उर्दू अदब के उस जज़्बाती शायर का तज़्किरा, जिसकी ग़ज़लों की गूँज आज भी महफ़िलों में ज़िंदा है
उर्दू शायरी की तारीख़ में कुछ ऐसे नाम भी दर्ज हैं, जिन्हें शोहरत तो उनकी सलाहियत के मुताबिक़ नहीं मिली, लेकिन जिनकी फ़िक्र, एहसास और कलाम ने अदबी हल्क़ों में हमेशा अपनी अलग पहचान क़ायम रखी। ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी उन्हीं चंद ख़ामोश लेकिन बेहद असरअंगेज़ शायरों में शामिल हैं। उनकी शायरी में दर्द की गहराई, मुहब्बत की नज़ाकत, ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तें और इंसानी जज़्बात की सच्ची तस्वीर एक साथ नज़र आती है।
उनका अस्ल नाम मुज़फ़्फ़र हुसैन था, मगर अदबी दुनिया ने उन्हें उनके तख़ल्लुस "ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी" के नाम से हमेशा याद रखा। वह ऐसे दौर के शायर थे, जब साहिर लुधियानवी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी और फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे अज़ीम शायर उर्दू अदब के आसमान पर चमक रहे थे। इसी दौर में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी ने अपनी अलग रवायत, दिलकश तरन्नुम और जज़्बाती ग़ज़लों के ज़रिए मुशायरों में ऐसी पहचान बनाई कि लोग उनकी आवाज़ सुनने के लिए बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे।
जन्म, ख़ानदान और बचपन
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का जन्म 20 जुलाई 1932 को उत्तर प्रदेश के ज़िला ग़ाज़ीपुर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में एक शरीफ़ और दीनी ख़ानदान में हुआ। उनके वालिद का नाम मुनव्वर हुसैन था, जो नेक-पारसा और इल्म-दोस्त इंसान माने जाते थे।
बचपन से ही मुज़फ़्फ़र हुसैन बेहद ख़ामोश, मुतफ़क्किर और हस्सास मिज़ाज के मालिक थे। आम बच्चों की तरह शोर-शराबे के बजाय उन्हें किताबों, इल्म और तन्हाई से गहरी दिलचस्पी थी। यही ख़ामोशी आगे चलकर उनकी शायरी की पहचान बनी और उन्होंने अपना तख़ल्लुस भी "ख़ामोश" इख़्तियार किया।
तालीम और इल्मी सफ़र
उनकी इब्तिदाई तालीम घर और मदरसा चश्म-ए-रहमत से शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने मदरसा चश्म-ए-रहमत ओरिएंटल कॉलेज, ग़ाज़ीपुर से मुनशी, फ़ारसी और उर्दू की आला तालीम हासिल की। बाद में 1953 में जामिआ उर्दू, अलीगढ़ से अदीब-ए-माहिर और अदीब-ए-कामिल की सनदें भी हासिल कीं।
इल्म से उनकी मुहब्बत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तालीम मुकम्मल करने के बाद वह उसी मदरसे में उर्दू के उस्ताद मुक़र्रर हुए, जहाँ कभी ख़ुद तालीम हासिल की थी। सन 1953 से 1956 तक उन्होंने बच्चों को उर्दू पढ़ाई और इल्म की शम्अ रौशन की।
शायरी की दुनिया में पहला क़दम
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी को बचपन से ही शेर-ओ-शायरी का ज़ौक़ था। उनके उस्ताद अब्दुल ग़ौस ग़ाज़ीपुरी ने उनकी सलाहियत को पहचाना और इस्लाह देना शुरू किया। बाद में वह मशहूर शायर सरोश मछलीशहरी के शागिर्द भी बने।
यह वही दौर था जब मुल्क भर के मुशायरों में साहिर लुधियानवी, शकील बदायूँनी, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जैसे अज़ीम शायर अपनी बुलंदी पर थे। ऐसे मुश्किल दौर में भी ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी ने अपनी अलग पहचान बनाई।
उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत उनका दिलकश तरन्नुम था। जब वह मुशायरे के मंच पर ग़ज़ल पढ़ना शुरू करते, तो महफ़िल देर तक तालियों और "वाह-वाह" से गूँज उठती। धीरे-धीरे वह उत्तर भारत के सबसे मक़बूल मुशायरा-निगार शायरों में शुमार किए जाने लगे। कई बार तो महीनों तक उनका मुशायरों का सफ़र जारी रहता था।
ग़ाज़ीपुर का फ़ख़्र
ग़ाज़ीपुर ज़िला हमेशा से अदबी और इल्मी शख़्सियतों की सरज़मीन रहा है। राही मासूम रज़ा, गोपाल राम गहमरी, भोलानाथ गहमरी, हारून रशीद और दूसरे कई नामों के साथ ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का नाम भी उसी फ़ख़्र से लिया जाता है।
अगर राही मासूम रज़ा ने अफ़साना और नॉवेल को नई बुलंदी दी, तो ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी ने अपनी ग़ज़लों के ज़रिए मुशायरों को नई रवानी बख़्शी।
उनकी शायरी की ख़ुसूसियत
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की शायरी महज़ इश्क़-ओ-मुहब्बत तक महदूद नहीं थी। उनकी ग़ज़लों में इंसानी जज़्बात, तन्हाई, रूहानी कैफ़ियत, ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ, समाजी नाइंसाफ़ी और उम्मीद की हल्की-सी शम्अ एक साथ दिखाई देती है।
उनके अशआर में बनावट नहीं, बल्कि ज़िंदगी का जिया हुआ दर्द बोलता है। यही वजह है कि उनका कलाम पढ़ने वाले के दिल में सीधे उतर जाता है।
फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' और मशहूर इख़्तिलाफ़
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की ज़िंदगी का सबसे ज़्यादा चर्चित वाक़िआ उनकी एक ग़ज़ल से जुड़ा है।
उनकी ग़ज़ल—
"हमें काश तुम से मुहब्बत न होती,
कहानी हमारी हक़ीक़त न होती..."
सन 1951 में मशहूर रिसाला "शमा" में शाएअ हो चुकी थी।
बाद में यही मतला फ़िल्म "मुग़ल-ए-आज़म" के एक गीत में इस्तेमाल हुआ, जिसका नाम शकील बदायूँनी से मंसूब किया गया। इस पर उनके दोस्तों ने एहतिजाज किया और बाक़ायदा क़ानूनी नोटिस भी भेजा, हालाँकि ख़ामोश ख़ुद इस तनाज़े को बढ़ाना नहीं चाहते थे।
रिवायतों के मुताबिक़, शकील बदायूँनी ने अपनी दोस्ती का वास्ता देते हुए एक ख़त भेजा और माली एहतिराम के तौर पर कुछ रक़म भी रवाना की। इस वाक़िए के बाद मामला दोस्ताना अंदाज़ में ख़त्म हो गया, लेकिन यह किस्सा आज भी उर्दू अदब की दिलचस्प बहसों में शामिल किया जाता है।
नौकरी, मुश्किलात और जद्दोजहद
ज़िंदगी ने ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी पर हमेशा मेहरबानी नहीं की। वह बेहद हस्सास तबीयत के इंसान थे। निजी परेशानियों और हालात के दबाव में उन्हें शराब की लत लग गई, जिसका असर उनकी ज़ाती और पेशेवर ज़िंदगी पर भी पड़ा।
आख़िरकार उन्हें उस मदरसे की नौकरी छोड़नी पड़ी, जहाँ कभी वह उस्ताद हुआ करते थे। मगर ताज्जुब की बात यह है कि बाद के बरसों में उसी इदारे में उनके एहतिराम में मुशायरों का एहतिमाम भी किया गया। यह उनके अदबी मक़ाम का सबसे बड़ा एतराफ़ था।
ज़ाती ज़िंदगी
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी शादीशुदा थे। शादी के बाद उनके तीन बेटे और एक बेटी हुई। घरेलू ज़िम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने शायरी को कभी नहीं छोड़ा।
उनकी पूरी ज़िंदगी इल्म, अदब, मुशायरों और इंसानी रिश्तों के दरमियान गुज़री। शोहरत उनके पीछे चली, मगर उन्होंने कभी शोहरत का पीछा नहीं किया।
विसाल
शराब की लत और लगातार बिगड़ती सेहत ने आख़िरकार इस हस्सास शायर को हमसे जुदा कर दिया।
सन 1981 में महज़ 49 वर्ष की उम्र में उनका इंतिक़ाल हो गया। उनका मज़ार ग़ाज़ीपुर के इमामबाड़ा क़ब्रिस्तान में मौजूद है।
उनका यूँ कम उम्र में दुनिया से रुख़्सत हो जाना उर्दू अदब का एक ऐसा नुक़सान था, जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं।
