उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो महज़ आवाज़ नहीं रहतीं, बल्कि अपने अहद की फ़िक्र, बेचैनी, कर्ब, एहतेजाज और आरज़ुओं की तर्जुमान बन जाती हैं। ऐसी आवाज़ें वक़्त की गर्द में गुम नहीं होतीं, बल्कि गुज़रे हुए ज़मानों से निकलकर आने वाली नस्लों के ज़ेहन से हमकलाम रहती हैं। किश्वर नाहिद भी उर्दू अदब की ऐसी ही बुलंद, बेबाक और पुरअसर आवाज़ हैं, जिन्होंने अपनी शायरी के ज़रिये औरत के वजूद, उसकी ख़ुदमुख़्तारी, उसकी इज़्ज़त-ए-नफ़्स और उसके मुसावी हुक़ूक़ के सवाल को न सिर्फ़ अदबी बहस का हिस्सा बनाया, बल्कि उसे एक व्यापक इंसानी और समाजी सरोकार में तब्दील कर दिया।
उनका नाम उर्दू शायरी में उस रवायत की अलामत है जिसमें शायरी महज़ हुस्न-ओ-इश्क़ की दिलकश कैफ़ियतों का बयान नहीं, बल्कि ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों से आँख मिलाने का हौसला भी है। किश्वर नाहिद के यहाँ लफ़्ज़ सिर्फ़ एहसास की तस्वीर नहीं बनाते, बल्कि सवाल उठाते हैं, इस्तिहसाल के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हैं और उस समाजी ढाँचे को चुनौती देते हैं जिसमें औरत की ज़ात को सदियों से बंदिशों, तअस्सुबात और मर्दाना इख़्तियार की ज़ंजीरों में जकड़कर रखा गया।
18 जून 1940 को बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाली किश्वर नाहिद की ज़िंदगी ख़ुद हिंदुस्तान की तारीख़ के एक पुरआशोब दौर की गवाह रही। तक़सीम-ए-हिंद के बाद 1949 में उन्होंने पाकिस्तान की तरफ़ हिजरत की। यह हिजरत महज़ एक जगह से दूसरी जगह मुन्तक़िली नहीं थी, बल्कि उस नस्ल के सामूहिक तजुर्बे का हिस्सा थी जिसने एक ही रात में सरहदों को बदलते, रिश्तों को बिखरते और इंसानी ज़िंदगियों को सियासी फ़ैसलों की ज़द में आते देखा था।
यही पुरआशोब तजुर्बात आगे चलकर उनकी फ़िक्र की बुनियाद बने। उनकी शायरी में जो कर्ब, एहतेजाज, बेदारी और इंसानी हमदर्दी दिखाई देती है, उसके पीछे उनकी अपनी ज़िंदगी और उनके अहद के सामाजिक-सियासी तजुर्बात की गहरी छाप मौजूद है।
आग़ाज़-ए-ज़िंदगी और तालीमी तरबियत
किश्वर नाहिद का ताल्लुक़ एक रवायती सैयद ख़ानदान से था। उनका बचपन उस समाजी फ़िज़ा में गुज़रा जहाँ औरत की ज़िंदगी पर रिवायत, रस्म-ओ-रिवाज और सामाजिक बंदिशों का गहरा असर था। उन्होंने बहुत कम उम्र में यह महसूस कर लिया था कि समाज में औरत और मर्द के लिए पैमाने एक जैसे नहीं हैं। औरत की ख़्वाहिश, उसकी राय, उसकी आज़ादी और उसके फ़ैसले अक्सर दूसरों की मर्ज़ी के ताबे कर दिए जाते हैं।
उनकी इब्तिदाई तालीम घर पर हुई। मुताला और इल्म से उनका रिश्ता बचपन ही से मज़बूत होता गया। आगे चलकर उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.ए. और माशियात में एम.ए. की तालीम हासिल की।
