Shehzad Ahmad Poet:उर्दू शायरी की रौशनी में डूबा एक दार्शनिक फ़नकार

उर्दू शायरी की तारीख़ में बाज़ नाम ऐसे होते हैं जो महज़ शायर नहीं रहते बल्कि अपने अह्द की फ़िक्री और तहज़ीबी शनाख़्त बन जाते हैं। शहज़ाद अहमद भी उन्हीं मुमताज़ शख़्सियात में शुमार होते हैं जिन्होंने इश्क़ व मुहब्बत के लतीफ़ एहसासात, फ़लसफ़े की गहराइयों, नफ़्सियात के पेचीदा मबाहिस और मुआशरती शऊर को अपनी शायरी में इस अंदाज़ से समोया कि उनका कलाम उर्दू अदब के संजीदा क़ारी के लिए एक फ़िक्री असासा बन गया।



शहज़ाद अहमद का शुमार पाकिस्तान के उन मुमताज़ शुअरा में होता है जिन्होंने ग़ज़ल और नज़्म दोनों असनाफ़ में अपनी इन्फ़िरादियत क़ायम की। उनकी शायरी में जज़्बात की लताफ़त भी है, अक़्ल व दानिश की रौशनी भी, और इंसानी वजूद के असरार व रुमूज़ पर गहरी नज़र भी। वह महज़ शायर नहीं थे बल्कि माहिर-ए-नफ़्सियात, फ़लसफ़ियाना मिज़ाज रखने वाले दानिशवर, मुतर्जिम और अदबी मुन्तज़िम भी थे।

इब्तिदाई ज़िंदगी और तालीम

शहज़ाद अहमद 16 अप्रैल 1932 को बरतानवी हिंदुस्तान के तारीखी शहर अमृतसर में पैदा हुए। उनका बचपन बरसग़ीर की उस तहज़ीबी फ़िज़ा में गुज़रा जहाँ उर्दू ज़बान व अदब अपनी पूरी आब-ओ-ताब के साथ मौजूद था। इब्तिदाई तालीम अमृतसर ही में हासिल की और मैट्रिक का इम्तिहान भी वहीं से पास किया।

1947 की तक़्सीम-ए-हिंद ने लाखों इंसानों की तरह उनकी ज़िंदगी का रुख़ भी बदल दिया। हिजरत के बाद वह पाकिस्तान आ गए और लाहौर को अपनी इल्मी व अदबी सरगर्मियों का मरकज़ बनाया। इल्म से उनकी ग़ैर-मामूली वाबस्तगी ने उन्हें आला तालीम की तरफ़ राग़िब किया। उन्होंने लाहौर के मारूफ़ तालीमी इदारे गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी से 1956 में नफ़्सियात में एम.एससी. की डिग्री हासिल की। बाद-अज़ाँ 1958 में फ़लसफ़े में एम.ए. किया।

नफ़्सियात और फ़लसफ़े की यही इल्मी बुनियादें आगे चलकर उनकी शायरी का बुनियादी हवाला बनीं। यही वजह है कि उनके अशआर में इंसानी नफ़्सियात, वजूदी सवालात और फ़िक्री जुस्तुजू की झलक नुमायाँ तौर पर नज़र आती है।


अदबी सफ़र का आग़ाज़

शहज़ाद अहमद की अदबी ज़िंदगी का आग़ाज़ ज़माना-ए-तालिब-ए-इल्मी ही में हो गया था। उन्हें बचपन ही से शे'र व अदब से गहरा शग़फ़ था। कॉलेज के दिनों में वह मुशायरों में अपना कलाम सुनाते और अदबी हल्क़ों में अपनी शनाख़्त बना रहे थे।