मौत के बाद भी ज़िंदा रहने वाला शायर
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी के इंतिक़ाल के बाद सन 1985 में उनका ग़ज़ल-संग्रह "नवा-ए-ख़ामोश" मंज़रे-आम पर आया। इसे उनके अज़ीज़ अहबाब और अदबी साथियों ने "बज़्म-ए-ख़ामोश" के ज़रिए शाएअ कराया, ताकि उनका कलाम आने वाली नस्लों तक महफ़ूज़ रह सके।
आज भी उनके अशआर मुशायरों में पढ़े जाते हैं और अदब के चाहने वाले उन्हें उसी मुहब्बत से याद करते हैं, जिसके वह हक़दार थे।
अदबी विरासत
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की शख़्सियत इस बात की ज़िंदा मिसाल है कि अस्ल अदब शोहरत का मोहताज नहीं होता। उन्होंने न बड़े ओहदों की ख़्वाहिश की, न सरकारी इनामों की। उनका अस्ल सरमाया उनका कलाम था, जो आज भी उर्दू अदब के आशिक़ों के दिलों में साँस ले रहा है।
उनका यह मशहूर शेर आज भी उनकी पूरी ज़िंदगी का तआरुफ़ बनकर सामने आता है—
में वो सूरज हूँ न डूबेगी कभी जिसकी किरन
रात होगी तो सितारों में बिखर जाऊंगा
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी जिस्मानी तौर पर भले ही हमारे दरमियान नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लों की रवानी, उनके एहसास की गर्मी और उनके अल्फ़ाज़ की ख़ुशबू उर्दू अदब की फ़िज़ा में हमेशा महकती रहेगी।
खामोश ग़ाज़ीपुरी की शायरी ग़ज़लें,नज़्मे
1-ग़ज़ल
उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर शब ए ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
चश्म ए साक़ी से पियो या लब ए साग़र से पियो
बे-ख़ुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है
उन की आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
शैख़ करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे
उस के सज्दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं
सब की नज़रों में हो साक़ी ये ज़रूरी है मगर
सब पे साक़ी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं
मय कशी के लिए ख़ामोश भरी महफ़िल में
सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो ये ज़रूरी तो नहीं
2-ग़ज़ल
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का फ़न्नी उस्लूब : दर्द, सादगी और तरन्नुम का दिलनशीं इम्तिजाज
एक तन्क़ीदी तब्सिरा
उर्दू ग़ज़ल की रवायत में कुछ शायर ऐसे भी गुज़रे हैं जिनकी शायरी का शोर बाज़ारों में कम सुनाई दिया, लेकिन अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों में उनकी सदा हमेशा ज़िंदा रही। ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी भी उन्हीं शायरों में से हैं। उनकी शायरी का मुताला करते हुए यह एहसास बार-बार उभरता है कि उन्होंने अल्फ़ाज़ की नुमाइश से ज़्यादा जज़्बात की सच्चाई को अहमियत दी। उनकी ग़ज़लों में बनावट नहीं, बल्कि दिल की कैफ़ियत अपनी पूरी सादगी और असरअंगेज़ी के साथ सामने आती है।
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का फ़न्नी उस्लूब दरअस्ल रवायती उर्दू ग़ज़ल की ख़ूबसूरत रिवायत और जदीद एहसास का ऐसा दिलकश इम्तिजाज है, जहाँ इश्क़ महज़ महबूब की ज़ुल्फ़ों तक महदूद नहीं रहता, बल्कि इंसान की पूरी वुजूदी कैफ़ियत का इस्तिआरा बन जाता है। उनकी शायरी में मुहब्बत, हिज्र, दर्द, तन्हाई, रूहानी बे-ख़ुदी, समाजी तज़ाद और इंसानी फ़ितरत की पेचीदगियाँ एक साथ दिखाई देती हैं।
उनकी मशहूर ग़ज़ल—
"उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं..."
