लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई।
ज़िआउस सहर रज़्ज़ाक़ी ने आगे कहा कि डॉ साहब के कई अहम, नायाब और बेशक़ीमती मसविदे अब भी ग़ैर-मुंतशिर हालत में मौजूद हैं, जिनमें इल्म, तहज़ीब, तन्क़ीद, शायरी और समाजी फ़िक्र के ऐसे गोशे समाए हुए हैं जो आने वाली नस्लों के लिए एक अहम अदबी विरासत साबित होंगे। उन्होंने भरोसे और उम्मीद से भरे अंदाज़ में कहा कि इंशा अल्लाह बहुत जल्द इन तमाम मसविदों को किताबों की शक्ल में मंज़र-ए-आम पर लाया जाएगा, ताकि अहल-ए-ज़ौक़ और अदब से मोहब्बत रखने वाले लोग उस इल्मी ख़ज़ाने से फ़ैज़याब हो सकें।
उन्होंने बेहद जज़्बाती लेकिन पुख़्ता लहजे में कहा, “यह महज़ एक ख़्वाब या जज़्बाती दावा नहीं, बल्कि हमारा अज़्म, हमारी ज़िम्मेदारी और वालिद-ए-मोहतरम की इल्मी विरासत से हमारी वफ़ादारी का अहद है। इस सिलसिले में बाक़ायदा काम जारी है और इंशा अल्लाह वह दिन दूर नहीं जब डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब के अनछुए फ़िक्र-ओ-फ़न के कई और दरवाज़े अहल-ए-अदब पर खुलेंगे, और दुनिया एक बार फिर उनके क़लम की रौशनी से मुनव्वर होगी।” ये मज़मून भी पढ़िए
नामचीन शायरों के कलाम से मुनव्वर हुई अदबी महफ़िल, समाईन ने दी भरपूर दाद
इस पुरवक़ार और नूरानी महफ़िल में अहल-ए-अदब, दानिशवरों और इल्मी व तहज़ीबी हल्क़ों से वाबस्ता नामवर शख़्सियात की गरिमामयी मौजूदगी ने महफ़िल की रौनक़ को दोचंद कर दिया। महफ़िल की सरपरस्ती मशहूर अदीब, उस्ताद-ए-सुख़न डॉक्टर नसीम-उज़-ज़फ़र ने फ़रमाई, जबकि सदारत के फ़राइज़ मारूफ़ो-मुस्तनद शायर डॉक्टर मुनव्वर ताबिश ने अपने वक़ार और इल्मी शख़्सियत के शायान-ए-शान अंदाज़ में अंजाम दिए। निज़ामत की ज़िम्मेदारी मीर शाह हुसैन आरिफ़ ने अपने दिलनशीं, शाइस्ता और पुरकशिश अंदाज़-ए-बयान के साथ निभाई, जिसे सामेईन ने बेहद सराहा।
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| मौक़े पर चौका सुलेमान फ़राज़ साहब अपनी किताब का इज्रा मुशायरे के इख़्तेताम पर करते हुए |
महफ़िल-ए-मुशायरा में मुल्क के मुख़्तलिफ़ अदबी गोशों से तशरीफ़ लाए नामवर शोअरा ने अपने फ़िक्र-अंगेज़, जज़्बाती और असरआफ़रीं कलाम के ज़रिये समां बांध दिया।
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| साहिब ए दीवान शायर सुलेमान फ़राज़ साहब मुशायरे में अपना क़लाम पढ़ते हुए |
सैयद शैबान क़ादरी, सुलेमान फ़राज़, नौशाद अंगड़, फ़हीम साक़िब, ताहिर हुसैन ताहिर, मुजाहिद नादान, मिदहत सऊद, आसी हसनपुरी, वसीम हसनपुरी, डॉक्टर अनस इक़ान मेरठी, नौशाद गोबंदपुरी, वसीम अरहम, इरफ़ान सबा और सरफ़राज़ ज़हूरी समेत दीगर अहल-ए-क़लम ने अपने चुनिंदा अशआर और ग़ज़लों से महफ़िल को अदबी लुत्फ़ और फ़िक्र की रौशनी से मुनव्वर कर दिया।
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| देर रात 2: 16 पर समाईन की एक झलक |