उनके भाई सय्यद इफ़्तिख़ार ज़ैदी ने उनकी तालीमी और अदबी तरबियत में अहम किरदार अदा किया। किताबों, मुताले, बहस और फ़िक्र की दुनिया ने किश्वर नाहिद के ज़ेहन को वह वुसअत अता की जिसने आगे चलकर उनकी शायरी को महज़ जज़्बाती इज़हार के बजाय शऊरी और समाजी एहसास की शायरी बना दिया।
उनके लिए तालीम सिर्फ़ एक सनद हासिल करने का ज़रिया नहीं थी। वह उनके लिए ज़ेहन की आज़ादी और फ़िक्र की वुसअत का रास्ता थी। यही वजह है कि उनकी शायरी में ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं का मुताला एक गहरी समाजी निगाह के साथ दिखाई देता है।
अदबी सफ़र का आग़ाज़
किश्वर नाहिद का अदबी सफ़र उस दौर में परवान चढ़ा जब उर्दू शायरी में नई आवाज़ें अपने लिए जगह बना रही थीं। उन्होंने अपनी शायरी में उन मौज़ूआत को तरजीह दी जिन्हें अक्सर अदबी दुनिया में गौण समझ लिया जाता था।
उनका कलाम ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों, औरत के तजुर्बात, समाजी नाइंसाफ़ी, जिंसी तफ़रीक़, इख़्तियार की असमान तक़सीम और इंसानी आज़ादी जैसे सवालों से हमआहंग है।
उनकी शायरी का कमाल यह है कि वह एहतेजाज को महज़ नारे में तब्दील नहीं होने देतीं। उनके यहाँ बग़ावत के पीछे एक गहरी इंसानी संवेदना है और तल्ख़ी के पीछे एक ऐसा दिल है जो इंसान को ज़िल्लत और इस्तिहसाल से निजात दिलाना चाहता है।
उन्होंने बारह काव्य-संग्रहों के अलावा बच्चों के लिए भी कई किताबें तहरीर कीं। उनकी अदबी विरासत में "लब-ए-गोया", "गलीयाँ, धूप, दरवाज़े" और "दश्त-ए-क़ैस में लैला" जैसी किताबों को विशेष अहमियत हासिल है।
"हम गुनाहगार औरतें": एहतेजाज की एक बुलंद आवाज़
किश्वर नाहिद की शायरी का ज़िक्र हो और "हम गुनाहगार औरतें" का नाम न आए, यह मुमकिन नहीं।
यह नज़्म उनकी अदबी पहचान की सबसे पुरअसर अलामतों में से एक बन चुकी है। इसमें वह उस समाजी रवैये पर सवाल उठाती हैं जहाँ औरत अगर अपनी आवाज़ बुलंद करे, अपने हक़ का मुतालबा करे, अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले ख़ुद करना चाहे या रवायती बंदिशों से बाहर निकलने की कोशिश करे तो उसे बग़ावत, बदचलनी या "गुनाह" के ख़ाने में रख दिया जाता है।
किश्वर नाहिद इस समाजी तअरीफ़ और नैतिक पाखंड को चुनौती देती हैं। उनके यहाँ औरत मज़लूमियत की तस्वीर भर नहीं है; वह अपने वजूद का शऊर रखने वाली, अपने हक़ से वाक़िफ़ और अपनी तक़दीर की तामीर में ख़ुद शरीक होने वाली इंसान है।
यही वजह है कि "हम गुनाहगार औरतें" सिर्फ़ एक नज़्म नहीं रही। वह निस्वानी ख़ुदआगाही, एहतेजाज और ख़ुदमुख़्तारी की अलामत बन गई।
निस्वानी हुक़ूक़ और समाजी जद्दोजहद
किश्वर नाहिद का नारीवाद किसी किताब या फ़लसफ़े से हासिल किया हुआ महज़ एक नज़रिया नहीं था। यह उनकी अपनी ज़िंदगी, उनके मुशाहिदात और उनके समाजी तजुर्बात से निकला हुआ शऊर था।
