Saifi Sironji Poet: हयात, अदबी ख़िदमात और उर्दू अदब का रौशन बाब

तआरुफ़

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ शख़्सियात ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ अपने शे'र-ओ-अदब की वजह से नहीं, बल्कि इल्म, तहक़ीक़, तन्क़ीद, इदारत, तदवीन और ज़बान-ओ-अदब की बे-लौस ख़िदमत की बिना पर एक मुकम्मल इदारा बन जाती हैं। डॉ. सैफ़ी सिरोंजी इन्हीं नादिर-ओ-कामयाब अदबी शख़्सियतों में शुमार किए जाते हैं। वह सिर्फ़ एक कामयाब शायर ही नहीं, बल्कि आला पाये के मुहक़्क़िक़, बेमिसाल तन्क़ीद-निगार, मुतअद्दिद किताबों के मुसन्निफ़, माहिर किताबियात (बिब्लियोग्राफ़िस्ट), दूरअंदेश मुदव्विन और उर्दू ज़बान के ऐसे मुहाफ़िज़ हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू अदब की तरक़्क़ी, इशाअत और फ़रोग़ के लिए वक़्फ़ कर दी।

उनकी इल्मी, अदबी और तहक़ीक़ी ख़िदमात का दायरा न सिर्फ़ हिंदुस्तान बल्कि आलमी सतह तक फैला हुआ है। उन्होंने अपनी तहरीरों, तहक़ीक़ी किताबों, तन्क़ीदी मज़ामीन, शायरी, इदारती सलाहियत और अदबी सरगर्मियों के ज़रिये उर्दू अदब को एक नई जहत अता की है। यही वजह है कि आज उनका नाम उर्दू दुनिया के उन चंद अहम् अहल-ए-क़लम में लिया जाता है जिनकी इल्मी साख़ मुसल्लम है।

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की शख़्सियत का सबसे रौशन पहलू यह है कि उन्होंने मुफ़लिसी, तंगी और मुख़्तलिफ़ मुश्किलात को कभी अपनी मंज़िल की राह में रुकावट नहीं बनने दिया। बीड़ी मज़दूर के तौर पर ज़िंदगी का आग़ाज़ करने वाले इस अज़ीम अदबी सफ़र ने मेहनत, इस्तिक़ामत और इल्म-दोस्ती की बदौलत एम.ए. और पी-एच.डी. जैसी बुलंद मंज़िलें तय कीं। उनकी ज़िंदगी इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि अगर इरादे बुलंद हों तो हालात कभी इंसान की राह नहीं रोक सकते।

पैदाइश और ख़ानदानी पस-ए-मंज़र

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी का अस्ल नाम रमज़ानी है। उनकी पैदाइश 28 अप्रैल 1952 को मध्य प्रदेश के ज़िला विदिशा की तहसील सिरोंज के क़रीब वाक़े गाँव महुआ खेड़ा (पिगरानी) में हुई। चूँकि उनकी विलादत माह-ए-रमज़ान की तेरहवीं तारीख़ को हुई थी, इसलिए उनका नाम रमज़ानी रखा गया। बाद के ज़माने में अदबी दुनिया में उन्होंने "सैफ़ी" को अपना तख़ल्लुस बनाया और फिर यही नाम उनकी पहचान बन गया।

उनका ताल्लुक़ एक ऐसे देहाती और सादा-ज़िंदगी गुज़ारने वाले ख़ानदान से था जहाँ दीनदाराना माहौल, अख़्लाक़ी उसूल और मेहनत-कशी को बड़ी अहमियत हासिल थी। अगरचे उस दौर में आला तालीम के वसाइल बहुत महदूद थे, लेकिन घर के बुज़ुर्गों की दीनदारी और इल्म से मुहब्बत ने उनके अंदर बचपन ही से इल्म हासिल करने की आरज़ू पैदा कर दी।

महुआ खेड़ा का देहाती माहौल, वहाँ की तहज़ीब, इंसानी रिश्तों की गर्मजोशी, मज़हबी रसूमात और ज़बान की शीरीनी ने उनकी शख़्सियत की तामीर में गहरा किरदार अदा किया। यही वजह है कि उनकी तहरीरों में गाँव की सादगी, इंसानी जज़्बात, समाजी एहसास और तहज़ीबी रंग बड़ी ख़ूबसूरती से नज़र आते हैं।