1958 में उनका पहला शे'री मजमूआ "सदफ़" शाए हुआ जिसने अहल-ए-अदब की तवज्जोह अपनी जानिब मबज़ूल कर ली। इस मजमूए ने न सिर्फ़ एक नए शायर की आमद का ऐलान किया बल्कि उर्दू शायरी में एक ऐसे लहजे को मुतआरिफ़ कराया जो रिवायत और जदीदियत के दरमियान एक हसीन तवाज़ुन क़ायम करता था।

इसके बाद उनकी शे'री तख़्लीक़ात का सिलसिला मुसलसल जारी रहा और यके-बाद-दीगरे मुतअद्दिद मजमूए मंज़र-ए-आम पर आते रहे। उनके मारूफ़ शे'री मजमूओं में सदफ़, सितार, बुझती आँखें, जलती, टूटा हुआ पुल और उतरे मेरी ख़ाक पर ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं।


शायरी का फ़िक्री जहान

शहज़ाद अहमद की शायरी का सबसे नुमायाँ वस्फ़ उसकी फ़िक्री गहराई है। वह महज़ जज़्बात के शायर नहीं थे बल्कि इंसानी शऊर के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को अपनी शायरी का मौज़ू बनाते थे। उनके यहाँ मुहब्बत सिर्फ़ एक रूमानी कैफ़ियत नहीं बल्कि इंसानी वजूद की तकमील का इस्तिआरा बनकर सामने आती है।

उनकी ग़ज़लों में इश्क़ की लताफ़त के साथ-साथ ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों का इदराक भी मौजूद है। वह इंसानी रिश्तों, समाजी तज़ादात, रूहानी तजरिबात और फ़िक्री कशमकश को निहायत सलीक़े से शे'री क़ालिब में ढालते हैं।

नफ़्सियात के तालिब-ए-इल्म होने के बाइस उन्हें इंसानी बातिन तक रसाई हासिल थी। इसी लिए उनके अशआर में दिल और ज़ेहन की पेचीदा कैफ़ियात बड़ी फ़न्नी महारत के साथ जल्वागर होती हैं। उनकी शायरी क़ारी को महज़ लुत्फ़-ए-सुख़न ही नहीं देती बल्कि सोचने पर भी मजबूर करती है।


मुतर्जिम, मुहक़्क़िक़ और अदबी मुन्तज़िम

शहज़ाद अहमद की ख़िदमात सिर्फ़ शायरी तक महदूद नहीं रहीं। उन्होंने दुनिया की मुख़्तलिफ़ ज़बानों के मुन्तख़ब कलाम को उर्दू में मुन्तक़िल किया और तर्जुमा के मैदान में भी अहम काम अंजाम दिया। उनके तराजिम ने उर्दू क़ारीन को आलमी अदब से रौशनास कराने में अहम किरदार अदा किया।

वह पाकिस्तान के मुमताज़ अदबी इदारे "मजलिस-ए-तरक़्क़ी-ए-अदब" से भी वाबस्ता रहे और उसके डायरेक्टर की हैसियत से गराँक़द्र ख़िदमात अंजाम दीं। यह इदारा उर्दू अदब के नादिर मख़्तूतात, क़दीम किताबों और इल्मी सरमाए की हिफ़ाज़त व इशाअत के हवाले से ग़ैर-मामूली अहमियत रखता है। शहज़ाद अहमद ने इस इदारे के ज़रिए इल्मी व अदबी विरसे को महफ़ूज़ रखने में नुमायाँ किरदार अदा किया।


एज़ाज़ात व एतराफ़-ए-ख़िदमात

अदब के मैदान में उनकी बेमिसाल ख़िदमात के एतराफ़ में हुकूमत-ए-पाकिस्तान ने उन्हें मुल्क के आला-तरीन सिविल एज़ाज़ात में से एक "प्राइड ऑफ़ परफ़ॉर्मेंस" से नवाज़ा। यह एज़ाज़ इस हक़ीक़त का एतराफ़ था कि शहज़ाद अहमद ने उर्दू ज़बान व अदब के फ़रोग़ में ग़ैर-मामूली किरदार अदा किया।

