उर्दू शायरी और हिंदी फ़िल्मी गीतों के आसमान पर अगर किसी एक सितारे ने सबसे ज़्यादा देर तक रोशनी बिखेरी, तो वह नाम साहिर लुधियानवी का है। उनका असल नाम अब्दुल हयी था। 8 मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना शहर के करीमपुरा मुहल्ले में पैदा होने वाले साहिर सिर्फ़ एक शायर या गीतकार नहीं थे, बल्कि वह एक ऐसा ज़ेहन थे जिसने मोहब्बत, बग़ावत, इंसाफ़, दर्द और इंसानी वजूद को अल्फ़ाज़ का लिबास पहनाया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में साहिर को अवाम का शायर यूँ ही नहीं कहा गया—उनकी नज़्मों और गीतों में समाज की धड़कन सुनाई देती है।
बचपन, माँ और ज़ख़्मी रूह की तामीर
साहिर का बचपन सुकून और सहारे से महरूम रहा। उनके वालिद और वालिदा के दरमियान तल्ख़ रिश्तों ने साहिर की ज़िंदगी को शुरू से ही दर्द की स्याही में डुबो दिया। उनकी माँ सरदार बेग़म ने शौहर से अलग होकर बेहद तंगी और ख़ौफ़ के साये में अपने बेटे की परवरिश की। साहिर की शख़्सियत पर सबसे गहरा असर उनकी माँ का था। कहा जाता है कि साहिर ने ज़िंदगी में अगर किसी से बेपनाह मोहब्बत की, तो वह उनकी माँ थीं, और अगर किसी से नफ़रत की, तो वह उनके वालिद। यही वजह है कि साहिर की शायरी में ममता, महरूमी और बग़ावत साथ-साथ चलती नज़र आती है।
तालीम और शुरुआती शोहरत
साहिर ने लुधियाना के ख़ालसा हाई स्कूल और फिर गवर्नमेंट कॉलेज, लुधियाना में तालीम हासिल की। कॉलेज के ज़माने में ही उनकी ग़ज़लें और नज़्में नौजवान दिलों की आवाज़ बन गईं। उनकी तक़रीरें जोश, फ़िक्र और समाजी बेदारी से भरी होती थीं। आज भी उसी कॉलेज का ऑडिटोरियम उनके नाम से मंसूब है, जो इस बात का सुबूत है कि साहिर सिर्फ़ शायर नहीं, बल्कि एक असरदार शख़्सियत थे।
लाहौर, तरक़्क़ी-पसंद तहरीक और “तल्ख़ियाँ”
1943 में साहिर लाहौर चले गए, जो उस दौर में उर्दू अदब और सियासी सोच का मरकज़ था। वहीं उनकी पहली किताब “तल्ख़ियाँ” (1945) शाया हुई—एक ऐसी किताब जिसने उनकी बाग़ी और बेबाक सोच को वाज़ेह कर दिया। साहिर तरक़्क़ी-पसंद मुसन्निफ़ीन की तहरीक से वाबस्ता रहे और कई अहम उर्दू रिसालों की एडिटिंग भी की। मगर कम्युनिज़्म से हमदर्दी और बेबाक बयानों के सबब पाकिस्तान हुकूमत ने उनके ख़िलाफ़ वारंट जारी कर दिया। 1949 में साहिर को लाहौर छोड़कर हिंदुस्तान लौटना पड़ा—पहले दिल्ली और फिर बंबई (मुंबई), जो आगे चलकर उनका असल मैदान बना।
फ़िल्मी दुनिया में इंक़लाब
संगीतकारों से रिश्ता और बेबाक मिज़ाज
साहिर ने एस.डी. बर्मन, रवि, रोशन, ख़य्याम, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम किया, मगर वह कभी समझौता-पसंद नहीं रहे। उन्होंने लता मंगेशकर से भी ज़्यादा मेहनताना माँगा—सिर्फ़ इसलिए कि गीत को उसकी असल अहमियत मिल सके। ऑल इंडिया रेडियो पर गीतकारों को क्रेडिट दिलवाने में भी साहिर का अहम रोल रहा।
मोहब्बत, तन्हाई और अमृता प्रीतम
अवार्ड्स, इज़्ज़त और पहचान
साहिर को दो बार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला और 1971 में उन्हें पद्म श्री से नवाज़ा गया। 2013 में भारत सरकार ने उनके नाम का डाक टिकट जारी कर उनकी अदबी और सांस्कृतिक अहमियत को हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
इंतक़ाल और बाक़ी रहने वाली आवाज़