बचपन और इब्तिदाई ज़िंदगी

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी का बचपन सादगी, मेहनत और जद्दोजहद के माहौल में गुज़रा। उन्होंने ज़िंदगी के शुरुआती दौर ही में महसूस कर लिया था कि इल्म ही वह दौलत है जो इंसान की तक़दीर बदल सकती है। यही एहसास आगे चलकर उनकी पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सरमाया साबित हुआ।

जब उनकी उम्र तक़रीबन छह बरस की हुई तो उनके दादा ने उन्हें गाँव के मदरसे में दाख़िल कराया ताकि वह क़ुरआन-ए-मजीद की तालीम हासिल कर सकें। यहीं से उन्होंने उर्दू पढ़ना, लिखना और क़ुरआनी तिलावत सीखनी शुरू की। इस दौरान उन्होंने क़ुरआन शरीफ़ के कई पारे याद किए और उर्दू ज़बान पर उनकी गिरफ़्त मज़बूत होती चली गई।

अगरचे उनके इर्द-गिर्द तालीम का रिवाज बहुत ज़्यादा नहीं था, मगर उनके अंदर इल्म हासिल करने का जोश दिन-ब-दिन बढ़ता गया। उन्होंने किताबों से दोस्ती कर ली और हर नई चीज़ को जानने की बेचैनी उनकी फ़ितरत का हिस्सा बन गई।

उनका बचपन मुफ़लिसी और मेहनत की दास्तान भी है। कम उम्र में ही उन्हें रोज़गार की तलाश में बीड़ी बनाने के कारख़ाने तक जाना पड़ा, लेकिन यही कारख़ाना उनकी अदबी ज़िंदगी का पहला मदरसा साबित हुआ।

तालीमी सफ़र

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी का तालीमी सफ़र किसी आम तलबा की तरह आसान नहीं था। हालात की सख़्ती, माली परेशानियाँ और ज़िंदगी की दूसरी मजबूरियाँ बार-बार उनकी राह में आती रहीं, लेकिन उन्होंने कभी इल्म का दामन नहीं छोड़ा।

उन्होंने अपनी बुनियादी तालीम मदरसे से हासिल की, जहाँ उर्दू ज़बान और दीनी उलूम की बुनियाद मज़बूत हुई। इसके बाद उन्होंने ख़ुद-मुतालआ (Self Study) को अपना सबसे बड़ा उस्ताद बनाया। रेडियो, अदबी रसाइल, नॉवेल, अख़बार और किताबें उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बनते चले गए।

बाद में उन्होंने बाक़ायदा आला तालीम हासिल की और बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी, भोपाल से एम.ए. तथा उसके बाद पी-एच.डी. की सनद हासिल की। यह कामयाबी किसी करिश्मे से कम नहीं थी, क्योंकि एक बीड़ी मज़दूर से डॉक्टरेट तक का सफ़र इंतिहाई सब्र, मेहनत और इस्तिक़ामत का मुतक़ाज़ी था।

उनकी तालीम महज़ डिग्रियों तक महदूद नहीं रही, बल्कि उन्होंने उम्र भर मुतालआ, तहक़ीक़ और इल्मी जस्तजू को अपना शिआर बनाए रखा।

अदबी ज़ौक़ की इब्तिदा

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की अदबी ज़िंदगी की अस्ल इब्तिदा बीड़ी के उसी कारख़ाने से हुई जहाँ रोज़गार की तलाश उन्हें ले गई थी। यह कारख़ाना मशहूर शायर दिलकश सागरी का था। वहाँ अक्सर मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से आने वाले शायरों, अदीबों और अहल-ए-क़लम की महफ़िलें सजती थीं।

इन महफ़िलों ने एक नौजवान रमज़ानी के दिल में उर्दू अदब की ऐसी शम्मा रौशन की जो फिर सारी उम्र बुझ न सकी। उन्होंने शायरों की गुफ़्तगू सुनी, अशआर याद किए और अदबी रसाइल पढ़ना शुरू कर दिए। 'किताब', 'शबख़ून', 'सुबह-ए-अदब', 'शायर' जैसी मुअतबर पत्रिकाएँ उनके इल्मी सफ़र की हमसफ़र बन गईं।

