इब्तिदाई ज़िंदगी: एक अज़ीमुश्शान शायर की बुनियाद
वली मुहम्मद वली, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल का बानी और उर्दू शायरी का अव्वलीन रहनुमा तसव्वुर किया जाता है, की पैदाइश औरंगाबाद के एक शरीफ़, बाशऊर और तहज़ीबयाफ़्ता ख़ानदान में हुई। उनकी इब्तिदाई ज़िंदगी सादगी, शराफ़त और इल्म-दोस्ती से इबारत थी। बचपन ही से उनके अंदर ज़ेहनी पुख़्तगी, फ़िक्र की गहराई और इल्म हासिल करने का बेपनाह शौक़ मौजूद था। उस दौर की रिवायती इस्लामी तालीम के साथ-साथ उन्होंने अरबी और फ़ारसी ज़बानों पर भी क़ाबिले-रश्क उबूर हासिल किया, जिसकी बदौलत उनके इल्मी और अदबी शऊर में ग़ैर-मामूली वुसअत पैदा हुई।
वली के दिल में बचपन ही से अदब और शायरी का चिराग़ रौशन हो चुका था। अल्फ़ाज़ की नफ़ासत, ख़यालात की लताफ़त और जज़्बात की तर्जुमानी का फ़न उन्हें शुरू ही से अपनी जानिब खींचता रहा। यही वजह थी कि उन्होंने कमसिनी ही में अशआर कहना शुरू कर दिए थे। औरंगाबाद का इल्मी, तहज़ीबी और अदबी माहौल उनकी शख़्सियत की तश्कील और फ़िक्र की परवरिश में निहायत अहम साबित हुआ। इसी ज़मीन ने उनके ज़ेहन को ऐसी जला बख़्शी कि आगे चलकर वही नौजवान उर्दू ग़ज़ल को एक नई पहचान देने वाला अज़ीमुश्शान शायर बना, जिसकी शायरी ने पूरे बर्रे-सग़ीर के अदबी मंज़रनामे पर गहरे और देरपा असरात मुरत्तब किए।
अदबी सफ़र: उर्दू ग़ज़ल के एक नए दौर की इब्तिदा
वली मुहम्मद वली ने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म, सैर-ओ-सफ़र और शायरी की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी। उनका अदबी सफ़र उस वक़्त एक नए मोड़ पर पहुँचा, जब तक़रीबन सन 1700 के आस-पास उन्होंने दिल्ली का रुख़ किया। यह सफ़र सिर्फ़ एक शहर से दूसरे शहर तक पहुँचने का नाम नहीं था, बल्कि उर्दू अदब की तारीख़ में एक ऐसे इंक़िलाबी बाब का आग़ाज़ था, जिसने ग़ज़ल की सिम्त और उसकी रूह, दोनों को बदल कर रख दिया। उस ज़माने में दिल्ली इल्म-ओ-अदब, फ़िक्र-ओ-फ़न और तहज़ीब-ओ-सक़ाफ़त का सबसे बड़ा मरकज़ मानी जाती थी। वली जब अपने दीवान और ग़ज़लों के साथ दिल्ली पहुँचे, तो उनके कलाम ने वहाँ के शायरों, उलेमा और अदबी हल्क़ों को हैरत और इस्तिहसान में मुब्तिला कर दिया। उनकी शायरी की मक़बूलियत ने दिल्ली के शुअरा को फ़ारसी के बजाय उर्दू में ग़ज़ल कहने की नई राह दिखाई और यही लम्हा उर्दू ग़ज़ल की तरक़्क़ी में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
वली की सबसे बड़ी अदबी ख़िदमत यह थी कि उन्होंने ग़ज़ल को फ़ारसी के पेचीदा, तकल्लुफ़-आमेज़ और दरबारी अंदाज़ से निकालकर हिंदुस्तानी ज़िंदगी की सादगी, लताफ़त और दिलनशीनी से हम-आहंग कर दिया। उन्होंने अपनी शायरी में इश्क़-ओ-मोहब्बत की नज़ाकत, हुस्न की दिलफ़रेब कैफ़ियत, इंसानी जज़्बात की सच्चाई और हिंदुस्तानी तहज़ीब की रंगारंग रूह को इस ख़ूबसूरती से समोया कि उनका कलाम हर दिल की आवाज़ बन गया। उनकी ग़ज़लों में नफ़ासत और सादगी, लताफ़त और असरआफ़रीनी का ऐसा दिलकश इम्तिजाज मिलता है, जिसने ख़ास-ओ-आम, दोनों तबक़ों को अपनी जानिब मुतवज्जेह किया। यही वजह है कि वली का कलाम आज भी उर्दू अदब की बेशकीमती विरासत और ग़ज़ल की बुनियादी रिवायत का ज़िंदा नमूना तस्लीम किया जाता है।