नब्बे की दहाई में उनकी अदबी ख़िदमात को क़ौमी सतह पर वसीअ पज़ीराई हासिल हुई और वह पाकिस्तान के सफ़-ए-अव्वल के शुअरा में शुमार किए जाने लगे।

वफ़ात

ज़िंदगी के आख़िरी बरसों में शहज़ाद अहमद मुख़्तलिफ़ अवारिज़-ए-सेहत का शिकार रहे। तवील अलालत के बाद 1 अगस्त 2012 को लाहौर में उनका इंतिक़ाल हो गया। उनकी उम्र उस वक़्त अस्सी बरस थी।

उनके इंतिक़ाल से उर्दू अदब एक ऐसे साहिब-ए-फ़िक्र शायर से महरूम हो गया जिसने आधी सदी से ज़्यादा अरसे तक अपने क़लम के ज़रिए उर्दू ज़बान की ख़िदमत की। ताहम अहल-ए-क़लम की तरह वह भी अपने लफ़्ज़ों में ज़िंदा हैं और उनकी शायरी आज भी फ़िक्री बालीदगी और जमालियाती लुत्फ़ का सरचश्मा समझी जाती है।

अदबी मक़ाम

शहज़ाद अहमद उर्दू शायरी के उन मुमताज़ तख़्लीक़कारों में शुमार होते हैं जिन्होंने इश्क़ और फ़लसफ़े, एहसास और अक़्ल, जमाल और शऊर के दरमियान एक नादिर हम-आहंगी पैदा की। उनका कलाम इस बात की रौशन मिसाल है कि शायरी महज़ जज़्बात का इज़हार नहीं बल्कि इंसानी फ़िक्र की गहराइयों तक रसाई का एक मोअस्सिर ज़रिया भी है।

उनकी शख़्सियत और शायरी उर्दू अदब के उफ़ुक़ पर हमेशा एक दरख़्शाँ सितारे की मानिंद रौशन रहेगी, और आने वाली नस्लें उनके फ़िक्री विरसे से उसी तरह फ़ैज़याब होती रहेंगी जिस तरह आज का क़ारी उनके अशआर में ज़िंदगी के नए मआनी तलाश करता है।


शहजाद की शायरी

ग़ज़ल-1

वो मिरे पास है क्या पास बुलाऊँ उस को
दिल में रहता है कहाँ ढूँडने जाऊँ उस को

आज फिर पहली मुलाक़ात से आग़ाज़ करूँ
आज फिर दूर से ही देख के आऊँ उस को

क़ैद कर लूँ उसे आँखों के निहाँ-ख़ाने में
चाहता हूँ कि किसी से न मिलाऊँ उस को

उसे दुनिया की निगाहों से करूँ मैं महफ़ूज़
वो वहाँ हो कि जहाँ देख न पाऊँ उस को

चलना चाहे तो रखे पाँव मिरे सीने पर
बैठना चाहे तो आँखों पे बिठाऊँ उस को

वो मुझे इतना सुबुक इतना सुबुक लगता है
कभी गिर जाए तो पलकों से उठाऊँ उस को

मुझे मालूम है आख़िर को जुदा होना है
लेकिन इक बार तो सीने से लगाऊँ उस को

याद से उस की नहीं ख़ाली कोई भी लम्हा
फिर भी डरता हूँ कहीं भूल न जाऊँ उस को

मुझ पे ये राज़ इसी एक हवाले से खुला
बात उस की है मगर कैसे बताऊँ उस को

ये मिरा दिल मिरा दुश्मन मिरा दीवाना दिल
चाहता है कि सभी ज़ख़्म दिखाऊँ उस को

आज तो धूप में तेज़ी ही बहुत है वर्ना
अपने साए से भी 'शहज़ाद' बचाऊँ उस को


ग़ज़ल-2

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया
वो क्यूँ गया है ये भी बता कर नहीं गया