इसी दौर में उन्होंने नसीम हिजाज़ी, सादिक़ सरहंदी और दूसरे बड़े मुसन्निफ़ीन का मुतालआ किया। धीरे-धीरे उन्होंने ख़ुद भी शे'र कहना शुरू किया। शुरू में उन्होंने नअतें और अशआर लिखे जो स्थानीय महफ़िलों और मिलाद की महफ़िलों में पढ़े जाते थे।

यही शुरुआती मश्क़ आगे चलकर उन्हें उर्दू दुनिया के एक मुअतबर शायर, मुहक़्क़िक़ और तन्क़ीद-निगार के मुक़ाम तक ले गई।

अफ़साना-निगारी और नस्री अदब की जानिब रुझान

अगरचे डॉ. सैफ़ी सिरोंजी को शोहरत एक शायर के तौर पर हासिल हुई, लेकिन उनकी अदबी शख़्सियत महज़ शायरी तक महदूद नहीं रही। अस्सी के दशक में उन्होंने नस्री अदब की तरफ़ तवज्जो दी और अफ़साना-निगारी, तन्क़ीद और तहक़ीक़ के मैदान में भी अपनी ख़ास पहचान क़ायम की।

उनके अफ़साने इंसानी ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों, समाजी नाइंसाफ़ियों, ग़रीबी, तहज़ीबी तब्दीलियों और इंसानी जज़्बात की अक्कासी करते हैं। उन्होंने किसी तसन्नोअ या तकल्लुफ़ का सहारा लेने के बजाय ज़िंदगी को उसी सादगी और सच्चाई के साथ बयान किया जैसा उन्होंने ख़ुद महसूस किया था।

उनकी नस्र में इल्मी वक़ार भी है और अदबी लताफ़त भी। यही वजह है कि उनके मज़ामीन सिर्फ़ मालूमात नहीं देते, बल्कि क़ारी को सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

पहली किताब और अदबी पहचान

हर मुसन्निफ़ की पहली किताब उसकी उम्र भर की मेहनत का पहला समर होती है। डॉ. सैफ़ी सिरोंजी के लिए भी यह लम्हा बेहद अहम था।

सन 1985 में उनका पहला शे'री मजमूआ "रौशन अलाव" मंज़रे-आम पर आया। इस किताब की इशाअत में मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने माली तआवुन फ़राहम किया। यह सिर्फ़ एक किताब की इशाअत नहीं थी, बल्कि उनकी अदबी सलाहियत का बाक़ायदा एतराफ़ भी था।

"रौशन अलाव" को उर्दू हल्क़ों में ख़ूब पसन्द किया गया। इस मजमूए ने साबित कर दिया कि डॉ. सैफ़ी सिरोंजी महज़ एक उभरते हुए शायर नहीं, बल्कि अपने अस्लूब, फ़िक्र और बयान की इन्फ़िरादियत रखने वाले तख़्लीक़कार हैं।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी तस्नीफ़ात का सिलसिला लगातार जारी रहा और देखते ही देखते वह पचास से ज़्यादा किताबों के मुसन्निफ़ बन गए।

तदरीसी ज़िंदगी और इल्म की तर्वीज़

अदब के साथ-साथ डॉ. सैफ़ी सिरोंजी ने तालीम के मैदान में भी क़ाबिल-ए-क़द्र ख़िदमात अंजाम दीं। उन्होंने मुख़्तलिफ़ तालीमी इदारों में असातिज़ा की हैसियत से फ़राइज़ अंजाम दिए और नई नस्ल को उर्दू ज़बान व अदब से वाबस्ता करने की भरपूर कोशिश की।

वह तालीम को महज़ रोज़गार हासिल करने का ज़रिया नहीं समझते थे, बल्कि उसे इंसान की फ़िक्र, अख़्लाक़ और शऊर की तामीर का ज़रिया क़रार देते थे। उनकी तदरीस में किताबी मालूमात के साथ-साथ ज़िंदगी का तजुर्बा और अदबी ज़ौक़ भी शामिल रहता था।