उन्होंने औरत के हुक़ूक़, उसकी तालीम, उसकी ख़ुदमुख़्तारी और उसकी समाजी हैसियत के लिए अमली तौर पर भी काम किया। इसी सिलसिले में उन्होंने "हव्वा" नामक तंज़ीम क़ायम की, जिसका मक़सद औरतों की बेहतरी और उनके हुक़ूक़ के लिए जद्दोजहद करना था।
उनकी फ़िक्र में औरत के लिए सिर्फ़ हमदर्दी काफ़ी नहीं। वह मुसावात, इख़्तियार, इज़्ज़त और इंसानी वक़ार की हक़दार है।
किश्वर नाहिद की शायरी इसी एहसास को बार-बार ज़िंदा करती है कि जिस समाज में आधी आबादी को अपने फ़ैसलों का हक़ हासिल न हो, वहाँ इंसाफ़ और मुसावात का दावा अधूरा है।
"बुरी औरत की ख़ता": ख़ुद अपनी कहानी कहने का हौसला
किश्वर नाहिद की आत्मकथा "बुरी औरत की ख़ता" उनकी शख़्सियत और फ़िक्र को समझने के लिए एक अहम दस्तावेज़ की हैसियत रखती है।
"बुरी औरत"—यह ताबीर अपने आप में एक पूरा समाजी फ़लसफ़ा समेटे हुए है। वह औरत जो सवाल करे, जो अपनी राय रखे, जो अपने हक़ की बात करे, जो समाज की तय की हुई हदों को मानने से इनकार करे—उसे अक्सर "बुरी" क़रार दे दिया जाता है।
किश्वर नाहिद ने इसी तसव्वुर को उलटकर देखा।
उनकी आत्मकथा में ज़िंदगी के निजी तजुर्बात, रिश्तों की पेचीदगियाँ, समाजी बंदिशें और एक औरत के रूप में अपनी पहचान को बरक़रार रखने की जद्दोजहद दर्ज है। इसमें एक शायरा की शोहरत के पीछे छिपे हुए इंसानी कर्ब और जद्दोजहद की झलक मिलती है।
सियासत, समाज और इंसानियत का रिश्ता
किश्वर नाहिद की फ़िक्र को सिर्फ़ निस्वानी हुक़ूक़ तक महदूद करना उनके अदबी कद को छोटा करना होगा। उनकी निगाह का दायरा इससे कहीं ज़्यादा वसीअ है।
उनकी तहरीरों में जंग, हिंसा, तशद्दुद, कट्टरपंथ, मज़हबी तअस्सुब, समाजी नाइंसाफ़ी और इंसानी आज़ादी जैसे मौज़ूआत भी जगह पाते हैं।
उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर ताल्लुक़ात और अमन की फ़िज़ा पैदा करने की कोशिशों में भी हिस्सा लिया। उनकी फ़िक्र सरहदों की सियासत से ऊपर उठकर इंसान को देखने की कोशिश करती है।
उनके लिए अमन महज़ सियासी इस्तिलाह नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरत है। वह ऐसे समाज की ख़्वाहाँ थीं जहाँ मज़हब इंसान को बाँटने के बजाय उसके अंदर इंसानियत को मज़बूत करे और सरहदें रिश्तों की दुश्मन न बनें।
अदबी अस्लूब और फ़िक्री इम्तियाज़
किश्वर नाहिद की शायरी का अस्लूब अपनी बेबाकी, सादगी, तल्ख़ी और फ़िक्री शिद्दत की वजह से अलग पहचान रखता है।
उनकी शायरी में लफ़्ज़ों की सजावट मक़सद नहीं, बल्कि एहसास की तर्जुमानी है। वह ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ के पीछे सच्चाई को पोशीदा नहीं करतीं। बल्कि उनकी कोशिश रहती है कि लफ़्ज़ हक़ीक़त को उसी शिद्दत से बयान करें जिस शिद्दत से वह उसे महसूस करती हैं।
उनकी नज़्मों में रिवायत और बग़ावत, दर्द और उम्मीद, तन्हाई और एहतेजाज, मोहब्बत और सामाजिक शऊर एक-दूसरे से हमआहंग दिखाई देते हैं।
