तवारीख़ का गहरा मुताला इस हक़ीक़त की ताईद करता है कि दुनिया की कोई भी समाजी, सियासी या फ़िक्री तहरीक़ महज़ अपने नारों, अपने इज्तिमाआत, अपने अवामी हुजूम या अपने वक़्ती जोश-ओ-ख़रोश की बदौलत ज़िन्दा नहीं रहती। किसी तहरीक़ की अस्ल ज़िन्दगी उन अफ़्कार, उस फ़िक्र और उन आवाज़ों में महफ़ूज़ होती है, जो उसके ज़ाहिरी इख़्तिताम के बाद भी इंसानी ज़मीर, इज्तिमाई शऊर और तवारीखी याददाश्त में लगातार गूँजती रहती हैं। यही आवाज़ें वक़्त के साथ महज़ एक वाक़िआ नहीं रहतीं, बल्कि एक फ़िक्री विरासत और इख़्लाक़ी रहनुमाई का दर्जा हासिल कर लेती हैं।
वक़्त के साथ मैदान वीरान हो जाते हैं, ख़ैमे उखड़ जाते हैं, मजमे बिखर जाते हैं, नारे अपनी गूँज खो बैठते हैं और मीडिया की सुर्ख़ियाँ नए मौज़ूआत का रुख़ इख़्तियार कर लेती हैं। लेकिन कुछ अल्फ़ाज़, कुछ ख़िताब और कुछ पुरख़ुलूस आवाज़ें ऐसी होती हैं, जिन पर वक़्त की गर्द कभी मुकम्मल तौर पर नहीं जम पाती। ज़ाहिरन वह ख़ामोश मालूम होती हैं, लेकिन उनका फ़िक्री और इख़्लाक़ी असर नस्ल-दर-नस्ल मुंतक़िल होता रहता है। दरअस्ल, तवारीख़ की पायदार याददाश्त इमारतों, नारों या हुजूमों को नहीं, बल्कि उन आवाज़ों को महफ़ूज़ रखती है जो इंसान को अपने दौर से आगे सोचने, अपने ज़मीर से मुकालमा करने और समाज को बेहतर बनाने की दावत देती हैं। यही आवाज़ें किसी भी तहरीक़ की अस्ल मीरास और उसकी सबसे क़ीमती तवारीखी सनद साबित होती हैं।
जंतर-मंतर के बाद भी बाक़ी रहने वाली आवाज़
जंतर-मंतर का एहतिजाज अब अपनी ज़ाहिरी मंज़िल तक पहुँच चुका है। वह मंज़र, जो कुछ दिनों पहले तक जोश, जज़्बे और अवामी हमदर्दी की अलामत था, आज अपनी जगह सुकूत का मंज़र पेश कर रहा है। लेकिन हर तहरीक़ अपने पीछे एक ऐसा किरदार छोड़ जाती है जो ख़ुद तहरीक़ से कहीं ज़्यादा तवज्जो का हक़दार बन जाता है। इस एहतिजाज की ऐसी ही एक आवाज़ इरफ़ान की है—एक ऐसा नौजवान, जिसका नाम शायद किसी सियासी फ़ेहरिस्त में दर्ज न हो, लेकिन जिसकी सादगी, फ़िक्र और ख़ुलूस ने लाखों दिलों पर दस्तक दी।
इरफ़ान की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि वह कौन है; उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह उसी हिन्दुस्तान का फ़र्द है जिसकी मेहनत से शहर आबाद होते हैं, खेत लहलहाते हैं, कारख़ाने चलते हैं और बाज़ारों की रौनक़ बरक़रार रहती है। वह उन करोड़ों मेहनतकश लोगों का नुमाइन्दा है जिनकी पेशानियों का पसीना मुल्क की तरक़्क़ी की बुनियाद तो बनता है, लेकिन जिनकी आवाज़ अक्सर इख़्तियार के ऊँचे दरवाज़ों तक पहुँचने से पहले ही दबा दी जाती है।
इरफ़ान : एक नाम नहीं, मेहनतकश हिन्दुस्तान की आवाज़