उनके कई शागिर्द बाद में उर्दू अदब, सहाफ़त और तहक़ीक़ के मैदान में अहम मुक़ामात तक पहुँचे, जो उनकी तालीमी ख़िदमात का सबसे बड़ा एतराफ़ है।

'इंतिसाब आलमी' — एक अदबी तहरीक़ का आग़ाज़

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की ज़िंदगी का सबसे बड़ा कारनामा बिला-शुब्हा "इंतिसाब आलमी" है।

सन 1982 में जब उन्होंने सिरोंज जैसे छोटे से शहर से एक उर्दू अदबी रिसाला जारी करने का फ़ैसला किया, तो बहुत से लोगों ने इसे नामुमकिन ख़्वाब समझा। उस दौर में बड़े-बड़े शहरों से निकलने वाले रसाइल भी बंद हो रहे थे, लेकिन उन्होंने तमाम मुश्किलात के बावजूद अपने इरादे को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया।

"इंतिसाब आलमी" महज़ एक रिसाला नहीं, बल्कि उर्दू अदब की एक मुकम्मल तहरीक़ साबित हुआ। इसकी बदौलत सिरोंज जैसा छोटा कस्बा पूरी उर्दू दुनिया के नक़्शे पर एक अहम अदबी मरकज़ के तौर पर उभरकर सामने आया।

चार दशकों से ज़्यादा अरसे तक मुसलसल इसकी इशाअत जारी रखना अपने आप में एक ऐसा कारनामा है जिसकी मिसाल उर्दू सहाफ़त में बहुत कम मिलती है।

एक मुदव्विन की हैसियत से उनकी ख़िदमात

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी ने मुदव्विन (Editor) की हैसियत से जिस दूरअंदेशी, इल्मी दीयानतदारी और अदबी ज़िम्मेदारी का मुज़ाहिरा किया, वह उनकी शख़्सियत का सबसे मज़बूत पहलू है।

उन्होंने "इंतिसाब आलमी" के ज़रिये नए और पुराने दोनों तरह के क़लमकारों को बराबर मौक़ा दिया। मुल्क के मुख़्तलिफ़ सूबों के अलावा ब्रिटेन, अमेरिका, सऊदी अरब, पाकिस्तान और यूरोप से भी अदीबों और शायरों की तहरीरें इस रिसाले में शाए होती रहीं।

उन्होंने सिर्फ़ तहरीरें जमा नहीं कीं, बल्कि उर्दू अदब की तहज़ीबी रवायत, तन्क़ीदी शऊर और इल्मी मयार को भी बरक़रार रखा। यही वजह है कि "इंतिसाब आलमी" को आज उर्दू दुनिया के मुअतबर अदबी रसाइल में शुमार किया जाता है।

'आलमी ज़बान' और दूसरी इदारती सरगर्मियाँ

"इंतिसाब आलमी" की कामयाबी के बाद डॉ. सैफ़ी सिरोंजी ने "आलमी ज़बान" के नाम से एक माहनामा भी जारी किया, जिसका मक़सद उर्दू ज़बान की तरक़्क़ी, अदबी रवायतों का तहफ़्फ़ुज़ और नई नस्ल को उर्दू से जोड़े रखना था।

उनकी इदारती सरगर्मियाँ सिर्फ़ रिसालों तक महदूद नहीं रहीं। उन्होंने अदबी सेमिनार, मुशायरे, तन्क़ीदी इजलास, किताबों की तक़रीब-ए-रूनुमाई और इल्मी नशिस्तों का सिलसिला भी मुसलसल जारी रखा।

उनकी कोशिशों की बदौलत सिरोंज जैसा शहर उर्दू अदब का एक ऐसा मरकज़ बन गया जहाँ मुल्क और बैरून-ए-मुल्क के अहल-ए-क़लम बड़ी दिलचस्पी के साथ शिरकत करने लगे।

क़ौमी शोहरत से आलमी पहचान तक का सफ़र

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की शोहरत किसी इश्तिहार या शोहरत-पसंदी की मरहून-ए-मिन्नत नहीं, बल्कि उम्र भर की मुसलसल इल्मी मेहनत और अदबी रियाज़त का समर है। उन्होंने जिस ख़ुलूस और दीयानतदारी के साथ उर्दू अदब की ख़िदमत की, उसी ने उन्हें मुल्क के कोने-कोने में एक मुअतबर नाम बना दिया।

