Raees Warsi Poet, Journalist: पाकिस्तान से अमेरिका तक उर्दू अदब का सफ़र

 रईस वारसी अस्र-ए-हाज़िर की उर्दू शायरी का वह रौशन और मोअतबर नाम हैं जिन्होंने रिवायत की नज़ाकत, क्लासिकी बह्र की संगीतियात और जदीद दौर के फिक्री तक़ाज़ों को एक हम-आहंग और बामानी वजूद में ढाल कर उर्दू अदब को नई सोच और नई सम्त अता की। 1 मार्च 1963 को कराची, पाकिस्तान में पैदा होने वाले रईस वारसी सिर्फ़ एक साहिब-ए-उस्लूब शायर ही नहीं, बल्कि संजीदा सहाफी, नग़्मा-निगार, टीवी एंकर, अदबी मुंतज़िम और समाजी ख़िदमतगुज़ार भी हैं।

 उनकी शख़्सियत की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह शायरी को महज़ इश्क़, रूमानी कैफ़ियत या जज़्बाती कर्ब तक महदूद नहीं रखते, बल्कि उसे अपने दौर के समाजी, तहज़ीबी, फिक्री और इंसानी मसाइल का आईना बना देते हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी में क्लासिकी लहजा भी है और जदीद हक़ीक़त-पसंदी की गहरी झलक भी।

ख़ानदानी पस-ए-मंज़र और अदबी तरबियत

रईस वारसी एक ऐसे इल्मी और अदबी ख़ानदान में पैदा हुए जहाँ लफ़्ज़ की हुरमत, फ़िक्र की बुलंदी और इज़हार की सच्चाई विरासत में मिली। उनके वालिद जनाब सत्तार वारसी नातिया शायरी के मैदान में एक मशहूर और घर-घर पहचाना जाने वाला नाम हैं, जिनके कलाम में इश्क़-ए-रसूल ﷺ की ख़ुशबू और अकीदत की लतीफ़ कैफ़ियत नुमायां तौर पर महसूस की जाती है। रईस वारसी के दोनों भाई, डॉ. सईद वारसी और रशीद वारसी, भी उर्दू शायरी और सहाफ़त के मैदान में अपनी अलग पहचान रखते हैं। इस तरह रईस वारसी ने बचपन ही से एक ऐसे माहौल में आँख खोली जहाँ शेर-ओ-अदब, मज़हबी शऊर और फिक्री संजीदगी ज़िंदगी का लाज़िमी हिस्सा थे। यही अदबी फ़िज़ा उनके ज़ौक़ की परवरिश और शऊर की तशकील में बुनियादी किरदार अदा करती है।

तालीम और फिक्री नश्व-ओ-नुमा

इब्तिदाई तालीम कराची में मुकम्मल करने के बाद रईस वारसी ने जामिया कराची से इबलाग़-ए-आममा (मास कम्युनिकेशन) में एमए की डिग्री 1987 में हासिल की। सहाफ़त और इबलाग़ के जदीद उसूलों से उनकी यह इल्मी वाक़िफ़ियत बाद में उनके अदबी उस्लूब में भी नज़र आती है, जहाँ वह महज़ जज़्बाती इज़हार पर इक्तिफ़ा नहीं करते, बल्कि शायरी को समाजी संदर्भ और फिक्री गहराई के साथ पेश करते हैं। इस तालीमी मरहले पर उनकी शख़्सियत में जो फिक्री पुख़्तगी और शऊरी वुसअत पैदा हुई, वह उनके कलाम और सहाफ़ती ख़िदमात दोनों में साफ़ झलकती है।

