Muztar Khairabadi Poet: जॉ निसार अख़्तर, जावेद अख़्तर तक एक ख़ानदान और अदबी विरासत

मुज़्तर ख़ैराबादी (1865–1927) उर्दू अदब की उस रोशन रवायत के अज़ीम शायर थे, जिनकी शायरी में इल्म की गहराई, फ़िक्र की बुलंदी और ज़बान की नफ़ासत एक साथ जलवा-गर नज़र आती है। उत्तर प्रदेश के ख़ैराबाद में पैदा हुए मुज़्तर, मशहूर आलिम, अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी और दानिशवर फ़ज़्ल-ए-हक़ ख़ैराबादी के नवासे थे। वह मशहूर शायर जाँ निसार अख़्तर के वालिद और जावेद अख़्तर के दादा थे।


 अपनी मुलाज़मत के दौरान उन्होंने एक कामयाब ज्यूडिशियल ऑफ़िसर के तौर पर भी ख़िदमात अंजाम दीं, लेकिन उनकी असल पहचान उर्दू शायरी की वह अमानत है, जिसने क्लासिकी अदब में उन्हें हमेशा के लिए एक मुहतरम और फ़रामोश-न-होने वाला मुक़ाम अता किया।

इब्तेदाई ज़िंदगी 

 सैयद मोहम्मद इफ़्तिख़ार हुसैन रिज़वी के नाम से पैदा होने वाले मुज़्तर ख़ैराबादी की परवरिश एक ऐसे ख़ानदान में हुई, जहाँ इल्म, अदब और शायरी साँसों की तरह रची-बसी थी। उनके घर का माहौल दानिश, तहज़ीब और फ़िक्र की रौशनी से मुनव्वर था, जिसने बचपन ही से उनके ज़ेहन में इल्मी ज़ौक़ और शेरी मिज़ाज की बुनियाद डाल दी।

उनकी वालिदा बीबी हिरमन ख़ैराबादी अपने दौर की निहायत बाअस्र, आलिमा और साहिबा-ए-दीवान शायरा थीं। उन्होंने न सिर्फ़ बेटे की तालीम-ओ-तरबियत पर ख़ास तवज्जोह दी, बल्कि शायरी के बारीक उसूल, ज़बान की नफ़ासत और एहसास की लतीफ़ दुनिया से भी उन्हें सबसे पहले आश्ना कराया। यही वजह थी कि मुज़्तर की शेरी तबीयत की पहली उस्ताद उनकी अपनी वालिदा बनीं।

बाद के दौर में उन्होंने उर्दू अदब के नामवर उस्ताद शायर अमीर मीनाई और बिस्मिल से इस्लाह हासिल की। इन अज़ीम उस्तादों की रहनुमाई में उनकी फ़िक्र में गहराई, ज़बान में पुख़्तगी और शेरी फ़न में ऐसी नफ़ासत पैदा हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें क्लासिकी उर्दू शायरी के नुमायाँ और मुस्तनद असातिज़ा की सफ़ में ला खड़ा किया।

इल्म-ओ-अदब की दुनिया में सफ़र

मुज़्तर ख़ैराबादी की अदबी ज़िंदगी महज़ शायरी तक महदूद नहीं थी, बल्कि वह इल्म, तहज़ीब और फ़िक्र की ऐसी रौशन दास्तान है, जिसने उर्दू अदब की तारीख़ में अपना एक नुमायाँ और मुस्तनद मुक़ाम क़ायम किया। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा ख़ैराबाद, टोंक, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल और रामपुर जैसे अदबी और तहज़ीबी मराकिज़ में गुज़ारा। इन मुख़्तलिफ़ शहरों की इल्मी फ़ज़ा, अदबी महफ़िलें, सूफ़ियाना रवायतें और मुख़्तलिफ़ मिज़ाजों ने उनकी फ़िक्र को वुसअत बख़्शी, तखय्युल को परवाज़ दी और उनके कलाम में ऐसी रवानी, नफ़ासत और असर पैदा किया, जिसने उन्हें अपने अहद के मुमताज़ शायरों की सफ़ में ला खड़ा किया।

उनकी वालिदा बीबी हिरमन ख़ैराबादी उनकी पहली उस्ताद थीं। उन्होंने मुज़्तर के दिल-ओ-दिमाग़ को इल्म की रौशनी से मुनव्वर किया और अदब, ज़बान तथा शायरी के लतीफ़ उसूलों से आश्ना कराया। यही तर्बियत आगे चलकर उनके शेरी शऊर की बुनियाद साबित हुई। बाद के दौर में उन्होंने अपने फ़न को और भी सवारा, यहाँ तक कि उनकी शायरी में क्लासिकी उर्दू की शाइस्तगी, फ़िक्र की गहराई और एहसास की नर्मी एक साथ जलवा-गर नज़र आने लगी।