वली का फ़न और उस्लूब-ए-शायरी
वली मुहम्मद वली का फ़न, उनका अंदाज़-ए-बयाँ और उस्लूब-ए-शायरी उनकी बुलंद फ़िक्र, बसीरत और मशरिक़ी तहज़ीब का रौशन आईना था। उनके कलाम में लफ़्ज़ों की नफ़ासत, ख़यालात की बुलंदी और जज़्बात की लताफ़त का ऐसा दिलनशीं इम्तिजाज नज़र आता है, जो क़ारी के दिल-ओ-दिमाग़ पर गहरा असर छोड़ता है। उनकी ग़ज़लों में मौसीक़ियत की ऐसी शीरीनी और तरन्नुम की ऐसी कैफ़ियत पाई जाती है कि हर शे'र अपने आप में एक नग़्मा मालूम होता है। उनकी मसनवियों में दिलकश किस्सागोई, तख़य्युल की रंगीनी और बयान की रवानी दिखाई देती है, जबकि क़सीदों में फ़ारसी अदब की नफ़ासत, शाइस्तगी और बलाग़त का ख़ूबसूरत रंग झलकता है।
वली ने अपनी ग़ज़लों में इश्क़-ओ-मोहब्बत के उन नाज़ुक, लतीफ़ और दिलनवाज़ पहलुओं को बयान किया, जिन्हें उस दौर में ज़्यादातर फ़ारसी शायरी का ख़ास मैदान समझा जाता था। मगर उनकी सबसे बड़ी फ़न्नी ख़ूबी यह थी कि उन्होंने इश्क़ को फ़ारसी की तकल्लुफ़-आमेज़ फ़िज़ा से निकालकर हिंदुस्तानी ज़बान, तहज़ीब और एहसासात का लिबास पहनाया। यही वजह है कि उनका कलाम सिर्फ़ ख़ास अहल-ए-ज़ौक़ तक महदूद न रहा, बल्कि अवाम के दिलों में भी बराबर मक़बूल हुआ। उनके अशआर में सादगी और असरआफ़रीनी का ऐसा हसीन संगम मिलता है कि मामूली से अल्फ़ाज़ भी गहरे मानी और दिलनशीं कैफ़ियत अपने अंदर समेटे हुए नज़र आते हैं। उनका हर मिसरा दिल की गहराइयों में उतरकर एहसासात को बेदार कर देता है और क़ारी को मोहब्बत, हुस्न और इंसानी जज़्बात की एक नई दुनिया से आशना कराता है।
मिसाल के तौर पर उनका एक मशहूर शे'र मुलाहिज़ा फ़रमाइए:
"दिल की तमन्ना थी कि हर शब वो मेरे साथ रहे,
अफ़सोस ये कि ख़्वाब में भी दूर वो बसा।"
दिल्ली का सफ़र और उसके असरात
वली मुहम्मद वली का दिल्ली का सफ़र उर्दू अदब की तारीख़ का एक ऐसा रौशन बाब है, जिसने शायरी की रिवायतों को नई सिम्त अता की। जब वह अपने दीवान के साथ दिल्ली पहुँचे, तो वहाँ की अदबी महफ़िलों, इल्मी नशिस्तों और अहल-ए-ज़ौक़ ने उनका दिल खोलकर इस्तिक़बाल किया। उस ज़माने में दिल्ली फ़ारसी अदब का सबसे बड़ा मरकज़ तस्लीम की जाती थी और ज़्यादातर शुअरा फ़ारसी ज़बान ही में अपने फ़न्नी कमाल का इज़हार करते थे। लेकिन वली के दिलनशीं कलाम ने उन्हें पहली बार यह एहसास दिलाया कि उर्दू भी जज़्बात की तर्जुमानी, ख़याल की बुलंदी और फ़न की नफ़ासत में किसी तरह फ़ारसी से कम नहीं।