उनकी आवाज़ में औरत की पुकार है, मगर वह पुकार सिर्फ़ औरत तक महदूद नहीं रहती। वह धीरे-धीरे हर उस इंसान की आवाज़ बन जाती है जो ज़ुल्म, इस्तिहसाल और नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ खड़ा होना चाहता है।
अहम अदबी कृतियाँ
किश्वर नाहिद की अदबी ख़िदमात का दायरा काफ़ी वसीअ है। उनकी अहम रचनाओं में शामिल हैं:
लब-ए-गोया — 1968
गलीयाँ, धूप, दरवाज़े — 1978
दश्त-ए-क़ैस में लैला — 2001
बुरी औरत की ख़ता — आत्मकथा
औरत-मर्द का रिश्ता
हम गुनाहगार औरतें — मशहूर नज़्म
इन रचनाओं में उनकी फ़िक्र के मुख़्तलिफ़ पहलू सामने आते हैं—कहीं ज़ाती एहसासात की गहराई है, कहीं समाजी नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ एहतेजाज, कहीं औरत की ख़ुदआगाही और कहीं इंसानियत के व्यापक सरोकार।
एज़ाज़, इकराम और अदबी एतिराफ़
किश्वर नाहिद की अदबी ख़िदमात को पाकिस्तान के अलावा बैरून-ए-मुल्क भी क़द्र की निगाह से देखा गया। उन्हें उनकी तवील अदबी ख़िदमात के एतिराफ़ में मुख़्तलिफ़ एज़ाज़ात और अवार्ड्स से नवाज़ा गया।
2000 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें "सितारा-ए-इम्तियाज़" से सरफ़राज़ किया। बाद में 2015 में "कमाल-ए-फ़न" से भी नवाज़ा गया।
उनकी तहरीरों और शायरी के मुख़्तलिफ़ ज़बानों में तर्जुमे हुए, जिसकी वजह से उनकी आवाज़ उर्दू अदब के दायरे से निकलकर दुनिया के मुख़्तलिफ़ अदबी हल्क़ों तक पहुँची।
लेकिन किसी अदीब की अस्ल अज़मत उसके एज़ाज़ात की तादाद से नहीं आँकी जाती। उसकी अस्ल क़द्र इस बात से होती है कि उसकी तहरीर कितनी देर तक ज़ेहन को मुतहर्रिक, ज़मीर को बेदार और समाज को सोचने पर मजबूर करती रहती है।
इस कसौटी पर किश्वर नाहिद का अदबी मुक़ाम बेहद अहम है।
किश्वर नाहिद के अदब के असरात
किश्वर नाहिद ने उर्दू अदब में औरत के तसव्वुर को एक नई फ़िक्री जहत अता की। उन्होंने औरत को महज़ किसी रिश्ते की पहचान के तौर पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल इंसानी शख़्सियत के तौर पर पेश किया।
उनकी शायरी ने यह सवाल उठाया कि जिस औरत से समाज ज़िंदगी की तमाम ज़िम्मेदारियाँ निभाने की तवक़्क़ो रखता है, उसे अपने फ़ैसलों, ख़्वाहिशों और मुस्तक़बिल पर इख़्तियार क्यों नहीं दिया जाता?
यही सवाल उनकी शायरी को महज़ निस्वानी शायरी नहीं रहने देता। वह उसे इंसानी वक़ार और मुसावात की शायरी बना देता है।
उनकी फ़िक्र ने बाद की नस्लों की शायरात और अदीबात को अपने तजुर्बात और अपनी आवाज़ को बेबाकी से पेश करने का हौसला दिया। उन्होंने उर्दू अदब में ऐसी फ़ज़ा क़ायम करने में हिस्सा लिया जहाँ औरत अपने बारे में ख़ुद बोल सकती थी—बिना किसी वसीले, वकील या मुख़्तार के।
किश्वर नाहिद: एक रवायत, एक एहतेजाज, एक आवाज़