उनके फ़िक्र-ओ-फ़न की सबसे नुमायाँ मिसाल है। इस ग़ज़ल का रदीफ़ "ये ज़रूरी तो नहीं" महज़ एक लफ़्ज़ी तक़रार नहीं, बल्कि पूरी ग़ज़ल की फ़लसफ़ियाना रूह है। हर शेर में वह ज़िंदगी के किसी मुक़र्रर तसव्वुर को सवालिया अंदाज़ में पेश करते हैं और क़ारी को यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि हक़ीक़त हमेशा ज़ाहिर से मुख़्तलिफ़ भी हो सकती है।
मिसाल के तौर पर—
"नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,उन की आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं।"
इस शेर में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी ने इश्क़ को रिवायती रोमानी तसव्वुर से निकालकर इंसानी सब्र और ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त से जोड़ दिया है। यह शेर अपने मफ़हूम में जितना सादा है, उतना ही गहरा भी है। यही ख़ामोश की फ़न्नी कमालियत है कि वह मुश्किल फ़लसफ़ों को बेहद आसान अल्फ़ाज़ में बयान कर देते हैं।
इसी तरह—
"शैख़ करता तो है मस्जिद में ख़ुदा को सज्दे,उस के सज्दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं।"
यह शेर उनके तन्क़ीदी शऊर और समाजी बसीरत का आइना है। यहाँ शायर किसी मज़हब या अकीदे पर एतराज़ नहीं करता, बल्कि रियाकारी और बे-रूह इबादत पर नर्म लेकिन बेहद असरदार तन्क़ीद करता है। यही अंदाज़ उर्दू ग़ज़ल की उस रवायत से जुड़ता है, जहाँ मीर, ग़ालिब और इक़बाल ने भी ज़ाहिर और बातिन के फ़र्क़ को अपने-अपने अंदाज़ में उजागर किया।
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की दूसरी मशहूर ग़ज़ल—
"हमें काश तुमसे मुहब्बत न होती..."
उनकी जज़्बाती शायरी की बुलंदी का बेहतरीन नमूना है। इस ग़ज़ल में मुहब्बत किसी फ़िल्मी तखय्युल का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसी रूहानी कैफ़ियत है जो इंसान को उसकी अपनी हदों से आगे ले जाती है। यहाँ दर्द में शिकवा कम और तस्लीम-ओ-रज़ा का रंग ज़्यादा दिखाई देता है।
ख़ास तौर पर—
"न दिल तुम को देते न मजबूर होते,न दुनिया न दुनिया के दस्तूर होते।"
इस शेर में मुहब्बत के साथ-साथ समाजी बंदिशों पर भी बारीक इशारा मौजूद है। यही दो-जहती मानी (Double Layered Meaning) ख़ामोश की शायरी को महज़ इश्क़िया ग़ज़ल नहीं रहने देती, बल्कि उसे फ़िक्र का दर्जा अता करती है।
फ़न्नी एतिबार से देखा जाए तो ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की सबसे बड़ी ख़ूबी ज़बान की सादगी है। उन्होंने न लफ़्ज़ों की पेचीदगी का सहारा लिया, न मुश्किल इस्तिआरों का। उनकी ग़ज़लों में रोज़मर्रा की ज़बान, रवाँ बहर, ख़ूबसूरत तरन्नुम और दिल में उतर जाने वाली रवानी मौजूद है। शायद यही वजह है कि उनका कलाम मुशायरों में बेहद मक़बूल हुआ। वह ग़ज़ल पढ़ते नहीं थे, बल्कि जीते थे; और यही एहसास सुनने वालों तक भी मुन्तक़िल हो जाता था।