वली की ग़ज़लों में हिंदुस्तानी ज़िंदगी की महक, ज़बान की शीरी और एहसासात की सच्चाई इस अंदाज़ से समाई हुई थी कि दिल्ली के शायर और अदबी हल्क़े उनके कलाम से बेतहाशा मुतास्सिर हुए। उनकी शायरी ने न सिर्फ़ अहल-ए-क़लम और शुअरा को उर्दू में ग़ज़ल कहने की तरगीब दी, बल्कि अवाम के दिलों में भी उर्दू ज़बान की मोहब्बत और क़ुबूलियत को मज़बूत किया। यही वह तारीख़ी मोड़ था, जहाँ से उर्दू ग़ज़ल को एक नई ज़िंदगी, नई पहचान और नई इज़्ज़त हासिल हुई।
वली की इस फ़न्नी कामयाबी का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि उर्दू शायरी फ़ारसी के साये से निकलकर अपनी मुस्तक़िल शनाख़्त बनाने लगी। दिल्ली के बाद उर्दू ग़ज़ल की जो रिवायत परवान चढ़ी, उसी ने आगे चलकर मीर, सौदा, दर्द, ज़ौक़ और ग़ालिब जैसे अज़ीम शुअरा के लिए राह हमवार की। इस लिहाज़ से वली मुहम्मद वली को सिर्फ़ "बानी-ए-उर्दू ग़ज़ल" ही नहीं, बल्कि उर्दू अदब के उस मुहसिन के तौर पर भी याद किया जाता है, जिसने उर्दू को हिंदुस्तानी अदब की एक मुकम्मल, मुस्तनद और मुअत्तबर ज़बान बनाने में बुनियादी किरदार अदा किया।
वली की अदबी विरासत और आने वाली नस्लों पर उनके असरात
वली मुहम्मद वली की अदबी ख़िदमात और फ़न्नी असरात सिर्फ़ उनके अपने दौर तक महदूद नहीं रहे, बल्कि सदियों तक उर्दू अदब की रूह में ज़िंदा रहे। उन्होंने जिस शायरी की बुनियाद रखी और जिस अंदाज़-ए-बयाँ को रिवाज दिया, वही आगे चलकर उर्दू ग़ज़ल की सबसे मज़बूत रिवायत बन गया। उनके कलाम ने न सिर्फ़ अपने हमअसर शुअरा को मुतास्सिर किया, बल्कि बाद की हर नस्ल को फ़िक्र, ज़बान और फ़न के नए आसमानों से आशना कराया। यही वजह है कि वली को उर्दू ग़ज़ल की तारीख़ में एक ऐसे इमाम और रहनुमा का मक़ाम हासिल है, जिनकी रहनुमाई के बग़ैर उर्दू शायरी की तारीख़ मुकम्मल तसव्वुर नहीं की जा सकती।
वली की शायरी की रवायत से ही आगे चलकर मीर तक़ी मीर, सौदा, ज़ौक़, ग़ालिब और दूसरे बेमिसाल शुअरा ने फ़ैज़ हासिल किया। इन अज़ीमुश्शान शायरों ने अपने-अपने अंदाज़ में उर्दू ग़ज़ल को नई बुलंदियाँ अता कीं, मगर उनकी फ़न्नी बुनियाद में वली की रिवायत और उनके उस्लूब की गहरी झलक साफ़ महसूस की जा सकती है। अगर वली ने उर्दू ग़ज़ल का पहला चराग़ रौशन न किया होता, तो शायद उर्दू अदब को वह रौशन मंज़िल इतनी जल्दी नसीब न होती, जिस पर आज उसे फ़ख़्र हासिल है।
वली मुहम्मद वली ने उर्दू ज़बान को महज़ गुफ़्तगू का ज़रिया नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक मुकम्मल अदबी ज़बान का मुक़ाम दिलाया। उनकी ग़ज़लों ने उर्दू को हिंदुस्तान की सरज़मीं से निकलकर पूरे बर्रे-सग़ीर और फिर दुनिया के मुख़्तलिफ़ मुल्कों तक पहचान और मक़बूलियत बख़्शी। आज भी उनका कलाम उसी ताज़गी, शीरीनी और असरआफ़रीनी के साथ पढ़ा और सराहा जाता है। यही उनकी सबसे बड़ी अदबी विरासत है कि सदियाँ गुज़र जाने के बावजूद उनका नाम उर्दू ग़ज़ल के बानी, मुजद्दिद और अज़ीम मुहसिन के तौर पर पूरे एहतराम और अकीदत के साथ लिया जाता है।