किश्वर नाहिद की ज़िंदगी और अदब को अगर एक जुमले में समेटने की कोशिश की जाए तो शायद इतना कहना काफ़ी होगा कि वह क़लम को महज़ इज़हार नहीं, बल्कि एहतेजाज और इस्लाह का ज़रिया बनाने वाली शायरा हैं।
उन्होंने अपने दौर की ख़ामोशियों को सुना और उन्हें लफ़्ज़ अता किए। उन्होंने उन दर्दों को बयान किया जिन्हें अक्सर "निजी मसला" कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था। उन्होंने उन बंदिशों पर सवाल उठाया जिन्हें सदियों से "रिवायत" का नाम देकर क़ायम रखा गया।
उनके यहाँ बग़ावत है, मगर बे-मक़सद बग़ावत नहीं; तल्ख़ी है, मगर बे-दर्द तल्ख़ी नहीं; एहतेजाज है, मगर इंसानियत से ख़ाली एहतेजाज नहीं।
यही किश्वर नाहिद की सबसे बड़ी अदबी ख़ूबी है।
उन्होंने साबित किया कि शायरी महज़ दिल की कैफ़ियत बयान करने का फ़न नहीं, बल्कि ज़मीर को बेदार करने का अमल भी है।
उनकी आवाज़ में एक ऐसी औरत बोलती है जो अपने वजूद की पहचान चाहती है, अपने हक़ का मुतालबा करती है और अपने मुस्तक़बिल की तामीर में ख़ुद अपना किरदार अदा करना चाहती है।
और शायद यही वजह है कि किश्वर नाहिद का नाम उर्दू अदब में महज़ एक शायरा के तौर पर नहीं लिया जाता। वह निस्वानी ख़ुदआगाही, समाजी शऊर, इंसानी मुसावात और बेबाक अदबी एहतेजाज की एक बुलंद अलामत बन चुकी हैं।
उनकी शायरी आज भी यह सवाल हमारे सामने रखती है कि अगर समाज में आधी आबादी को ख़ामोश कर दिया जाए, तो क्या इंसानियत की आवाज़ मुकम्मल रह सकती है?
किश्वर नाहिद का जवाब उनकी पूरी अदबी ज़िंदगी में बिखरा हुआ है—नहीं।
क्योंकि जब एक औरत अपने वजूद की हक़ीक़त को पहचान लेती है, जब उसके लफ़्ज़ उसकी ख़ामोशी का बोझ उठा लेते हैं और जब उसका क़लम उसके ज़मीर की आवाज़ बन जाता है, तब उसकी आवाज़ सिर्फ़ उसकी अपनी आवाज़ नहीं रहती—वह पूरे समाज के शऊर की आवाज़ बन जाती है।
यह संस्करण देवनागरी लिपि + अधिकतम फ़सीह/अदबी उर्दू शब्दावली में रखा गया है, ताकि भाषा ANTHOUGHT की “उर्दू अल्फ़ाज़, हिंदी रस्मुल-ख़त” शैली के अधिक क़रीब रहे।
किश्वर नाहिद की शायरी ग़ज़लें,नज़्में
1-ग़ज़ल
दिल को भी ग़म का सलीक़ा न था पहले पहले
उस को भी भूलना अच्छा लगा पहले पहले
दिल था शब-ज़ाद उसे किस की रिफ़ाक़त मिलती
ख़्वाब ता'बीर से छुपता रहा पहले पहले
पहले पहले वही अंदाज़ था दरिया जैसा
पास आ आ के पलटता रहा पहले पहले
आँख आईनों की हैरत नहीं जाती अब तक
हिज्र का घाव भी उस ने दिया पहले पहले
खेल करने को बहुत थे दिल-ए-ख़्वाहिश-दीदा
क्यूँ हवा देख जलाया दिया पहले पहले
उम्र-ए-आइंदा के ख़्वाबों को प्यासा रक्खा
फ़ासला पाँव पकड़ता रहा पहले पहले
नाख़ुन-ए-बे-ख़बरी ज़ख़्म बनाता ही रहा
कू-ए-वहशत में तो रस्ता न था पहले पहले
अब तो उस शख़्स का पैकर भी गुल-ए-ख़्वाब नहीं
जो कभी मुझ में था मुझ जैसा था पहले पहले
अब वो प्यासा है तो हर बूँद भी पूछे निस्बत