उनकी ग़ज़लें, नज़्में, तन्क़ीदी मज़ामीन, तहक़ीक़ी किताबें और इदारती कारनामे हिंदुस्तान के मुख़्तलिफ़ अदबी मराकिज़ में न सिर्फ़ पढ़े गए बल्कि उन्हें एक मिसाली काम के तौर पर सराहा भी गया। धीरे-धीरे उनका दायरा हिंदुस्तान की सरहदों से निकलकर आलमी उर्दू बिरादरी तक फैल गया।

आज उनकी पहचान सिर्फ़ मध्य प्रदेश या सिरोंज तक महदूद नहीं, बल्कि वह उर्दू अदब की आलमी नुमाइंदा शख़्सियतों में शुमार किए जाते हैं।


मुल्क-ओ-बैरून-ए-मुल्क अदबी सरगर्मियाँ

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी ने अपनी अदबी ज़िंदगी में बेशुमार मुशायरों, सेमिनारों, इल्मी कॉन्फ़्रेंसों और अदबी इजलासों में शिरकत की। उनकी मौजूदगी किसी भी अदबी नशिस्त को इल्मी वक़ार और फ़िक्र की गहराई बख़्श देती है।

उन्होंने हिंदुस्तान के अलावा ब्रिटेन, सऊदी अरब, अमेरिका, पाकिस्तान और यूरोप के मुख़्तलिफ़ अदबी मराकिज़ में भी उर्दू ज़बान और अदब की नुमाइंदगी की। इन आलमी प्लेटफ़ॉर्म्स पर उन्होंने अपनी तहरीरों, तक़रीरों और तहक़ीक़ी नज़रिये के ज़रिये यह साबित किया कि उर्दू सिर्फ़ एक ज़बान नहीं, बल्कि तहज़ीब, मोहब्बत और इंसानी अख़्लाक़ की ज़बान है।

उनकी इल्मी गुफ़्तगू और अदबी फ़िक्र को मुल्क-ओ-बैरून-ए-मुल्क के अहल-ए-ज़ौक़ ने बड़ी क़द्र की निगाह से देखा।


उर्दू ज़बान की बे-लौस ख़िदमत

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि उन्होंने उर्दू की ख़िदमत किसी ओहदे, शोहरत या माली मफ़ाद के लिए नहीं की। उनकी पूरी ज़िंदगी इस बात की गवाह है कि उन्होंने उर्दू को अपना मिशन समझा।

जब उर्दू के बहुत से रसाइल एक-एक करके बंद हो रहे थे, तब उन्होंने सिरोंज जैसे छोटे शहर से "इंतिसाब आलमी" को लगातार ज़िंदा रखा। यह कारनामा महज़ इदारती सलाहियत का सबूत नहीं, बल्कि उर्दू ज़बान से उनकी बे-पनाह मुहब्बत का भी आईना है।

उन्होंने नई नस्ल को उर्दू से जोड़ने, नए क़लमकारों की रहनुमाई करने, तहक़ीक़ को फ़रोग़ देने और उर्दू अदब के मयार को बुलंद रखने के लिए जो कोशिशें कीं, वह तारीख़-ए-उर्दू में हमेशा याद रखी जाएँगी।


क़तर का आलमी उर्दू अवॉर्ड — एक तारीखी ऐज़ाज़

सन 2022 डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की अदबी ज़िंदगी का एक बेहद अहम साल साबित हुआ।

क़तर की मशहूर अदबी तंज़ीम मजलिस-ए-फ़रोग़-ए-उर्दू अदब (MFUA) ने उन्हें उर्दू ज़बान और अदब की ग़ैर-मामूली ख़िदमात के एतराफ़ में अपना आलमी उर्दू अवॉर्ड अता किया।

यह इज़्ज़त अफ़ज़ाई किसी एक किताब या एक शोबे की वजह से नहीं, बल्कि उनकी पूरी उम्र की अदबी, तहक़ीक़ी, तन्क़ीदी और इदारती ख़िदमात के एतराफ़ में की गई।