उसकी हथेलियों की सख़्ती उसकी मुफ़लिसी की नहीं, बल्कि उसकी इज़्ज़त-ए-नफ़्स की गवाही देती है। वह उन लोगों में से है जिन्होंने हालात से शिकस्त खाने के बजाय उन्हें अपना उस्ताद बना लिया। उसके पास आलीशान तालीमी इदारों की सनदें नहीं, न मशहूर यूनिवर्सिटियों के दारुल-उलूम से फ़राग़त का कोई दावा। लेकिन उसके सीने में इल्म हासिल करने की जो बेचैनी है, वही उसकी अस्ल सनद है।
आज के दौर में जहाँ टेक्नोलॉजी को अक्सर तफ़रीह और वक़्त गुज़ारने का ज़रिया समझा जाता है, वहीं इरफ़ान ने Google Voice Search और YouTube जैसे वसाइल को अपने लिए दर्सगाह बना लिया। उसने इन्हीं ज़राए से हिन्दुस्तानी दस्तूर, जम्हूरियत, बुनियादी हुक़ूक़, मज़दूरों के मसाइल और समाजी इंसाफ़ के तसव्वुर को समझने की कोशिश की। यह मंज़र हमें याद दिलाता है कि इल्म कभी इमारतों का मोहताज नहीं होता। जब तलब सच्ची हो, तो ज़माना ख़ुद किताब बन जाता है और हर तजुर्बा एक नया सबक़।
डिजिटल दौर का ख़ुद-सिखाया हुआ तलबगार
इरफ़ान का वह लम्हा, जब उसने पूरे वक़ार, इत्मीनान और एहतराम के साथ हिन्दुस्तानी दस्तूर की प्रस्तावना पढ़ी, किसी रस्मी तक़रीब का हिस्सा नहीं था। वह एक ऐसे शहरी का इज़्हार था जिसने दस्तूर को रटकर नहीं, बल्कि जीकर समझा था। उसकी आवाज़ में लफ़्ज़ों की बनावट नहीं थी, एहसास की हरारत थी; उसके लहजे में बयान की नुमाइश नहीं थी, यक़ीन की रोशनी थी। ऐसा महसूस होता था मानो दस्तूर की रूह ख़ुद अवाम के दरमियान उतर आई हो और उन्हें यह याद दिला रही हो कि जम्हूरियत की अस्ल क़ुव्वत हुकूमतों की ताक़त में नहीं, बल्कि जागरूक और बा-वक़ार नागरिकों के शऊर में होती है।
वायरल वीडियो से आगे : ज़मीर तक पहुँचती हुई आवाज़
यही वजह है कि उसका बयान महज़ Viral होकर सोशल मीडिया की भीड़ में गुम नहीं हुआ। वह लोगों की याददाश्त का हिस्सा बन गया। कुछ आवाज़ें सुनाई देती हैं और फिर भुला दी जाती हैं, लेकिन कुछ आवाज़ें इंसान के अंदर उतरकर उसके ज़मीर से मुकालमा शुरू कर देती हैं। इरफ़ान की आवाज़ भी उन्हीं आवाज़ों में शामिल हो चुकी है।
उसकी गुफ़्तगू में किसी फ़र्द के लिए नफ़रत नहीं, किसी तबक़े के लिए तौहीन नहीं और किसी गिरोह के ख़िलाफ़ इंतिक़ाम की पुकार नहीं। उसका एतराज़ अफ़राद से नहीं, बल्कि उन हालात से है जो इंसाफ़ और मसावात के रास्ते में रुकावट बन जाते हैं। वह निज़ाम से सवाल करता है, मगर अदब के साथ; वह इख़्तिलाफ़ करता है, मगर तहज़ीब के दायरे में; वह अपने हक़ की बात करता है, मगर किसी और का हक़ छीनने की दावत नहीं देता। यही रवैया किसी भी बालिग़ जम्हूरियत की सबसे बड़ी पहचान होता है।
उसकी तक़रीरों का मरकज़ हमेशा मेहनतकश इंसान की इज़्ज़त, मुनासिब उजरत, मयारी तालीम, सस्ती और आसान सेहत की सहूलियतें तथा बराबरी के मौक़े रहे हैं। उसकी गुफ़्तगू में सियासी नारों की गूँज कम और इंसानी तकलीफ़ की सच्चाई ज़्यादा सुनाई देती है। शायद इसी लिए लोग उसकी बातों में किसी लीडर का बयान नहीं, बल्कि अपने ही घर, अपने ही मोहल्ले और अपनी ही ज़िन्दगी की दास्तान महसूस करते हैं।