वो जो दरियाओं पे हँसता रहा पहले पहले
वो मुलाक़ात का मौसम नहीं आया अब के
जो सर-ए-ख़्वाब सँवरता रहा पहले पहले
ग़म का दरिया मिरी आँखों में सिमट कर पूछे
कौन रो रो के बिछड़ता रहा पहले पहले
अब जो आँखें हुईं सहरा तो खुला हर मंज़र
दिल भी वहशत को तरसता रहा पहले पहले
मैं थी दीवार तो अब किस का है साया तुझ पर
ऐसा सहरा-ज़दा चेहरा न था पहले पहले
2-ग़ज़ल
हसरत है तुझे सामने बैठे कभी देखूँ
मैं तुझ से मुख़ातिब हूँ तिरा हाल भी पूछूँ
दिल में है मुलाक़ात की ख़्वाहिश की दबी आग
मेहंदी लगे हाथों को छुपा कर कहाँ रक्खूँ
जिस नाम से तू ने मुझे बचपन से पुकारा
इक 'उम्र गुज़रने पे भी वो नाम न भूलूँ
तू अश्क ही बन के मिरी आँखों में समा जा
मैं आईना देखूँ तो तिरा अक्स भी देखूँ
पूछूँ कभी ग़ुंचों से सितारों से हवा से
तुझ से ही मगर आ के तिरा नाम न पूछूँ
जो शख़्स कि है ख़्वाब में आने से भी ख़ाइफ़
आईना-ए-दिल में उसे मौजूद ही देखूँ
ऐ मेरी तमन्ना के सितारे तू कहाँ है
तू आए तो ये जिस्म शब-ए-ग़म को न सौंपूँ
3-ग़ज़ल
शाम बाँहों में लिए रात की रानी आई
ऐ मोहब्बत तुझे देने को सलामी आई
तिश्नगी इतनी कि दरिया है मिरी आँखों में
ना-शनासा तिरे होने की गवाही आई
जिस से मंसूब हुआ मेरे ख़यालों का सफ़र
ढूँडने उस को मिरे साथ हवा भी आई
मुझ में मौजूद है वो और नहीं है ज़ाहिर
उस की ख़्वाहिश दर-ओ-दीवार बनाती आई
ज़ख़्म ऐसा था टपकता था लहू आँखों से
उस की ख़्वाहिश दर-ओ-दीवार बनाती आई
ज़ख़्म ऐसा था टपकता था लहू आँखों से
दिल बयाँ कर न सका ऐसी तबाही आई
पुर्सिश-ए-हाल करे कौन किसे है फ़ुर्सत
कब मिरे सहन में ना-दीदा ख़ुदाई आई
4-ग़ज़ल
तिरे क़रीब पहुँचने के ढंग आते थे
ये ख़ुद-फ़रेब मगर राह भूल जाते थे
हमें अज़ीज़ हैं इन बस्तियों की दीवारें
कि जिन के साए भी दीवार बनते जाते थे
सतीज़-ए-नक़्श-ए-वफ़ा था तअल्लुक़-ए-याराँ
वो ज़ख़मा-ए-रग-ए-जां छेड़ छेड़ जाते थे
वो और कौन तिरे क़ुर्ब को तरसता था
फ़रेब-ख़ुर्दा ही तेरा फ़रेब खाते थे
छुपा के रख दिया फिर आगही के शीशे को
इस आईने में तो चेहरे बिगड़ते जाते थे
अब एक उम्र से दुख भी कोई नहीं देता
वो लोग क्या थे जो आठों पहर रुलाते थे
वो लोग क्या हुए जो ऊँघती हुई शब में
दर-ए-फ़िराक़ की ज़ंजीर सी हिलाते थे
5-ग़ज़ल
हवा कुछ अपने सवाल तहरीर देखती है
कि बादलों को भी मिस्ल-ए-ज़ंजीर देखती है
मुझे बुलाता है फिर वही शहर-ए-ना-मुरादी
कि आरज़ू आबलों में तस्वीर देखती है
जो कश्तियों में न बैठ पाए वो घर न पहुँचे
सफ़र की ताईद शाम-ए-तक़्सीर देखती है
बहुत दिनों में सितम के दरिया का ज़ोर टूटा
सरिश्त-ए-शब भी बरहना ताज़ीर देखती है
समुंदरों का उरूज फिर रेत बन गया है
शहाब-ए-साक़िब में रात तफ़्सीर देखती है
हवा चली थी प शहर-ए-जाँ के थे दर मुक़फ़्फ़ल
ये आँख अपने ही ख़्वाब ताख़ीर देखती है
सुबू लिए तिश्नगी खड़ी थी ये जानती थी