इस एवार्ड के साथ उन्हें नक़दी इनाम, ट्रॉफ़ी और आलमी सतह पर उर्दू के एक मुअतबर ख़ादिम की हैसियत से ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया गया। इस मौक़े पर आलमी उर्दू हल्क़ों ने उनकी ख़िदमात को इंतिहाई एहतराम के साथ याद किया।


अकादमिक दुनिया में मक़बूलियत

हर अदीब को यह इज़्ज़त हासिल नहीं होती कि उसकी ज़िंदगी और ख़िदमात ख़ुद एक मौज़ू-ए-तहक़ीक़ बन जाएँ। डॉ. सैफ़ी सिरोंजी उन ख़ुशनसीब और बुलंद-पाया अहल-ए-क़लम में शामिल हैं जिनकी अदबी ख़िदमात पर यूनिवर्सिटी सतह पर बाक़ायदा रिसर्च की गई।

उनके इदारा "इंतिसाब आलमी" की अदबी और सहाफ़ती ख़िदमात पर पी-एच.डी. मुकम्मल की जा चुकी है।

इसी तरह उनकी तहरीरी और अदबी ख़िदमात पर एम.फिल. की तहक़ीक़ात भी मुकम्मल हो चुकी हैं। यह किसी भी ज़िंदा अदीब के लिए इंतिहाई क़ाबिल-ए-फ़ख़्र बात है कि उसकी ख़िदमात अगली नस्ल के मुहक़्क़िक़ीन के लिए मरजअ बन जाएँ।


उनकी किताबें — तलबा और मुहक़्क़िक़ीन के लिए मरजअ

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की तस्नीफ़ात आज उर्दू के तलबा, रिसर्च स्कॉलर्स, असातिज़ा और मुहक़्क़िक़ीन के लिए एक मुअतबर हवाला मानी जाती हैं।

उनकी किताबों में मालूमात की वुसअत, हवालों की मुस्तनद हैसियत, तहक़ीक़ की गहराई और तन्क़ीद की मुतवाज़िन रविश ऐसी ख़ूबियाँ हैं जिनकी वजह से उनकी तहरीरें अकादमिक हल्क़ों में बराबर पढ़ी और पढ़ाई जाती हैं।

उनकी कई किताबें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की यूनिवर्सिटियों के तलबा के लिए भी मुफ़ीद साबित हुई हैं, जबकि उनकी कुछ तहरीरों का तर्जुमा अंग्रेज़ी, हिन्दी, गुजराती और मलयालम जैसी ज़बानों में भी किया जा चुका है।


नई नस्ल की रहनुमाई

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी सिर्फ़ ख़ुद लिखने तक महदूद नहीं रहे। उन्होंने हमेशा नई नस्ल के क़लमकारों की हौसला-अफ़ज़ाई की।

"इंतिसाब आलमी" और "आलमी ज़बान" के ज़रिये उन्होंने सैकड़ों नए शायरों, अफ़साना-निगारों, मुहक़्क़िक़ों और तन्क़ीद-निगारों को पहली बार अपनी तहरीरें शाए कराने का मौक़ा फ़राहम किया।

उनका एतक़ाद था कि उर्दू अदब की अस्ल ताक़त नई नस्ल है, और अगर उसे सही रहनुमाई और मुनासिब मंच मिल जाए तो उर्दू का मुस्तक़बिल हमेशा रौशन रहेगा।


शख़्सियत और अख़्लाक़

जिन लोगों ने डॉ. सैफ़ी सिरोंजी को क़रीब से देखा है, वह इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि उनकी इल्मी बुलंदी के साथ-साथ उनकी इन्सार-पसंदी, इन्किसारी, ख़ुश-अख़्लाक़ी और सादा-मिज़ाजी भी उनकी शख़्सियत का अहम हिस्सा है।

उन्होंने कभी शोहरत को अपनी मंज़िल नहीं बनाया। उनका अस्ल मक़सद हमेशा इल्म की ख़िदमत, उर्दू की तरक़्क़ी और अदब की पासदारी रहा। यही इन्किसारी उन्हें अपने हमअस्र अदीबों में एक मुमताज़ मुक़ाम अता करती है।

इख़तिताम (समापन) 