शायरी का आग़ाज़ और अदबी पहचान

रईस वारसी ने कम-उम्री ही में शेर कहना शुरू कर दिया था, मगर 1981 में कराची के एक क़ौमी सतह के मुशायरे में पढ़ी गई ग़ज़ल ने उन्हें अदबी हल्क़ों में बाक़ायदा पहचान अता की। उनके अशआर में उस वक़्त भी एक ऐसा मुनफ़रिद लहजा मौजूद था जो रिवायत से जुड़ा हुआ होने के बावजूद तक़लीद का शिकार नहीं था। 1986 में उनका कलाम मशहूर अदबी रिसाले अफ़कार (कराची) में शाए हुआ, जो उनके अदबी सफ़र में एक अहम संग-ए-मील साबित हुआ। इसके बाद वह मुसलसल उर्दू के बड़े अख़बारों और अदबी रसाइल में शाए होते रहे, जिनमें रोज़नामा जंग, नवाए-वक़्त, मशरिक़, हुर्रियत, अख़बार-ए-जहाँ, अख़बार-ए-ख़वातीन, माहनामा विरसा, माहनामा इदराक और दीगर मुतअद्दिद रसाइल शामिल हैं।

सहाफ़त, मुशायरे और आलमी सतह पर पहचान

रईस वारसी ने मुशायरों को महज़ रस्मी अदबी मजालिस के बजाय फिक्री मुकालमे का ज़रिया बनाया। पाकिस्तान के साथ-साथ हिंदुस्तान और फिर अमरीका में भी वह मुशायरों के मक़बूल और मुसलसल शायर रहे। उनकी शायरी को रेडियो, टीवी और अख़बारात के ज़रिये वसीअ तर सामेईन और क़ारईन तक रसाई मिली। पाकिस्तान और भारत के इलावा मग़रिबी दुनिया में भी उनके इंटरव्यूज़ नशर हुए, जिनमें उन्होंने उर्दू ज़बान की बक़ा, जदीद शायरी के तक़ाज़ों और तहज़ीबी पहचान जैसे मौज़ूआत पर संजीदा और दलील से भरी गुफ़्तगू की।

हिजरत और अमरीका में अदबी ख़िदमात

1989 में रईस वारसी ने अमरीका हिजरत की, मगर इस हिजरत ने उनके अदबी सफ़र को कमज़ोर नहीं किया बल्कि उसे नई वुसअत अता की। न्यूयॉर्क में उन्होंने “उर्दू मरकज़ न्यूयॉर्क” की बुनियाद रखी, जो बाद में अमरीका में उर्दू ज़बान और अदब के फ़रो़ग़ का एक मोअतबर इदारा बन गया। इस इदारे के तहत बाक़ायदा मुशायरे, अफ़साना और नज़्म ख़्वानी की नशिस्तें, तन्क़ीदी इज्लासात और लेक्चर सीरीज़ मुनक़द की जाती रहीं। रईस वारसी इस इदारे के क़ियाम से लेकर आज तक इसके सदर हैं और उर्दू के फ़रो़ग़ को अपनी ज़िंदगी का मक़सद समझते हैं।

आलमी उर्दू कांफ़्रेंस और बैनुल-अक़वामी एतिराफ़

उर्दू मरकज़ न्यूयॉर्क की सबसे बड़ी और तारीख़ी कामयाबी 24 जून 2000 को अक़वाम-ए-मुत्तहिदा के हेडक्वार्टर्स में मुनक़द होने वाली “पहली आलमी उर्दू कांफ़्रेंस” है। इस कांफ़्रेंस में दुनिया भर से उर्दू के मुमताज़ शुअरा, उदबा, नुक़्क़ाद और दानिशवर शरीक हुए। इस अज़ीम अदबी इज्तिमा को अक़वाम-ए-मुत्तहिदा के सेक्रेटरी जनरल, अमरीका के नायब सदर और पाकिस्तान व भारत के सदरों की जानिब से सराहा गया। यह वाक़ेआ रईस वारसी की अदबी बसीरत, इंतज़ामी सलाहियत और आलमी सतह पर उर्दू के वक़ार की अलामत बन गया।

तस्नीफ़ी ख़िदमात और शायरी का मजमूआ

2005 में रईस वारसी का पहला शायरी मजमूआ “आईना हूँ मैं” शाए हुआ, जिसे उर्दू शायरी में एक अहम इज़ाफ़ा तस्लीम किया गया। इस किताब पर गोपी चंद नारंग, फ़रमान फ़तहपुरी, इफ़्तिख़ार आरिफ़, अहमद फ़राज़, अहमद नदीम क़ासमी, जमी़ल जालिबी, ज़मीर जाफ़री और दीगर अकाबिर की तक़ारीज़ शामिल हैं, जो इस बात का वाज़ेह सबूत हैं कि रईस वारसी का कलाम किस क़दर मोअतबर और मायारी है। यह मजमूआ महज़ अशआर का ढेर नहीं, बल्कि एक फिक्री दस्तावेज़ है जिसमें फ़र्द, समाज और दौर के तज़ादात का गहरा शऊर मौजूद है।