वो यूँ गया कि बाद-ए-सबा याद आ गई
एहसास तक भी हम को दिला कर नहीं गया

यूँ लग रहा है जैसे अभी लौट आएगा
जाते हुए चराग़ बुझा कर नहीं गया

बस इक लकीर खींच गया दरमियान में
दीवार रास्ते में बना कर नहीं गया

शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तुजू है शर्त
वो अपने नक़्श-ए-पा तो मिटा कर नहीं गया

घर में है आज तक वही ख़ुश्बू बसी हुई
लगता है यूँ कि जैसे वो आ कर नहीं गया

तब तक तो फूल जैसी ही ताज़ा थी उस की याद
जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया

रहने दिया न उस ने किसी काम का मुझे
और ख़ाक में भी मुझ को मिला कर नहीं गया

वैसी ही बे-तलब है अभी मेरी ज़िंदगी
वो ख़ार-ओ-ख़स में आग लगा कर नहीं गया

'शहज़ाद' ये गिला ही रहा उस की ज़ात से
जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया


ग़ज़ल-3

सूरज की किरन देख के बेज़ार हुए हो
शायद कि अभी ख़्वाब से बेदार हुए हो

मंज़िल है कहाँ तुम को दिखाई नहीं देगी
तुम अपने लिए आप ही दीवार हुए हो

एहसास की दौलत जो मिलेगी तो कहाँ से
कुछ भी न रहा पास तो होशियार हुए हो

सोचो तो है मौजूद न सोचो तो नहीं है
जिस दाम में तुम लोग गिरफ़्तार हुए हो

अपने से तग़ाफ़ुल है कि बे-राह-रवी है
क्या सोच के दुनिया के तलबगार हुए हो

ये रिश्ता-ए-दिल तोड़ के क्या तुम को मिला है
टूटे हुए पत्ते की तरह ख़्वार हुए हो

पहले भी कभी नूर का एहसास हुआ था
या आज ही इस ग़म से ख़बर-दार हुए हो

मजनूँ हो तो है ख़ाक उड़ाने से तुम्हें काम
यूसुफ़ हो तो रुस्वा सर-ए-बाज़ार हुए हो

कल तक तो इन आँखों में मुरव्वत की झलक थी
फ़ित्ना हो तो फिर आज ही बेदार हुए हो

कोई उफ़ुक़-ए-दिल पे नुमूदार तो हो ले
तुम किस के क़दम लेने को तय्यार हुए हो

ये छब ये झमक आँख से देखी नहीं जाती
तुम उड़ते हुए वक़्त की रफ़्तार हुए हो

'शहज़ाद' तअस्सुफ़ न करो बे-असरी पर
तुम दस्त-ए-रसा कब थे कि बेकार हुए हो


ग़ज़ल-4

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ
जागते चीख़ते रंगों को कहाँ ले जाऊँ