विसाल और उनके बाद का अदबी दौर
वली मुहम्मद वली का विसाल सन 1707 में अहमदाबाद में हुआ। उनके इंतिक़ाल के साथ उर्दू अदब का एक ऐसा रौशन सितारा ग़ुरूब हुआ, जिसने अपनी ज़िंदगी में उर्दू ग़ज़ल को नई ज़िंदगी, नई रवायत और नई शनाख़्त अता की थी। अगरचे उनका जिस्मानी सफ़र ख़त्म हो गया, लेकिन उनका फ़न्नी और अदबी सफ़र सदियों तक जारी रहा। उनका कलाम आने वाली नस्लों के लिए मशअल-ए-राह बन गया और उर्दू शायरी की तारीख़ में उनका नाम हमेशा के लिए नक़्श हो गया।
अहमदाबाद में उनकी मज़ार बरसों तक अहल-ए-अदब, शायरी के दिलदादों और उर्दू ज़बान से मुहब्बत करने वालों के लिए अकीदत और एहतराम का मरकज़ बनी रही। मुल्क के मुख़्तलिफ़ गोशों से लोग वहाँ हाज़िरी देते, फ़ातेहा पढ़ते और उर्दू ग़ज़ल के इस अज़ीम बानी को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते थे। वक़्त के गर्दिशों में उनकी मज़ार को मज़हबी और सियासी तनाज़आत का भी सामना करना पड़ा, लेकिन ऐसे वाक़ियात उनके फ़न्नी मक़ाम, अदबी अज़मत और तारीख़ी हैसियत को कभी मुतज़लज़िल न कर सके। इमारतों को मिटाया जा सकता है, मगर इल्म, अदब और फ़न की रौशनी को कभी ख़ामोश नहीं किया जा सकता।
आज तीन सदियों से ज़्यादा अरसा गुज़र जाने के बावजूद वली मुहम्मद वली का कलाम उसी ताज़गी, शीरी और दिलनवाज़ी के साथ पढ़ा और महसूस किया जाता है। उनकी ग़ज़लें उर्दू अदब की रूह में आज भी ज़िंदा हैं और हर नए दौर के शायरों, मुहक़्क़िक़ीन और अहल-ए-ज़ौक़ के लिए सरचश्मा-ए-इल्हाम बनी हुई हैं। यही उनकी सबसे बड़ी फ़न्नी फ़त्ह और हमेशा बाक़ी रहने वाली अदबी मीरास है कि "बानी-ए-उर्दू ग़ज़ल" के तौर पर उनका नाम ता-क़यामत उर्दू अदब के सुनहरे औराक़ में पूरी अज़मत, एहतराम और अकीदत के साथ दर्ज रहेगा।
वली मुहम्मद वली: उर्दू अदब की एक जावेदाँ मीरास
वली मुहम्मद वली का नाम उर्दू अदब की तारीख़ में हमेशा आब-ओ-ताब के साथ चमकता रहेगा। उन्होंने अपने फ़न, फ़िक्र और ख़लूस से उर्दू ग़ज़ल को वह बुनियाद फ़राहम की, जिस पर आज पूरी उर्दू शायरी की आलीशान इमारत क़ायम है। उनकी शायरी में मोहब्बत की नज़ाकत, इंसानी जज़्बात की सच्चाई, मशरिक़ी तहज़ीब की लताफ़त और ज़िंदगी की दिलनवाज़ कैफ़ियात इस ख़ूबसूरती से समाई हुई हैं कि उनका कलाम हर दौर के क़ारी के दिल को अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। यही वजह है कि सदियाँ गुज़र जाने के बावजूद उनकी ग़ज़लों की ताज़गी, शीरीनी और असरआफ़रीनी में ज़रा भी कमी नहीं आई।
वली ने उर्दू ज़बान को महज़ एक बोलचाल की ज़बान से उठाकर अदब-ओ-शायरी की बुलंदियों तक पहुँचाया। उन्होंने साबित किया कि उर्दू भी नफ़ासत-ए-बयाँ, बलाग़त, फ़िक्र की गहराई और जज़्बात की तर्जुमानी में दुनिया की किसी भी ज़बान से कमतर नहीं। उनकी ग़ज़लों ने उर्दू को ऐसी अदबी हैसियत बख़्शी, जिसने उसे बर्रे-सग़ीर की सबसे मक़बूल और मुअत्तबर अदबी ज़बानों में शामिल कर दिया। यही वजह है कि उन्हें पूरे एहतराम के साथ "बानी-ए-उर्दू ग़ज़ल" कहा जाता है।
