15 मई 2026 को मरहूम उस्ताद शायर डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी की याद में "कुछ रुतें डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी के नाम" के उन्वान से एक मुशायरे का इनक़ाद किया गया। इस महफ़िल में शहर के मुख़्तलिफ़ मक़ामात से अहल-ए-क़लम और अहल-ए-सुख़न को दावत दी गई थी। हमारा मक़सद सिर्फ़ इतना था कि एक ऐसे उस्ताद की याद को ताज़ा किया जाए जिसने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा अदब, इल्म और शागिर्दों की तरबियत के लिए वक़्फ़ कर दिया।
हर अदबी सरगर्मी की तरह इस आयोजन से पहले भी तरह-तरह की रायें सामने आईं। कुछ दोस्तों ने कुछ इख़्तिलाफ़ात की बिना पर शिरकत से माज़रत की। उनका मौक़िफ़ अपनी जगह क़ाबिल-ए-एहतराम था। किसी भी साहिब-ए-राय को अपने फ़ैसले का पूरा हक़ हासिल है। अलबत्ता, मुशायरे की तश्कील और उसके इंतिज़ामात से मुतअल्लिक़ तमाम फैसले उन लोगों की मशावरत से किए गए जो इस काम में शुरू से शरीक थे, और आज भी मुझे यक़ीन है कि वह फैसले नेकनीयती और बेहतर मसलहत को सामने रखकर किए गए थे।
कुछ अहबाब तशरीफ़ न ला सके। उनके न आने से महफ़िल की रौनक़ में कोई कमी नहीं आई, लेकिन इंसानी तौर पर उनकी कमी महसूस ज़रूर हुई। बाद में मालूम हुआ कि एक बुज़ुर्ग शायर, जिनकी ख़िदमत में मैं ख़ुद दावतनामा लेकर हाज़िर हुआ था और जिनकी तस्वीर भी एहतिरामन मैन फ़्लेक्स पोस्टर पर शामिल की गई थी, उन्होंने महज़ इस वजह से शिरकत नहीं की कि उन्हें अपने क़द-ओ-क़ामत के मुताबिक़ मसनद नहीं दी गयी
इस पर मुझे न हैरत हुई, न मलाल। अलबत्ता इस वाक़िए ने एक पुराने सवाल को फिर ज़हन में ज़िंदा कर दिया कि अदबी महफ़िलों में मसनद का मयार आख़िर क्या होना चाहिए? उम्र? शोहरत? या फिर फ़न और अदबी ख़िदमात?
मेरी नाक़िस राय में जिस तरह किसी यूनिवर्सिटी में महज़ उम्र की बुनियाद पर किसी को HOD, DEEN या CHANCLER नहीं बनाया जाता, बल्कि इल्मी सलाहियत, तजुर्बे और कारकर्दगी को देखा जाता है, उसी तरह अदबी महफ़िलों में भी अस्ल मयार फ़न, इल्मी व अदबी ख़िदमात और तख़्लीक़ी वुसअत होनी चाहिए। उम्र का एहतराम अपनी जगह एक लाज़िमी अमल है और रहेगा, मगर अदबी मंसबात का तअय्युन सिर्फ़ उम्र की बुनियाद पर नहीं होना चाहिए।
इत्तिफ़ाक़ की बात है कि कुछ रोज़ बाद मुझे डॉक्टर उमेश चंद्र सक्सेना साहब की किताब "पितामह" के जश्न ए इज्रा में शिरकत का मौक़ा मिला। वहाँ मैंने बड़ी ग़ौर से कार्यक्रम की फ़्लेक्स पढ़ी। न उस बुज़ुर्ग शायर का नाम नज़र आया और न तस्वीर। कार्यक्रम आधी रात के क़रीब इख़्तिताम पज़ीर हुआ, लेकिन ताज्जुब की बात यह रही कि उन्हें अपना कलाम पेश करने का मौक़ा भी न मिल सका। आख़िर में जब महफ़िल का रंग कुछ और हो चुका था और लोग फ़िल्मी नग़मों पर लुत्फ़अंदोज़ हो रहे थे, तब किसी ने उनका हाथ थामकर उन्हें स्टेज पर बुला लिया। उन्होंने भी मुस्कुराकर उस लम्हे में शरीक होना मुनासिब समझा।