रेडियो, टेलीविज़न और इबलाग़ी ख़िदमात

रईस वारसी ने 1979 से 1984 तक रेडियो पाकिस्तान कराची से मुतअद्दिद अदबी और सक़ाफ़ती प्रोग्रामों में हिस्सा लिया। बाद में अमरीका में भी वह मुख़्तलिफ़ उर्दू टीवी चैनलों से वाबस्ता रहे, जहाँ उन्होंने न्यूज़कास्टर, एंकर और प्रोग्राम प्रोड्यूसर की हैसियत से ख़िदमात अंजाम दीं। ITV न्यूयॉर्क, ETN, PTN और आज टीवी जैसे चैनलों पर उनकी मौजूदगी उर्दू नाज़िरीन के लिए एक फिक्री नेअमत साबित हुई।

नग़्मा-निगारी, फ़िल्म और ग़ज़लों की मक़बूलियत

रईस वारसी की शायरी को मौसीक़ी की दुनिया में भी ग़ैर-मामूली पज़ीराई मिली। पाकिस्तान और भारत के अज़ीम गायक—ग़ुलाम अली, उस्ताद ज़ाकिर अली ख़ान, असद अमानत अली ख़ान, हमीद अली ख़ान, परवेज़ मेहदी, रिफ़ाक़त अली ख़ान और दीगर—ने उनकी ग़ज़लें गाईं। फ़िल्म “हम तुम और मम” के लिए लिखे गए उनके गीत उर्दू शायरी को अवामी सतह पर नई पहचान दिलाने में कामयाब रहे।

एहतराम, एवार्ड्स और एतिराफ़-ए-ख़िदमात

रईस वारसी को उनकी अदबी, सक़ाफ़ती और समाजी ख़िदमात के एतिराफ़ में दर्जनों क़ौमी और बैनुल-अक़वामी एवार्ड्स से नवाज़ा गया। अमरीका के सदर जोसेफ़ आर. बाइडन जूनियर की जानिब से 2024 में लाइफ़ टाइम अचीवमेंट एवार्ड, न्यूयॉर्क स्टेट की जानिब से प्रोक्लेमेशन, ओवरसीज़ पाकिस्तानी फ़ाउंडेशन की तरफ़ से “प्राइड ऑफ़ पाकिस्तान” और मुख़्तलिफ़ अदबी इदारों के एज़ाज़ात इस हक़ीक़त की गवाही देते हैं कि रईस वारसी सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू ज़बान के सच्चे सफ़ीर हैं।

मजमूई अदबी मक़ाम

रईस वारसी की शख़्सियत और शायरी उर्दू अदब में उस दौर की नुमाइंदगी करती है जहाँ रिवायत और जिद्दत आपस में टकराती नहीं बल्कि एक-दूसरे को मुकम्मल करती हैं। उनका कलाम दर्द-ए-दिल, सच्चाई, तहज़ीबी शऊर और इंसानी हमदर्दी से लबरेज़ है। आज भी अमरीका में क़ियाम के बावुजूद वह उर्दू ज़बान के चिराग़ को रौशन किए हुए हैं और आने वाली नस्लों के लिए यह पैग़ाम छोड़ते हैं कि ज़बान, तहज़ीब और पहचान सरहदों की मोहताज नहीं होतीं, बल्कि दिलों में ज़िंदा रहती हैं।