सैफी सिरोंजी की ज़िंदगी जद्द-ओ-जहद, अज़्म और अदबी अज़मत की अलामत है। आपका सफर, जिसमें आपने एक छोटे से गाँव से शुरूआत करके 75 से ज़्यादा किताबें लिखीं, वाक़ई मुतास्सिरकुन है। सैफी सिरोंजी का अदबी कारनामा उर्दू अदब में बेमिसाल है, और आपकी तखलीकात आने वाली नस्लों के लिए मशल-ए-राह रहेंगी।

सैफ़ी  सिरोंजी की शायरी,दोहे 

1-ग़ज़ल 


वफ़ा ख़ुलूस मोहब्बत इबादतें उस की 

भुला न पाऊँगा यारो मोहब्बतें उस की 

क़दम क़दम पे मुझे जिस ने हौसला बख़्शा 

चराग़-ए-राह बनी हैं नसीहतें उस की 

हर एक मोड़ पे उस ने मुझे सँभाला है 

मैं ख़ुश-नसीब कि पाएँ रिफाक़तें उस की 

है कुछ तो बात यक़ीनन कि लोग कहते हैं 

यूँही नहीं हैं ज़माने में शोहरतें उस की 

2-ग़ज़ल 


ख़ुशियाँ तमाम ग़म में वो तब्दील कर गया 

आख़िर मिरे ख़ुलूस की तज़लील कर गया 

वो एक शख़्स दोस्तों मर तो गया मगर 

रौशन जहाँ में प्यार की क़िंदील कर गया 

लिख कर वफ़ा का नाम वो सादा वरक़ पे आज 

पूरी हर इक किताब की तफ़्सील कर गया 

शो'ला-बयाँ था कितना ख़तरनाक दोस्तो 

लफ़्ज़ों का ज़हर जिस्म में तहलील कर गया 

'सैफ़ी' की आज मौत पे दुश्मन भी कह उठे 

अच्छा था वो हयात की तकमील कर गया 

3-ग़ज़ल 


नतीजे सारे यक़ीं से निकले 

ख़ज़ाने घर की ज़मीं से निकले 

हर एक क़तरा गवाही देगा 

लहू हमारा कहीं से निकले 

लगे थे पहरे वहाँ पे हर-सू 

हमारी ज़िद थी वहीं से निकले 

सुनाऊँ जब भी ग़ज़ल मैं उस को 

पसीना उस की जबीं से निकले 

अँधेरी शब और मैं अकेला 

कोई तो तारा कहीं से निकले 

4-ग़ज़ल 

मैं एक मुद्दत से जल रहा हूँ

तुम्हारे रस्ते का इक दिया हूँ

तिरी तिजारत चमक रही है

ख़सारा मैं ही उठा रहा हूँ

जिधर से गुज़रा था क़ाफ़िला वो

अभी तलक मैं वहीं खड़ा हूँ

सच कहूँगा झूट तुम से

अजीब मुश्किल में पड़ गया हूँ

नहीं है जिस की कोई भी मंज़िल

मैं ऐसे रस्ते पे चल पड़ा हूँ

दोहे

अपनी ख़ुशियाँ भूल जा सब का दर्द ख़रीद 'सैफ़ी' तब जा कर कहीं तेरी होगी ईद

हर महफ़िल में जा मगर इतनी कर ले जाँच ख़ुद्दारी पर भूल कर आए कभी न आँच

मैं हूँ इक ज़र्रा मगर ऊँची मेरी ज़ात मेरे आगे कुछ नहीं तारों की औक़ात


तब्सिरा

कुछ शख़्सियतें अपनी तख़्लीक़ात से पहचानी जाती हैं, कुछ अपनी तहक़ीक़ से, कुछ अपनी शोहरत से; लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनकी पूरी ज़िंदगी ख़ुद एक ऐसी किताब बन जाती है जिसे हर दौर का क़ारी एहतराम के साथ पढ़ता है। डॉ. सैफ़ी सिरोंजी ऐसी ही नादिर और क़ाबिल-ए-सद-एहतराम शख़्सियतों में शामिल हैं।