उर्दू अदब की पूरी रिवायत पर अगर ग़ौर किया जाए, तो वली मुहम्मद वली की शख़्सियत उसकी बुनियादी कड़ी के तौर पर सामने आती है। उनके बग़ैर उर्दू ग़ज़ल की इर्तिक़ाई दास्तान और उसकी अदबी तारीख़ मुकम्मल नहीं हो सकती। उन्होंने जो चराग़ अपने दौर में रौशन किया था, उसकी रौशनी आज भी उर्दू अदब की महफ़िलों, तहक़ीक़ी इदारों और अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों को मुनव्वर कर रही है। यही उनकी सबसे बड़ी फ़न्नी कामयाबी और जावेदाँ अदबी मीरास है कि उनका नाम ता-क़यामत उर्दू शायरी के सबसे अज़ीम मुहसिनों, रहनुमाओं और बुनियाद-गुज़ारों में पूरे फ़ख़्र, अकीदत और एहतराम के साथ लिया जाता रहेगा।
वली मुहम्मद वली (वली दखनी ) की शायरी,ग़ज़लें
1-ग़ज़ल
मुफ़्लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ए'तिबार खोती है
क्यूँके हासिल हो मुज को जमइय्यत
ज़ुल्फ़ तेरी क़रार खोती है
हर सहर शोख़ की निगह की शराब
मुझ अँखाँ का ख़ुमार खोती है
क्यूँके मिलना सनम का तर्क करूँ
दिलबरी इख़्तियार खोती है
ऐ 'वली' आब उस परी-रू की
मुझ सिने का ग़ुबार खोती है
2-ग़ज़ल
शग़्ल बेहतर है इश्क़-बाज़ी का
क्या हक़ीक़ी ओ क्या मजाज़ी का
हर ज़बाँ पर है मिस्ल-ए-शाना मुदाम
ज़िक्र तुझ ज़ुल्फ़ की दराज़ी का
आज तेरी भवाँ ने मस्जिद में
होश खोया है हर नमाज़ी का
गर नईं राज़-ए-इश्क़ सूँ आगाह
फ़ख़्र बेजा है फ़ख़्र-ए-राज़ी का
ऐ 'वली' सर्व-क़द को देखूँगा
वक़्त आया है सरफ़राज़ी का
3-ग़ज़ल
तिरा मजनूँ हूँ सहरा की क़सम है
तलब में हूँ तमन्ना की क़सम है
सरापा नाज़ है तू ऐ परी-रू
मुझे तेरे सरापा की क़सम है
दिया हक़ हुस्न-ए-बाला-दस्त तुजकूं
मुझे तुझ सर्व-ए-बाला की क़सम है
किया तुझ ज़ुल्फ़ ने जग कूँ दिवाना
तिरी ज़ुल्फ़ाँ के सौदा की क़सम है
दो-रंगी तर्क कर हर इक से मत मिल
तुझे तुझ क़द्द-ए-राना की क़सम है
किया तुझ इश्क़ ने आलम कूँ मजनूँ
मुझे तुझ रश्क-ए-लैला की क़सम है
'वली' मुश्ताक़ है तेरी निगह का
मुझे तुझ चश्म-ए-शहला की क़सम है
4-ग़ज़ल
आशिक़ के मुख पे नैन के पानी को देख तूँ
इस आरसी में राज़-ए-निहानी कूँ देख तूँ
सुन बे-क़रार दिल की अवल आह-ए-शोला-ख़ेज़
तब इस हरफ़ में दिल के मआनी कूँ देख तूँ
ख़ूबी सूँ तुझ हुज़ूर ओ शमा दम-ज़नी में है
उस बे-हया की चर्ब-ज़बानी कूँ देख तूँ
दरिया पे जा के मौज-ए-रवाँ पर नज़र न कर
अंझुवाँ की मेरे आ के रवानी कूँ देख तूँ
तुझ शौक़ का जो दाग़ 'वली' के जिगर में है
बे-ताक़ती में उस की निशानी कूँ देख तूँ
5-ग़ज़ल
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे
उसे ज़िंदगी क्यूँ न भारी लगे
न छोड़े मोहब्बत दम-ए-मर्ग तक
जिसे यार-ए-जानी सूँ यारी लगे
न होवे उसे जग में हरगिज़ क़रार