पैरहन चुस्त हवा सुस्त खड़ी दीवारें
उसे चाहूँ उसे रोकूँ कि जुदा हो जाऊँ

हुस्न बाज़ार की ज़ीनत है मगर है तो सही
घर से निकला हूँ तो उस चौक से भी हो आऊँ

लड़कियाँ कौन से गोशे में ज़ियादा होंगी
न करूँ बात मगर पेड़ तो गिनता जाऊँ

कर रहा हूँ जिसे बदनाम गली-कूचों में
आँख भी उस से मिलाते हुए मैं घबराऊँ

वो मुझे प्यार से देखे भी तो फिर क्या होगा
मुझ में इतनी भी सकत कब है कि धोका खाऊँ

हुस्न ख़ुद एक भिकारी है मुझे क्या देगा
किस तवक़्क़ो पे मैं दामान-ए-नज़र फैलाऊँ

वाक़िआ कुछ भी हो सच कहने में रुस्वाई है
क्यूँ न ख़ामोश रहूँ अहल-ए-नज़र कहलाऊँ

एक मुद्दत से कई साए मिरी ताक में हैं
कब तलक रात की दीवार से सर टकराऊँ

आदमियत है कि है गुम्बद-ए-बे-दर कोई
ढूँडने निकलूँ तो अपना भी न रस्ता पाऊँ

लिए फिरता हूँ ख़यालों का दहकता दोज़ख़
सर से ये बोझ उतारूँ तो ख़ुदा हो जाऊँ

नज़्म -1

में और तू 

मैं वो झूटा हूँ
कि अपनी शाएरी में आँसुओं का ज़िक्र करता हूँ

मगर रोता नहीं
आसमाँ टूटे

ज़मीं काँपे
ख़ुदाई मर मिटे

मुझ को दुख होता है
मैं वो पत्थर हूँ कि जिस में कोई चिंगारी नहीं

वो पयम्बर हूँ कि जिस के दिल में बेदारी नहीं
तुम मुझे इतनी हक़ारत से न देखो

ऐन-मुमकिन है कि तुम मेरा हयूला देख कर
ग़ौर से पहचान कर

अपनी आँखें फोड़ लो
और मैं ख़ाली निगाहों से तुम्हें तकता रहूँ

आगही मुझ को पियारी थी
मगर इस का मआल

ज़िंदगी भर का वबाल
अब लिए फिरता हूँ अपने ज़ेहन में सदियों का बोझ

कुछ इज़ाफ़ा इस में तुम कर दो
कि शायद कोई तल्ख़ी ऐसी बाक़ी रह गई हो

जिस को मैं ने आज तक चक्खा नहीं

नज़्म -2

आँख मिचोली 

वो इक नन्ही सी लड़की
बर्फ़ के गाले से नाज़ुक-तर

हवा में झूलती शाख़ों की ख़ुशबू
उस का लहजा था

चमकते पानियों जैसी सुबुक-रौ
उस की बातें थीं

वो उड़ती तितलियों के रंग पहने
जब मुझे तकती

तो आँखें मीच लेती
मगर अब वो नहीं है

बर्फ़ के गाले भी ग़ाएब हैं
हवा में झूलती शाख़ों में

लहजा है न ख़ुशबू है
चमकते पानियों पर तैरते हैं

खड़खड़ाते ज़र्द-रू पत्ते
वो उड़ती तितलियाँ जिन के परों पर

उस की रंगत थी
ख़ुदा जाने कहाँ किस हाल में हैं

मैं हर उजड़े हुए मौसम में
उस को याद करता हूँ

तो आँखें मीच लेता हूँ

एक तन्क़ीदी तब्सिरा:-

उर्दू अदब की तारीख़ में शहज़ाद अहमद का नाम उन शुअरा में शुमार किया जाता है जिन्होंने शायरी को महज़ जज़्बाती इज़हार का ज़रिया नहीं रहने दिया, बल्कि उसे फ़िक्र, तदब्बुर और इंसानी शऊर की गहराइयों तक पहुँचने का वसीला बना दिया। उनकी शख़्सियत और फ़न का मुताला यह साबित करता है कि वह बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उर्दू ग़ज़ल को एक नया फ़िक्री आयाम देने वाले अहम शायरों में से थे।

शहज़ाद अहमद की शायरी का सबसे नुमायाँ पहलू उसका फ़लसफ़ियाना और नफ़्सियाती मिज़ाज है। चूँकि उन्होंने नफ़्सियात और फ़लसफ़े की बाक़ायदा तालीम हासिल की थी, इसलिए उनके अशआर में इंसानी ज़ेहन, वजूद, मोहब्बत, तन्हाई, ख़ौफ़, उम्मीद और रिश्तों की पेचीदगियाँ गहरी बसीरत के साथ सामने आती हैं। उनकी शायरी को पढ़ते हुए महसूस होता है कि शायर सिर्फ़ दिल की नहीं, बल्कि दिमाग़ और रूह की भी ज़बान बोल रहा है।