एक शख़्स से बढ़कर एक इस्तिआरा
दरअस्ल इरफ़ान किसी एक शख़्स का नाम नहीं रहा। वह एक इस्तिआरा बन चुका है—उस हिन्दुस्तान का इस्तिआरा जो तमाम महरूमियों के बावजूद इल्म की तलाश नहीं छोड़ता, जो मुश्किलात के बावजूद उम्मीद का दामन थामे रखता है और जो तमाम नाउम्मीदियों के बावजूद अपने दस्तूर, अपने इंसाफ़ और अपनी जम्हूरी रिवायतों पर यक़ीन बरक़रार रखता है।
आज जब मुआशरा शोर, सनसनी, तफ़रीक़ और सियासी इस्तिक़ताब के दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में इरफ़ान जैसी आवाज़ें हमें यह एहसास दिलाती हैं कि किसी भी मुल्क की अस्ल दौलत उसके ख़ज़ाने नहीं, उसके जागरूक नागरिक होते हैं। हुकूमतें बदलती रहती हैं, इख़्तियार के चेहरे बदलते रहते हैं, मगर वह ज़मीर जो इंसाफ़, सच्चाई और इंसानी वक़ार की हिफ़ाज़त करता है, वही किसी क़ौम की अस्ल पहचान बनता है।
मुमकिन है आने वाले बरसों में लोग इस एहतिजाज की तारीख़ें भूल जाएँ। यह भी मुमकिन है कि उन्हें मंचों की शक्ल, नारों की गूँज और इज्तिमा की तफ़सील याद न रहे। लेकिन तवारीख़ हमेशा वही नाम महफ़ूज़ रखती हैं जो इंसानों के ज़मीर को बेदार कर दें। अगर इस तहरीक़ की कोई सबसे पायदार याद बाक़ी रहेगी, तो वह एक ऐसे मेहनतकश नौजवान की पुरख़ुलूस आवाज़ होगी जिसने अपने किरदार से यह साबित कर दिया कि इल्म की अज़मत डिग्रियों से नहीं, तलब से पैदा होती है; इज़्ज़त ओहदों से नहीं, अख़लाक़ से हासिल होती है; और जम्हूरियत की सबसे मुकम्मल तफ़्सीर हमेशा अवाम की बेबाक, पुरवक़ार और बाशऊर आवाज़ों में मिलती है।
तालीम, सरपरस्ती और रहनुमाई की ज़रूरत
अगर हम वाक़ई एक ऐसे समाज की तामीर चाहते हैं जहाँ सलाहियत को नसब, दौलत और डिग्रियों की ज़ंजीरों में क़ैद न किया जाए, तो सबसे पहले इरफ़ान को एक मुस्तक़िल तालीमी और फ़िक्री माहौल फ़राहम करना होगा। उसे संविधान, समाजी उलूम, तारीख़, इक्तिसादियात, मज़दूर क़वानीन, अवामी पॉलिसी और ख़िताबत (Public Speaking) की बाक़ायदा तरबियत दी जानी चाहिए। उसके लिए किसी मुफ़्त Fellowship, Scholarship या Leadership Development Programme का इंतिज़ाम किया जाए, जहाँ वह अपने तजुर्बात को इल्म की रौशनी से हमआहंग कर सके। साथ ही उसे ऐसी माली इस्तिहकाम भी मुहैया कराया जाए कि रोज़ी-रोटी की फ़िक्र उसके इल्मी और समाजी सफ़र में रुकावट न बने। यह एहसान नहीं होगा, बल्कि एक ऐसी सलाहियत पर सरमायाकारी होगी जो आने वाले वक़्त में हज़ारों नौजवानों के लिए मशअल-ए-राह साबित हो सकती है।
इसके साथ-साथ ज़रूरत इस बात की भी है कि इरफ़ान को किसी सियासी जमाअत या मफ़ादी गिरोह का चेहरा बनाने के बजाय एक आज़ाद फ़िक्री आवाज़ के तौर पर महफ़ूज़ रखा जाए।