उनकी ज़िंदगी का सफ़र किसी आसान राह की कहानी नहीं, बल्कि जद्दोजहद, सब्र, इस्तिक़ामत और इल्म की ऐसी दास्तान है, जो हर उस इंसान के लिए उम्मीद का पैग़ाम है जो हालात से शिकस्त खाने के बजाय उनसे लड़ना जानता है। बीड़ी के कारख़ाने में मेहनत-मशक्कत करने वाला एक गुमनाम नौजवान, जिसने मुफ़लिसी को अपनी तक़दीर मानने से इंकार कर दिया, वही आगे चलकर उर्दू अदब का एक मुअतबर मुहक़्क़िक़, बुलंद-पाया तन्क़ीद-निगार, कामयाब शायर, दूरअंदेश मुदव्विन और आलमी सतह पर उर्दू ज़बान का सच्चा सफ़ीर बन गया। यह महज़ एक शख़्स की कामयाबी नहीं, बल्कि इल्म, इरादे और ख़ुलूस की फ़त्ह की दास्तान है।

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी ने अपनी ज़िंदगी से यह साबित कर दिया कि इंसान की अस्ल पहचान उसके हालात नहीं, बल्कि उसका किरदार, उसका क़लम और उसके ख़्वाब तय करते हैं। उन्होंने मुफ़लिसी को मजबूरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी तालीम, तहक़ीक़ और तख़्लीक़ का ज़ीना बना लिया। यही वजह है कि आज उनका नाम उर्दू अदब में महज़ एक शायर या मुसन्निफ़ के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे मुकम्मल अदबी इदारे की हैसियत से लिया जाता है जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी।

उनकी शायरी में दिल की हरारत है, तन्क़ीद में इल्म की रोशनी, तहक़ीक़ में सनद की मज़बूती, इदारत में दीयानतदारी और शख़्सियत में ऐसी इन्किसारी है जो बड़े से बड़े अहल-ए-क़लम को भी अपना मु'तरिफ़ बना लेती है। उनकी तहरीरों को पढ़ते हुए यूँ महसूस होता है जैसे अल्फ़ाज़ सिर्फ़ लिखे नहीं गए, बल्कि उम्र भर के मुतालआ, तजुर्बे और मुशाहिदे की आँच में तपकर निखरे हों।

सिरोंज जैसे एक छोटे से शहर को उर्दू अदब के आलमी नक़्शे पर पहचान दिलाना, "इंतिसाब आलमी" जैसे मुअतबर अदबी रिसाले को चार दशक से ज़्यादा अरसे तक ज़िंदा रखना, पचास से ज़्यादा इल्मी और अदबी किताबें तस्नीफ़ करना, नई नस्ल के क़लमकारों की रहनुमाई करना और उर्दू तहक़ीक़ को नई जहत अता करना—ये ऐसे कारनामे हैं जिन्हें उर्दू अदब की तारीख़ हमेशा फ़ख़्र के साथ याद रखेगी।

डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की शख़्सियत हमें यह भी सिखाती है कि शोहरत का सबसे ख़ूबसूरत रास्ता ख़ामोश मेहनत से होकर गुज़रता है। उन्होंने कभी अपने लिए सुर्ख़ियाँ नहीं तलाशीं; उन्होंने सिर्फ़ अपने क़लम को सच्चाई, इल्म और अदब की अमानत समझा। शायद यही वजह है कि आज उनका नाम हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के उर्दू हल्क़ों में इंतिहाई एहतराम के साथ लिया जाता है।

बिला-शुब्हा, डॉ. सैफ़ी सिरोंजी की ज़िंदगी उस चराग़ की मानिंद है जिसने ख़ुद जलकर न सिर्फ़ अपने रास्ते को रौशन किया, बल्कि उर्दू अदब की पूरी बिसात पर इल्म, फ़िक्र और तख़्लीक़ की ऐसी रोशनी बिखेरी जो आने वाली नस्लों के लिए भी मशअल-ए-राह बनी रहेगी। उनकी हयात इस बात की ज़िंदा तफ़्सीर है कि अगर इरादे बुलंद हों, मुतालआ वसीअ हो और मक़सद पाकीज़ा हो, तो बीड़ी के कारख़ाने की धूल से उठने वाला एक साधारण इंसान भी आलमी अदब के आफ़ाक़ पर आफ़ताब की तरह रौशन हो सकता है। ये भी पढ़ें

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