उर्दू ग़ज़ल की रिवायत में जहाँ इश्क़ अक्सर मरकज़ी मौज़ू रहा है, वहीं शहज़ाद अहमद ने इश्क़ को एक वसीअ इंसानी तजुर्बे के तौर पर देखा। उनके यहाँ मोहब्बत महज़ रूमानी एहसास नहीं, बल्कि ख़ुद-शनासी और कायनात-शनासी का ज़रिया बन जाती है। यही वजह है कि उनके कलाम में जज़्बात की गर्मी और फ़िक्र की गहराई एक साथ दिखाई देती है।

फ़न्नी एतबार से देखा जाए तो शहज़ाद अहमद की ज़बान निहायत शाइस्ता, नफ़ीस और मुतवाज़िन है। उन्होंने न तो बेवजह पेचीदगी को तरजीह दी और न ही सतही सादगी को। उनके यहाँ लफ़्ज़ अपने पूरे मआनी और जमाली हुस्न के साथ इस्तिमाल होते हैं। यही कारण है कि उनका कलाम आम क़ारी को भी मुतास्सिर करता है और अहल-ए-इल्म व तन्क़ीद को भी अपनी जानिब मुतवज्जेह करता है।

शहज़ाद अहमद की अदबी अहमियत का एक दूसरा पहलू उनका इल्मी और तहक़ीक़ी शऊर है। मजलिस-ए-तरक़्क़ी-ए-अदब से उनकी वाबस्तगी इस बात की दलील है कि वह सिर्फ़ तख़्लीक़कार नहीं थे बल्कि अदबी विरसे के मुहाफ़िज़ भी थे। उन्होंने उर्दू ज़बान और उसके इल्मी सरमाए को महफ़ूज़ रखने में जो किरदार अदा किया, वह उनकी शायरी जितना ही अहम और क़ाबिल-ए-क़द्र है।

अगर उर्दू शायरी के जदीद मंज़रनामे का जायज़ा लिया जाए तो शहज़ाद अहमद एक ऐसी आवाज़ के रूप में सामने आते हैं जिसने फ़ैज़, नासिर काज़मी, अहमद फ़राज़ और जौन एलिया के दौर में अपनी अलग फ़िक्री शनाख़्त कायम की। उनका अंदाज़ न किसी की नकल है और न किसी रवायत की अंधी पैरवी; बल्कि वह अपनी ज़ाती फ़िक्र, इल्मी पसमंज़र और तख़्लीक़ी सलाहियत के बल पर एक मुस्तक़िल मक़ाम हासिल करते हैं।

मजमूई तौर पर कहा जा सकता है कि शहज़ाद अहमद की शायरी उर्दू अदब में फ़िक्र और एहसास के ख़ूबसूरत इम्तिजाज की नुमाइंदगी करती है। उनका कलाम इंसान को सिर्फ़ लुत्फ़-ए-सुख़न ही नहीं देता, बल्कि उसे अपने अंदर झाँकने, ज़िंदगी को नए ज़ावियों से देखने और वजूद के बुनियादी सवालों पर ग़ौर करने की दावत भी देता है। यही वह ख़ुसूसियत है जो शहज़ाद अहमद को अपने अस्र के अहम और पायेदार शुअरा की सफ़ में खड़ा करती है।

शहज़ाद अहमद का अदबी विरसा आज भी तहक़ीक़, तन्क़ीद और मुताले के नए दरवाज़े खोलता है। यही वजह है कि उनका नाम उर्दू शायरी की उस रिवायत में हमेशा एहतराम के साथ लिया जाएगा जहाँ फ़न, फ़िक्र और इंसानियत एक-दूसरे से हम-आहंग नज़र आते हैं।ये भी पढ़ें 

Read More Articles :-

1-Domaining Hindi-English

2-News Hindi


और नया पुराने