कि जाँ-फ़रोशों को क़ौस-ए-शमशीर देखती है
नियाबत-ए-शहर उन के हाथों में अब न होगी
कमान-दारों को शब की ज़ंजीर देखती है
1-नज़्म
ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ
न जान बेचें
न सर झुकाएँ
न हाथ जोड़ें
ये हम गुनहगार औरतें हैं
कि जिन के जिस्मों की फ़स्ल बेचें जो लोग
वो सरफ़राज़ ठहरें
नियाबत-ए-इम्तियाज़ ठहरें
वो दावर-ए-अहल-ए-साज़ ठहरें
ये हम गुनहगार औरतें हैं
कि सच का परचम उठा के निकलें
तो झूट से शाहराहें अटी मिले हैं
हर एक दहलीज़ पे सज़ाओं की दास्तानें रखी मिले हैं
जो बोल सकती थीं वो ज़बानें कटी मिले हैं
ये हम गुनहगार औरतें हैं
कि अब तआक़ुब में रात भी आए
तो ये आँखें नहीं बुझेंगी
कि अब जो दीवार गिर चुकी है
उसे उठाने की ज़िद न करना!
ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ
न जान बेचें
न सर झुकाएँ न हाथ जोड़ें!
2-नज़्म
बंदर चूहा और ख़रगोश
हँसते हँसते थे बेहोश
पास थी एक गिलहरी भी
थी चूहे से मोटी भी
और कुत्ता था मुँह खोले
टाँगों में था नेकर पहने
सब से बड़ी थी लोमड़ी
थी उस की मोटी खोपड़ी
ये सब ही प्यार से रहते थे
सब नाचते गाते हँसते थे
इक दिन वो बोले ख़ुश हो के
हम आँख-मिचोली खेलेंगे
जो पकड़ा जाए चोर बने
उस की आँखों पे पट्टी बंधे
जो भी पकड़ा न जाएगा
आख़िर राजा कहलाएगा
पहले कुत्ते की बारी थी
उस की सब से ही यार थी
उस ने सोचा किस को पकड़ूँ
आख़िर मैं किस को चोर कहूँ
इतने में बोला बंदर भी
आए हैं मियाँ-छछूंदर भी
कहते हैं मैं भी खेलोंगा
मैं आख़िर सब को पकड़ूँगा
कुत्ते ने कहा आने दो इसे
हाँ चोर ज़रा बनने दो इसे
ये सुन के शैख़ी में आ के
ख़ुद आप छछूंदर ने बढ़ के
कुत्ते से कहा मुझ को पकड़ो
मेरे मुँह पे पट्टी बाँधो
मैं हर एक को पकड़ूँगा
आख़िर राजा कहलाऊँगा
अहमक़ थे मियाँ छछूंदर भी
पढ़ते थे अंतर-मंतर भी
कोई भी हाथ न आता था
कोई भी चोर न बनता था
थक थक के हाल ख़राब हुआ
लेकिन न कोई किसी को हाथ लगा
अच्छा नहीं शैख़ी में आना
अच्छा नहीं होता इतराना
तब्सरा:-
किश्वर नाहिद सिर्फ उर्दू अदब की एक बेमिसाल शायरा ही नहीं, बल्कि नारीवाद और सामाजिक बदलाव की एक प्रेरणादायक आवाज़ हैं। उनकी रचनाएँ आज भी समाज में बदलाव लाने और महिलाओं को अपनी आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित करती हैं। उनका साहित्य और उनके विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बन चुकी है।
किश्वर नाहिद ने अपनी लेखनी से यह साबित किया कि मुश्किल हालातों में भी अपनी आवाज़ को बुलंद करना और अपने अधिकारों के लिए खड़ा रहना कितना ज़रूरी है। उनकी सोच और साहित्य हमेशा याद किए जाएंगे और आने वाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा लेकर अपने हक़ के लिए खड़ी रहेंगी।।ये भी पढ़ें
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