रईस वारसी की शायरी,ग़ज़लें नज़्मे 


ग़ज़ल-1


उसे भुला के भी यादों के सिलसिले न गए

दिल-ए-तबाह तिरे उस से राब्ते न गए


किताब-ए-ज़ीस्त के उनवाँ बदल गए लेकिन

निसाब-ए-जाँ से कभी उस के तज़्किरे न गए


मुझे तो अपनी ही सादा-दिली ने लूटा है

कि मेरे दिल से मुरव्वत के हौसले न गए


मैं चाँद और सितारों के गीत गाता रहा

मिरे ही घर से अँधेरों के क़ाफ़िले न गए


'रईस' जुरअत-ए-इज़हार मेरा विर्सा है

क़सीदे मुझ से किसी शाह के लिखे न गए


ग़ज़ल-2

जो देखो तो वो चेहरा अजनबी है

अगर सोचो तो वज्ह-ए-ज़िंदगी है


मुझे है ए'तिराफ़ ए जुर्म ए उल्फ़त

मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है


मिरी आँखें लुटाती हैं जो गौहर

मिज़ाज ए इश्क़ में दरिया-दिली है


मसीहाई न तुम से हो सकेगी

हमारा दर्द-ए-उल्फ़त दाइमी है


तिरा पैकर ख़यालों में बसा है

हर इक सू रौशनी ही रौशनी है


हमें रास आ गई ख़ूबाँ परस्ती

बड़ी दिलकश हमारी ज़िंदगी है


तिरी चाहत का है ये भी करिश्मा

अदू से भी हमारी दोस्ती है


मुझे मय-कश समझता है ज़माना

निगाहों में ख़ुमार-ए-आशिक़ी है


मज़ा जब है वो कह दे बे-ख़ुदी में

क़रार ए जाँ 'रईस' ए वारसी है


ग़ज़ल-3

जो आ सको तो बताओ कि इंतिज़ार करें

वगर्ना अपने मुक़द्दर पे ए'तिबार करें


चराग़-ए-ख़ाना-ए-उम्मीद है अभी रौशन

अभी न तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ को इख़्तियार करें


हमारे तूल-ए-मसाफ़त का ये तक़ाज़ा है

शरीक-ए-हाल तुझे ऐ ख़याल-ए-यार करें


ये गुल-रुख़ों का है शेवा ब-नाम-ए-नाज़-ओ-अदा

निगाह-ए-आशिक़-ए-बिस्मिल को अश्क-बार करें


ये अहल-ए-इश्क़ को ज़ेबा नहीं सर-ए-बाज़ार

जुनूँ के नाम पे दामाँ को तार तार करें


हमारे आबा-ओ-अज्दाद का ये विर्सा है

ज़मीन-ए-दश्त को सर्माया-ए-बहार करें


जवाज़-ए-ज़िंदगी ठहरी है जिस की याद 'रईस'

उसी से दिल के तअल्लुक़ को उस्तुवार करें


ग़ज़ल-4

तेरे पैकर सी कोई मूरत बना ली जाएगी

दिल के बहलाने की ये सूरत निकाली जाएगी


कौन कह सकता था ये क़ौस-ए-क़ुज़ह को देख कर

एक ही आँचल में ये रंगत समा ली जाएगी

काग़ज़ी फूलों से जब मानूस होंगी तितलियाँ

आशिक़ी की रस्म दुनिया से उठा ली जाएगी


आइने में बाल पड़ जाए तो जा सकता नहीं

रेत की दीवार तो फिर से बना ली जाएगी


हम जो कार-ए-आज़री में बे-हुनर ठहरे तो क्या

उन की सूरत शे'र के क़ालिब में ढाली जाएगी


ख़ुद-परस्ती के नशे में जिन को है ज़ो'म-ए-जमाल

आइना देखें तो उन की ख़ुश-ख़याली जाएगी


इश्क़ की फ़ितरत में है परवान ही चढ़ना 'रईस'

हुस्न वो दौलत नहीं जो फिर कमा ली जाएगी


तब्सरा:-

रईस वारसी की शायरी पर गुफ़्तगू करते हुए सबसे पहली बात जो अहसास की शक्ल में सामने आती है, वह यह है कि उनका कलाम महज़ लफ़्ज़ों का हुस्न नहीं, बल्कि फ़िक्र की ज़िम्मेदारी भी अपने दामन में समेटे हुए है। वह उन शुअरा में से हैं जिनके यहाँ ग़ज़ल रिवायती ढाँचे की पाबंद ज़रूर है, मगर उसकी रूह पूरी तरह ज़िंदा, बाशऊर और अस्र-ए-हाज़िर से हम-कलाम नज़र आती है। उनके यहाँ शेर कहना एक फ़न ही नहीं, बल्कि एक नैतिक और तहज़ीबी अमल बन जाता है।