मुज़्तर ख़ैराबादी ने अपने पीछे एक ऐसा अदबी सरमाया छोड़ा, जिसे उर्दू अदब हमेशा एहतराम की निगाह से देखता रहेगा। उनके अहम मजमुओं में "नज़र-ए-ख़ुदा" और "मिलाद-ए-मुस्तफ़ा" ख़ास तौर पर क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। "नज़र-ए-ख़ुदा" में उन्होंने हम्दिया कलाम के ज़रिये ख़ालिक़-ए-कायनात की अजमत, रहमत और कुदरत को निहायत पुरअसर अंदाज़ में बयान किया, जबकि "मिलाद-ए-मुस्तफ़ा" में हुज़ूर सैय्यद-ए-आलम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शान-ओ-अज़मत में ऐसी पुरसोज़ नातें तहरीर कीं, जो आज भी अक़ीदत और मोहब्बत का बेहतरीन नमूना मानी जाती हैं।

इसके अलावा "बेहर-ए-तवील" और "मर्ग-ए-ग़लत की फ़रियाद" जैसी तख़्लीक़ात भी उनके बुलंद फ़न, ज़ेहनी वुसअत और अदबी कमाल की ज़िंदा दलील हैं। उनकी तहरीरों में ज़बान की लताफ़त, ख़याल की बुलंदी, जज़्बात की सच्चाई और फ़िक्र की गहराई इस अंदाज़ से समा गई है कि उनका कलाम आज भी उर्दू अदब के शौक़ीनों के दिलों को मुतअस्सिर करता है और क्लासिकी शायरी की शानदार रवायत का एक दरख़्शाँ बाब तसव्वुर किया जाता है।

अदबी ख़िदमात और ऐज़ाज़ात 

मुज़्तर ख़ैराबादी का नाम उन ख़ुश-नसीब शायरों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने अपनी बुलंद-पाया शायरी, इल्मी बसीरत और अदबी ख़िदमात के ज़रिये उर्दू अदब की तारीख़ में एक लाज़वाल मुक़ाम हासिल किया। उनके कलाम की फ़िक्र-अफ़रोज़ी, ज़बान की नफ़ासत और बयान की दिलनशीं रवानी ने अहल-ए-अदब को इस क़दर मुतअस्सिर किया कि उनके इल्मी-ओ-अदबी कारनामों के एहतिराम में उन्हें "एतबार-उल-मुल्क" और "इफ़्तिख़ार-उश-शुअरा" जैसे बुलंद-पाया अलक़ाब से नवाज़ा गया। ये इज़ाज़ात महज़ ख़िताब नहीं थे, बल्कि उनकी अदबी अज़मत, शेरी कमाल और उर्दू ज़बान के लिए उनकी बे-मिसाल ख़िदमात का खुला एतराफ़ थे।

मुज़्तर ख़ैराबादी ने तख़्लीक़-ए-अदब के साथ-साथ उसकी अशाअत और फ़रोग़ को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझा। इसी जज़्बे के तहत उन्होंने "करिश्मा-ए-दिलबर" नामी अदबी रिसाले की तदवीन और इशाअत का बीड़ा उठाया। यह रिसाला अपने दौर में उर्दू अदब का एक मुअतबर मिम्बर साबित हुआ, जहाँ अहल-ए-क़लम की तख़्लीक़ात को नई ज़िंदगी मिलती थी और अदबी मुबाहिस, शेरी मजमुए तथा इल्मी मक़ालात ज़ौक़-ए-अदब रखने वालों तक पहुँचते थे।

यही वजह है कि मुज़्तर ख़ैराबादी की शख़्सियत महज़ एक कामयाब शायर तक महदूद नहीं रही, बल्कि वह उर्दू अदब के ऐसे मुहाफ़िज़, मुरब्बी और रहनुमा बनकर उभरे, जिनकी इल्मी विरासत और अदबी ख़िदमात आज भी एहतराम के साथ याद की जाती हैं। उनकी ज़िंदगी इस हक़ीक़त की रौशन मिसाल है कि ख़ालिस फ़न, बुलंद अख़्लाक़ और इल्म की ख़िदमत इंसान को ज़माने की गर्द से निकालकर हमेशा के लिए तारीख़ के सफ़्हों पर जावेदाँ कर देती है।