ज़िंदगी शायद इसी का नाम है; कभी बड़ी मसनदें नहीं मिलतीं, मगर वक़्त अपने अंदाज़ में इंसान को कोई न कोई मंच दे ही देता है।
इसी सिलसिले में एक और वाक़िया याद आता है। एक साहिब, जो मेरे वालिद के शागिर्द भी हैं, उनकी ख़िदमत में मैं दो मर्तबा हाज़िर हुआ। पहली बार ज़बानी दावत देने के लिए और दूसरी बार बाक़ायदा प्रिंटेड दावतनामा लेकर। दोनों मौक़ों पर उन्होंने आने का वादा किया। दूसरी मुलाक़ात में उन्होंने अपना मजमूआ-ए-कलाम भी दिखाया, जिसमें अपने उस्ताद डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी का ज़िक्र दो लाइन्स में किया गया था, ख़ुशी भी हुयी,। उस्ताद की अज़मत बयान करते हुए उन्होंने इमाम अबू हनीफ़ा से मंसूब एक वाक़िया भी सुनाया, जिसका मफ़हूम यह था कि उस्ताद का मक़ाम इंसानी ज़िंदगी में किस क़दर बुलंद है।
उस वक़्त मुझे यक़ीन हो गया था कि ऐसे ख़यालात रखने वाला शख़्स ज़रूर तशरीफ़ लाएगा। लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी तवक़्क़ोआत के मुताबिक़ नहीं चलती। न जाने कौन-सी मजबूरियाँ, कौन-से दबाव और कौन-सी मसलहतें आड़े आ गईं कि उस्ताद की याद पीछे रह गई और ज़िंदा लोगों की दुनिया आगे निकल गई।
यह सब लिखने का मक़सद किसी पर तंज़ करना या किसी की तौहीन करना नहीं है। अगर ऐसा होता तो नाम लेने में कोई मुश्किल न थी। मेरा मक़सद सिर्फ़ अपने तजुर्बात को दर्ज करना और अदबी माहौल की कुछ सूरत ए हाल पर ग़ौर करने की दावत देना है।
हक़ीक़त यह है कि इन तमाम वाक़िआत ने मुझे शिकस्ता नहीं किया, बल्कि पहले से ज़्यादा मज़बूत बनाया है। मुशायरे के इख़्तिताम पर मैंने एक बात कही थी कि अगर इस आयोजन से मुझे कोई सबसे बड़ी चीज़ हासिल हुई है तो वह "हौसला" है।
मुझे मोहसिन नक़वी का वह मशहूर कलाम याद आता है:
"मुझे अब डर नहीं लगता"
वाक़ई, जब इंसान नीयत की सच्चाई और मक़सद की पाकीज़गी के साथ सफ़र करता है तो फिर न किसी के आने से फ़र्क़ पड़ता है, न किसी के जाने से। न तारीफ़ उसे बहुत ऊँचा उठाती है और न मुख़ालिफ़त बहुत नीचे गिरा पाती है।
अदब की अस्ल रूह यही है कि इंसान शिकवे से ज़्यादा फ़िक्र करे, शिकायत से ज़्यादा तामीर करे और अफ़राद से ज़्यादा उस मिशन को अहमियत दे जिसके लिए वह क़लम उठाता है।
डॉ. ताहिर रज़्ज़ाक़ी की याद में सजने वाली उस महफ़िल का सबसे बड़ा हासिल भी शायद यही था कि उसने हमें लोगों की पहचान से ज़्यादा अपने इरादों की पहचान करा दी।
खुर्शीद हैदर साहब ये क़ता याद आता हे
की तुम ये न समझ लेना की घबराये हुए हैं
हम वक़्त के तूफान से टकराये हुए हैं
जो छीन ने आये हैं मेरे मुँह से निवाला
वो मेरे बुज़ुर्गों का नमक खाये हुए हैं
अदब का ख़ादिम
ضیاءُ السحر رزّاقی