उसकी अस्ल क़ुव्वत उसकी सादगी, उसकी ख़ुद्दारी और उसका अवामी एतमाद है; अगर यही चीज़ें सियासी मफ़ादात की नज़र हो गईं, तो समाज एक अहम आवाज़ से महरूम हो जाएगा। बेहतर होगा कि मुल्क की मुअतबर यूनिवर्सिटियाँ, दस्तूरी इदारे, समाजी तन्ज़ीमें, अदबी अकादमियाँ और मज़दूर हुक़ूक़ पर काम करने वाले इदारे उसे अपने मकालमों, सेमिनारों और तर्बियती प्रोग्रामों में शरीक करें, ताकि उसकी सलाहियत महज़ एक वायरल वाक़िआ बनकर न रह जाए, बल्कि एक मुकम्मल फ़िक्री शख़्सियत की सूरत इख़्तियार कर सके। किसी भी क़ौम की अस्ल दौलत ज़मीन के ख़ज़ाने नहीं, बल्कि ऐसे बाशऊर और बा-वक़ार इंसान होते हैं, जिनकी आवाज़ समाज के ज़मीर को बेदार करने की सलाहियत रखती हो। अगर इरफ़ान को सही रहनुमाई, इल्मी सरपरस्ती और इज़्ज़त-आफ़रीन मौक़े फ़राहम किए जाएँ, तो वह सिर्फ़ अपनी ज़िन्दगी नहीं बदलेगा, बल्कि उन लाखों मेहनतकश नौजवानों की उम्मीदों का अमीन भी बन सकता है, जिनकी आवाज़ अब तक शोर में दबकर रह गई है।
इख़्तिताम:-
किसी भी क़ौम की अस्ल दौलत उसके बा-शऊर और बा-वक़ार अफ़राद होते हैं
किसी भी क़ौम की अस्ल दौलत उसके ज़मीन के ख़ज़ाने, बुलन्द इमारतें या मआशी वसाइल नहीं होते, बल्कि उसकी सबसे बड़ी सरमायेदारी ऐसे बा-शऊर, ख़ुद्दार और बा-वक़ार इंसान होते हैं, जिनके अफ़्कार समाज के ज़मीर को बेदार करने, इंसाफ़ की शम्अ रौशन रखने और इन्सानियत की क़द्रों को ज़िन्दा रखने की सलाहियत रखते हों। तवारीख़ गवाह है कि मुल्कों की तामीर तलवारों से कम और ऐसे ही पुरख़ुलूस किरदारों से ज़्यादा होती है, जो अपने अख़्लाक़, अपने इल्म और अपने अमल से आने वाली नस्लों के लिए मशअल-ए-राह बन जाते हैं।
इरफ़ान भी महज़ एक फ़र्द का नाम नहीं, बल्कि उस ख़ामोश हिन्दुस्तान की नुमाइन्दगी करता है, जिसकी पेशानी पर मेहनत का पसीना है, मगर जिसकी आवाज़ अक्सर शोर-ओ-गुल में दबा दी जाती है। अगर उसे सही रहनुमाई, इल्मी सरपरस्ती, फ़िक्री परवरिश और इज़्ज़त-आफ़रीन मौक़े फ़राहम किए जाएँ, तो वह सिर्फ़ अपनी ज़िन्दगी की सिम्त ही तब्दील नहीं करेगा, बल्कि उन लाखों मेहनतकश नौजवानों की उम्मीदों, ख़्वाबों और आरज़ुओं का अमीन भी बन सकता है, जो आज भी अपने हुनर, अपने शऊर और अपने हक़ की पहचान के बावजूद गुमनामी की तारीकियों में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं।
दरअस्ल, किसी भी समाज का मुस्तक़बिल उन अफ़राद के हाथों में महफ़ूज़ होता है, जो इल्म को डिग्रियों से, इज़्ज़त को ओहदों से और जम्हूरियत को महज़ नारों से नहीं, बल्कि अपने किरदार, अपने अख़्लाक़ और अपने अमल से ताबीर देते हैं। अगर ऐसे लोगों की क़द्र की जाए, उन्हें आगे बढ़ने के मौक़े दिए जाएँ और उनकी सलाहियत को सही सिम्त बख़्शी जाए, तो वही अफ़राद किसी क़ौम की फ़िक्री, तहज़ीबी और जम्हूरी विरासत को नई बुलन्दियों तक पहुँचा सकते हैं। यही वह सरमाया है, जो वक़्त की गर्द से कभी मद्धम नहीं पड़ता और जिसकी रौशनी नस्ल-दर-नस्ल राहनुमाई करती रहती है।ये भी पढ़ें
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