ख़ानदान और अदबी विरासत

मुज़्तर ख़ैराबादी ऐसे ख़ानदान के चिराग़ थे, जिसकी पहचान महज़ नसब से नहीं, बल्कि इल्म, फ़िक्र और अदब की दरख़्शाँ रवायत से होती है। उनकी ज़ात से शुरू होने वाली यह अदबी ज़ंजीर कई नस्लों तक फैली और हर दौर में उर्दू अदब तथा हिंदुस्तानी तहज़ीब को नए फ़िक्र-ओ-फ़न से मालामाल करती रही। मुज़्तर के घराने में शायरी विरासत नहीं, बल्कि एक ज़िंदा तहज़ीब और रूहानी अमानत की हैसियत रखती थी, जो एक नस्ल से दूसरी नस्ल तक पूरी आब-ओ-ताब के साथ मुन्तक़िल होती रही।

वह मशहूर शायर जाँ निसार अख़्तर के वालिद थे, जिन्होंने तरक़्क़ी-पसंद उर्दू शायरी को नई सम्त अता की और अपने कलाम से अदबी दुनिया में एक मुस्तहकम मुक़ाम हासिल किया। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उनके पोते जावेद अख़्तर ने शायरी, गीत-निगारी और अदब के मैदान में ऐसी शोहरत हासिल की, जो सरहदों की मोहताज नहीं रही। उनके दूसरे पोते सलमान अख़्तर ने भी इल्म, फ़िक्र और तहरीर के ज़रिये इस ख़ानदानी विरासत की लाज रखी।

वक़्त के साथ यह अदबी शजर और भी शादाब होता गया। आज फ़रहान अख़्तर, ज़ोया अख़्तर और कबीर अख़्तर जैसी शख़्सियतें अपने-अपने फ़न के ज़रिये इसी रौशन विरासत को नई बुलंदियों तक पहुँचा रही हैं। यूँ मुज़्तर ख़ैराबादी की अदबी रूह महज़ उनकी तख़्लीक़ात में ही नहीं, बल्कि उनकी आने वाली नस्लों के इल्मी और फ़नकारी कारनामों में भी बराबर धड़कती हुई महसूस होती है।

मुज़्तर ख़ैराबादी की यह विरासत इस बात की ज़िंदा गवाही है कि ख़ालिस इल्म, बुलंद फ़िक्र और आला अदब कभी ज़वाल-पज़ीर नहीं होते। उनका कलाम, उनका शेरी अंदाज़ और उनकी अदबी रवायत आज भी अहल-ए-ज़ौक़ के दिलों को मुनव्वर करती है और उर्दू अदब के आसमान पर एक दरख़्शाँ सितारे की तरह अपनी रौशनी बिखेर रही है।

इंतिक़ाल और यादगार विरासत

27 मार्च 1927 को उर्दू अदब का यह दरख़्शाँ सितारा ग्वालियर में हमेशा के लिए ग़ुरूब हो गया। मुज़्तर ख़ैराबादी का इंतिक़ाल न सिर्फ़ उनके अहल-ए-ख़ानदान, बल्कि पूरी अदबी दुनिया के लिए एक गहरा सदमा था। उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद उन्हें ग्वालियर की सरज़मीं में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया, जहाँ उनकी मजार आज भी उनकी इल्मी-ओ-अदबी अज़मत की ख़ामोश गवाह बनी हुई है।

अगरचे वक़्त ने उनकी शख़्सियत को निगाहों से ओझल कर दिया, लेकिन उनका कलाम, उनकी फ़िक्र की बुलंदी, ज़बान की नफ़ासत और एहसास की पाकीज़गी आज भी उसी आब-ओ-ताब के साथ ज़िंदा है। उनकी हम्द, नअत, ग़ज़लें, नज़्में और अदबी तख़्लीक़ात उर्दू अदब के ख़ज़ाने का वह क़ीमती सरमाया हैं, जिससे आज भी अहल-ए-ज़ौक़ रूहानी लुत्फ़ हासिल करते हैं।

मुज़्तर ख़ैराबादी का नाम उन चुनिंदा फ़नकारों में शुमार होता है, जिनका जिस्म ख़ाक में मिल जाता है, मगर जिनका फ़िक्र, फ़न और तख़्लीक़ी असर सदियों तक ज़िंदा रहता है। उर्दू अदब की तारीख़ में उनका मुक़ाम आज भी उतना ही बुलंद, मुस्तनद और क़ाबिल-ए-एहतराम है, जितना उनकी ज़िंदगी के अहद में था। यही उनकी सबसे बड़ी यादगार और सबसे लाज़वाल विरासत है।