उनकी शायरी में मीर तक़ी मीर की दर्दमंदी, फ़िराक़ गोरखपुरी की नफ़ासत, साहिर लुधियानवी की फ़िक्र और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इंसान-दोस्ती की हल्की-हल्की झलक महसूस की जा सकती है। लेकिन इसके बावजूद उनका लहजा पूरी तरह उनका अपना है। उन्होंने किसी की नकल नहीं की, बल्कि अपनी ज़िंदगी के तजुर्बों को अपनी आवाज़ दी।
अफ़सोस यह है कि ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी को वह अदबी मक़ाम नहीं मिल सका जिसके वह हक़दार थे। इसका एक सबब उनकी गुमनामी, दूसरा उनकी बेनियाज़ तबीयत और तीसरा उनकी ज़ाती ज़िंदगी के इम्तिहानात रहे। मगर फ़न की दुनिया में अस्ल फ़ैसला वक़्त करता है, और वक़्त ने साबित कर दिया कि उनका कलाम आज भी ताज़गी, असर और अहमियत रखता है।
ज़ाफ़ी नोट
ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी साहब की ज़िंदगी, अदबी ख़िदमात और शायरी से मुतअल्लिक़ तमाम मुस्तनद मालूमात अभी पूरी तरह दस्तयाब नहीं हो सकी हैं। ANTHOUGHT की रिसर्च टीम इस सिलसिले में मुसलसल तहक़ीक़ और दस्तावेज़ी जद्दोजहद में मशग़ूल है। जैसे-जैसे नए, क़ाबिल-ए-एतमाद हवाले, दस्तावेज़, तस्वीरें या दूसरी मुस्तनद मालूमात हासिल होती जाएँगी, उन्हें इस बायोग्राफी में पूरी एहतियात, तहक़ीक़ और ज़िम्मेदारी के साथ शामिल किया जाता रहेगा, ताकि क़ारईन के सामने एक ज़्यादा मुकम्मल, मुस्तनद और भरोसेमंद दस्तावेज़ पेश किया जा सके।
अगर आपके पास ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी साहब से मुतअल्लिक़ कोई मुस्तनद मालूमात, दस्तावेज़, नायाब तस्वीर, किताब, रिसाला, अख़बार की कतरन, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, ख़त, या कोई ऐसा हवाला मौजूद हो जो उनकी शख़्सियत और फ़न को बेहतर तौर पर समझने में मददगार हो, तो बराए-मेहरबानी उसे हमारे साथ ज़रूर साझा कीजिए। आपकी फ़राहम की हुई हर मालूमात की तहक़ीक़ और तस्दीक़ के बाद उसे मुनासिब अंदाज़ में शामिल किया जाएगा।
इसी तरह, अगर किसी अहल-ए-इल्म, मुहक़्क़िक़, अहल-ए-अदब या क़ारी को इस बायोग्राफी में किसी मालूमात, तारीख़, हवाले या बयान के बारे में कोई ख़ता, कमी या इज़ाफ़े की गुंजाइश महसूस हो, तो हम उनसे अदब के साथ दरख़्वास्त करते हैं कि हमें ज़रूर आगाह फ़रमाएँ। ANTHOUGHT अपनी हर तहरीर को एक ज़िंदा दस्तावेज़ (Living Document) मानता है, जो नई तहक़ीक़ और मुस्तनद हवालों की रोशनी में वक़्त के साथ मुसलसल बेहतर होता रहता है। सही मालूमात की इस मुश्तरका कोशिश में आपका तआवुन हमारे लिए बेहद क़ीमती और क़ाबिल-ए-क़द्र है।