हर शायर के कलाम पर सामेईन ने पूरे जोश-ओ-ख़रोश के साथ दाद-ओ-तहसीन पेश की। कई अशआर ऐसे भी रहे जिनकी गूंज देर तक महफ़िल की फ़िज़ाओं में तैरती रही और तालियों की मुसलसल सदाओं ने यह साबित कर दिया कि अदब आज भी दिलों पर हुकूमत करता है।
शुक्रिया, मोहब्बत और अदब के साथ हुआ यादगार मुशायरे का इख़्तेताम
मुशायरे के इख़्तेताम पर ज़िआउस सहर रज़्ज़ाक़ी ने बेहद शाइस्ता, पुरख़ुलूस और एहतराम से भरे अंदाज़ में महफ़िल से मुख़ातिब होते हुए तमाम मेहमानान-ए-गिरामी, शोरा-ए-किराम और आयोजकों का दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि यह शानदार और यादगार अदबी महफ़िल जिन बुज़ुर्गों, अहल-ए-क़लम और मुहिब्बान-ए-अदब की मोहब्बत, रहनुमाई और तआवुन से मुकम्मल हुई, उनका एहसान हमेशा याद रखा जाएगा।
उन्होंने ख़ास तौर पर मुशायरे के सरपरस्त मशहूर अदीब और उस्ताद-ए-सुख़न जनाब डॉ नसीम-उस-ज़फ़र साहब, सद्र-ए-महफ़िल जनाब मुनव्वर ताबिश साहब और दिलनशीं अंदाज़-ए-बयान से महफ़िल को रौनक़ बख़्शने वाले नाज़िम जनाब मीर शाह हुसैन “आरिफ़” साहब का तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा किया। साथ ही मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से तशरीफ़ लाए तमाम शोरा-ए-किराम के लिए भी अपनी मोहब्बत और अक़ीदत का इज़हार करते हुए कहा कि इन्हीं अहल-ए-अदब की मौजूदगी ने इस महफ़िल को सच मायनों में यादगार बना दिया।
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| मेहमान ए ज़ी वक़ार जनाब मेंबर आरफीन साहब का इस्तक़बाल करते हुए ज़िआउस सहर रज़ज़ाक़ी |
ज़िआउस सहर रज़्ज़ाक़ी ने आयोजन समिति के तमाम अराकीन का भी ख़ास तौर पर ज़िक्र किया और उनकी मेहनत, लगन और ख़ामोश ख़िदमात को सराहते हुए जनाब फ़ैज़ान रिज़वी, ज़िआउल कमर रज़्ज़ाक़ी, जावेद अख़्तर रज़्ज़ाक़ी, अकमल दानिश रज़्ज़ाक़ी, अनवर बिलाल रज़्ज़ाक़ी, ज़ुनूर नोशाही, नाज़िर ख़ान, फ़ैज़ान फ़ैज़ी और मोहम्मद हाशिम साहब,मोहम्मद उमर साहब, का दिली शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि इन तमाम अफ़राद की बे-लौस कोशिशों और शब-ओ-रोज़ की मेहनत ने इस अदबी आयोजन को कामयाबी की बुलंदियों तक पहुँचाया।
उन्होंने इस मौक़े पर शब्बीर पैलेस के बानी जनाब हाजी तौक़ीर साहब का भी ख़ास शुक्रिया अदा किया, जिनकी मेज़बानी और अदब-नवाज़ी ने महफ़िल को एक ख़ास वक़ार अता किया। साथ ही चेयरमैन प्रत्याशी जनाब यासीन संभली और एक्स नगरपालिका मेंबर जनाब मेंबर आरिफ़ीन साहब के मोहब्बत और हिमायत को भी सराहते हुए उनका शुक्रिया अदा किया।
महफ़िल का समापन शुक्रिया, मोहब्बत, अदब और अक़ीदत से भरे ऐसे जज़्बाती माहौल में हुआ, जहाँ हर दिल डॉ ताहिर रज़्ज़ाक़ी साहब की यादों से नम और अदब की रौशनी से मुनव्वर दिखाई दे रहा था।
NOTE- इस पोस्ट काम जारी हे


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