ख़ुलासा

मुज़्तर ख़ैराबादी उर्दू अदब के उन बुलंद-पाया शायरों में शुमार किए जाते हैं, जिनके कलाम में जज़्बात की सच्चाई, फ़िक्र की गहराई, इश्क़ की पाकीज़गी और ज़बान की दिलनशीं नफ़ासत एक साथ जलवा-गर नज़र आती है। उन्होंने अपनी शायरी को महज़ जज़्बात के इज़हार का ज़रिया नहीं बनाया, बल्कि उसे इल्म, तहज़ीब, अख़्लाक़ और रूहानियत की ऐसी रौशन तर्जुमान बनाया, जो हर दौर के क़ारी के दिल तक बे-इख़्तियार पहुँच जाती है। उनकी हम्द, नअत, ग़ज़ल और नज़्म में ख़ुलूस, फ़िक्र और फ़न का ऐसा हसीन इम्तिजाज मिलता है, जो उन्हें अपने अस्र के मुमताज़ शायरों में शामिल करता है।

उनकी अदबी ख़िदमात का असर सिर्फ़ उनके ज़माने तक महदूद नहीं रहा, बल्कि आज भी उनका कलाम उसी ताज़गी, उसी असर और उसी अदबी वक़ार के साथ पढ़ा और सराहा जाता है। उन्होंने जिस इल्मी और शेरी रवायत की बुनियाद को मज़बूती बख़्शी, वही रवायत उनके ख़ानदान के ज़रिये आगे बढ़ती रही और उर्दू अदब तथा हिंदुस्तानी तहज़ीब को नई बुलंदियाँ अता करती रही।

मुज़्तर ख़ैराबादी की तख़्लीक़ात उर्दू अदब का एक नायाब सरमाया हैं, जिनमें ज़बान की लताफ़त, ख़याल की बुलंदी और एहसास की पाकीज़गी आज भी पूरी शान के साथ महफ़ूज़ है। यही वजह है कि उनका नाम उर्दू शायरी की तारीख़ में हमेशा एहतराम, मोहब्बत और अदबी अज़मत के साथ लिया जाएगा। उनका फ़न और उनकी विरासत आने वाली नस्लों के लिए मशअल-ए-राह रहेगी और उनकी यादें अहल-ए-अदब के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेंगी।



मुज्तर खैराबादी की शायरी,ग़ज़लें,मशहूर शेर 

ये ग़ज़ल फिल्म लाल क्विला में बहादुर शाह ज़फ़र पर फिल्माया गया और मोहम्मद रफ़ी साहब ने इस खूबसूरत ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी 1960 में 

1- ग़ज़ल 

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ 

किसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त ए ग़ुबार हूँ 


न दवा ए दर्द ए जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं 

न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ 


मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग रूप बिगड़ गया 

जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल ए बहार हूँ 


पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ 

कोई आ के शम जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ 


न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ 

जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ 


मैं नहीं हूँ नग़्मा ए जाँ फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या 

मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ 


न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ 

जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ 

2- ग़ज़ल 

तू मुझे किस के बनाने को मिटा बैठा है 

मैं कोई ग़म तो नहीं था जिसे खा बैठा है 


बात कुछ ख़ाक नहीं थी जो उड़ाई तू ने 

तीर कुछ ऐब नहीं था जो लगा बैठा है 


मेल कुछ खेल नहीं था जो बिगाड़ा तू ने 

रब्त कुछ रस्म नहीं था जो घटा बैठा है
 

आँख कुछ बात नहीं थी जो झुकाई तू ने 

रुख़ कोई राज़ नहीं था जो छुपा बैठा है 


नाम अरमान नहीं था जो निकाला तू ने 

इश्क़ अफ़्वाह नहीं था जो उड़ा बैठा है 


लाग कुछ आग नहीं थी जो लगा दी तू ने 

दिल कोई घर तो नहीं था जो जला बैठा है 


रस्म काविश तो नहीं थी जो मिटा दी तू ने 

हाथ पर्दा तो नहीं था जो उठा बैठा है 

3- ग़ज़ल 

इतने अच्छे हो कि बस तौबा भली 

तुम तो ऐसे हो कि बस तौबा भली 


रस्म ए इश्क़ ए ग़ैर और मैं ये भी ख़ूब 

ऐसी कहते हो कि बस तौबा भली 


मेरी मय नोशी पे साक़ी कह उठा 

इतनी पीते हो कि बस तौबा भली 


वक़्त ए आख़िर और ये क़ौल ए वफ़ा 

दम वो देते हो कि बस तौबा भली 


ग़ैर की बात अपने ऊपर ले गए 

ऐसी समझे हो कि बस तौबा भली 


मैं भी ऐसा हूँ कि ख़ालिक़ की पनाह 

तुम भी ऐसे हो कि बस तौबा भली 


कहते हैं 'मुज़्तर' वो मुझ को देख कर 

यूँ तड़पते हो कि बस तौबा भली 

4- ग़ज़ल 

हम उम्र के साथ हैं सफ़र में 

बैठे हुए जा रहे हैं घर में 


हम लुट गए तेरी रहगुज़र में 

ये एक हुई है उम्र भर में 


अब कौन रहा कि जिस को देखूँ 

इक तू था सो आ गया नज़र में 


हसरत को मिला है ख़ाना ए दिल 

तक़दीर खुली ग़रीब घर में 


आँखें न चुराओ दिल में रह कर 

चोरी न करो ख़ुदा के घर में 


अब वस्ल की रात हो चुकी ख़त्म 

लो छुप रहो दामन ए सहर में 


मैं आप ही उन से बोलता हूँ 

बैठा हूँ ज़बान ए नामा बर में 


'मुज़्तर' करो दिल ही दिल में शिकवे 

रह जाएगी बात घर की घर में 

शख़्सियत और फ़न पर तब्सरा

मुज़्तर ख़ैराबादी की शख़्सियत इल्म, तहज़ीब, वकार और इन्किसारी का ऐसा दिलनशीं संगम थी, जिसकी झलक उनके हर शे'र और हर तहरीर में साफ़ महसूस की जा सकती है। वह उन ख़ुश-नसीब अहल-ए-क़लम में से थे, जिनके किरदार की पाकीज़गी और फ़िक्र की बुलंदी ने उनके फ़न को और भी ज़ियादा असरअंगेज़ बना दिया। उनके यहाँ न शोहरत की हवस थी, न अल्फ़ाज़ की नुमाइश; बल्कि हर मिसरा दिल की गहराइयों से निकलकर एहसास की ऐसी दुनिया आबाद करता है, जहाँ सादगी, ख़ुलूस और अदबी शाइस्तगी अपनी मुकम्मल शान के साथ जलवा-गर नज़र आती है।

मुज़्तर ख़ैराबादी का फ़न क्लासिकी उर्दू शायरी की उस शानदार रवायत का अमीन है, जिसमें ज़बान की लताफ़त, बयान की नफ़ासत, तखय्युल की बुलंदी और मआनी की गहराई एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल जाती हैं कि कलाम महज़ पढ़ा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है। उनकी ग़ज़लों में इश्क़ की पाकीज़ा कैफ़ियत है, नज़्मों में फ़िक्र की रौनक है, हम्द में बंदगी का ख़ुलूस है और नअत में इश्क़-ए-रसूल ﷺ की वह सोज़-ओ-गुदाज़ है, जो दिलों को बेइख़्तियार मुतअस्सिर कर देती है। उनका कलाम बनावट से पाक और तसन्नोअ से बेनियाज़ है; यही वजह है कि वह हर दौर के क़ारी के दिल में अपनी जगह बना लेता है।

मुज़्तर की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि उन्होंने अदब को महज़ तफ़रीह का ज़रिया नहीं समझा, बल्कि उसे इंसानी अख़्लाक़, रूहानी इर्तिक़ा और समाजी शऊर की तामीर का वसीला बनाया। उनकी शायरी में तहज़ीब की ख़ुशबू, इल्म की रौशनी, इश्क़ की नर्मी और हिकमत की गहराई इस ख़ूबसूरती से समा गई है कि उनका हर शे'र अपने अंदर एक मुकम्मल जहान समेटे हुए मालूम होता है।

अगर उर्दू अदब की तारीख़ में उन शायरों का ज़िक्र किया जाए, जिन्होंने अपनी तख़्लीक़ी सलाहियत, बुलंद फ़िक्र और पाकीज़ा एहसास के ज़रिये आने वाली नस्लों के लिए एक रौशन मीनार क़ायम की, तो मुज़्तर ख़ैराबादी का नाम पूरे एहतराम और अकीदत के साथ लिया जाएगा। उनका फ़न वक़्त की गर्द से महफ़ूज़ है, क्योंकि सच्चा अदब कभी फ़ानी नहीं होता। मुज़्तर ख़ैराबादी का कलाम आज भी उसी ताज़गी, उसी दिलकशी और उसी अदबी वक़ार के साथ ज़िंदा है, 
जो उन्हें उर्दू शायरी के आसमान पर हमेशा चमकने वाला एक दरख़्शाँ सितारा बना देता है।ये भी पढ़ें
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