जिसे इश्क़ की बे-क़रारी लगे
हर इक वक़्त मुझ आशिक़-ए-पाक कूँ
प्यारे तिरी बात प्यारी लगे
'वली' कूँ कहे तू अगर यक बचन
रक़ीबाँ के दिल में कटारी लगे
तब्सिरा
वली मुहम्मद वली का नाम उर्दू अदब की तारीख़ में महज़ एक शायर के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे फ़न्नकार, मुजद्दिद और बुनियाद-गुज़ार के रूप में दर्ज है, जिसने उर्दू ग़ज़ल को पहली बार मुकम्मल अदबी शऊर, फ़न्नी वक़ार और ज़बानी शनाख़्त अता की। अगर उर्दू ग़ज़ल की तारीख़ का मुतालआ गहराई से किया जाए, तो यह हक़ीक़त वाज़ेह होती है कि जिस शजर ने आगे चलकर मीर, सौदा, दर्द, ज़ौक़ और ग़ालिब जैसे अज़ीमुश्शान शुअरा को अपनी साया-अफ़गनी में परवान चढ़ाया, उसकी पहली मज़बूत जड़ें वली के फ़िक्र-ओ-फ़न ही में पैवस्त थीं। इसी बिना पर उन्हें पूरे एहतराम के साथ "बानी-ए-उर्दू ग़ज़ल" कहा जाता है।
वली की शायरी महज़ इश्क़-ओ-मोहब्बत की दास्तान नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात, रूहानी कैफ़ियात, हुस्न की लताफ़त, ज़िंदगी की रंगीनियों और हिंदुस्तानी तहज़ीब की शीरीनी का एक दिलनवाज़ आईना है। उन्होंने फ़ारसी की पेचीदा, तकल्लुफ़-आमेज़ और दरबारी रवायतों को एक तरफ़ रखकर उर्दू ग़ज़ल को अवाम की ज़बान, एहसासात की सादगी और ज़िंदगी की हक़ीक़त से हम-आहंग कर दिया। यही वजह है कि उनके कलाम में फ़साहत भी है, बलाग़त भी; सादगी भी है, गहराई भी; और लताफ़त भी है, असरआफ़रीनी भी। उनका हर शे'र दिल की गहराइयों में उतरकर एहसास की ऐसी कैफ़ियत पैदा करता है, जो सदियों बाद भी अपनी ताज़गी बरक़रार रखे हुए है।
वली मुहम्मद वली की सबसे बड़ी अदबी कामयाबी यह है कि उन्होंने उर्दू को महज़ गुफ़्तगू की ज़बान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक मुकम्मल अदबी ज़बान का बुलंद मुक़ाम अता किया। उनकी ग़ज़लों ने उर्दू को ऐसी फ़न्नी हैसियत बख़्शी कि आगे चलकर यही ज़बान बर्रे-सग़ीर की सबसे मुअत्तबर अदबी ज़बानों में शुमार की जाने लगी। उनके कलाम ने न सिर्फ़ अपने दौर के अहल-ए-अदब को मुतास्सिर किया, बल्कि आने वाली हर नस्ल के शायरों और नक़्क़ादों के लिए इल्हाम और रहनुमाई का सरचश्मा साबित हुआ।
आज भी जब उर्दू ग़ज़ल की तारीख़ का ज़िक्र होता है, तो वली मुहम्मद वली का नाम सबसे पहले एहतराम और अकीदत के साथ लिया जाता है। उनकी फ़न्नी मीरास, उनके अफ़कार और उनका दिलनशीं उस्लूब उर्दू अदब की रूह में उसी तरह ज़िंदा है, जैसे किसी रौशन चराग़ की लौ सदियों तक तारीकियों को मुनव्वर करती रहती है। वली का कलाम न सिर्फ़ अपने दौर की आवाज़ था, बल्कि हर उस दिल की आवाज़ है, जो मोहब्बत, ख़ुलूस, हुस्न और इंसानियत की क़द्र करना जानता है। यही वजह है कि उनका नाम ता-क़यामत उर्दू अदब के सुनहरे औराक़ में एक जावेदाँ सितारे की मानिंद चमकता रहेगा।
"जिन्हें इश्क़ का तीर कारी लगे,
उन्हें ज़िंदगी क्यों न भारी लगे।"