पेश की गई ग़ज़लों में रईस वारसी का जो उस्लूब उभर कर सामने आता है, वह सादगी में गहराई और नज़ाकत में वक़ार का बेहतरीन नमूना है।

“उसे भुला के भी यादों के सिलसिले न गए”
जैसा मिसरा सिर्फ़ एक जज़्बाती कैफ़ियत नहीं, बल्कि इंसानी याददाश्त और वफ़ा की उस मनोवैज्ञानिक सच्चाई की तरफ़ इशारा करता है, जहाँ फ़रामोशी भी याद का ही एक रूप बन जाती है। यह वही शायरी है जो क़ारी को अपने तजुर्बे से जोड़ देती है।

रईस वारसी के यहाँ इश्क़ महज़ रूमानी तसल्ली नहीं, बल्कि एक अख़लाक़ी और फिक्री रवैया है। दूसरी ग़ज़ल में

“मुझे है ए’तिराफ़-ए-जुर्म-ए-उल्फ़त”
जैसा मिसरा इश्क़ को समाजी अदालत के कटघरे में खड़ा करता है, जहाँ मोहब्बत एक “जुर्म” तो है, मगर ऐसा जुर्म जिसे शायर पूरे वक़ार और सरफ़राज़ी के साथ कुबूल करता है। यही अंदाज़ रईस वारसी को सतही आशिक़ों से अलग करता है।

तीसरी ग़ज़ल में इंतिज़ार, उम्मीद और तअल्लुक़ की जो बहस मिलती है, वह उर्दू ग़ज़ल की क्लासिकी रवायत से जुड़ी होने के बावजूद जदीद इंसान की बेचैनी को पूरी शिद्दत से बयान करती है।

“चराग़-ए-ख़ाना-ए-उम्मीद है अभी रौशन”
यह मिसरा दरअसल पूरे दौर की नुमाइंदगी करता है—एक ऐसा दौर जहाँ मायूसी के अँधेरों के बावजूद इंसान उम्मीद का दिया बुझाने पर आमादा नहीं।

चौथी ग़ज़ल में रईस वारसी का तख़य्युल और इस्तिआरा-आफ़री अपने उरूज पर दिखाई देती है। क़ौस-ए-क़ुज़ह, काग़ज़ी फूल, रेत की दीवार और आईना जैसे अलामात उनके यहाँ महज़ सजावटी नहीं, बल्कि तहज़ीबी और फिक्री मफ़हूमात से लबरेज़ हैं।

“इश्क़ की फ़ितरत में है परवान ही चढ़ना”
यह शेर इश्क़ को एक ऐसी क़ुदरती क़ुव्वत के तौर पर पेश करता है जिसे न जमा किया जा सकता है और न ही बाज़ारू माल बनाया जा सकता है—यह सोच रईस वारसी की शायरी को एक बुलंद अख़लाक़ी मक़ाम अता करती है।

मजमूई तौर पर कहा जा सकता है कि रईस वारसी की शायरी रिवायत और जिद्दत के दरमियान एक मज़बूत पुल है। उनके अशआर में न तो बे-मक़सद तजुर्बे हैं और न ही फ़र्ज़ी बग़ावत। वह लफ़्ज़ की हुरमत, फ़िक्र की सच्चाई और इंसानी जज़्बात की पाकीज़गी को साथ लेकर चलते हैं। यही वजह है कि उनका कलाम पढ़ने वाला सिर्फ़ मुतअस्सिर नहीं होता, बल्कि कुछ देर के लिए अपने अंदर झाँकने पर भी मजबूर हो जाता है।

रईस वारसी को अगर अस्र-ए-हाज़िर की उर्दू शायरी का मोअतबर और बाशऊर आवाज़ कहा जाए तो यह कोई मुबालग़ा नहीं, बल्कि एक अदबी हक़ीक़त है—ऐसी हक़ीक़त जो वक़्त के साथ और ज़्यादा वाज़ेह होती जाएगी।

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