25 अक्टूबर 1980 को साहिर लुधियानवी का इंतक़ाल अचानक दिल का दौरा पड़ने से हो गया। वह 59 साल के थे। जिस्म मिट्टी में मिल गया, मगर साहिर की आवाज़ आज भी ज़िंदा है—हर उस शख़्स के दिल में जो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ सोचता है, मोहब्बत को इज़्ज़त देता है और इंसान को इंसान समझता है।
साहिर की अदबी विरासत
साहिर लुधियानवी महज़ एक शायर या गीतकार नहीं थे, बल्कि वह एक दौर, एक फ़िक्र और एक एहसास थे। उन्होंने शायरी को महलों से निकालकर सड़कों तक पहुँचाया। वह सच कहते थे, तल्ख़ सच—और शायद इसी वजह से आज भी साहिर अवाम के शायर कहलाते हैं।
साहिर लुधियानवी की शायरी, ग़ज़लें, नज़्मे फ़िल्मी गाने
ग़ज़ल-1
ग़ज़ल-2
ग़ज़ल-3
ग़ज़ल-4
ग़ज़ल-5
नज़्म -1
फ़िल्म - कभी कभी (1976 )
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो कर
तिरे जमाल की रानाइयों में खो रहता
तिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखें
इन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता
हयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेता
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों से
मुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों से
न कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी
इन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर
मैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँही
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
नज़्म -2
फ़िल्म - प्यासा ( 1957 )
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूके रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
हर इक जिस्म घायल हर इक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन दिलों में उदासी
ये दुनिया है या 'आलम-ए-बद-हवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
यहाँ इक खिलौना है इंसाँ की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
जवानी भटकती है बद-कार बन कर
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर
यहाँ प्यार होता है बेव्पार बन कर
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है
जहाँ प्यार की क़द्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया
मिरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
नज़्म -3
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ पल दो पल मिरी कहानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मिरी जवानी है
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
वो भी इक पल का क़िस्सा थे मैं भी इक पल का क़िस्सा हूँ
कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
पल दो पल में कुछ कह पाया इतनी ही स'आदत काफ़ी है
पल दो पल तुम ने मुझ को सुना इतनी ही ‘इनायत काफ़ी है
कल और आएँगे नग़्मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझ से बेहतर कहने वाले तुम से बेहतर सुनने वाले
नज़्म -4
फिल्म - इंसान और शैतान (1970)
ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे
फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे
तेग़-ए-बे-दाद पे या लाशा-ए-बिस्मिल पे जमे
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
लाख बैठे कोई छुप-छुप के कमीं-गाहों में
ख़ून ख़ुद देता है जल्लादों के मस्कन का सुराग़
साज़िशें लाख उड़ाती रहीं ज़ुल्मत की नक़ाब
ले के हर बूँद निकलती है हथेली पे चराग़
ज़ुल्म की क़िस्मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहो
जब्र की हिकमत-ए-परकार के ईमा से कहो
महमिल-ए-मज्लिस-ए-अक़्वाम की लैला से कहो
ख़ून दीवाना है दामन पे लपक सकता है
शोला-ए-तुंद है ख़िर्मन पे लपक सकता है
तुम ने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वो कूचा ओ बाज़ार में आ निकला है
कहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन कर
ख़ून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से
सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से
ज़ुल्म की बात ही क्या ज़ुल्म की औक़ात ही क्या
ज़ुल्म बस ज़ुल्म है आग़ाज़ से अंजाम तलक
ख़ून फिर ख़ून है सौ शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें कि मिटाओ तो मिटाए न बने
ऐसे शोले कि बुझाओ तो बुझाए न बने
ऐसे नारे कि दबाओ तो दबाए न बने
तब्सरा :-
साहिर की हयात पर ग़ौर किया जाए तो साफ़ महसूस होता है कि उनकी शख़्सियत दो मुक़ाबिल ताक़तों के दरमियान तामीर हुई—एक तरफ़ माँ की ममता, तंगी और मज़लूमी, और दूसरी तरफ़ बाप की सख़्ती, ज़ुल्म और बेगानगी। यही वजह है कि उनकी शायरी में माँ एक मुक़द्दस साया बन कर उभरती है और बाप एक नाइंसाफ़ निज़ाम की अलामत बन जाता है। साहिर का बाग़ी मिज़ाज दरअसल शख़्सी नहीं, समाजी था; वह इंक़लाब के नारे नहीं लगाते थे बल्कि ज़ुल्म की नब्ज़ पर उँगली रख देते थे। उनकी नज़्में अदालत की तरह हैं—जहाँ सवाल भी वही पूछता है और फ़ैसला भी वही सुनाता है।
फ़िल्मी दुनिया में साहिर का दाख़िला उर्दू शायरी के मिज़ाज में एक नई तहरीक लेकर आया। उन्होंने गीत को महज़ धुन का ख़ादिम बनने से इंकार कर दिया और लफ़्ज़ को उसकी असल हुकूमत लौटाई। यह कोई मामूली बात नहीं थी कि एक गीतकार संगीतकार से कहे कि पहले अल्फ़ाज़ मुकम्मिल होंगे, फिर सुर पैदा होंगे। साहिर का यह रवैया फ़नकाराना ज़िद नहीं, बल्कि अदब की इज़्ज़त का ऐलान था। इसी उसूल ने उन्हें उनके दौर का सबसे ज़्यादा मेहनताना लेने वाला गीतकार भी बनाया और सबसे ज़्यादा बहसों में घिरा हुआ भी।
मोहब्बत के मामले में साहिर एक अजीब तज़ाद थे—वह इश्क़ को समझते थे, लिखते थे, दूसरों के लिए अमर बना देते थे, मगर ख़ुद उसके तआल्लुक़ से घबराते थे। अमृता प्रीतम के साथ उनका रिश्ता इसी तज़ाद की सबसे बड़ी मिसाल है। यह मोहब्बत हासिल की कहानी नहीं, बल्कि छोड़े जाने की अज़्मत की कहानी है। साहिर शायद जानते थे कि अगर वह किसी एक रिश्ते में बंध गए तो उनकी तन्हाई, जो उनकी शायरी की सबसे बड़ी ताक़त थी, उनसे छिन जाएगी। इसलिए उन्होंने मोहब्बत को अपनाया भी और उससे दूरी भी बनाए रखी—और इसी दूरी ने उन्हें साहिर बना दिया।
साहिर की शायरी और गीतों की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह अपने दौर तक महदूद नहीं रहते। “जिन्हें नाज़ है हिंद पर” सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि हर दौर के ज़ालिम निज़ाम के ख़िलाफ़ एक सवाल है; “वो सुबह कभी तो आएगी” सिर्फ़ उम्मीद नहीं, बल्कि मज़लूम इंसान की ज़िद है। साहिर ने इंसान को मज़हब, मुल्क़ और सियासत से पहले इंसान की हैसियत से देखा, और यही नज़रिया उन्हें आम शायरों से अलग करता है।
इंतक़ाल के बाद साहिर का जिस्म मिट्टी में मिल गया, मगर उनका फ़न वक़्त की गर्द से महफ़ूज़ रहा, क्योंकि वह किसी फ़ैशन या दौर की पैदावार नहीं था, बल्कि इंसानी तक़ाज़ों से जन्मा था। साहिर लुधियानवी को अगर एक जुमले में समझना हो तो कहा जा सकता है कि वह शायर नहीं, ज़मीर थे—और ज़मीर कभी मरते नहीं।ये भी पढ़ें

